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देर ना हो जाये-21 श्रेष्ठ नारीमन की कहानियां पंजाब: Old People Story
Der Na ho Jae

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

Old People Story: “मम्मी, आप कहाँ थीं, कितनी बार फोन कर चुकी हूँ?”

“माँजी बीमार हैं। उन्हें ही देखने गयी थी।” मम्मी का स्वर उदासी भरा था।

“अच्छा! ओह! अपने माँजी…। क्या हुआ उन्हें?” मैंने स्वाभाविकता से पूछा।

“बस, क्या बताऊँ। तुम आओगी, फिर बताऊँगी।” मम्मी ने आह भरी।

“मैं बस घर से निकल रही थी। तभी आप को फोन कर रही थी।”

“आ जा, फिर जल्दी से। तुम्हारे लिये पालक पनीर बनाया है।”

***

कार में सामान रखते ही मेरा ध्यान माँजी की ओर चला गया। अपने मायके जाते हुए, कार की रफ्तार के साथ मेरे दिमाग में पुरानी यादें चलचित्र के दृश्यों-सी घूमने लगीं।

मेरा बचपन जिस गली-मुहल्ले में बीता, वहाँ हमारे घर से एकदम सटा हुआ घर ‘माँजी’ का था। गली-मुहल्ले में जहाँ हर कोई आप के साथ किसी न किसी रिश्ते से जुड़ा होता है। कोई मासी, कोई माता, कोई चाचा या ताऊ होता है। तब तक आँटी-अंकल जैसे संबोधन हमारे कल्चर का हिस्सा नहीं बने थे। इन रिश्तों की बदौलत ही आपस में अत्यन्त स्नेह और निकटता महसस होती थी। ऐसा नहीं था कि आपस में मन-मटाव या लडाई-झगडा नहीं होता था। कभी-कभी ऐसा हो जाने पर एक-दो दिन आपस में मुँह बना लेने के पश्चात् फिर से वही संबंध बन जाते थे।

एक दिन मम्मी ने देखा कि हमारे घर की बाहरी दीवार के साथ नाली से निकाला गया कूड़ा-करकट पड़ा है। मम्मी ने गुस्से से, वहीं खड़े मुहल्ले के सफाई कर्मचारी से पूछा, “यह कूडा तुमने यहाँ रखा हैं?”

“जी हाँ! इन्होंने नाली साफ करवायी है।” सफाई-कर्मचारी ने माँजी के घर की ओर संकेत करते हुए स्पष्टिकरण दिया।

“नाली साफ करवायी थी तो कूड़ा भी अपनी दीवार के पास रखवाना था न। हमारे घर क्यों बदबू भेजी जा रही है।” मम्मी ने गुस्से से कहा, साथ ही उसे भी डाँटा, “तू भी तो साथ-साथ मुहल्ले की सफाई नहीं करता। उठा कर ले जा इसे। उफ्फ! कितनी बदबू फैली हुई है।” इतना कह मम्मी अंदर आ गयी।

यह बात तो निश्चित थी कि माँजी ने यह सारा वार्तालाप अपने घर में सुन लिया था। उस दिन मम्मी ने माँजी से कोई बात नहीं की। अगले दिन दोपहर में माँजी ने आदत अनुसार मम्मी को आवाज लगाई, “जीत कौर, अभी तेरा काम खत्म नहीं हुआ।”

“नहीं, अभी खत्म नहीं हुआ। आप बताओ जी…।” मम्मी ने व्यस्त होने के कारण अंदर से ही जवाब दिया।

“जीत कौर! सुन, एक आदमी था। उसे एक दिन के लिए हुकूमत करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।” माँजी दहलीज में पालथी लगा कर बैठते हुए बोली।

“अच्छा! लेकिन यह मिला क्यों?” मम्मी सब्जी काटते-काटते पास आ बैठी।

“वो छोड़ो तुम। हुकूमत यह थी कि उसे सभी आने-जाने वालों को पत्थर उठा कर मारना था।”

