यूं तो हर इंसान के सामने, हर दिन कोई ना कोई छोटी-बड़ी समस्या और चुनौती आती ही रहती है, लेकिन ऐसी चुनौतियों का सामना करने के लिए आमतौर पर उसके पास एक या एक से अधिक अस्त्र-शस्त्र होते ही हैं, चाहे वह जमा की हुई बचत के रूप में हों, मित्रों या पारिवारिक सदस्यों के सहयोग के रूप में हों या अनुभव एवं ज्ञान के रूप में, लेकिन कल्पना करिए कि किसी के पास ऐसा कुछ भी ना हो, ऊपर से उसकी उम्र भी ऐसी ना हो, कि वह शारीरिक या मानसिक रूप से ऐसी किसी भी समस्या का सामना कर सके, तो उसकी क्या स्थिति होगी? यही स्थिति होती है, एक अनाथ बच्चे की।

एक शासकीय स्तर की रिपोर्ट के अनुसार, कोरोना की दूसरी लहर ने 1000 से अधिक बच्चों के मां-बाप को उनसे छीन लिया। वे बेसहारा हो गए।  यह आंकड़े धीरे-धीरे बढ़ते ही जा रहे हैं। इन बच्चों की स्थिति और उनके बारे में पढ़कर ऐसा नहीं है, कि लोगों के हृदय में इनके प्रति संवेदना ना जागी हो या कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं की इन पर नजर न पड़ी हो, किंतु इनकी सहायता कैसे की जाए, यह काफी हद तक लोगों के सामने स्पष्ट नहीं है।

उलझनों से दूर रहे बचपन

एक समस्या और है इन बच्चों को या किसी भी अनाथ बच्चे को गोद लेने के लिए आने वाले व्यक्ति की विश्वसनीयता।

ह्यूमन राइट्स वाच की एक रिपोर्ट के अनुसार कोविड की वजह से अनाथ हुए बच्चों को गोद लेने की इच्छा प्रकट करने वाले लोगों में मानव तस्करी, यौन शोषण और जबरन भीख मंगवाने वाले गिरोह से संबंध रखने वालों के शामिल होने का बहुत बड़ा खतरा है।

हमारे देश में ही नहीं बल्कि विश्व भर में ऐसे कितने ही संगठित गिरोह हैं, जिनकी दृष्टि इसी तरह के बच्चों पर रहती है और वह इस ताक में रहते हैं कि जैसे ही कोई ऐसे बच्चे जो पूरी तरह अनाथ है और जिन्हें आसानी से काबू में किया जा सकता है उनको किसी न किसी तरीके से किसी ना किसी प्रक्रिया से अपने काबू में कर के और उनसे इस तरह के अपराध कराए जाएं। एक बार इनके चंगुल में जाने पर बच्चों की जिंदगी इनकी ही दया पर आश्रित हो जाती है और वह बड़े होकर इनके ही सहभागी बन जाते हैं। इसमें एक महत्वपूर्ण तथ्य भी है कि वे बच्चे जो मानसिक रूप से अवस्थित हैं या पहले से ही विकलांग हैं उनकी कीमत ऐसे संगठनों की नजर में और भी ज्यादा होती है, क्योंकि उनका उपयोग इन अपराधों में आसानी से किया जा सकता है। इन संगठित गिरोहों के पास अपना ऐसा नेटवर्क है और ऐसी व्यवस्था है कि वे सारे नकली कागदादी तैयार कर लेते हैं और नकली माता-पिता भी खड़े कर देते हैं।

बच्चों को सरकार का सहयोग

कोविड के कारण अनाथ हुए वे बच्चे जिनके मां-बाप दोनों ने ही उनका साथ छोड़ दिया हो, उनकी देखभाल और सुरक्षा के लिए जे.जे. एक्ट 2015 के सेक्शन 31 के अंतर्गत उन्हें जिले की चाइल्ड वेलफेयर कमेटी (जो हर जिले में होती है) के सम्मुख प्रस्तुत करने की व्यवस्था की गई है, ताकि उस बच्चे की देखभाल के लिए जरूरी आदेश दिए जा सकें। उसकी पढ़ाई का इंतजाम, उसे एडॉप्शन पूल में डालना और अगर कोई रिश्तेदार उसकी देखभाल करना चाहता है, तो उसे सपोर्ट करना, यह सब इस विभाग की जिम्मेदारी है। नई दिल्ली बाल अधिकार संरक्षण आयोग डीसीपीसीआर ने ऐसे जरूरतमंद बच्चों के लिए एक हेल्पलाइन नंबर 91 9311 55 13 93 जारी किया है जिस पर रिपोर्ट करने के बाद 24 घंटे के अंदर सहायता मिलना सुनिश्चित किया गया है।

भावनात्मक सहयोग भी अपेक्षित

अनाथ हुए बच्चों को जहां एक ओर सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा की आवश्यकता महसूस होती है, वहीं उससे कहीं और ज्यादा भावनात्मक सहारे की जरूरत पड़ती है। आमतौर पर उनके रिश्तेदार या पारिवारिक मित्र भी शोक में डूबे हुए होते हैं, अत: उन्हें वह सपोर्ट नहीं मिल पाता। 

