रामगढ़ का किला अब वीरान था। किले के भीतर का भाग जिस में राज परिवार रहा करता था, वह बंद पड़ा पड़ा खंडहर में तब्दील हो रहा था। किले के बाहरी हिस्से में किले में काम करने वाले लोगों की रिहाइश थी। किले का एक बड़ा मेन फाटक था। एक वक्त था, जब उसकी चौकीदारी के लिए बीस बीस लोग तैनात रहते थे। चौकीदारों की मुखिया थे मंगल सिंह। अब तो जब से राजा साहब का देहांत हुआ किले में काम करने वाले सभी लोग खाली हो गए। राजा साहब के साथ ही सब की नौकरी चली गई। बेटी साहब ने पिता के देहांत के बाद वापस ससुराल जाते वक्त सब से कह दिया कि वे कोई और काम काज ढूंढ लें। अब किले से उन्हें पगार नहीं मिल पाएगी। रहने के लिए वे उन्हीं घरों में रह सकते थे, जहां  रह रहे थे।

बहुत से लोग ऐसे थे जो किले में काम करते करते ही अपनी उम्र गुजार चुके थे, अब कहां काम ढूंढते? सब चुप लगा गए। पर मंगल सिंह जवान थे और अजब कर्मठ और जिद्दी इंसान थे। बेटी साहब से कहने लगे – “बेटी साहब, हमें तो राजा साहब ने यहां की रखवाली का काम सौंपा था और हमने भी उन्हें जुबान दी थी कि जब तक जान है हम यहां से नहीं हटेंगे। अब आप तनख्वाह दें या ना दें हम यही काम करेंगे। देखेंगे ऊपरवाला दो रोटी का कहीं से इंतजाम कर देगा तो बच्चों को खिला देंगे नहीं तो कोई बात नहीं। जैसा ऊपर वाले को मंजूर होगा देखा जाएगा।”

बेटी साहब कुछ पल चुप रहीं। उन्होंने सोचा कि किले की देखभाल के लिए कोई तो होना ही चाहिए। फिर मंगल सिंह जैसा ईमानदार और स्वामी भक्त व्यक्ति ढूंढने से भी नहीं मिलेगा। सोच कर बोली, ‘ठीक है मंगल सिंह जी आपको आपकी तनख्वाह सही वक्त पर मनीआर्डर से मिलती रहेगी। आप किले की पहरेदारी में रहिए।’ किले के फाटक  के अन्दर एक छोटी सी कोठरी थी। चाहे जैसा भी मौसम हो मंगल सिंह उसी में रात गुजारते। बेटी साहब कभी कभार अपनी जमीन जायदाद और किले की देखभाल के लिए आती। साथ में दामाद साहब भी आते। दोनों की कोई संतान नहीं थी। मंगल सिंह के बेटों की पढ़ाई – लिखाई  की जिम्मेदारी भी बेटी साहब ने अपने ऊपर ले ली थी। देखते – देखते दोनों बेटे बड़े हो गए। दोनों बहुत ही होनहार और पिता की ही भांति अच्छे संस्कारों वाले थे। बड़ा बेटा डॉक्टर बन गया और छोटे बेटे की पुलिस में नौकरी लग गई। दोनों ने किले के पास ही बाहर एक शानदार मकान बनाया था। मंगल सिंह भी वक्त के साथ बूढ़े हो चले थे। बेटे चाहते थे कि अब पिताजी उनके साथ आ कर रहें, और अपना बुढ़ापा सुकून से गुजारें। सारी जिंदगी तो उन्होंने मेहनत की है। पर मंगल सिंह टस से मस ना होते। उन्हें उसी कोठरी में रात बितानी होती। देखते देखते बेटी साहब भी चल बसी। उनकी मौत के बाद दामाद साहब ने हमीरपुर छोड दिया। उनके भतीजे से उनकी नहीं पटती थी। उन्होंने किले के भीतर के दो तीन कमरे ठीक ठाक करा लिए और वहीं  रहने लगे। अब तो मंगल सिंह की ड्यूटी और सख्त हो गई। दामाद साहब की देखभाल का सारा काम भी उन्हीं पर आ गया। मंगल सिंह उनके हर सुख दुख के साथी हो गए। शाम को कभी कभार जब दामाद साहब अपनी मोटर में सैर के लिए निकलते तब भी मंगल सिंह को अपने साथ बिठाकर ले जाते। दामाद साहब की तबीयत जरा भी ढीली होती तो मंगल सिंह फौरन अपने बेटे को बुलवा भेजते। ऐसे में वह एक पल के लिए भी वहां से ना हिलते। बहुएं खाना भी वहीं भेज देतीं। बेटे मिन्नत कर कर के थक जाते कि पिताजी बहुत उम्र हो गई अब तो नौकरी छोड़ दो। मंगल सिंह हंस कर कहते, ‘बेटा अब तो जान के साथ ही जाएगी यह नौकरी। दामाद साहब को किसके सहारे छोड़ दें? कौन देखभाल करेगा उनकी?’