“पत्थर…?” मम्मी ने हैरानी से फिर पूछा।

“बात को सुनते हैं ध्यान से” माँजी ने समझाया।

“अच्छा, फिर।” मम्मी ने भी कान उधर लगा लिए।

“उसे सारा दिन आने-जाने वालों को पत्थर मारने थे। सारा दिन ऐसे ही चलता रहा। काफी देर के बाद उसे निकटता से जानने वाला एक शख्स निकला। उसने सोचा, मैं इसे पत्थर उठा कर नहीं मार सकता। लेकिन अब करे क्या…। उसने सोचा और पास रखा एक फूल उठा कर उसे मार दिया। इस प्रकार उसने मानो अपना काम निपटा लिया। शाम हुई, उस व्यक्ति का राज्यकाल खत्म हुआ। सभी जान-पहचान वालों ने आ कर उसे हुकूमत करने के लिये मुबारकबाद दी। उस व्यक्ति ने ध्यान दिया, जिन्हें उसने पत्थर मारे, उन सभी लोगों ने आकर उसे बधाई दी, लेकिन जिसे उसने फूल मारा था, वो नहीं आया था। एक-दो दिन के पश्चात, जब उस व्यक्ति से मुलाकात हुई तो हुकूमत करने वाले ने उसे इस बात का एहसास करवाया। उसने जवाब दिया, “तुम ने उस दिन मुझे फूल क्यों मारा था?’

“क्योंकि मैं तुम्हें पत्थर नहीं मारना चाहता था। तुम मेरे अजीज हो।”

“मैं तुम्हारा अजीज हूँ न, इसलिये तुम्हारा वो फूल मुझे बहुत जोर से लगा था। तुम बेगाने होते तो तुम्हारा पत्थर भी मुझे न चुभता।”

इतना कह कर माँजी चुप हो गई।

“माँजी, आपने मुझे यह कहानी किस मकसद से सुनाई है, मैं वो समझने का यत्न कर रही हूँ।”

“जीत कौर! तुम कल कह रही थी न कि कूड़े का ढेर मेरी दीवार के साथ लगा दिया है। तुम मेरी अपनी हो न। तुम ने यह बात किसी बाहर के आदमी के सामने क्यों कही। मुझ से सीधा कहा होता। अब वह दस जगह जा कर, लोगों से चुगली करेगा। कहेगा, वैसे तो बहुत प्यार से रहती हैं, मगर पडोसनों की तरह लड़ती भी हैं।”

“चलो माँजी, मुझ से गलती हो गई।” कहते हुए मम्मी ने उनके घुटनों को छुआ।

“हूँ…, खुद तो अपने काम से फारिग हो गई। मेरा अभी सारा काम करने को पड़ा है।” माँजी तेज कदमों से अपने घर की ओर चल दी।

उनके जाते ही मम्मी मुस्कुरा दी, “गलती भी इनकी, माफी भी मुझसे ही मँगवा ली।”

***

ऐसी ही थी माँजी! बहुत भरा-पूरा परिवार चार पुत्र, दो पुत्रियाँ, बड़ा खानदान। माँजी सारा दिन काम में लगी रहती। हमने उन्हें कभी भी खाली बैठे हुए नहीं देखा था। दोपहर के काम से फुरसत पाते ही, कभी स्वैटर बुनने लगती, कभी किसी फटे-घिसे कपड़ों की मरम्मत करने लगती। वैसे भी बड़ा परिवार, काम सारा दिन खत्म होने में नहीं आता था।

एकदम गोरा रंग, लालिमा लिए हुए। मलमल की शमीज के ऊपर खुली सी कमीज पहने ही माँजी सारा दिन निकाल देती थी। गर्मी के दिन, वह अक्सर घर के अंदर शमीज में निकाल देती थी। कथा-कहानियों. बातों का अमुक भंडार था उनके पास। जिसमें से कथाएं व बातें सुना कर वह हमारी मम्मी को हैरान कर देती थीं।

