Hindi Love Story: जि़ंदगी में किसी भी रिश्ते को अगर तुलनात्मक नज़रिये से देखा जाए तो किसी न किसी के पलड़े को झुकना ही पड़ता है। इन्हीं तानों-बानों को सुलझाती कहानी-
वीक एंड पर केशव ने पास के ही एक पिकनिक स्पॉट पर जाने की योजना बना डाली। दोनों बेटों को हॉस्टल में भेज देने के बाद से मैं भी अपने को घर में काफी अकेला महसूस करने लगी थी, इसलिए झट से जाने के लिए तैयार हो गई थी। दूसरे दिन सुबह-सुबह ही वहां जाने के लिए हम तैयार होकर निकल पड़े थे। अभी आधा रास्ता भी तय नहीं हुआ था कि एक छोटा सा लड़का तेजी से कार के सामने से रास्ता पार करने के लिए दौड़ पड़ा। केशव ने उसे बचाने की बहुत कोशिश की, जिससे कार रास्ते के किनारे लगे पत्थर से जा टकराई और लड़के को हल्का-सा धक्का लग ही गया, जिससे वह औंधे मुंह सड़क पर जा गिरा।
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केशव की कोई गलती नहीं थी, फिर भी देखते-देखते लोग कार के आस-पास जमा होने लगे। मैं बुरी तरह घबरा गई थी। तभी वहां पर एक पुलिस की गाड़ी आ लगी, जिससे चार-पांच पुलिसकर्मी उतरकर वहां आ गए। उन लोगों ने बीच-बचाव कर मामले को शांत किया और हम दोनों को सुरक्षित अपनी जीप तक ले आए। वहां पहुंचते ही जो व्यक्ति धूमकेतु सा जीप से निकलकर प्रगट हुआ, वह और कोई नहीं विष्णु था, जिसे देखते ही मुझे यह समझने में देर नहीं लगी कि पुलिसकॢमयों का हमारे साथ इतना दोस्ताना रवैया क्यों था।
पुलिसकॢमयों को हमारी क्षतिग्रस्त कार के विषय में कुछ निर्देश दे, वह हम दोनों को अपनी जीप में बिठाकर अपने घर ले आया। वहां पहुंच आनन-फानन में केशव को लगी थोड़े-बहुत चोटों पर मरहम-पट्टी करवा दी, हमारे लिए उसने इतना सब कुछ किया, फिर भी मैं हमेशा की तरह उसके लिए एक छोटा-सा शब्द ‘अ’! ‘धन्यवाद’ तक नहीं बोल पाई। दरअसल कहीं-न-कहीं मेरे मन में हमेशा से अपने आपको उससे विशिष्ट समझने का दर्प रहा, जिससे उसकी विनम्रता में भी उसकी दीनता नजर आती थी। आज उसका सौम्य व्यक्तित्व, वैभव, उच्चपद और शालिन व्यवहार ने मेरे सारे दर्प को धराशायी कर मुझे पूरी तरह निरूपाय बना दिया था। उस पर उसके सांवले चेहरे पर जड़ी दो आंखों के मूक उपालंभ बेचैन किये हुए था।
तभी वहां उसकी पत्नी रेवा और उसका गोलमटोल सा बेटा अनंत भी आ गया था। रेवा का सुंदर मुखड़ा, आकर्षक व्यक्तित्व और विनम्र व्यवहार ने मेरे रहे सहे दर्प को भी चूर-चूर कर दिया। रेवा एक डाक्टर थी, जो पास के ही एक हॉस्पिटल में काम करती थी, फिर भी उसने हमारे आतिथ्य में कोई कमी नहीं छोड़ी थी। रेवा के सामने मैं खुद को काफी बौना महसूस कर रही थी। थोड़ी ही देर में विष्णु और केशव ऐसे घुलमिल कर बातें करने लगे, मानो बरसों के बिछड़े दो आत्मीय स्वजन हो और मेरा अचंभित मन यही सोच रहा था कि मात्र दस बरसों का समय क्या आदमी को आपाद मस्तक बदल सकता है।
कभी घिसे बदरंग कपड़े और पैबंद लगे जूते पहनने वाला विष्णु पुलिस की वर्दी में काफी स्मार्ट लग रहा था। पुलिस की ट्रेनिंग ने ठोक पीटकर उसके श्यामल चेहरे को पौरूष के तेज से दिप्त कर उसके व्यक्तित्व को एक नया आयाम दिया था, फिर भी उसकी मुस्कान अभी तक उतनी ही स्निग्ध थी। जब रेवा किसी काम से उठकर अंदर चली गई तो भारी बोझ लिए मेरा मन उद्देश्यहीन यहां-वहां भटकता विस्मृत शहर मुजफ्फरपुर के उस मकान में जा पहुंचा, जिसके पड़ोस में मेरी सबसे अच्छी दोस्त नेहा रहती थी। विष्णु नेहा के ताऊजी की इकलौती संतान था। उसके माता-पिता गांव