बेटे भी थक – हार कर चुप हो जाते। एक रात दामाद साहब की तबीयत काफी बिगड़ गई। रात में मंगल सिंह की कोठरी की घंटी बजी। मंगल सिंह दौड़ते हुए अंदर पहुंचे। दामाद साहब की हालत देखकर तुरंत नौकर अपने घर भेजा बेटे को बुलाने के लिए। बेटा तुरंत ही आया। मंगल सिंह भी वहीं खड़े थे। बेटे ने आकर हाथ खड़े कर दिए। बोला “पिताजी ने अस्पताल ले जाना होगा। हालत कुछ ठीक

नहीं जान पड़ती।” आनन- फानन में ड्राइवर बुलाया। गाड़ी में किसी तरह उन्हें लेकर अस्पताल पहुंचे। वहां उन्हें तुरत ही दाखिल कर दिया गया।

मंगल सिंह ने बेटे को हिदायत देकर भेजा था कि तुम रात में दामाद साहब के पास ही रुकना। पर रात पूरी कहां बीत पाई। सुबह चार बजे दामाद साहब चल बसे। बेटा उनके शव को किले में लाने का प्रबंध करके अपनी गाड़ी से पिता को खबर देने वापस आया। उसका मन स्वार्थी हो चला था। कहीं ना कहीं मन में सुकून था कि चलो अब पिताजी की नौकरी खत्म। जब मालिक ही नहीं रहे तो कैसी नौकरी ? अब मैं उन्हें घर ले जाऊंगा। सोचते सोचते सीधे पिता की कोठरी में पहुंचा। आवाज लगाई – “पिताजी पिताजी”! जब कोई आवाज ना आई तो उसने दरवाजे को धक्का दिया। दरवाजा पूरा खुल गया। मंगल सिंह चारपाई पर पड़े थे। बेटा उन्हें इस हालत में देखकर कुछ सशंकित हो गया। उसने आवाज दी “पिताजी, पिताजी”! मंगल सिंह तो एक आवाज में जवाब देते थे। इस उम्र में भी क्या कड़क दार आवाज थी। पर मंगल सिंह होते तो बोलते। बेटे को कुछ शंका हुई। उसने हाथ पकड़ कर नब्ज टटोली तो वहां कुछ ना था।

“नहीं!!!! ऐसा नहीं हो सकता पिताजी!!! मैंने क्या-क्या सोचा था।अब आप को घर लेकर जाऊंगा।” बेटा फफक – फफक कर रो पड़ा। पिताजी घर क्या जाते? वे तो मालिक के लिए ही पैदा हुए थे। उन्हीं के साथ चले गए। उस दिन किले से दो अर्थियां एक साथ उठीं , एक मंगल सिंह की और दूसरी उनके मालिक की।

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