जागृती-गृहलक्ष्मी की कहानियां
Jagriti

Hindi Kahani: अकेलापन ऐसी पीड़ा है, जो कही नहीं जाती और सही भी नहीं जाती. मालती घर पर अकेली ही थी. ॲाफिस से घर और घर से ॲाफिस , इस के अलावा उसे कुछ काम भी नहीं था. पती के देहान्त की टीस भी अब हल्की हो गई थी. राजेश्वर का फोन हफ्ते में दो बार आता था. इकलौते बेटे को अमेरिका के प्रिंस्टन विश्वविद्यालय में पढाई के लिये भेजने को वह बिलकुल राजी नहीं थी, लेकिन पती ने जिद पकडी थी, और राज भी करीयर का वास्ता देकर अमेरिका जाने को उत्सुक था. होनी को कौन टाल सकता है…वह प्रिंस्टन में गया और मालती के पती को हार्ट अटैक आया, और उनकी मृत्यु हो गई|

मालती ने राजेश्वर को पढाई पूरी करने की हिदायत दी. ..मालती को यकीन था कि ये दिन भी ढल जायेंगे , अच्छे दिनों की सुबह होगी….

  फोन की घण्टी. राज का दूरध्वनी. “ मम्मी, मेरी प्यारी मम्मी, “ राजेश्वर ने उत्साह  भरे स्वर में कहा, “ मम्मी, बताऊं… मैं उत्तीर्ण हुआ- प्रथम  श्रेणी में – मैं ने बोरी बिस्तर बांध लिया है, सोमवार को होस्टेल से ‘ नो ॲाब्जेक्शन ‘ सर्टिफिकेट लेकर भारत का टिकेट बुक करूंगा…मम्मी … घर आ रहा हूं…टिकट का फायनल होने पर फिर फोन करूंगा- फिलहाल बहुत भागादौडी है— बाय मम्मी — टेक केयर-ओक्के… “

 मालती को हलका सा महसूस हुआ. प्रतीक्षा का काल अंतिम सांसें ले रहा था. राजेश्वर के आने पर कौन सी खाने की चीजें बनानी हैं, उन की क्रमवारी बनाने में पिछले

तीन दिन यूं ही व्यतीत हुए थे. आखिर, राज का फोन आ ही गया… , “ मम्मी, … “ मालती ने सवालों की झडी लगा दी.. यह करो… यह ना करो… सामान सम्हालो…खाना ढंग से खाओ… राजेश्वर ने फिर कहा, “ मम्मी, फोन में सिर्फ बोलना ही नहीं, कुछ सुनना भी पड़ता है… अब सुन… “.  “ अच्छा बाबा, सुना… क्या कहते हो? “ मालती. 

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  “ प्यारी मम्मी, गुस्से हो गई हो ? …. पर सुन … मैं पांच तारीख को निकलूंगा और छ: के शाम को पहुंचूंगा….मम्मी… पहले मैं गुरुग्राम जाऊंगा… लिली के घर… “

      “ कौन लिली? कोई अमेरिकी लडकी तो नहीं ? और पहले – अपने गांव मरोल में आओ, सामान रखो, और फिर … “    “ मेरी प्यारी मम्मी, लिली भारतीय है.. लिली फूल होता है न ?.. बांगला देश का राष्ट्रीय फूल…लिली बागेसर… उस के पिता बडे रसूकदार व्यक्ति हैं. उन की जान पहचान से …कैसे कहूं… काफी मदद हो सकती है….

मश्वरा दिया है… मम्मी, आने पर सब डीटेल में बता दूंगा… मैं फोन करता हूं…वहां केवल दो या तीन दिन रुकूंगा… ओके… मम्मी, टेक केअर… बाय..”

  मालती को सदमा लगा था. राज पर प्यार का श्रद्धापूर्वक अभिषेक करने की उस की अभिलाषा को ठेस पहुंची थी. अन्यमनस्क अवस्था में वह ॲाफिस गई थी. उसे उदास देखकर रिंकी फर्नांडिस ने पूछा, “ कल तक तो नाचती फुदकती थी… आज क्या हुआ ?

