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Hindi Kahani: नाशुक्र
Naasukr

Hindi Kahani: बड़ी बेटी शिवानी के साथ दिल्ली लौटते समय मौसी जी रुंधे कंठ से अपने बेटे अनिकेत से बोली, ‘ये समझ लो तुम्हारे पिता के साथ मैं भी मर गई। कहते-कहते मौसी जी की आंखे भर आई। जब से कोरोना के चलते मौसा जी गुजरे, मौसी जी के आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे। वह बार-बार एक ही रट लगाई हुई कि भगवान पहले मुझे क्यों नहीं उठा ले गये। अब उन्हें कौन समझाये कि मृत्यु पर इंसान का कोई वश नहीं।
मौसा जी 82 साल के हो चले थे। अनेक बीमारियों ने जकड़ रखा था। सांस फूलने से लेकर शुगर तक, उनके शरीर को घुन की तरह चाट रहे थे। दवाइयों के भरोसे जीवित थे। काफी एहतियात बरत रहे थे। मगर न जाने कहां से उन्हें कोरोना ने डस लिया। 15 दिन निजी अस्पताल में रहे। 8 लाख खर्च आया। इसके बावजूद बच न सके। बहुत कष्ट था सांस लेने में। उनके जाने का दु:ख स्वाभाविक था मगर बच्चों को यह सोचकर सुकून था कि उन्हें अपरिहार्य कष्ट से मुक्ति मिल गयी। मौसी जी यही समझ नहीं पा रही थी। कुछ रूढिवादी संस्कार भी थे, जिसमें कहा गया है कि पति के कंधे पर सुहागन स्त्री की अर्थी जाती है। जिन्हें मौसी जी भुला नहीं पा रही थी।
काफी मन्नतों के बाद मौसी जी दो संतानों की मां बनी। बड़ी बेटी शिवानी दिल्ली में ब्याही थी वहीं छोटा बेटा अनिकेत लखनऊ मे। वर्तमान में वह बैंगलोर में इंजीनियर था। दोनों के पास रुपयों पैसो की कोई कमी नहीं थी। जैसे ही मौसा जी के खराब तबीयत की खबर लगी दोनों शाम तक फ्लाइट से बनारस आ गये। तब तक मैं अपने पति के साथ मौसा जी की देखभाल कर रहे थे। जितनी देर अस्पताल में रहे कोरोना का भय सताता रहा। इसके बावजूद हम दोनों अपने फर्ज पर डटे रहे।
मौसी जी अकेली हो गई। उनके पास अनिकेत के पास रहने के कोई और विकल्प नहीं था। बनारस में खुद का निजी मकान था। पति पत्नी सुकून से रह रहे थे। मौसा जी नहीं रहे तब मौसी जी किसके भरोसे रहे? मौसा-मौसी दोनों बहुत पहले ही बैंगलोर कभी न जाने का फैसला ले चुके थे। ऐसे फैसले के पीछे अनिकेत की पत्नी श्रेया का रूखा व्यवहार था। अनिकेत का प्रेम विवाह था।
मौसा-मौसी इस विवाह से खुश नहीं थे। जिस तरीके से श्रेया ने उनके बेटे को फंसाया और  फिर विवाह के लिए दबाव बनाया वह उनके लिए असहृय था। इसके बावजूद उन्होने इसे नियति का फैसला मानकर स्वीकार कर लिया। मगर श्रेया का खुदगर्ज स्वभाव ने उन दोनो का दिल तोड़ दिया। एक महीने ही रही होगी। उतने में ही उन्हें समझ में आ गया कि श्रेया से निभ पाना आसान नहीं है। बनारस आई तो यही सोचकर कि अब कभी कभार ही बैंगलोर जाएंगी। दो साल बाद अनिकेत को बेटा हुआ तो जाना पड़ा। इस बार दो महीने रह गई। अनिकेत ने न रोका होता तो एक हफ्ते में ही लौट आती। इस दौरान उन्होंने महसूस किया कि श्रेया का व्यवहार अनिकेत के प्रति भी मुनासिब नहीं था। वह छोटी-छोटी बात पर उससे उलझती रहती। एक दिन मौसी जी से रहा न गया तो बोल पड़ी, ‘ये क्या तरीका है पति से बोलने का?
