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लेजर शौ-21 श्रेष्ठ युवामन की कहानियां पंजाब: Family Story
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भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

Family Story: टाई की नॉट कसते हुए उसने अपनी बेटी माया को आवाज दी, “बेटा, कितनी देर है तैयार होने में…।” ।

“बस पापा आई…।” उसने दूसरे कमरे से कहा। संदीप को उसके बोलने से अंदाजा हो गया कि वह ड्रेसिंग टेबल के सामने खड़ी लिपस्टिक लगा रही है। वह एकदम तैयार हो कर लॉबी में बेवजह चहलकदमी करने लगा। अचानक पत्नी का ध्यान आने पर उसके कमरे की ओर चला गया। ऊपर-नीचे तीन तकिए पर सिर रखे वह मायूस-सी लेटी थी। गुम और खामोश कमरे में खाली-खाली देखती हुई। उसके आने पर उसकी पुतलियों में हरकत हुई। उसने चुप्पी तोड़ने के इरादे से पूछा, “कैसी हो शारदा?”

उसे मालूम है, शारदा कोई जवाब नहीं देगी। जुबान चले तो जवाब दे। अधरंग की नामुराद बीमारी ने उसे केवल बिस्तर से ही नहीं जोड़ दिया, उसकी आवाज भी छीन ली। वह इतनी लाचार है कि चल कर बाथरूम तक जाना तो दूर, उठ कर बैठ भी नहीं सकती। यह तो उसकी थोड़ी-बहुत आर्थिक स्थिति अच्छी है कि उसने होल-टाईम सरवैट रखी है, जो शारदा की साफ-सफाई, उठाना-बिठाना और खिला-पिला देती है। वरना ऐसी हालत में बहुत मुश्किल हो जाती है। माया कॉलेज जाती, पढ़ती या मां का ख्याल रखती? वह स्वयं ऑफिस जाता, अंदर-बाहर के काम देखता या सेवा-भावना के तहत पत्नी के साथ सट कर बैठता। कामकाज और व्यस्तता की भरमार है। शारदा तो अब जीवन की बची-खुची सांसें पूरी कर रही थी। उसका ध्यान कमरे में रखी सुनहरी फ्रेम में जड़ी उनकी जवानी के समय की तस्वीर की ओर चला गया, जो पहले ब्लैकएंड व्हाइट थी परन्तु बाद में बड़ी करवाते समय चमन फोटोग्राफर ने मनमर्जी के रंग भर कर इसका कायाकल्प कर दिया था। तस्वीर में शारदा मीठा-मीठी-सा मुस्करा रही थी। भरा-परा शरीर और नरानी चेहरा। वह स्वयं भी उस समय किसी से कम न था। गांव में मित्र कहते. “संदीप. बम्बई (मंबई) चला जा। जाकर एक्टर बन जा। देखने में एकदम जतिन्दर जैसा लगता है।” वह हंस कर बात टाल जाता। वह कभी-कभी मुंबई के स्वप्नमय संसार में जाने के बारे में सोचता भी, मगर वक्त ने उस ओर का रास्ता न दिखाया।

उसकी और शारदा की जोड़ी बहुत सुंदर लगती, सभी उन्हें हंसों की जोड़ी या लव-बर्डस कहते। परन्तु वक्त ने क्या से क्या कर दिया? वह खुद तो ड्राई और क्रीम इत्यादि लगा कर वक्त को पीछे धकेलने की कोशिश कर रही है जबकि शारदा बेचारी तो न जीवित में न मृत्यु के बीच डोल रही है। बस बीच में जिन्दगी की डोरी झूल रही थी। डॉक्टर जोशी से एक बार उसने पूछ लिया था, “यार, मेडिकल साइंस मर्सी डैथ रिकेमैंड नहीं करती?” डॉक्टर जोशी ने उसकी आंखों में झांकते हुए कहा, “हम मरीज को आखिरी सांस तक बचाने का यत्न करते हैं। मेडिकल साइंस का मतलब ही मौत से लड़ाई है।” वास्तव में वह कहना चाहता था, शारदा का दुख मुझसे देखा नहीं जाता। वह खामख्वाह बोझ बन गई। उनकी फैमिली लाईफ तबाह हो गई। मगर वह चुप रहा। डॉक्टर ने उसकी मानसिक स्थिति को समझते हुए, कंधे पर हाथ रख कर दिलासा दी, ‘बी पेशैंस, सब ठीक हो जाएगा, रिलैक्स…।’ कहते हुए डॉक्टर चला गया। शारदा के सांस लेने का अर्थ था कि वह जीवित है। उसकी नजर में न मिन्नत, न करुणा, ना कोई उद्देश्य और न कोई उत्साह था।