सटी दीवारों के कारण, जोर से बोलने पर सारी बात दूसरे घर में आसानी से सुनाई देती थी। हमारे घर में वैसे भी किसी को धीरे बोलना आता ही नहीं। इसी प्रकार एक दोपहर में घर के कामों से फरसत पा. जब वह मम्मी के पास आ कर बैठी तो कहने लगी, “जीत कौर! एक लडकी की नई-नई शादी हुई। वह अपने पति से बहुत शरमाती थी। लेकिन आगे-पीछे अपने देवर-ननद के साथ खूब हँसती-खेलती रहती। जब भी उसका पति सामने आ जाता, वह मुँह झुका कर अंदर घुस जाती।”

“अच्छा, फिर…।” मम्मी समझ गयी कि अब फिर कोई बात है, जिसका खुलासा वह ‘बात’ सुना कर करने वाली है।

“इसी प्रकर, फिर एक दिन जब ऐसा ही हुआ और हँसती-खेलती लडकी अंदर जा कर सिमट गयी तो उसके पति ने एक आह भरी और कहा, “काश! मैं भी इसका देवर ही होता, कम से कम यह मुझे देख खुश तो होती।”

“माँजी, यह बात तो मुझे समझ में आ गयी, लेकिन….” मम्मी ने इसके पीछे का कारण जानना चाहा।

“जीत कौर! कल तुम ने अपने ममिया ससुर को पकौडे तल कर खिलाए। घर में बैठी, मैं सोचने लगी, आज अगर मैं इसके घर रिश्तेदारी के नाते गई होती तो मुझे भी पकौड़े खाने को मिलते।” कहते हुए वह जोर से हँस दी।

मम्मी समझ गयी कि उनकी आवाज बिना किसी खास वजह के भी उनके आस-पास के घरों में पहुँच ही जाती है। मम्मी ने भी हँसते हुए कहा, “अरे, आप मुझे आवाज दे देती। मैं आपको खुद पकौड़े खिला देती। इसमें कौन-सी बड़ी बात थी।”

“कोई बात नहीं, आगे से ख्याल रख लेना।” कहते हुए माँजी उठ खडी हुई, “मेरा हरबंस आने वाला है, जा कर उसके लिये गर्म रोटी बना दूँ।”

इस प्रकार मुहल्लेदारी में सभी को आप के घर आने-जाने के बारे में जानकारी रहती है। अगर कोई रिश्तेदार कुछ समय ना आए तो अड़ोस-पड़ोस वाले उसके बारे में पूछ-ताछ करने लगते हैं। गली-मुहल्लों में लोग आस-पास वालों को ही नहीं, आप की बिरादरी वालों को भी अच्छी तरह से जानते-पहचानते हैं।

***

एक दिन दोपहर में मम्मी घर के मुख्य दरवाजे के पास बैठ कोई कढ़ाई कर रही थी। हमारे घर के दसरी ओर ऊपर के घर में जाने की सीढियाँ थीं। अपने काम में व्यस्त मम्मी को कुछ ऐसा महसूस हुआ, जैसे सीढ़ियों से उतरते किसी अजनबी व्यक्ति ने अपने कंधे पर कुछ उठा रखा था। पलक झपकते ही वह व्यक्ति निकल गया। वैसे भी यह मामूली-सी बात थी। शाम के समय गली में शोर होने लगा। मालूम हुआ, ऊपर रहने वाले पडोसी ‘हरू’ के घर से कोई सिलाई मशीन उठा ले गया। हर कोई कहने लगा, ‘हद हो गयी भाई, किसी ने देखा-सुना नहीं। भरी-पूरी गली में से कोई मशीन उठा ले जाए और किसी को पता ही ना लगे।’ लोग तरह-तरह की बातें करने लगे। किसी ने बताया, पुलिस को खबर की जा रही है। अभी पुलिस आएगी। अड़ोस-पड़ोस सभी से पूछ-ताछ करेगी।

अचानक मम्मी को याद आया कि दोपहर में उन्होंने किसी अनजान व्यक्ति को कंधे पर कुछ उठाए सीढ़ियों से उतरते देखा था। उन्होंने तुरन्त कुछ पड़ोसनों से कहा, “दोपहर में कोई आया तो था।” औरतों के झुंड में माँजी भी खड़ी थी।

