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नारीमन की कहानियां
Bharat Katha Mala

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

कभी-कभी हम एक इंसान से इतना प्यार करने लग जाते कहैं कि हम ये भूल जाते हैं कि हमारी ज़िन्दगी में भी ऐसे लोग हैं जो हमें बहुत प्यार करते हैं। उनकी ज़िन्दगी में हमारी एक जगह है। मैंने भी ऐसा ही कुछ किया। नासमझ थी। मैंने वो रास्ता अपनाया जो नहीं अपनाना चाहिए था। पर समय हाथ से निकल चुका था और पछतावे के अतिरिक्त मेरे पास और कुछ नहीं था।

मुराश को पति के रुप में पाकर, मैंने सबको भुला दिया था। मेरी शादी खानदान की सबसे कामयाब शादी रही। शायद इसीलिए कुछ उड़ने लगी थी मैं। या यूँ भी कह सकते हैं कि मुझे मुराश के अतिरिक्त किसी से भी राबता रखने की इच्छा नहीं रह गई थी। उसका प्यार पाकर मैं फूल की भाँति खिल उठी थी। एक जगह पढ़ा था। “स्त्रियाँ, राजा और लताएँ, इनका प्रायः ऐसा स्वभाव होता है कि जो भी बगल में मिलता है, उसी से लिपट जाती है।” बस कुछ ऐसा ही हाल मेरा भी था। बिदाई के समय माँ ने कहा था बेटी, “खून के रिश्ते हमें विरासत में मिलते हैं पर पति-पत्नी का रिश्ता हम खुद बनाते हैं।” इस रिश्ते को संभालने में स्त्री का एक बड़ा योगदान रहता है। मुराश में बहुत खूबियाँ थीं। वो मुझसे अधिक पढ़ा-लिखा, सुन्दर, सुशील और कोमल स्वभाव लिए था। परिवार को अहमियत देना और उसे जोड़कर रखना भली-भाँति जानता था।

मेरी आदत ऊँचा बोलने की थी और वो धीमा बोलता या बस मुस्कुरा देता। परन्तु मुझसे कभी शिकायत न करता, न ही मुझे अपने को बदलने को कहता। कहता तो शायद मुझ में कुछ बदलाव आ ही जाता। वो हमेशा कहता “ज़िन्दगी का साथ निभाना सीखना चाहिए। जिन्दगी हमसे नहीं निभाती।” मैं सुनती पर अपने में बदलाव नहीं ला सकी। बचपन में माँ व पिता जी को देखती। पिता जी माँ की हर इच्छा पूरी करने की कोशिश करते। परिवार में दादा-दादी और मेरे दो बहन-भाई समेत हम सात सदस्य थे। सीमित आय में घर चलाना बड़ा जोखिम का काम था। जब कभी पिता जी कोई इच्छा पूर्ण न कर पाते तो माँ हम सब बच्चों को बिठा कर समझाती। बेटा, “इच्छाएँ तो पनपती ही रहती हैं, आज एक पूरी हुई तो कल दूसरी जाग जाएगी और ये सिलसिला चलता रहेगा लेकिन अच्छा आदमी (पति) दौलत की तरह होता है, असली पूँजी। बस इसकी हिफ़ाज़त करो। वक्त कभी एक-सा नहीं रहता। भौतिक वस्तुओं से क्या कभी किसी का पेट भरा है?” माँ की इसी सीख को गाँठ मे बाँध रखा था मैंने। जिस वजह से मैं भी मुराश से कभी किसी वस्तु के लिए ज़िद नहीं करती थी।

धीरे-धीरे समय बीतता गया। मैं एक के बाद एक-दो, प्यारे-प्यारे बेटों की माँ बनी। दोनों बच्चे खूबसूरती में मुराश पर गए। मुझे कभी-कभी अपनी किस्मत पर रश्क होता था। मैं एक साधारण-सी शक्ल सूरत वाली लड़की मुराश को पसन्द कैसे आ गई? खैर कहते है न, जोड़े तो खुदा ही बना कर भेजता है, धरती पर तो बस उनका मिलन ही होता है, किसी न किसी के जरिये।

बच्चों के पालन पोषण में इतनी व्यस्त हो गई कि लखनऊ में बसे अपने माता-पिता को फोन किए भी महीनों बीत जाते। मेरा बचपन लखनऊ में बीता इसी कारण हम-सब परिवार वालों की भाषा में उर्दू के शब्दों ने कब प्रवेश कर लिया, पता ही नहीं चला। मुराश का ऑफिस, बच्चों का स्कूल, ट्यूशन, उनकी पढ़ाई और मेरा स्कूल आदि में समय कब बीत जाता पता ही नहीं चलता।