उसके घुटनों पर पड़े कंबल को सीने तक ठीक करते हुए, उसने स्वाभाविकता से उसके माथे को सहलाया। उसकी आंखों की पुतलियां हिली, जैसे पूछ रही हो, ‘कहां जा रहे हो? कब तक लौटोगे? अधिक शराब मत पीना…।’ उसकी नजरों में लटकते सवाल देख कर उसने कहा, “जल्दी वापस आ जाऊंगा।” फिर उसने धीमे से बाहर निकल कर उसके कमरे का दरवाजा भिड़ा दिया। रसोई में लगी नौकरानी से शारदा को देने वाली दवा इत्यादि की जानकारी ली, उसकी बाथरूम हाजत के बारे में पूछा। नौकरानी ने काम रोकते हुए कहा, “सब ठीक है साहब। आप चिन्ता न करें।’ उसने फिर बेटी को पुकारा, “कितनी देर है बेटा?”

माया का जवाब न मिलने पर उसने सोचा, शायद वह चेंज कर रही होगी। शारदा भी ऐसा ही करती थी, तैयार होने में दो-दो घंटे लगा देती। दनिया भर का मेकअप पोत लेती। उसकी लेटलतीफी पर वह खीझता भी और खश भी होता। वह उसके एकदम पास जा कर उसकी महक को सूंघता तो वह नजाकत से पीछे हट कर डपटती, ‘मेरा मेकअप ना खराब करो। खामख्वाह पीछे-पीछे घूमते रहते हो। मैं बस अभी पांच मिनट में आई।’

“तुम्हारे पांच मिनट भी घंटे के बराबर है।’ वह खीझता। बोरियत देर करने के लिए, टी.वी. लगा लेता। शारदा की आदत से वाकिफ होने के कारण वह उसे घंटा-दो घंटे पहले का प्रोग्राम बताता। तब भी चलते-चलते वह और आधा घंटा लगा ही देती। वह बेचैन भी होता मगर एडजस्ट भी करता। अब यही हाल माया का है। वह चाहता था, माया अंग्रेजी में ऑनर्स करती या जर्नलिजम के फील्ड में जाती। किसी चैनल या अखबार में अपनी प्रतिभा को उभारती। नेताओं और ब्यूरोक्रेट्स के बखिए उधेड़ती मगर वह साइंस की ओर मुड़ गई। फिजिक्स में मास्टर्स कर रही है, मगर रुचि मॉडल्स वाली है। इक्कीस की उम्र में ही बेहद डायट कंससियस। उसे सजने-संवरने का बेहद शौक है। नए-नए कपड़ों की दीवानी। मगर उसे तसल्ली इस बात की है कि माया हर बात में एक संतुलन बना कर रखती है। किसी एक ओर ही बहने नहीं लगती। वह अपनी जनरेशन के मसलों के बारे में समझती है। इसलिए वह माया के मसलों के बारे में अधिक दूर तक नहीं सोचती।