“ऐ जीत कौर! लगता है तेरे घर में कोई आया है।” माँजी ने जोर से आवाज लगा, बात को अनसुना कर दिया।

“कौन आया है?” कहते हुए मम्मी ज्यों ही घर की दहलीज में घुसी, उनके पीछे-पीछे ही माँजी भी अंदर आ गयी।

“कौन था, माँजी?” मम्मी ने पलट कर उन्हीं से पूछा।

“तू अंदर बैठ या अपनी बहन के घर चली जा।”

“क्यों, क्या हुआ?” मम्मी हैरान थी।

“अभी पुलिस आएगी। तुम्हारा घर ही सबसे करीब है। वो लोग तुम से जरूर पूछेगे। तुम कहना, मुझे दो दिन से बुखार है। मैं तो अपने बिस्तर से उठी भी नहीं। फिर मुझे क्या मालूम, कौन आया, कौन गया। साथ ही कहना, यह माँजी से पूछ लो, मैं कितनी बीमार हूँ।”

पुलिस का नाम सुनते ही आम शरीफ आदमी की तरह मेरी माँ की भी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गयी।

आदमी तुम्हारा घर नहीं। बाहर गया है और तुम लोगों से कहती फिर रही हो कि तुम ने चोर को जाते देखा है। थाने जाना पड़ेगा।” माँजी ने जोरदार ढंग से मेरी माँ को डाँटते हुए समझाया। फिर अपनी आदत अनुसार इससे संबंधित एक किस्सा भी सुना डाला।

“एक बार, एक छोटे से लड़के को कहीं से सोने का बडा हार मिल गया। असल में एक कौवां कहीं से रानी का हार उठा लाया। उसने हार वहाँ ला कर फेंक दिया, जहाँ वह लड़का खेल रहा था। उस लड़के को यह तो समझ में ना आया कि वह क्या चीज है लेकिन उसने उस चमकती हई चीज को उठा लिया। घर आ कर उसने वह हार अपनी माँ को दे दिया। माँ ने तुरन्त वह हार छपा लिया। थोडी देर के बाद उसने अपने घर की छत पर जा कर कछ लड़ चूरा कर के बिखरा दिए। नीचे आ कर उसने लडके से कहा, आ, ऊपर आ कर देख, कैसे लड्डुओं की बारिश हो रही हैं। आ जा, हम दोनों मिल कर लड्डू इकट्ठे करते हैं। लड़का खुशी-खुशी छत पर जा चढ़ा। सचमुच वहाँ कितने ही लड्डू बिखरे पड़े थे।

लडके ने एक दिन खेलते-खेलते अपने किसी साथी को चमकने वाली चीज मिलने की बात कह सुनाई। पास में उस साथी का बापू खड़ा था। उसे मालूम था कि राजा के सिपाही रानी का खोया हार तलाश कर रहे हैं। उसने वह सुनी-सुनाई बात जा कर राजा के सिपाहियों से इनाम के लालच में कह सुनाई। पूछते-पूछते सिपाही उस लड़के के घर तक आ पहुँचे। उन्होंने सब से पहले लड़के से हार के बारे में पूछा। लड़के ने खुशी में हामी भर दी। उसने बताया कि उसने वह हार अपनी माँ को दे दिया था। माँ बहुत चतुर थी। उसने सिपाहियों के सामने ही पुत्र से पूछा, ‘पुत्तर! तू किस दिन की बात कर रहा है।” माँ, जिस दिन लड्डुओं की बारिश हुई थी। मैंने तुम्हें एक बडी चमकती-सी चीज दी थी।’ माँ ने भोलेपन से सिपाहियों की ओर देखा और कहा, “देखा आपने, बच्चों की बातें। लड्डुओं की बारिश। हूं..। सिपाही इत्ता-सा मुँह ले के लौट गए।”