इन बच्चों में गुस्सा, उदासी, डर और शोक स्थाई रूप से घर कर जाता है। ऐसे में इनकी मानसिक स्थिति क्या होगी, इसकी हम कल्पना कर सकते हैं। इन अनाथ बच्चों को गोद लेकर ही उनकी सहायता की जा सकती है, यह भावना कितने ही लोगों के मन में आती है। पहले जहां महिला बाल एवं बाल कल्याण अधिकारी के यहां आवेदन करने के बाद जिला जज की अनुमति से बच्चा आसानी से गोद मिल जाता था, वहीं अब महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने सावधानी बरतते हुए, कुछ नई व्यवस्थाएं की हैं और संभवत: आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि पूरे देश में बच्चों को गोद लेने की प्रतीक्षा सूची में 26000 से अधिक लोग शामिल हैं। (इस प्रतीक्षा सूची कि इतनी बड़ी संख्या के पीछे एक तथ्य यह भी है कि गोद लेने के इच्छुक मां-बाप, गोद लेने से पूर्व बच्चों की जाति, रूप-रंग धर्म आदि पर भी पूरा ध्यान देते हैं और अपनी शर्तों पर वह बच्चों को गोद लेना चाहते हैं)।

अब नई व्यवस्था के अंतर्गत बच्चा गोद लेने की प्रक्रिया कम-से-कम 6 से 8 माह में पूरी होती है। अधिकतर लोगों को यह जानकारी नहीं होती कि वह गोद लेने की प्रक्रिया को किस प्रकार पूरा कर सकते हैं। उनको लगता है कि किसी परिचित या नॄसग होम, अस्पताल या एनजीओ के माध्यम से ऐसे किसी अनाथ बच्चे की सूचना पाने पर, वह उसको गोद ले सकते हैं, किंतु सत्य यह है कि राज्य सरकारों की अधिकृत एडॉप्शन एजेंसी के द्वारा ही इस प्रक्रिया को पूरा किया जा सकता है।

कारा (cara) करती है इसमें सहायता

कारा अर्थात भारत सरकार की सेंट्रल एडॉप्शन रिसोर्स अथॉरिटी, अनाथ बच्चों को गोद लेने के लिए सबसे उचित माध्यम है। इसकी वेबसाइट www.cara.NIC.in पर इस संदर्भ में पूरा विवरण उपलब्ध है।

एक छोटी सी रजिस्ट्रेशन फीस देकर कारा के माध्यम से और उनकी शर्तों का पालन करके गोद लेने की प्रक्रिया पूरी की जा सकती है, किंतु ऐसा नहीं है कि कोई भी व्यक्ति उस फीस का भुगतान करके बच्चे को गोद ले सकता है।

क्या होनी चाहिए भावी माता-पिता की उम्र

  • गोद लेने वाले की उम्र एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। बच्चे की उम्र से उसकी उम्र कम-से-कम पच्चीस वर्ष अधिक होनी चाहिए, हां, अगर बच्चे के सौतेले माता या पिता या रिश्तेदार बच्चा गोद लेते हैं, तो यह बंधन नहीं रहता।
  • चार वर्ष तक के बच्चे को गोद लेने वाले दंपती में से किसी एक की उम्र पैंतालीस वर्ष से अधिक नहीं होनी चाहिए, जबकि आठ वर्ष तक के बच्चे के लिए यह सीमा पचास वर्ष है।

क्या है प्रक्रिया कारा की 

वेबसाइट पर आवेदन के समय आवेदनकर्ता को ईमेल आईडी, मोबाइल नंबर, पैन कार्ड, आधार कार्ड, कोई संक्रामक रोग नहीं है इसका प्रमाण पत्र, विवाह प्रमाण पत्र, इनकम टैक्स रिटर्न/आय प्रमाण पत्र, अगर तलाकशुदा है तो तलाक प्रमाण पत्र देना पड़ता है।

आवेदन के बाद 6 बच्चों की फोटो एवं नाम आदि आवेदनकर्ता को मेल कर दिया जाता है। उनमें से उसे किन्हीं दो बच्चों को चुनना पड़ता है। वह उनसे मिल भी सकता है। इसके बाद जिला जज के न्यायालय में आवेदन करने और वहां से स्वीकृति प्राप्त होने के बाद इन दोनों बच्चों में से कोई एक बच्चा, उसे गोद दे दिया जाता है। इस सारी  प्रक्रिया में 6 से 8 माह लग जाते हैं।

कोविड जैसी वैश्विक महामारी ने हमें बहुत सारी समस्याओं से रू-ब-रू कराया है। उनमें अनाथ बच्चों की समस्या को सुलझाने में अगर हम कुछ सहायता कर सकें तो यह मानवता के प्रति हमारा बहुत बड़ा उपकार होगा। इस दिशा में गोद लेने के इच्छुक दम्पतियों के दृष्टिकोण में परिवर्तन की भी बहुत जरूरत है।

ऐसी महामारी और उसका प्रभाव जाति, धर्म, परिवेश आदि को देखकर नहीं होता। किसी भी जाति, धर्म या पृष्ठभूमि के बच्चे इस त्रासदी से रू-ब-रू हो सकते हैं, तो उन्हें गोद लेने में अगर इन सब बातों पर ध्यान ना दिया जाए तभी संभवत: इन बच्चों के साथ और साथ ही साथ हमारी संवेदनात्मक भावनाओं के साथ भी सच्चा न्याय हो सकेगा। ठ्ठ

यह भी पढ़ें –संतान नाशक योग के निवारण