स्टैफी लॉबी की सीढ़ियां उतर कर उसके पैरों में लोटने लगी। उसने और माया ने उसे बहुत एहतियात से पाला था। वह माया के आसपास घूमती रहती। माया के जाने के बाद गेट के पास बैठ कर उसका इंतजार करती। उसके घर लौटने पर ही कुछ खाती-पीती थी। जानवरों की ऐसी संवेदनशील तबियत पर वह हैरान होता। कुछ महीने पहले स्टैफी ‘बहार’ पर आई तो उसने आसमान सिर पर उठा लिया। घर में इतना शोर मचाया कि रहे भगवान का नाम! डॉक्टर की सलाह लेने पर मालूम हुआ, दस दिन का पीरीयड है। फिर शांत हो जाएगी। कोठी के गेट के पास सड़क के आवारा कुत्तों ने जीना हराम कर दिया। गेट की दरारों से मुंह अंदर घुसा-घुसा कर भौंकते रहते। उसे माया से शर्म महसूस होती और माया को पापा से। दोनों एक-दूसरे से लुकते-छिपते। जंजीर खींच-खींच कर स्टैफी ने खुद को लहु-लुहान कर लिया। माया उसे दूध देने गई तो वह उसे काटने को दौड़ी। माया चीखें मारते हुए भाग उठी। वह एक बार फिर जानवरों की इस मनोवृत्ति पर हैरान हो गया। उसके रवैये से खौफजदा हई माया ने उसे घर से निकालने तक को कह दिया। उसने समझाया. “जानवर है आखिर। इसे भले-बरे की पहचान कहां?’ स्टैफी ने भी जैसे माफी मांगी। जब तक माया ने अपने हाथ से उसे खाना न खिलाया, स्टैफी ने भी खाना न खाया।

उसने आवाज दी, “माया बेटा! अब तो आठ बज गए हैं।”

“तो क्या हुआ पापा।” माया ने भीतर से निकलते हुए कहा, “यह मैट्रो लाईफ है। इट इज टू अर्ली येट। जिन्दगी तो रात दस बजे के बाद स्टार्ट होती है।” फिर उसने नौकरानी को आवाज दी, “निशा दीदी! जरा मेरी ड्रेस प्रेस कर देना।”

“जी माया जी।” उसने रसोई से ही जवाब दिया।

“एक तो पापा मुझे अपने इस नाम से एलर्जी है। क्या नाम रखा है मेरा आपने….माया…।” उसने बुरा-सा मुंह बनाया। “मुझसे तो निशा नाम अच्छा लगता है। कोई मॉडर्न-सा नाम रखते।”

“मसलन…।”

“जैसे…जैसे…।” कहते-कहते वह भीतर की ओर भाग गई।

वह नाम के मनोविज्ञान पर माया से चर्चा करना चाहता था परन्तु यह मुनासिब वक्त नहीं था। उसने उतावलेपन से कहा, “तुम जल्दी से अपना काम खत्म करो। मालूम है, कार्ड पर सात बजे का टाईम है। अगर इन्गुरेशन पहले हो गया तो फिर क्या फायदा…?” वह शुरू से ही वक्त की पाबंदी का कायल था। शारदा से ब्याह के समय भी वह पांच मिनट भी लेट नहीं हुआ था। दूसरी ओर कोई तैयारी ही नहीं थी। इस बात पर शारदा हमेशा उससे मजाक करती, ‘तुम्हारा वश चलता तो आधी रात को ही आ धमकते।’ वह सहज करने की कोशिश करता मगर ऐसा कर न पाता। वक्त उसे खींचता, झिंझोडता और जगाता।

उसने स्टैफी के नर्म बालों पर हाथ फिराया और वह उसके आसपास कूदने-फांदने लगी। उसने अपने कपड़ों के गंदे हो जाने के डर से उसे पीछे की ओर धकेला। वह खीझने लगा, लोग कार्ड पर टाईम कुछ लिखवाते और काम कुछ और समय शुरू करते हैं। उसे लगता, शायद इसी कारण मुल्क पीछे रह गया है। मगर नहीं, पीछे कहां है? अखबार पढ़ो, टी.वी. देखो। लगता है, देश तरक्की का शिखर छू रहा है। अब अपने ही शहर को देखो। बड़े शहर की सारी विशेषताएं इसमें हैं। आज से दशक पहले के माहौल के बारे में वह सोचने लगा। उसने कभी कल्पना नहीं की थी। अचानक इस प्रकार इतने मॉल्स और प्लाजमा खुल जाएंगे। उसने कभी सोचा नहीं था कि ढ़ाई एकड़ जमीन पर निर्मित इस तेरह मंजिल के ऊंचे सुपर मॉल के नक्शे पर उसके हस्ताक्षर भी होंगे। ज्योति सुपर मॉल। एग्जीक्यूिटिव डॉयरेक्टर सुमन शर्मा ने अपनी पत्नी के नाम पर इस मॉल का नामकरण किया। यह जान कर वह हंस दिया था कि ये लोग कौन-से मुगल बादशाहों या अंबानी-टाटा से कम है। अब शहर के सबसे ऊंचे स्थान पर उस सांवली और मोटे नैन-नक्शे वाली ज्योति का नाम जगमगाएगा। उसे ख्याल आया. वह अपनी खबसरत और जहीन पत्नी के लिए कुछ नहीं कर पाया। अपनी ढाई सौ गज की दो मंजिला कोठी बनाने में ही उसकी जान निकल गई थी, जो इस ज्योति सुपर मॉल के सामने तुच्छ भी नहीं थी। अपने संबंधियों में संदीप ‘संपन्न’ माना जाता जबकि इन लोगों के बीच वह चींटी के समान भी नहीं था। फिर भी गनीमत थी कि उसे मॉल के उद्घाटन समारोह का आमंत्रण-पत्र मिला था। कार्ड पर ‘वैलिड फॉर टू’ देख कर माया ने कहा था, “पापा मैं आपके साथ जाऊंगी।”