‘आप हमारे बीच में न ही पड़ें तो अच्छा होगा, वह तुनक कर बोली।
‘क्यों न बोलूं? क्या मेरा बेटा नालायक है? अच्छा खासा कमाता है। तुम्हें हर सुख सुविधा से नवाजा है तिसपर उससे उलझती रहती हो?
‘आपको बुरा लगता है तो चली जाइये अपने घर, श्रेया तुनककर बोली।
‘क्या यह मेरा घर नहीं है? मौसी जी का लहजा सवालिया था।
‘बिल्कुल नहीं। ये मेरे पति की संपत्ति है। इस पर मेरा अधिकार है। उसके बेबाक जवाब से मौसी-मौसा दोनों का दिल टूट गया। उन्हे अपने बहू से ऐसी उम्मीद नहीं थी।
‘हां-हां चली जाऊंगी, मौसी का गला भर आया। मौसा जी ने संभाला। मौसा ने कभी भी अपने बेटे पर उंगली नहीं उठाई। वे हमेशा उसे सहलाते रहे। आज भी जब अनिकेत ऑफिस से लौटा तो बहू की कोई शिकायत नहीं की। न ही मौसी जी को इजाजत दी। वे मन मसोसकर रह गईं। इस बीच यहां कभी न आने का फैसला मन ही मन कर लिया।
बनारस आये तो दोनो का मन भारी था। श्रेया ने उनके बेटे को कैसा बना दिया। वह पूरी तरह से श्रेया के वश में था। बस एक ही खासियत अनिकेत में थी। जब भी दोनो बीमार पड़ते भागते हुए बनारस आता। पानी की तरह पैसा बहाता। इस बार मौसा जी को कोरोना हुआ तब भी उसने वही किया। 15 दिन रहा मगर एक दिन भी श्रेया ने फोन करके मौसी जी से मौसा का हाल नहीं लिया। हो सकता हो अनिकेत को किया हो। किया भी होगा तो यही कहा होगा कि जल्दी आओ। यहां हर्ज हो रहा है।
काफी मान मनौव्वल के बाद मौसीजी बैंगलोर रहने के लिए राजी हुई। अनिकेत ने उन्हें रहने के लिए एक कमरा दे रखा था। फ्लैट में और कोई कर ही क्या सकता है। मौसी जी वहां पड़ी रहती। न कोई बोलने वाला न ही बतियाने वाला। नौकरानी समय-समय पर मौसी जी को नाश्ता खाना दे देती। श्रेया ने अपने साथ-साथ बच्चों को भी मौसी जी से दूर रखा। बच्चों में दादा-दादी के प्रति विशेष लगाव होता है। मगर यहां उल्टा था। लंबे समय के बाद आई तो पोता-पोती भी अन्चींहे लगे। वे मौसी जी से कटे-कटे से रहे। जहां श्रेया से अपेक्षा थी कि वह मौसी जी से बोल बतिया कर उनका अकेलापन बांटकर दु:ख कम करेगी वही उसका दुरावपन उनकी तकलीफ को और बढ़ा दिया। ऐसे वातावरण में उनका दम घुटने लगा। वे हर वक्त मौसाजी की याद में आंसू बहाती रहती। कभी अपनी बेटी तो कभी अपनी बहन तो कभी मुझसे अपने दिल का हाल बयां कर रोती रहती। श्रेया से यह सब छुपा न था। एक दिन उसने मुझे फोन लगाया। वह काफी आक्रोश में थी।
‘अलकाजी बोल रही हैं…? मैंने हां में जवाब दिया। न दुआ न सलाम। सीधे मुद्दे पर आ गई। वह आगे कही, ‘मांजी दिन भर रोती रहती है। आपको फोन लगाकर अपना दुखड़ा कहती रहती है। ऐसा ही है तो ले जाईये अपने पास। मुझे नहीं रखना है। सुनकर मैं अवाक रह गई। बेशर्मी की भी हद होती है। पर यहां तो इसने इसे भी लांघ लिया। मौसी जी अनिकेत की जिम्मेदारी थी। फिर यह कौन होती है यह कहने वाली कि अपने साथ ले जाइये। गुस्सा तो बहुत आया मगर संयत रही।
‘श्रेया, तुम उनकी बहू हो। तुम्हारा फर्ज बनता है कि उनसे बोल बतिया कर उनका अकेलापन बांटो। तुम सबका अपनापन पाकर वे धीरे-धीरे अपने दु:खों को भूल जाएंगी। मौसाजी के गुजरे 15 दिन ही तो हुए है। अचानक कैसे वे सामान्य हो जाएंगी?