राज आने वाला है न ? “  रिंकी घनिष्ठ मित्र थी – हमराज थी. मालती ने उसे सब कुछ बता दिया. रिंकी ने समझाया, “ अरी पगली, इस में नाराजी की क्या बात है ? दो ही तीन दिनों की तो बात है. राज ऐसा लडका नहीं है… तुम्हारे सिवा उसे इस दुनिया में कौन है? 

आजकल के बच्चे बडे कॅल्क्यूलेटेड होते हैं… इन बागेसर महाशय से कुछ हासिल होता है, तो.. व्हॅाट्स रॅान्ग… मालती चिंता मत कर… सब ठीक हो जायेगा.. “

      मालती ने घर की सफाई करवाई. कोच पर बैठी मासिक पत्रिका पढ रही थी. राजेश्वर भारत में दाखिल हुआ था. उसे आये हुए को सात दिन हो गये थे. बीच- बीच में फोन करता था. वैसे ही आज फोन आया. “ मम्मी, माय डिअs मम्मी, लिली के पिता के पहचान वाले एक अंकल हैं – दयाघन अगरवाल – बडा कारोबार है उन का . उन की एक इकाई में मुझे जॅाब मिला है- तनख्वाह तगडी है. आकर बताऊंगा. तीन महीने अंडर ट्रेनिंग रहूंगा… “  मालती की आंखों में आंसू थे.वह उठ खडी हुई… बोली “ भगवान का शुक्र है… देरी से क्यों न हो, उस ने हमारा सपना पूरा किया है…मैं प्रयागराज जाकर शिवजी पर जलाभिषेक करूंगी… “   “ मां, तू सुनती तो है नहीं… देखो, हम परसों घर आ रहे हैं…”.    “ राज, ‘ हम ‘ क्यों कह रहे हो ? “    “ अरी प्यारी मम्मी, हम मतलब… देखो, तुम्हे बताया था न , लिली- लिली और मैं आ रहे हैं – लिली की भी नौकरी लग गयी है. हम दस दिन रहेंगे – मम्मी – रविवार को लिली के माता पिता भी आयेंगे आप से मिलने.”

     “ क्या – माजरा क्या है, राज … तुम.. ? “ मालती ने पूछा… , “ मैं तो… कुछ समझ में नहीं आ रहा.. “

   मालती ठगी सी अनुभव कर रही थी. शादी जैसी चीज में , राज को मुझे पहले विश्वास में लेना आवश्यक था. फिर रिंकी ने समझाया कि वह प्रौढ, शिक्षित और दुनियादारी की समझ रखने वाला युवक है… और  मां पर उस की असीम भक्ती भी लगती है. ‘ दिल को तसल्ली देने को ख्याल अच्छा है ‘ यह सोच कर मालती कामधाम  में मग्न हो गई. 

  लिली कमनीय और कामसू लडकी थी, उस ने मालती का दिल जात लिया था.बागेसर महाशय मितभाषी लेकिन प्रसन्न स्वभाव के व्यक्ति थे. अवनी- लिली की मां सामाजिक कार्यों में बढचढ कर हिस्सा लेती थी. सब ने मिलकर विवाह की तिथी निश्चित की. उन्होंने मालती को आश्वस्त किया कि उसे केवल सजधज कर उपस्थित रहना है, वे सब व्यवस्था कर लेंगे. व्यस्तता के कारण लिली के माता पिता जल्दी गुरुग्राम चले गये. 

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 परिणीत राजेश्वर-लिली की जोडी अब मेरठ में रहने गयी  थी. मेरठ कैंट के पास

बागेसर महाशय का एक छोटा सा बंगला था. अवनीजी के मित्रों ने दो नौकरों का इंतजाम किया था . ऐशोआराम से उन का जीवन व्यतीत हो रहा था. अपने काम से दोनों अपनी कंपनियों में स्थापित हुए थे….