उसने अपने एसोसिएट चौधरी से पूछा था, उसके साथ कौन जाएगा? उसने तुरन्त कहा, ‘मेरे साथ मेरी पत्नी जाएगी।’ अब संदीप के लिए धर्मसंकट पैदा हो गया। पिछले सात वर्षों से शारदा कैसा नर्क भोग रही है? पता नहीं किस गुनाह की सजा उसे मिली है? इस लॉबी की इन सीढ़ियों के आखिरी स्टैप से शारदा का पैर स्लिप किया था। दिन में कितनी ही बार वह अनेक कामों के लिए इन सीढ़ियों से चढ़ती-उतरती रहती थी। बस उस दिन एडी नीचे की ओर खिसक गई और कमर में दूसरे या तीसरे स्टैप का सिरा जोर से लगा। घर में कोई न था। वह तुरन्त उठ बैठी। उसे फोन कर बताया। स्वयं बिस्तर पर जा लेटी। अस्पताल ले जाने पर डॉक्टर ने जांच-पड़ताल की। कहा, मामूली चोट है। एंटी इंफलामेटरी डोज दे कर वापस भेज दिया। डिस्क थोड़ी-सी दब गई थी। कुछ दिनों में ठीक हो जाएंगे। उस रात के बाद, अगले दिन शारदा में कोई हिलडुल ना कोई आवाज। कार में डाल फटाफट अस्पताल ले गया। शारदा के शरीर में कोई हरकत नहीं। छत्तीस बरस की भरी-पूरी औरत एकदम बेबस हो गई। जवान होती बेटी का ध्यान कौन रखेगा? उसकी आवश्यकताओं के बारे में कौन सोचे? गांव से आई मां अधिक दिनों तक शहर में रह न पाई। उसने सोच कर, घर में कामकाज संभालने के लिए एक बाई रख ली।

निशा भी घर में पूरी तरह से रच-बस गई है। साफ नीयत से काम करने वाली निशा से वे लोग खुश हैं। काम करते हुए उसके जवान शरीर की गठन उसको अंदर तक उकसाने लगती है परन्तु जवान होती बेटी की मौजूदगी और अपने स्तर का एहसास उसे संयम में रहने के लिए मजबूर करता है। काम-धंधे के कारण वह कई बार मन-इच्छित रास्ता तलाश लेता था परन्तु वह संबंध कुछ समय तक ही चलते थे।

“चलो पापा!” माया उसके सामने आ खड़ी हुई। देख कर वह अवाक् रह गया। जैसे कोई हाई-फाई मॉडल हो। अजीब मगर कमाल की डेस। माया उसके सामने ऐसे खडी है, जैसे रैंप में कैट-वाक करने जा रही हो। उसने नजरें झुका ली। टी.वी. बंद किया और बाहर निकल गया। दिसंबर के शीत मौसम में कार में भीनी-भीनी खुशबू फैलने लगी। कार में पड़े सैंट की महक है या माया के कॉस्मैटिक की। माया ठीक कहती है, अब हमारा शहर भी बड़े शहरों में शुमार होने लगा है। यही शहर था, जो आतंकवाद के समय शाम के पांच बजे ही बंद हो जाता था। अब यह आठ बजे अंगड़ाई लेने लगता है।