“कुछ समझी तुम।” माँजी मम्मी को समझा कर चली गयी।

माँजी के पास हर बात का जवाब तैयार होता था। किसी का बच्चा बीमार हो जाए, वह रात-बिरात में भी माँजी से कोई न कोई टोटका पूछने चल देता था। किसी गृहस्थिनी की बडियाँ अगर नर्म नहीं बनती थीं तो उसका गुर वह माँजी से ही आकर पूछती थी। किसी के स्वैटर के डिजाईन में गडबड़ हो जाती तो उसकी बुनाई माँजी के अलावा कोई और ठीक कर ही नहीं पाता था। किसी ने भी माँजी को कभी खाली बैठे नहीं देखा था। वह इस बात से हैरान होती थी कि लोग बीमार कैसे पड़ते हैं, उनके पास तो बीमार होने का भी वक्त नहीं था।

आगे-पीछे पडोसनें बातें करतीं, ‘माँजी, बोलती बहुत हैं। ना खुद फुरसत से बैठती हैं ना हमें ही बैठने देती हैं।’ जब कभी मेरी मम्मी भी ऐसी कोई बात कहती तो मेरे डैडी कहते, “बहुत समझदार स्त्री हैं माँजी। इनसे कुछ सीखा करो। तुम्हारे काम आयेगा।”

समय बीतता गया। बचपन गजर गया। एक अर्से के बाद हम उस पराने मुहल्ले को छोड़ एक नयी कालोनी में कोठी में आ कर रहने लगे। फिर भी गली-मुहल्ले वालों से कोई ना कोई नाता बना ही रहा। एक अच्छी खबर यह मिली कि माँजी के दो बेटों ने हमारी ही कालोनी के दूसरे ब्लाकों में कोठियाँ ले ली थीं। उनमें से ही एक बेटे के पास माँजी अब रहने लगी थीं।

“कितनी देर लगा दी तुमने। कब से तुम्हारा इंतजार कर रही हूँ मैं।” मेरी गाड़ी के रूकते ही, गेट के पास खड़ी मम्मी ने मुझे मीठा-सा उलाहना दिया।

“दिल्ली का ट्रैफिक तो आप जानते ही हैं।” हालाँकि मैं खुद ट्रैफिक के कारण काफी खीझ जाती थी, लेकिन आज माँजी के ख्यालों में खोए होने के कारण मुझे ट्रैफिक पर गुस्सा नहीं आया था।

खाना खाने के पश्चात् मैंने फिर मम्मी से माँजी के बारे में पूछा।

“क्या बताऊँ! माँजी का बहुत बुरा हाल है।” मम्मी के स्वर में अत्यन्त मायूसी थी।

“क्यों बहू अच्छे से देखभाल नहीं करती।” मैंने स्वाभाविक-सा सवाल किया, जो अक्सर बुजुर्गों के बारे में सोचा जाता है।

“बहू-बेटे तो बहुत अच्छे हैं, माँजी के। इस बहू ने अब एक नर्स भी रखी है, उनकी देखभाल के लिए।”

“फिर, बीमारी क्या है?” मेरा अगला सवाल था।

“माँजी का दिमाग हिल गया है। पागलों जैसी हरकतें करने लगी हैं।” मम्मी ने बहुत दुखी हो कर बताया।

“हैं…” मेरा मुँह हैरानी से खुला ही रह गया।

“आप तो बताया करते थे कि माँजी बहुत ही सयानी औरत है। इतनी समझदार औरत भला पागल कैसे हो सकती है? कहीं दिमाग में कोई चोट लगी थी, कोई एक्सीडेंट वगैरह हुआ था क्या।” मैं अनुमान लगाने लगी।

“नहीं, ऐसा कुछ नहीं हुआ। बस, हरनाम (उनकी बहू) बता रही थी, पता नहीं बैठे-बैठे माँजी को क्या पागलपन सवार हो जाता है, कभी अपने कपड़े कैंची से काट कर मुझ से कहेगी, ‘हरनाम, मुझे मशीन दे दे। मुझे अपने कपड़े मुरम्मत करनी हैं। उसने कहा, मशीन का क्या करेगी। कपड़े फट गये हैं तो मैं नए ला दूंगी। बस जिद करने लगी, मैं खुद सिलाई करूँगी। मुझे मशीन उठा कर दे दो।’ हरनाम का कहना है, ‘आज के जमाने में भला मशीन कौन इस्तेमाल करता है भाभी जी आप ही बताइए।’