   मालती को राजेश्वर का फोन नित्यश: आता रहता था. लिली भी मालती के संपर्क में रहती थी. उसने मालती को कई बार अच्छे सुझाव दिये थे. घर के फर्नीचर पर जमी धूल को हफ्ते में एक दिन कामवाली से साफ करवाइये, आप के कुर्ता-कमीज ओल्ड फॅशन के हुए हैं- मैं गुरुग्राम से पांच-छ: जोडी लाऊं क्या, भोजन में फ्रूट का समावेश आवश्यक है- कुछ पढने- सीखने की आदत आत्मसात करो, किचन के कंटेनरों को बदली करवाइये, बालों को रेग्युलरली कलर करिये, चश्मे का नंबर चेक कराइये, और बहुत कुछ… मालती को यह सब नहीं अच्छा लगता था. वह इन सुझावों को दरकिनार कर सादा जीवन जीना चाहती थी.

    रिंकी फर्नांडिस ने कहा, “ मालती, अरे इसे पॅाजिटिव वे में देखो. वह तुम्हारा भला ही तो चाहती है न ? इस में टेंशन लेने की कौन सी बात है ? देखो, मालती, तुम्हारे बहु-बेटे सेटल्ड हैं, समधी-समधन ब्रॅाड माइंडेड हैं, कंपनी तुम्हारे काम से खुश है और मेरे जैसे कई एक तुम्हारे सुख दुख को शेअर करने को तयार हैं… इन्सान को और क्या चाहिये ?”

      मालती के मन में विचारों का बवंडर सा उठा. उसे अब अलग से सोच बनानी पडेगी.राजेश्वर-लिली का हित सर्वोपरी मानना पडेगा. या मन को समझाना पड़ेगा कि यही तो वास्तविक सत्य है. उसे कहावत याद आयी, ‘ जो अपरिवर्तनीय है, उसे तो सहना ही पड़ेगा. ‘

     नाहक विषण्णता को तीलांजली देने वाली खबर आयी. समधन अवनीजी का फोन था, “ मालतीजी , आप का अभिनंदन… मंगल वार्ता यह है कि आप दादी होनेवाली हो “

      “ माय गॅाड ! अवनीजी, आप को भी मुबारक बात हो… बच्चों को नानी का प्यार जीवनभर सुखावह लगता है …मैं , सच में , बेहद खुश हूं. “

  अवनीजी ने कहा,    “ अगले मास लिली बिटिया को मैं ने गुरुग्राम में आमंत्रित किया है- गर्भाधान संस्कार विधि करनी है-पंडितजी ने ‘अथमास ‘ यानि आठवे महिने का संस्कार बताया है. आप कृपया छुट्टी का प्रावधान कीजिए. आप की उपस्थिती प्रार्थनीय है….. “ मालती को इन संस्कारों की- सोलह संस्कारों की- जानकारी नहीं के बराबर थी. 

      मालती ने जुगाड लगाकर ‘ सिक लीव ‘ हासिल की थी. गुरुग्राम में अब वह एक महिना गुजार चुकी थी. अवनीजी का दुमंजिला घर विस्तृत क्षेत्र में फैला था. दो मददगार काम वालों को नीचे ही दो कमरे दिये थे. मालती का मरोल का घर बहुत पिछडे जमाने का और देहाती परिप्रेक्ष्य सा लगता था. यहां प्रांगण में पिछवाडे में सब्जियां लगीं थीं. प्रवेश द्वार पर फूलों के गमलें और क्यारियां बनी थीं. बागेसर महाशय की महत्वपूर्ण बैठकें ऊपरी मंझिल के भव्य दीवानखाने में होतीं थीं. अवनीजी को मिलने भांती भांती के लोग आते थे. वह मुस्कुराते उन के स्वागत के लिये तत्पर रहती थी. 