घर में जब पहली बार बिजली का कनैक्शन लगा, सारा परिवार पूरी रात जागता रहा था। रेडियो आने पर जैसे इंकलाब ही आ गया। उसका दादा गानों पर नाचने वाले बच्चों के पीछे डंडा लेकर भागता। वह अपनी पुरानी यादों में खोया था कि माया ने टोका, “पापा राईट टर्न लो।’ देखा, सामने तेरह मंजिल का ज्योति सुपर मॉल की इमारत चमक रही थी। रोशनी से जगमगाता मॉल। उसे इस बात पर गर्व महसूस हुआ कि इतने बड़े प्रॉजेक्ट के नक्शे पर उसके हस्ताक्षर हैं। सोचते हुए उसका सीना चौड़ा हो गया।

धीमे-धीमे कदम रखते हुए माया सुपर मॉल की एट्रैस पर पहुंच गई। सिक्योरिटी चैक करवा, अपना कार्ड दिखाया। एक प्रबंधक ने उन्हें कुर्सियों पर बिठा दिया। स्टेज पर कई कुर्सियां पड़ी थी। उसने आसपास नजर दौड़ाई, मगर कोई जान-पहचान दिखाई नहीं दिया। माया किसी लड़की से बातें करने लगी, जो उसके समान ही सजी-संवरी है। अचानक ठेकेदार एस.एस. जौहल उसे मिल गया। दूसरे इधर-उधर चहलकदमी करने लगे। आसपास मल्टीनेशनल कंपनियों के शौ-रूम चमक रहे थे। विभिन्न वस्तुओं के अमुक भंडार।

धीरे-धीरे अनजान चेहरों के बीच जानकारों की भी एक श्रृंखला बनने लगी। आगे एक बड़ा स्क्रीन लगा था, जिस पर ग्राऊंड फ्लोर पर चल रहे हवन का दृश्य आ रहा था। अचानक उसे माया का ध्यान आया।

टहलते हुए वह बाहर खुले दालान में निकल आया। जहां भी नजर जाती, गहमा-गहमी दिखाई दे रही थी। विवाह जैसा माहौल। एक ओर खाने-पीने के बेहिसाब स्टॉल। सामने ऊंचे स्टेज पर खड़ा एक बहुरंगी सूट पहने एक नौजवान माईक पकड़ कर कुछ बोल रहा था। उसने देखा, माया भी सामने वाले स्टॉल पर खड़ी कुछ खा रही है। उसके पास एक नौजवान खडा है। पता नही. वह उससे बातें कर रहा है या वैसे ही स्टॉल पर खडा है। वह खामख्वाह की दिलचस्पी दिखाने से गरेज करता है। उसे मालम है. माया समझदार और चेतन है। हर चीज को बारीकी से परखती है। जादूगर जैसी ड्रेस पहने वह एंकर अंग्रेजी, पंजाबी-हिन्दी भाषा को मिला कर कुछ घोषणा करता है। माया इस खिचडी भाषा को जंक भाषा कहती है। रंग-बिरंगी पैबंद वाले कपड़ों को जंक ड्रेस कहती है। वह ऊल-जलूल और कुछ समय के संबंधों को जंक रिश्ते कहता है। जंक….कितना नजदीक आता जा रहा है यह शब्द….।

“इस स्टेज पर होगा ग्रुप डांस और फैशन शो…..मिस्टर एंड मिस f सटी…बेबी शो…ब्यूटी कंपीटीशन…बैस्ट फिगर…बैस्ट कपल…बैस्ट सिंगर. ..बैस्ट…बैस्ट….बैस्ट…यू कैन ईट एंड ड्रिंक…ड्रिंक एंड डांस, डांस एंड एन्जॉय…।” उस जंक किस्म के नौजवान ने कई घोषणाएं की।