मुराश ने मुझे बहुत दफ़ा कहा भी कि इतना थक जाती हो तो स्कूल छोड़ क्यों नहीं देती? पर मुझे लगता कि स्कूल जाना छोड़ दूँगी तो बस घर की चारदीवारी में ही रह जाऊँगी। स्कूल के बहाने रोज़ तैयार होकर बाहर निकलना और लोगों से मिलना तो होता ही है, साथ में अपनी एक पहचान भी बनती है। मुराश ने मेरे कहीं भी आने-जाने पर कभी कोई एतराज़ नहीं जताया। यही कारण था कि कभी-कभी स्कूल में एक्स्ट्रा कलासेज के कारण देरी भी हो जाती थी पर मुराश ने कभी पूछा तक नहीं। एक बार मैंने कहा भी कि, “मुराश, पूछा तो करो कहाँ देरी हो गई?” पर उसका जवाब था, “जो मर्द औरत का एहतराम नहीं करता, उसे जीने का कोई हक नहीं।” मैं मुराश को पति के रूप में पाकर अपने आप को धन्य समझती और मन ही मन खुश होती।

आज लखनऊ से बड़े भैया का फोन आया। माँ बहुत उदास है। हो सके तो समय निकाल कर मिल जाओ। पिता जी का समय तो सारा दिन टी.वी. पर राजनैतिक बहस देखते हुए गुज़र जाता है। शाम को सैर पर निकल जाते हैं। माँ का स्वभाव हमेशा से कम बोलने का था। वो अपना सारा समय घर को देती। वही आदतें हम में भी थीं। मुराश ने घर सम्भालने का जिम्मा लिया और मैं अगले दिन लखनऊ के लिए रवाना हो गई। घर पहुँची तो माँ को गले मिल आँखें नम हो आई। करीब एक वर्ष के पश्चात मिल रही थी सभी को।

दो दिन माँ के पास रही। मैंने महसूस किया। घर के सभी तौर-तरीके बदल चुके थे। घर की सजावट, खाना-पीना, उठना-बैठना, माँ व पिता जी की आदतें। कुछ भी तो पहले जैसा नहीं था। मैं हैरान-सी थी। दूसरे दिन मेरे चेहरे के भाव माँ से छुपे नहीं रहे। पास में बिठा कर बोली, “नए ख्यालात को रास्ता देना चाहिए। पुराने ख्यालातों से चिपके नहीं रहना चाहिए।” एक और सीख जो माँ से मिली और मैंने गाँठ बांध ली। उन्होंने भैया, भाभी व पोते संग तालमेल बिठा लिया था जिससे सभी बहुत खुश थे। सुबह मुझे वापिस आना था। रात माँ के पास ही सोई। सुबह चार बजे का अलार्म लगाया। ट्रेन साढ़े पाँच बजे की थी। अलार्म बजते ही उठ कर नहा-धोकर बाहर निकली तो देखा माँ अभी तक नहीं उठी थी। सोचा माँ इतनी देर तो कभी नहीं सोती। खासकर, तब तो और भी जल्दी उठ जाती है जब किसी को घर से बाहर निकलना होता है। फिर सोचा शायद रात देर तक बातें करते रहे थे हम दोनों और तबियत भी ठीक नहीं थी, इसीलिए सो रही होंगी। पर मन शंकित था। भाभी ने चाय दी और कुछ खाने का सामान रास्ते के लिए बाँध दिया। अब घर से निकलने का समय हो चुका था। देरी करती तो ट्रेन छूट जाती। भैया ने गाड़ी निकाल कर आवाज़ दी, “जल्दी आ जाओ, देरी न हो जाए।” पर माँ से मिले बिना कैसे जाती?

अन्दर गई, माँ को आवाज़ दी। पिता जी से गले मिली। माँ ने फिर भी नहीं सुना तो पास बहुत हिलाने-डुलाने के पश्चात पिता जी ने नब्ज़ देखी और कहा, “बेटी तुम्हारी माँ नहीं रही।” बस वही शब्द आज तक मेरे कानों में गूंज रहे हैं। ‘माँ नहीं रही,’ ‘माँ नहीं रही,’ और रह गया है पछतावा, देरी करने का, व्यस्तता का और कुछ न कर पाने पर बहाने बनाने का।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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