“फिर क्या हुआ?” मैं बात की तह में जाना चाहती थी।

“बस इसी तरह ही कुछ न कुछ करने लगती है। एक दिन बगल वाली कोठी की बेल बजा कर कहने लगी, कोई काम है आप के घर में करने के लिए। मैं कर देती हूँ। उन्होंने समझा, काम करने वाली कोई बाई है। जब पास आ कर देखा तो पता लगा, बगल वाले सरदारजी की माताजी हैं। उन्होंने जबर्दस्ती माँजी को घर भेजा। ऐसे ही कई बातें बता रही थी हरनाम। माँजी कभी साफ बर्तन उठा कर माँजने लगती हैं। कभी साफ किए फर्श पर ही पोंछा लगाने लगती हैं। हरनाम कहती है, ‘अब आप बताओ भाभीजी, घर में कोई आ जाये और माँजी को इस प्रकार साफ-सफाई करते देखे तो भला क्या सोचेगा, मैं उन से घर के काम करवाती हूँ। कितनी बार कहा है, माँजी, किसी चीज की जरूरत है तो हमें बताइए। मगर माँजी मानती ही नहीं।’ अब बेटा-बहू भी क्या करें।” मम्मी को माँजी के बेटा-बहू से पूरी हमदर्दी थी।

“मम्मी, हरनाम आँटी तो सर्विस करती है न और बच्चे…।”

“हाँ, वो स्कूल में पढ़ाती है। तभी उसने घर में कई नौकर-बाईयाँ रखी हैं, ताकि माँजी को पीछे से कोई काम ना करना पड़े। फिर भी मुशिकल आ पड़ी है। वह बता रही थी, ‘भाभीजी, माँजी कभी शीशे के आगे खड़े हो कर खुद से ही बातें करने लगती हैं। शीशे में नजर आते अपने ही चेहरे को देख कर कहेगी, ‘देख बेटा, तेरी नानी आई है। फिर अक्स की ओर हाथ बढ़ा कर कहेंगी, आ माँ, बातें करें। ओह! तूने कौन-सा अचार बताया था मुझे। पता नहीं आजकल मेरे डाले सारे अचार खराब हो जाते हैं। माँ, आज ना शलगम का अचार बता दे।’ भाभीजी, माँजी की यह बातें सुन कर हम ने समझा, शायद माँजी का मन कोई अचार खाने का कर रहा है। मैंने उसी समय नौकर को बाजार दौड़ाया, जा भाग कर बढ़िया अचार की शीशी ले आ। मैंने सोचा, चलो, जो दो निवाले खाने हैं, वह अचार के बहाने ही खा लेंगी। मैंने नौकर से बढ़िया-सा परांठा बनवाया और उन्हें अचार के साथ खाने के लिए दिया। उन्होंने वह प्लेट उठा कर परे फेंक दी।” इतनी लंबी बात बता कर मम्मी साँस लेने के लिए रुकी।

“मम्मी, उनके घर में पीछे कौन होता हैं?” मैं कुछ और जानना चाह रही थी।

“कोई नहीं होता। बच्चे पढ़ने चले जाते हैं। मियाँ-बीबी सुबह अपने-अपने काम पर निकल जाते हैं। पीछे एक नौकर है, जो घर देखता-संभालता है। काम वाली बाईयाँ बारी-बारी से आकर घर का सारा काम निपटा जाती हैं। अब देखा जाए तो माँजी को कोई तकलीफ नहीं है। वह घर में आराम से बैठे। लेकिन परेशानी यहाँ तक बढ़ गई है कि, माँजी! अकेले थैला उठा कर बाजार से कुछ खरीदने ही ना निकल जाए या गेट के बाहर से गुजरने वाले किसी को जबर्दस्ती अंदर लाकर उल्टी-सीधी बातें ना करने लगे। इस कारण उन्हें अब सारा दिन गेट पर ताला लगा कर रखना पड़ता है।”