स्टेज पर संगीत गूंजने लगा। पॉप गायक जोड़ी ने आते ही गीतों की झड़ी लगा दी। उसने ड्रिंक सिप करते हुए माया की ओर निगाह दौड़ाई। उसने कुछ ही दूरी से उसे हाथ के इशारे से निश्चिंत रहने का इशारा किया। चलो अच्छा है, उसे कोई कंपनी मिल गई। वह भी एन्जॉय कर रही है। उसने देखा, कुछ औरतें नैपकिन में गिलास लपेट कर ड्रिंक कर रही है। औरतों द्वारा दारू पीना कोई नयी बात नहीं। अब तो यह सोसाइटी, यह कल्चर…. यह मैट्रो लाईफ…।

दिसंबर के ठंड के मौसम में भी वहां इस समय ठंड का कोई एहसास बाकी नहीं।

स्टेज पर अब कपल डांस चल रहा है। यह जोड़े पहले बने हैं या ऐन मौके पर बने हैं, उसे कुछ मालूम नहीं। फिल्मी संगीत की तेज धुनों पर थिरकते-नाचते जवान जोड़े स्टेज पर अपने जलवे दिखा रहे हैं। उसने आंखें फैला कर देखा, माया कब स्टेज पर पहुंच गई? सबसे बढ़िया डांस माया कर रही है। उसके साथ वही नौजवान है, जिसे उसने कुछ देर पहले उसके साथ खड़े देखा था। माया स्कूल के समय से ही डांस में कुशल थी। घर में टी.वी. के सामने नाचते हुए वह देखने वालों को हैरान कर देती थी। कहां से सीखा माया ने इस प्रकार से थिरकना? बांहें घुमाती, कमर लचकाते, गर्दन को हिलाते देख, अभी भी लोग तालियां बजाने लगे। माईक पर जिस जोड़ी के पहले ईनाम की घोषणा हुई, वह माया और विशाल की थी। ‘मुझे मालूम ही था, मेरी बेटी ही फर्स्ट आएगी।’ उसने पास खड़े व्यक्ति से यह बात कहनी चाही, मगर कुछ सोच कर चुप रह गया।

फैशन परेड करते हए माया ने यह डेस कब चेंज कर लिया? उसने एक बार फिर से स्टेज पर खड़ी माया की ओर देखा। सितारों से जड़ी पोशाक में वह उसे पहचान नहीं पाया। चेहरे पर पड़ती तेज रोशनी ने उसके मेकअप को उसे किसी दूसरी दुनिया की परी ही बना दिया। माया जैसी कई लड़कियां चक्कर लगा रही है। एक बार फिर तालियों का शोर उठा। जादूगर बने एंकर ने फिर से माया के नाम की घोषणा की। माया की कला की चर्चा लोग करने लगे। वे उसके बारे में जानना चाहने लगे। उसके पते-ठिकाने के अनुमान लगाने लगे। सुन कर उसे कहीं अच्छा भी लगा और कुछ बुरा भी।

पेशाब की हाजत के बाद वह फिर से स्टेज की रंगीनी में लौअ आया। ओल्ड कपल, न्यूलरी मैरिड कपल, सिल्वर जुबली कपल, हंसी, चुटकलेबाजी, नशा, संगीत, शोर, उल्लास…। प्रोग्राम अपने शिखर पर है परन्तु उसे अब उकताहट होने लगी। उसने सोचा, क्यों न अब चला जाए?

दस बज कर पच्चीस मिनट…। जोकर टाईप एंकर आसमान पर फैलने वाली रोशनी के बारे में ऐलान करने लगा, ‘आधे घंटे के लिए लेजर शौ होगा। मंत्री जी तेरहवीं मंजिल की छत पर लगे लेजर ऑन करेंगे।’ आस-पास प्रैस और लोगों का जमघट। मॉल रोड़ भर गई। पता नहीं कौन से रंग बिखेरगी ये लेजर किरणें? ऐलान जारी है, “आधे घंटे के लिए आप रंगों व रोशनी की दुनिया में खो जाएंगे। लेजर शौ इज ऑन। प्लीज एन्जॉय द न्यू इलैक्ट्रिक टेक्नोलॉजी…।” आसमान पर तीखी तेज किरणें आपस में टकरा रही हैं। वह सिर उठा कर इस अलौकिक नजारे को देखता है। सितारे कहीं दिखाई नहीं दे रहे। रंग-बिरंगे घूमते दायरे, त्रिकोण, एक-दूसरे को काटती रेखाएं। कभी फैलती, कभी सिकुड़ती, रोशनी की बारिश करती। उस रोशनी में कई आकृतियां बन रही और मिट रही हैं।