      शाम का समय था.राजेश्वर मेरठ  में ही था. बागेसरजी बाहर गांव गये थे. अवनीजी शास्त्रीय गायन के किसी जलसे  में गईं थीं. बबलू बगीचे में काम करता था. विन्या ऊपर सफाई में लगा था. खाना बनाने वाली ‘भोली ‘ ओटला पोंछकर चली गयी थी. लिली अपने कंप्यूटर पर काम में व्यस्त थी… उतने में लिली चिल्लाकर बोली, “ बबलू , जल्दी कर , टॅक्सी बुला… मेरे पेट में भयंकर दर्द हो रहा है.. “ मालती दौड़ी—दौड़ी उसके पास गई, लिली का पसीना पोंछा, और गरम पानी पिलाया. “ मम्मी, आप रहो घर में… मैं बबलू के साथ ‘ कल्पतरू ‘ हॅास्पिटल में जा रही हूं… वहां ही मेरा नाम रजिस्टर है… और फिर डॅाक्टर भी जाने पहचाने हैं … आप चिंता मत करो…

      “ अरे लिली, मेरे होते हुए, अकेले कैसे जाने दूंगी ? “ मालती. उस ने जल्दी से बॅग भरा, थर्मॅास, पर्स, मोबाईल रखा…टॅक्सी से ‘ कल्पतरू ‘ पहुंचे. हॅास्पिटल भव्य था- चार मंझिला.  अस्पताल ने तुरन्त जिम्मेदारी संभाल ली .

बबलू और मालती प्रतीक्षा कक्ष में बैठे थे. मालती ने राजेश्वर, लिली के माता—पिता और विन्या को फोन किया. फिर रिंकी से बातचीत करने लगी. अब तक बीस पचीस व्यक्ति ‘ कल्पतरु ‘ में लिली के स्वास्थ्य की पूछताछ करने पहुंचे हुए थे. उत्कण्ठा सब के चेहरों पर झलक रह थी. लगभग तीन घण्टों के उपरान्त डॅाक्टर भागते दौड़ते लिली के पिता के पास आए , “बागेसर महाशय, बधाई हो, भगवान ने पुत्र रत्न दिया है… बालक और हमारी नन्ही लिली भी स्वस्थ हैं.

मां-बेटे को विश्रांती की आवश्यकता है…..एक एक कर के सब लिली से मिलकर चले गये. अब बबलू और मालती ही प्रतीक्षा कक्ष में रह गये. एक परिचारिका आयी- पूछा,  “ “ लिली मैडम के साथ हो ? ….सेकण्ड फ्लोअर पर डिसपेंसरी है, वहां से ये दवाएं और ईंजेक्शन ले आओ…. “ उस ने मालती के हाथ पर्ची थमा दी…. “ मालती को बब्लू ने बोला मैडम मैं जानता हूं कि आपको ये समझ में नहीं आयेगा.. “ मालती ने उसे बगैर बोले, हाथ से दूर किया, पर्स पकडी, और लिफ्ट की ओर चली गयी. 
अवनीजी ने  शिशु को सुशोभित झूले में सुलाया था. हैलो… अच्छी तरह से सुनो,”अवनीजी फोन पर ऊंची आवाज में  कह रही थीं, “मैं दो दिन नहीं आ पाऊंगी… कल नवजात शिशु का नामकरन होना है, मेहमान, रिश्तेदार, पहचानवाले पधारेंगे ना हमारी कुटिया में…हां हां भई, तुम सब आ जाना, घर आप ही का है – हां के ना ?  “ अवनी ने मोबाईल पटक कर बोली, “ मालती, कैसे कैसे लोग होते हैं !