“मम्मी, आप को भी लगता है, माँजी को कोई तकलीफ नहीं है। आप तो उनकी सभी बहुओं से कहीं अधिक उनके साथ रही हैं।” मैंने कहीं गहरे डूबते हुए कहा।

“हाँ, मैं भी समझ रही हूँ। लेकिन अब बहू इससे अधिक करे भी क्या? वह तो अपनी ओर से उन्हें हर प्रकार का सुख-आराम देने की कोशिश कर रही है।”

“मम्मी, यह आराम ही हमारे लिए हराम हो गया है। घर में बनने वाली हर शै अब बाजारों में रेडीमेड मिल जाती है। हम बाजार की ओर ही हरदम भागते रहते हैं। इन मशीनों, ढेर सारी सुख-सुविधाओं ने आदमी को एकदम खाली कर दिया है और इस खालीपन ने व्यक्ति को अकेला कर दिया है। कुछ वर्षों के बाद देखना मम्मी, फालतू और अकेले होने के लिए बुढ़ापे तक का इंतजार नहीं करना पड़ेगा। हर घर में माँजी जैसे कई मिला करेंगे।” मैं मालूम नहीं कहाँ खो गयी थी।

“तू डरा रही है,” मम्मी ने थोड़ा अन्यमस्क होते हुए पूछा।

“नहीं मम्मी, मैं किसी को क्या डराऊँगी? यह वक्त ही हमें समझाएगा।” मैं कहीं शून्यता में उतर रही थी।

मेरा मन किया, मैं इसी समय भाग कर माँजी के पास जाऊँ और उनसे कहूँ, “माँजी, मुझे अपने वो ढेर सारे किस्से-कहानियाँ सुनाओ, जिसका अमुक भंडार आपके पास है। जिनमें जीवन के सार-तत्व निहित हैं। जिन्हें समय के साथ हम एकदम भूलने लगे हैं। अपने वो टोने-टोटके बताओ, जो मुझे ‘गूगल’ या किसी भी साईट पर ‘सर्च’ करने पर भी कभी नहीं मिलेंगे। जिन्हें इस्तेमाल करने पर ना कोई ‘साईड इफैक्ट’ होता है और ना ही कुछ खर्च करना पड़ता है। आप की बहुत जरूरत है हमें, आप जैसों की बहुत जरूरत हैं हम लोगों को।”

“कहाँ खो गयी तू?” मम्मी की आवाज ने मेरी सोच को झिंझोड़ दिया।

“मैं सोच रही हूँ मम्मी, माँजी जैसे परिपक्व, समझदार बुजुर्गों के अनुभवों से हमें बहुत कुछ सीखना चाहिए। जानकारी और ज्ञान से भरे इन स्रोतों को हमने अपनी तेज रफ्तार के कारण यूँ ही गवाँ दिया है।”

“मतलब।”

“मम्मी, मैंने निश्चय कर लिया है, मैं माँजी जैसे लोगों का अकेलापन दूर करने की कोशिश करूँगी। इनकी बातें सुनूंगी।”

“कैसे?” मम्मी अभी पूरी तरह से समझ नहीं पा रही थी।

“मैं किसी ऐसे एन.जी.ओ. से जुड़ जाऊँगी, या अपने आस-पास ही किसी बूढ़े व्यक्ति के लिए थोडा-सा वक्त निकाला करूँगी।”

“तुझे लगता है, इससे कुछ होगा। आजकल लोग दूसरों पर भरोसा कम ही करते हैं।” मम्मी मुझे व्यावहारिकता समझा रही थी।

“कुछ भी हो, अपनी ओर से मैं कोशिश जरूर करूँगी। आज आपने माँजी की दुखभरी हालत के बारे में बता कर मुझे जीवन के नये मकसद से जोड़ दिया है। मैंने कभी पहले ऐसे सोचा ही नहीं, लेकिन अब देर ना होने दूंगी। किसी एक को भी माँजी बनने से रोक पायी तो समझूगी कि” आगे कुछ कहना जरूरी ना लगा।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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