‘मेरे पास समय नहीं है। उनके रोने धोने की वजह से मेरा जीना हराम हो गया है। बच्चों पर बुरा असर पड़ रहा है। वे बार-बार पूछते हैं कि ये रो क्यों रही है? मुझे डर है कि अगर इन्हे कुछ हो गया तो मुझे ही दोषी ठहराया जाएगा। वाह रे श्रेया। तुमने अपने बच्चों से ये भी नहीं बताया कि ये तुम्हारी दादी है? सोचकर मेरा मन तिक्त हो गया।
‘बहुत होगा मर जाएगी। उम्र हो चली है। कभी भी कुछ हो सकता है। दो चार साल और जीएगी। क्या तुम्हारा फर्ज नहीं बनता है जो थोड़ा मौका उनके साथ रहने को मिला है, उन्हे रिश्तों की गरमाहट दो। क्या वे सौ साल जिएंगी?
‘मैं यह सब नहीं जानती। आप लोग इन्हें ले जाईये।
‘क्या अनिकेत भी राजी है?
‘मैं उनका नहीं जानती। समस्या मुझे है। हद हो गई तो मैं बिफरी, ‘ऐसे कहो कि तुम इनकी जिम्मेदारी नहीं लेना चाहती? इनकी मौजूदगी से तुम्हारी आजादी पर अंकुश लगेगा।
‘आप ही रख लीजिए। आपकी तो सगी मौसी हैं।
‘रख लूंगी। मैं इतनी खुदगर्ज नहीं हूं मेरा लहजा चेतावनी भरा था।
‘मगर याद रखना कल तुम भी बूढ़ी होगी तब क्या करोगी जब तुम्हारी बहू तुम्हारे साथ ऐसा ही व्यवहार करेगी। आदमी का दिया लिया उसी के साथ जाता हैं। इतनी निष्ठुर मत बनो।
मौसी यह सब सुन रही थीं। मौका पाकर सुबकते हुए बोली, ‘मैंने सपने में भी सोचा था कि मेरा बुढ़ापा ऐसे कटेगा? क्या कमी रह गई थी मेरी परवरिश में? हर सुविधा दी अपने बच्चों को। मगर मेरा बेटा एक लड़की के लिए मुझसे ही विद्रोह कर बैठेगा? मैंने उन्हें ढांढस बंधाया।
दिल्ली आकर भी मौसा जी का मन नहीं लग रहा था। मैं उन्हें भरसक समझाती। कुछ दिन रह कर देखिए आदत पड़ जाएगी। तभी एक शाम शिवानी का फोन आया, ‘दीदी, क्या आप मम्मी को अपने पास रख लेंगी? सुनकर मैं असमंजस में पड़ गई। क्या जवाब दूं। रिश्ता इतना करीबी का था कि न हां करते बन रहा था न ना। इससे पहले कि मैं कुछ बोली वह आगे बोली, ‘जीजी से पूछकर बताईगा। अगर नहीं तो आसपास कोई किराये का मकान मिल जाए तो वहीं रख दीजिए। सुनकर बड़ा अटपटा लगा। मेरे यहां रहे या कहीं आसपास। जिम्मेदारी तो मेरी ही बनेगी? रात-बिरात बीमार होगी तो देखभाल कौन करेगा? जाहिर है मेरे मत्थे पड़ेगा। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि शिवानी क्यों नहीं अपने पास रखना चाहती है? सगी मां है कोई सौतेली नहीं। कहीं वह भी तो अपनी जिम्मेदारी से बचना नहीं चाह रही है? मां-बाप बुढ़ापे में अपने संतानों के पास नहीं रहेंगे तो कहां रहेंगे? क्या एक समय के बाद मां-बाप के प्रति बच्चों में मोह कम हो जाता है? क्या उनका परिवार ही मुख्य हो जाता है? शिवानी ने सफाई दी, ‘मेरी सास कहेगी कि जब बेटा है तो यहां क्यों है? बात तो सही है। परन्तु किन्हीं कारणों से संभव नहीं है तो सच्चाई बता देने में हर्ज ही क्या है। क्या शिवानी की परेशानी की यही वजह है या कुछ और? हो सकता है शिवानी का पति ही तैयार न हो। अक्सर दोनों छुट्टियों में बाहर घूमने-फिरने