में ही रहकर खेती-बाड़ी का काम देखते थे और विष्णु गांव से ही दसवीं की परीक्षा पास करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए शहर में रह रहे अपने चाचा आदित्य बाबू के पास आ गया था, लेकिन उस घर में उसकी चिंता करने वाला कोई नहीं था। बस दो जून खाना और रहने की जगह भर मिल गई थी, जिसकी एवज में आटा पिसवाना, बिजली का बिल जमा करवाना जैसे कई काम उसे सौंप दिए गए थे। ऐसी दुरवस्था में भी उसने अपना आत्मसम्मान नहीं खोया था। यहां-वहां ट््यूशन कर अपनी पढ़ाई के लिए पैसे इक_ïा कर लेता था।
एक बार नेहा ने मुझे बताया कि विष्णु भले ही गांव में रहकर पढ़ा था, फिर भी गणित और अंग्रेजी विषयों का ज्ञान उसे बहुत अच्छा था, पर उसके हाव-भाव और हुलिए को देखकर अच्छे परिवारों में जहां से उसे अच्छे पैसे मिल सकते थे, वैसी जगहों पर लोग उसे पढ़ाने के लिए रखते ही नहीं थे। तब न जाने क्यूं मेरे अंदर उसकी मदद करने का जज्बा सा उमड़ा था और मां को समझा बुझा कर मैंने अपने दोनों छोटे भाइयों सोनू और मोनू को पढ़ाने का काम उसे दिलवा दिया था।
उसे चाहे जो फायदा हुआ हो या न हुआ हो वह हमारे घर के लिए अच्छा खासा मनोरंजन का साधन बन गया था। जब भी वह सोनू-मोनू को पढ़ाने आता, मेरी छोटी बहन कोमल उसे चाय और नाश्ता देने के बहाने वहां के दो-चार चक्कर लगा ही आती और साथ ले आती हंसी का पिटारा। कभी कहती, ‘दी आपने उसके अलबेले जूते देखे हैं, अपने फटे जूते पर कैसे तरह-तरह के स्टीकर चिपका कर जूते के जीर्ण-शीर्ण काया का जीर्णोद्वार किये हुए हैं? कभी कहती ‘दी… आप जानती हैं इतनी ठंड में भी अपने शर्ट की आस्तीन क्यों मोड़े रहता है? उसके शर्ट की आस्तीन ही फटी हुई है। एक बार जब जाड़ा समाप्त होने पर भी वह अपना पुराना हाफ स्वेटर पहने रहता, जाने किस वेताल से कोमल ने पता लगा लिया था कि उसका शर्ट पीठ पर से फटी है जिसके कारण वह स्वेटर पहनता है।
मां को मालूम हुआ तो उन्होंने दूसरों का मजाक उड़ाने के लिए कोमल को अच्छी-खासी डाट पिलाई और महीना पूरा होने से पहले ही विष्णु को ट््यूशन के पैसे पकड़ा दिये। दूसरे ही दिन स्वेटर उतार नया शर्ट पहनकर आ गया था। ऐसा नहीं था कि विष्णु हम लोगों की हरकतों और व्यंग्यवाणों से अनभिज्ञ था, लेकिन जानबूझ कर अनजान बना कोमल के व्यंग्य वाणों को हंसी से छिपाने का प्रयास करता रहता।
उस दिन मेरा जन्मदिन था। किसी तरह सोनू-मोनू से विष्णु को मालूम हो गया था। सुबह-सुबह दो बेहद सुंदर पीले गुलाबों को पत्तों से सजाकर मुझे भेंट किया। कोमल को अच्छा मौका मिल गया, उसके जाते ही शुरू हो गई। ‘दी… एक बात कहूं, इतने सुंदर फूल खरीदने की तो इसकी हैसियत नहीं है। जाने किस बाग का नगीना चुरा लाया है। मेरे डांटने का भी उस पर कोई असर नहीं होता।
गुजरते समय के साथ वह हमारे परिवार में पूरी तरह घुल-मिल गया था, फिर भी कोमल की अनियंत्रित वाणी कभी-कभी मुझे चौंका देती, कहीं वास्तव में वह मुझसे प्यार तो नहीं करने लगा, क्योंकि वह घर के अन्य लोगों की अपेक्षा मेरा कुछ ज्यादा ही ख्याल रखता था।
मेरे लिए इतना सब कुछ करने के बाद भी उसने हमेशा मेरे और अपने बीच की मर्यादा को बनाये रखा। कभी अपने प्यार का इजहार नहीं किया भी भी मैं उसके दिल में बसे प्यार को अच्छी तरह भांप गई थी। उसके इस दु:साहस पर गुस्से के साथ-साथ मन ही मन हंसी भी आई थी। अपनी हैसियत जाने बिना लोग कैसे-कैसे सपने देखने लगते हैं।