  डेकोरेटर, कैटर, फोटोग्राफर, गायक-वादक वृंद, इलेक्ट्रीशियन, सफाई कार्मिक,पंडित, ज्योतिषविद, लोकल अखबार के  प्रतिनिधी,लिली- राजेश्वर का ॲाफिस स्टाफ , सब इकट्ठा हुए थे . होम हवन के साथ, सब के आशीर्वाद से, धूमधाम के साथ बालक का नाम ‘ लावण्य ‘ रखा गया था. मालती फुले नहीं समाती थी. राजेश्वर का कृतकृत्य भाव उस के हृदय को आल्हाददायक शीतलता प्रदान करता था. राजेश्वर और लिली को मेरठ वापिस जाना था. कर्तव्य और करीयर का तकाजा था कि वे कार्यपथ पर अग्रसर हों.
लिली के माता-पिता ने साशीर्वाद अनुमती दी थी. मालती को उन्होंने कहा था कि आप यहां ही आराम से रहिये… मरोल में आप का कौन है… और आप वृदधवास्था की ओर बढ रही हो… यहां कोई दिक्कत हो बताना- आनाकानी नहीं करना. मालती के संज्ञान में नहीं आ रहा था कि क्या जवाब दें…

राजेश्वर- लिली के प्रस्थान का समय आया था. उनके साथ लावण्य की देखभाल करने के लिये बागेसरजी ने एक वेट नर्स की नियुक्ती की थी. मालती का मन विना कारण उद्विग्न , विचलित और कोलाहल भरा बन गया था. राजेश्वर ने कहा, “ मम्मी, माय डियर, अब मरोल केवल चार दीवारी बन गया है… यहां नौकर चाकर हैं, आराम है, स्वतंत्र कमरा है… मम्मी, मेरठ से यहां तुम्हे मिलने आना आसान है… रहो .. इधर ही रहो”. 

      इतवार था. विन्या और बबलू काम में मशगूल थे. बागेसर महाशय गया में एक हफ्ते के लिये विपश्यना के समारोह में सहभागी होने के लिये कल ही गये थे. अवनीजी दिल्ली गईं थीं- उन की मित्र ,गंधिता जाजू , कार ॲक्सिडेंट में  घायल थीं,  उन का अस्पताल में रहना जरूरी था, मित्र की सेवा करना उन का स्वभाव था, यही बुजुर्गों ने उसे सिखाया था. यही तो ईश्वर की आराधना का मार्ग है…मालती बंगले में थी, बाकी सब अपने अपने कार्य में व्यस्त थे. उसे पता नहीं, क्यों, असहजता का अनुभव हो रहा था.कुछ दिनों के उपरान्त लिली लावण्य को लेकर उस के मायके- गुरुग्राम में आयी थी. 

  लिली ने लावण्य को आते ही अवनी के हवाले कर दिया था. लिली  ने मालती के लिये एक रिस्ट वॅाच लायी थी. “ राज, मेरे पास पहले ही यह घड़ी है… यह महंगी लगती है…क्या जरूरी थी इस की ? “.    लिली ने कहा, “ मम्मीजी, आप के पास जो है, वह बाबा आदम के जमाने की है… यह नये युग की , नये तंत्रवाली वॅाच है… आप पुरानी डिबिया पहनती हो, लोग हंसते हैं हमपर… मैंने ही राज से कहा था कि मम्मी के लिये ढंग की घडी खरीदो… “ मालती ने दो उंगलियों से घडी पकडी, मिनट भर घूरती रही, फिर बोली , “ जैसे आप लोगों की मनिषा-घडी के बिना मेरा कौन सा काम रुकता है ? “ इतना कहकर उस ने पुरानी घड़ी उतार कर नयी वॅाच कलाई पर लपेट ली.बोली, 

“अच्छी है… बहुत अच्छी है…बेल्ट भी खूबसूरत है, पसंद है मुझे.. “ आदमी का अंतर्यामी मन कुछ सोचता है और दुनियादारी की भाषा कुछ और होती है. मालती के मन में कई सवाल पैदा हुए थे…. लोग मेरी घड़ी को देखकर मेरी संभावना करते हैं… केवल चमक धमक ही मेरी पहचान है… राजेश्वर को मेरा पक्ष रखना चाहिये था कि नहीं ? …