निकल जाते हैं। ऐसे में मौसी अकेले रहेगी तो किसके सहारे छोड़ेंगे? विचार प्रक्रिया पलटी तो लगा हो सकता है मौसी जी ही बेटी के पास रहने में सकुचा रही हो। ऐसा स्वाभाविक भी था। बेटा के रहते बेटी के पास रहना कहां तक उचित है? मौसी जी के पास धन दौलत की कोई कमी नहीं थी। बनारस में खुद का निजी मकान था। जहां से बारह हजार के किराया आता था। साथ में मौसा जी की पेंशन भी कम न थी। पचीस हजार पर्याप्त था मौसी जी के लिए।
बहरहाल वे कुछ महीने मन बहलाने के लिए अपनी छोटी बहन के पास मुंबई चली गई। दो महीने बाद बनारस मेरे घर आई। वहां से फिर अपने मकान पर गई। खाली मकान देख उनका दिल भर आया। पुरानी यादें फिर से सजीव हो गई। लगा जैसे कल की बात हो। उम्र के 35 बसंत देखने के बाद भी जब मां न बन पाई तब शीतला मां से मनौती मानी। दवा तो चल ही रहा था। जैसे ही पहली गोद भरी। स्वस्थ होने के बाद टेहुना के बल चलकर उनका दर्शन किया। मौसा जी हर साल नंगे पांव कांवडिया बनकर महादेव का दर्शन करते। दान पुण्य उनके स्वभाव में था। जो कोई उनके दरवाजे याचक बनकर आता उन्हें निराश नहीं करते। अनिकेत बीटेक करके नौकरी ज्वाइन कि तो कितने सपने संजोये थे बहू के लिए। शिवानी अपने ससुराल चली जाएगी तब बहू ही उनका अकेलापन बांटेगी। उम्र हो चली थी। भरे बदन के कारण काम नहीं हो पाता था। बहू आएगी तो कहेगी, ‘मांजी, आप आराम करिये। घर-गृहस्थी मैं संभालूंगी। पोता-पोती होंगे तो घर में कितनी चहल-पहल होगी। दिनभर उन्हीं के साथ व्यस्त रहूंगी। तब समय भागेगा तो जी करेगा उसे मु_ी में कैद कर लूं। सोचकर वे मन ही मन निहाल हो रही थी। तभी शिवानी ने उनकी तंद्रा तोडी। वे अतीत से वर्तमान में आई। उनकी आंखे आंसुओ से लबरेज थी। शिवानी की नजर पड़ी तो उसका भी मन भीग गया। ‘मम्मी, आप फिर से जज्बाती हो रही हैं। मौसी जी ने आंचल से अपने आंसू पोंछे। उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। वे जिस मर्मान्तक पीड़ा से गुजर रही थी उसका सहज अनुमान लगाना आसान न था। वे वापस मेरे घर आई। हम सब एक साथ बैठकर बातें करने लगे। बातों के बीच मौसीजी बोली, ‘अलका, मैं तुम्हारे साथ रहना चाहती हूं। इसी बहाने अपने घर के करीब रहूंगी। मेरा मन न ही शिवानी के यहां लगा न ही मुबंई में। अनिकेत का नाम उन्होने नहीं लिया। सुनकर मै धर्म संकट में पड़ गई। मौका देखकर पति से सलाह लिया तो उन्होंने कहा ‘रख लो। ऊपर का कमरा खाली है वहीं पड़ी रहेंगी। बच्चे पक्ष में नहीं थे। तथापि मैंने उनके बुढापे की अंतिम ख्वाहिश जानकर हामी भर दी। शिवानी के चेहरे से लग रहा था मानो उसके सिर से एक बहुत बड़ा बोझ उतर गया। एक महीने रही होगी। अचानक एक सुबह उनके सीने में दर्द उठा। उठा-उठाकर हम दोनों उन्हे अस्पताल ले गये। तत्काल अनिकेत और शिवानी को फोन लगाया। जब तक दोनो मौसी के पास पहुंचते उनके प्राणपखेरू उड़ चुके थे।

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