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कथा-कहानी

पड़ोस वाले घर की दादीजी आजकल नेताओं के मिजाज की मानिंद बदली-बदली सी नजर आ रही हैं। यूं तो जब से उन्हें जाना है, उम्र से दस वर्ष पीछे मगर समय से दस साल आगे की वेशभूषा में नजर आती रही हैं।

अभी पिछले ही हफ्ते की बात है। वे गोपगप्पे वाले को अपने दरवाजे के सामने रोककर स्वाद के मजे ले रही थीं। अचानक उनकी मुखाकृति क्रोधित सी दिखी। उनकी भाव-भंगिमा देख ठेलेवाला बोला, ‘दादी, आपके कम दांत होने से कड़क गोलगप्पा मसूड़े में चुभा होगा। दादी का गुस्सा चरम पर था, ‘क्या मैं तेरी भी दादी लगती हूं। चाची-आंटी तक फिर भी ठीक है। और हां, तुमने भरावन में कंकड़ और लकड़ी छोड़ रखी है। मुझे याद आया, एक दिन वह अपने पोते-पोतियों की नकल में अंग्रेजी की शब्द अदायगी करने लगीं। गलती पर बच्चों ने टोका तो बड़ी मासूमियत से दादी ने समझाया, ‘कम दांत होने से उच्चारण ठीक से नहीं हो पाता है न।

पड़ोसी होने के नाते उनके घर मेरा आना-जाना बहुत होता है। उनकी बहू से मेरी छनती भी बहुत है। एक दिन हम लोग रूसी की समस्या पर बातें कर रहे थे। बात उनकी बहू ने शुरू की, पता है, आजकल मेरे बालों में बहुत रूसी हो गई है। मैंने तुरंत उपाय सुझाया, सिर धोने से पहले दही में बेसन घोलकर आधे घंटे तक लगाकर रखिए, फिर धो डालिए। दो दिन बाद पुन: किसी काम से उनके घर जाना हुआ। देखा तो दादीजी अपने बेतरतीज बालों का जूड़ा बनाकर बड़ी अदा से टहल रही हैं। पूछने पर जवाब मिला, दरअसल मेरे बालों में रूसी कुछ ज्यादा ही हो गई है। सो, उपाय कर लिया। अच्छा लगा कि बहू न सही, सास ने ही मेरी बात पर अमल किया। खुशी होती है, उन्हें देखकर। अगर इतना बदलाव और तत्परता युवा पीढ़ी में दिखे तो तसवीर कुछ अलग ही हो।

खैर! लगे हाथों दो दिन पहले की घटना से आपको वाकिफ करा दूं। मैं सुबह की ताजी हवा लेने नजदीक के पार्क में गई। वहां पहले से एक जानी-पहचानी फिगर मगर नई वेश-भूूषा में टहलने में तल्लीन थी। करीब जाने पर मेरा मुंह हैरानी से खुल गया। मच्छर घुसने और किसी और खुराक से बचने हेतु मुंह तुरंत बंद किया। बात कुछ यूं थी कि दादी ने कंधे तक बाल कटा रखे थे और नाइटी पहन रखी थी। मेरे बिना पूछे ही उन्होंने सफाई दे दी। इससे बड़ा आराम है। समय कहां है, बालों को संवारने का और फिर इस पहनावे को धोना-पहनना, उतारना सब आसान है। अब उनसे आगे कौन पूछे कि अस्सी वर्ष को पहुंचती आपकी उम्र में कितने काम निपटाने पड़ते हैं आपको। ये वही दादी हैं, जो दस वर्ष पहले तक अपनी बहुओं को बाल कटवाने पर कुलक्षणा और नाइटी को बेपर्दा वस्त्र कहने से नहीं चूकती थीं। साथ में अपने जमाने की सिर पर पल्लू रखने की परंपरा निभाने की वकालत भी जरूर करती थी।

अब किस-किस जख्म की चर्चा करें, हर जख्म यहां नासूर है। पर बिना कहे पेट भी तो बेतहाशा फूलता है। सो पड़ोसन ने बताया, ‘अरे एक दिन तो हद ही हो गई। सासू मां मेरी चेहरे पर लगाने वाली महंगी क्रीम मजे से और बड़ी मात्रा में बिस्तर पर बैठकर पैरों में लगा रही थीं। मुझे देखते हुए बोली, इससे पैर खूब मुलायम हो रहे हैं। उसने मन के गुस्से को हाथों पर भेज दिया, जिससे पतला चम्मच टेढ़ा हो गया।

मैंने अपनी पड़ोसन और सहेली को दोहरी सलाह दे डाली, ‘सुन, कुढऩे की बजाय खुश रहा कर और उचित समझ तो हर वो नुस्खा अपना, जो बुजुर्गों के अनुकूल हो। क्योंकि तुम्हारी नकल में उन्हें जवानी की आहट का आभास लगता है। इससे ज्यादा कहने की औकात नहीं। डर है कि कहीं कब्र में जाने लिए भी कसीदें न काढ़े क्योंकि लोग यह तो अवश्य कहेंगे कि, ‘बेचारी कम ही उम्र में अल्लाह को प्यारी हो गई।

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