    आज लिली के घर में रात्री-भोज का आयोजन था. लावण्य को देखने शहर की बडी हस्तियां आने वाली थीं .पूरा बंदोबस्त हो गया था. बबलू ने एक पैकेट मालती को पकडाया. “ मालती मैडम, ये लिली मैडम ने दिया है… फंक्शन में पहनने की रिक्वेस्ट की है… “  ब्यूटी पार्लर वाली महिला मालती का मेक अप कर गयी थी. मालती नया ड्रेस 

पहनकर अवनीजी के संग खडी थी. कार्यक्रम सुचारु रूप से सम्पन्न हुआ. फिर भी मालती के दिल में समाधान की भावना नहीं थी. राजेश्वर  आगंतुकों के साथ घुलमिल गया था. मालती सब लोगों से अपरिचित थी. वह कुर्सी लेकर एक कोने में बैठ गयी थी. 

      मालती ने दूसरे दिन रिंकी को फोन लगाया और कहा कि वह खोई खोई सी महसूस कर रही थी. रिंकी ने समझाया कि यह उस का भ्रम है . तुम्हे सब तरह से आराम है, मान सम्मान है, प्रिय जनों का साथ है, अपने मन को अवगत कराओ कि सचमुच तुम्हे सुख की नैया मिली है…. मालती , खुश रहना भी एक कला है…. और क्या बताऊं ? “

      नया दिन निकल आया था. बागेसर महोदय हमेशा की तरह बाहर गये थे, अवनीजी, महिलाओं के लिये आयोजित एक समारोह में गईं थीं.राज और लिली मेरठ जाने की तयारी में थे. राज ने कहा , “ मम्मी, अब यहां ही रहना है… मरोल को भूल जाओ. मैं और लिली समय निकाल कर वहां जायेंगे और घर डिसपोज कर देंगे. आप को चिंता करने की  कतई जरूरत नहीं. “ 

      मालती के पेट में पीड़ा सी महसूस होने लगी, दिल मचलने लगा , आंखों में अंधेरा सा छा गया… कष्ट के साथ बोली , “राज- बेटा, मैं यहां नहीं रह सकती. मुझे मरोल ही भला लगता है. यहां .. यहां मुझे कोई बंधन नहीं, सभी सुविधायें हैं , फिर भी , यहां मेरा मन नहीं लगता “. राज ने कहा, “ मम्मी, तुम खामख्वाह परेशान होती हो… कोई भय  तुम्हारे मन में घर किये बैठा है… काल्पनिक चीजों के पीछे मत भागो. “

राजेश्वर ने समझाने की कोशिश की , पर व्यर्थ. लिली ने कहा, “ राज, जातीं हैं तो जाने दो न ? बुढापा डराएगा, तब अपने आप गुरुग्राम याद आयेगा…. बबलू कहता ही था कि  मालती मैडम का स्वभाव विचित्र जैसा लगता है…. “

    मालती को मरोल पहुंचे महिना बीत चुका था. वह नियमित रूप से कार्यालय जाने लगी थी. रिंकी के साथ विचारों का आदान प्रदान होता ही था. कभी कभार राजेश्वर का फोन आता था. रिंकी ने पूछा, “ मालती, अकेली रहती हो, एकांत वास दिल को काटता है कि नहीं ? “  “ रिंकी, सच कहूं…. अकेले में मन का दाह तो होता ही है… पर, यहां, कोई दूसरा मुझे यह नहीं बताता कि तुम क्या खाओ, क्या पहनो, कैसे बोलो, कब बोलो,…. बागेसरजी बहुत अच्छे इन्सान हैं , लेकिन मैं वहां एक गवांर औरत सी लगती थी, मैं हाय फाय सोसायटी के लायक कदाचित नहीं हूं… इधर मैं स्वतन्त्र हूं… यहां अकेलेपन मुझे खुदमुख्त्यारी देता है, मेरा खोया हुआ आत्मविश्वास पुनर्जागृत हो गया है,  मैं जीऊंगी… ऐसी ही… मेरे अपने हिसाब से…..