rosy from bihar
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Summary: काम बंद हो गया रोसी का

ठेले के प्रचार के लिए बनाया गया एक मज़ाकिया वीडियो वायरल हुआ, लेकिन ट्रोलिंग और परेशानियों के चलते रोसी को अपना काम बंद करना पड़ा। बिहार की ‘रशियन गर्ल’ कहकर वायरल की गई रोसी नेहा सिंह आज कहती हैं—व्यूज़ नहीं चाहिए, बस बिना डर और शोर के जीना है।

Bihar Russian Girl: सोशल मीडिया पर वायरल होना अक्सर लोगों को सफलता की सीढ़ी लगता है, लेकिन रोसी नेहा सिंह के लिए यह अनुभव किसी बुरे सपने से कम नहीं रहा। सोशल मीडिया पर जिन्हें कुछ समय के लिए “बिहार की रशियन गर्ल” कहा गया, उनके लिए वायरल होना न तो मौके लेकर आया और न ही पहचान को मजबूत कर पाया। उल्टा, इसने उनकी ज़िंदगी को उलझा दिया और रोज़मर्रा का सुकून छीन लिया।

रोसी मूल रूप से बिहार के सोनपुर की रहने वाली हैं और फिलहाल रांची में रहती हैं। पेशे से वह ब्यूटीशियन थीं, लेकिन खाना बनाना उनका शौक था। आमदनी बढ़ाने के लिए उन्होंने रांची में लिट्टी-चिकन का छोटा सा ठेला लगाया। ग्राहकों तक पहुंचने के लिए उन्होंने सोशल मीडिया का सहारा लिया और कुछ छोटे-छोटे वीडियो पोस्ट करने शुरू किए। शुरुआत में यह तरीका काम करता दिखा और दुकान पर लोगों की आवाजाही बढ़ने लगी।

लेकिन यहीं से कहानी ने अचानक मोड़ ले लिया। रोसी की शक्ल-सूरत को लेकर लोग बार-बार कमेंट करने लगे कि क्या वह रशियन हैं या किसी दूसरे देश से आई हैं। इन्हीं सवालों से परेशान होकर रोसी ने एक हल्का-फुल्का वीडियो बनाया, जिसमें बिहारी बोली में हंसते हुए कहा कि वह “पूरी तरह बिहारी लड़की हैं, कोई रशियन नहीं।” यह वीडियो मज़ाक के इरादे से बनाया गया था, लेकिन वही वीडियो तेज़ी से वायरल हो गया।

कुछ ही दिनों में रोसी की पहचान बदल गई। वह सिर्फ एक मेहनती महिला दुकानदार नहीं रहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर एक “टैग” बन गईं। शुरुआत में बढ़ते लाइक्स, शेयर और कमेंट्स अच्छे लगे। उन्हें लगा कि शायद इससे काम और पहचान दोनों बढ़ेंगे। इसी उम्मीद में उन्होंने ऐसे ही और वीडियो बनाने शुरू कर दिए।

लेकिन जल्द ही लोगों का रवैया बदल गया। रोसी के मुताबिक, जब वह हर सवाल का जवाब नहीं दे पाईं या एक जैसी वीडियो बनाना बंद किया, तो ट्रोलिंग शुरू हो गई। कमेंट्स में निजी बातें कही जाने लगीं, आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल होने लगा। कई व्लॉगर्स भी उनके ठेले पर पहुंचने लगे। कुछ लोग सहयोग के लिए आए, लेकिन कई ऐसे थे जो सिर्फ कंटेंट चाहते थे। रोसी कहती हैं, “अगर मैं मना कर देती या वक्त नहीं दे पाती, तो वही लोग मुझे ट्रोल करने लगते थे।”

रोसी बताती हैं कि लोग ग्राहक बनकर नहीं, बल्कि परेशान करने के इरादे से ठेले पर आने लगे। कुछ नशे में होते, कुछ जबरदस्ती फोटो या सेल्फी मांगते। मना करने पर झगड़ा होता। ऐसे माहौल में काम करना मुश्किल हो गया। हालात इतने बिगड़ गए कि रांची के अच्छे इलाके में होने के बावजूद रोसी को अपना लिट्टी-चिकन का ठेला बंद करना पड़ा। वह कहती हैं कि उन्हें आज तक यह भी ठीक से नहीं पता कि सोशल मीडिया पर कमाई कैसे होती है या मोनेटाइजेशन क्या होता है। वह कहती हैं, “न मुझे यह सिस्टम समझ आता है, न मेरे परिवार को”। आज रोसी किसी पहचान या वायरल वीडियो की चाह नहीं रखतीं। उनके शब्दों में, “व्यूज़ के पीछे भागते-भागते मैंने अपना चैन खो दिया। अब मुझे कुछ नहीं चाहिए, बस शांति से जीना और काम करना चाहती हूं।”

ढाई दशक से पत्रकारिता में हैं। दैनिक भास्कर, नई दुनिया और जागरण में कई वर्षों तक काम किया। हर हफ्ते 'पहले दिन पहले शो' का अगर कोई रिकॉर्ड होता तो शायद इनके नाम होता। 2001 से अभी तक यह क्रम जारी है और विभिन्न प्लेटफॉर्म के लिए फिल्म समीक्षा...