लोग शोर मचाते, ज्योति सुपर मॉल में मनाई जा रही इस दीवाली की चकाचौंध में मस्त। इन किरणों ने शहर का पुराना अध्याय ही बदल दिया। लगा जैसे मेला पूरे यौवन पर है। चारों ओर अलौकिक दृश्य। दिन-रात का भेद ही खत्म हो गया। वह सोचने लगा, जब युग बदलता है शायद ऐसा ही कुछ घटता होगा।

अचानक इधर-उधर बेचैनी से देखने लगा। स्टेज से ईनाम कब से बांटे जा चुके है। माया कहां है? वह कुछ कदम आगे बढ़ा, कुछ कदम दूसरी ओर बढ़ा, लोगों की भागदौड़ में उसने माया को तलाश करने की कोशिश की। बदहवास हो वह माया को पकारने लगा. ‘माया…।’ उसकी चीखती आवाज सन कर कछ लोग उसकी ओर देखने लगे। उसने स्टेज के आगे-पीछे देखा। तेजी से जेब से मोबाइल निकाल कर माया का नंबर लगाया। आगे से आवाज सनाई दी. ‘नंबर य आर डायलिंग इज आउट ऑफ रीच।’ उसने फिर से कोशिश की। फिर वही आवाज। उसका दिल डूबने लगा। अनेक शंकाएं सिर उठाने लगी। मोबाइल जेब में डाल उसने फिर से नजर दौड़ाई। कोई परिचित दिखाई नहीं दिया। वह चीखने लगा, “माया…माया…माया…।”

“वो कहां है, जो अभी फर्स्ट आई थी। मेरी बेटी माया….आपने देखा उसे? अभी तो यहीं थी…। कहां गई…। कोई तो बताओ…हमें घर भी जाना है…।”

किसी ने कहा, “अंदर फोटो सैशन चल रहा है, प्रैस इंटरव्यू कर रही है…शायद वहां….।”

वह भीतर की ओर भाग उठा। तेजी से लिफ्ट की ओर बढ़ा। पागलों की तरह लिफ्ट का बटन दबाने लगा। लिफ्ट खुलते ही उसने भीड़ के बावजूद अंदर घुसने की कोशिश की परन्तु लिफ्टमैन ने उसे परे धकेल कर लिफ्ट बंद कर दी। वह सीढ़ियों से ऊपर जाने लगा। दूसरी मंजिल, तीसरी मंजिल…चौथी मंजिल…। माया कहीं नहीं। कोई उसके बारे में नहीं बता रहा। इधर-उधर टहलते लोग एक नजर उसकी ओर देख कर अपने में व्यस्त हो जाते।

वह सीढ़ी दर सीढ़ी, मंजिल दर मंजिल…एक छोर से दूसरे छोर तक माया को ढूंढते हुए बदहवास हो गया। परन्तु माया का कोई खुरा-खोज नहीं। उसकी आवाज रुक गई। रंगों का खेल काली रात के घने अंधेरे में बदलने लगा। वह किस मुंह से घर वापस जाएगा? शारदा को क्या बताएगा? नहीं, नहीं, माया अभी उसे मिल जाएगी। उसने पूरी ताकत लगा कर माया को एक बार फिर से पुकारा। शायद कहीं बाहर खुले कंपाऊंड में खड़े उसे ही ढूंढ रही हो। उसने अपने डूबते दिल को धीरज बंधाया। अब एक साथ सीढ़ियां लांघने लगा। आंखें फाड़-फाड़ कर लोगों की भीड़ में से तलाश करने लगा। हांफते हुए वह माया…माया पुकारता रहा। ग्राउंड फ्लोर के ऐन आखिरी स्टैप पर आ कर उसकी एडी फिसल गई, पैर फिसल गया और वह चौफाल फर्श पर आ गिरा। सीढ़ी का तीखा कोना उसकी रीढ़ की हड्डी में जोर से लगा। अपने मुंह से निकली चीख उसे खुद ही सुनाई नहीं दी। रंगों के बोझ से भरी आंखों में क्षण भर में ही दूर तक फैला अंधेरा भरने लगा।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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