समृद्धि और शहरी संस्कार में पली-बढ़ी मैं बेहद खूबसूरत लड़की थी। मेरे पिताजी सिंचाई विभाग में काफी ऊंचे पद पर कार्यरत थे, जिसके कारण बचपन से ही हमें सभी आधुनिक सुख-सुविधाओं की आदत थी। वहीं विष्णु का सांवला रंग, उठने-बैठने का तरीका, आधुनिक मान्यताओं से पूरी तरह भिन्न और देहाती था। विष्णु के मन की बात समझते ही खुद-ब-खुद मेरा व्यवहार उसके प्रति रूखा हो गया था। उसी दौरान बीए का रिजल्ट भी आ गया था। विष्णु ने पूरी यूनिवॢसटी में प्रथम स्थान प्राप्त किया था। मुझे भी फर्स्ट क्लास मिला था। इस रिजल्ट ने हम दोनों के बीच अचानक उग आए बेगानेपन को थोड़ा कम कर दिया। अभी मैं आगे की पढ़ाई के लिए सोच ही रही थी कि मामाजी केशव का रिश्ता मेरे लिए ढूंढ़ लाए थे और मेरी शादी केशव के साथ तय हो गई थी। पापा ने ढेर सारे काम विष्णु को भी पकड़ा दिये थे। वह चुपचाप कामों में लगा रहता, लेकिन उसके चेहरे की उदासी और मायूसी मुझसे छिपी हुई नहीं थी, फिर भी प्रभुता के मद में अंधी मैं जानबूझ कर अपने ससुराल की शिक्षा, पद और समृद्धि का गुणगान कर उसे आहत करती रहती।
मेरी शादी से एक दिन पहले उसकी मां की तबियत खराब हो गई और उसे गांव जाना पड़ा। मेरी शादी के तुरंत बाद उसे पटना के एक प्राइवेट फर्म में नौकरी मिल गई थी और वह मुजफ्फरपुर छोड़कर पटना जा बसा था। देखते-देखते दो वर्ष गुजर गए। एक दिन अचानक कोमल का फोन आया- ‘दी… एक खुशखबरी है, वह रोड रोमियो विष्णु आईपीएस ऑफिसर बन गया।
उसकी इस आशातीत सफलता पर खुश होने के बदले, मुझे एक तमाचा सा लगा, क्योंकि मैंने हमेशा उसे अपने से कमतरीन समझा इसलिए खुश होने के बदले उद्गिन मन से व्यंग्यवाण ही निकले। हालांकि मैं $खुद ही समझ रही थी, मेरा सिद्धांत विहीन वक्तव्य मेरी ही आत्महीनता को दर्शा रहा था। वह भी उस विष्णु के लिए जो हमेशा निष्काम भाव से समॢपत रहा।
तभी रेवा की आवाज ने मुझे चौका दिया था। वह मेरी तरफ चाय का प्याला बढ़ाते हुए बोली, ‘विष्णु आपकी जितनी तारीफ करते थे, आप उससे कहीं ज्यादा अच्छी हैं।
‘बिना वजह बड़ाई करना तो विष्णु की आदत में शुमार है। मेरी इतनी सी बात ने रेवा को बोलने का सूत्र थमा दिया- ‘आपकी इस बात से मैं पूरी तरह सहमत हूं, विष्णु का स्वभाव ही ऐसा है जिन्हें दूसरों में सिर्फ गुण ही दिखाई देते हैं। वह किसी के लिए दिल में कोई शिकवा नहीं रखते। माता-पिता से भी इनका लगाव अद्भुत है। हर रिश्ते को मान देने वाला निश्च्छल और दूसरों की मदद करनेवाले इंसान की पत्नी कभी दुखी हो ही नहीं सकती है। यही सोच मुझे इनके करीब लाई। हम दोनों अलग-अलग वातावरण में पले-बढ़े, अलग-अलग स्वभाव के भी हैं, फिर भी ऐसी ही कुछ बातें बहुत खास थीं जो हमदोनों में समान थी, जिससे हमने शादी कर ली। मैं आज फख्र से कह सकती हूं कि हम दोनों का यह फैसला पूरी तरह सही था।
रेवा की बातों से मेरी खामोशी और भी गहरा गई थी। एक अजीब सी शून्यता मेरे दिलो-दिमाग में भरने लगी थी। तभी हमारी कार बन कर आ गई थी। हम दोनों ने वहां से विदा ली। गाड़ी में बैठने से पहले मैंने मुड़कर देखा, विष्णु से मेरी आंखें टकरा गई, उसकी सरल, शंकाहीन, निर्दोष आंखों से मैं आंखें मिला नहीं पाई। मैंने जो श्रेष्ठता की एक लकीर खीची थी, उसकेसामने एक बड़ी लकीर खींच कर खुद-ब-खुद मुझे छोटा बना दिया था।
विष्णु का सांवला रंग, उठने-बैठने का तरीका, आधुनिक मान्यताओं से पूरी तरह भिन्न था, साथ ही देहाती संस्कारग्रस्त तन-मन और अभावग्रस्त कम पढ़े-लिखे माता-पिता की संतान होने के कारण वह अभावों में ही पला-बढ़ा था।
