Hindi Kahani: लगातार आते बधाइयों के फ़ोन आज रुकने का नाम ही नही ले रहे थे,घंटो हो गए थे मिस्टर रूप सहाय को सबके जवाब देते हुए पर चेहरे पर एक भी शिकन,थकान की नही थी,और होती भी कैसे ,आज उनका बरसों का सपना जो पूरा हुआ था,बुकर पुरुस्कार जीतने का।
अपने उत्कृष्ट लेखन के लिए जब से उनके नाम की घोषणा इस पुरस्कार के लिए हुई थी,उनके घर में जैसे
कोई उत्सव सा मन रहा था।
राधा रानी,उनकी पत्नि, बड़ी सीधी, शांत महिला थीं,पति की उन्नति ,प्रसिद्धि में फूली न समा रहीं
थीं,खुद तो अधिक पढ़ लिख न पायीं थीं घर की मजबूरियों, जिम्मेदारियों के चलते पर पूरी समझदारी से
अपने पति के साथ कंधे से कंधा मिला कर उन्होंने ये जिंदगी का रथ चलाया था।
रूप सहाय बहुत वरिष्ठ साहित्यकार थे,यूं तो पेशे से वो रिटायर्ड प्रोफेसर थे पर कई वर्षों से लेखन की दुनिया में
उनका नाम बहुत सम्मान से लिया जाता था।
स्त्रियों की दयनीय स्तिथि के खिलाफ वो बड़ी बुलंद आवाज में लिखते,उनको, उनके अधिकार दिलाने की
लड़ाई में वो अपनी रचनाओं के माध्यम से हमेशा अग्रसर रहते।उन्हें स्त्री समस्याओं के निवारण का जनक
माना जाता था।जब वो बोलते तो लोग,खासकर स्त्रियां उनका नाम लेकर आहें भरती थीं,कितने पुण्य किए
होंगे इनकी धर्मपत्नी ने जो उन्हें ये मिले।
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उन्हें ये पुरस्कार लेने विदेश जाना था अगले माह।
उनकी बड़ी बेटी चहक के बोली:”माँ, इस बार तो तुम्हारी लॉटरी लगी है,पापा संग सात समंदर घूमन
जयोगी,कितना सम्मान होगा मिसेज सहाय का…!!”
राधा थोड़ी डर गयीं, “ये नादान लड़की क्या बोलती है,कहीं मिस्टर सहाय बुरा न मान जाएं।”
और वही हुआ भी,वो बोले: “अरे,इनका वहां क्या काम भला,ये तो मेरी प्रेस वार्ता में मेरी सारी रेपुटेशन मिट्टी में
मिला देंगीं।वहां वाक पटुता,ज्ञान और आत्म विश्वास की पूछ है…जो इनके बस का रोग कहां!!इन जैसी
औरते घर की चारदीवारी में ही अच्छी लगती हैं।”
राधा का सारा उत्साह और पति की प्रसिद्धि की उमंग
वहीं दम तोड़ गयी,वो जानती थी कि उसके पति जो लिखते हैं और जो वास्तविक जीवन जीते हैं,उसमे जमीन
आसमान का फर्क है,पर बेटी की बात ने उसके दबे हुए ज़ख्म फिर हरे कर दिए।
उसकी आँखों से बेसाख़्ता आंसुओ की लड़ी बह निकली और दिल कहीं पुरानी गलियों में भटक गया।
उन दिनों राधा बी ए प्रथम वर्ष की छात्रा थी,चुलबुली,शरारती और नटखट सी कमसिन बदन लड़की,पढ़ने से
ज्यादा दिल मस्ती में लगता,सहेलियों संग खिलखिला के हंसती तो जैसे कोई झरना मीठी तरंग छेड़ रहा
हो।वाद विवाद प्रतियोगिता में हमेशा अव्वल रहती,उसके बेबाक, अकाट्य तर्कों के आगे सब नतमस्तक थे।
एक बार किसी दूसरे कॉलेज में वो अपने कॉलेज को रिप्रेजेंट कर रही थी,वो पक्ष में थी और विपक्ष में उसके
ही कॉलेज का कोई सीनियर लड़का था,बड़ा नाम सुना था उसका (मोहन नाम था उसका )और राधा,मिल
पहली बार रही थी।
क्या गज़ब व्यक्तित्व था उसका,वो इतना प्रभावशाली ढंग से बोलता कि लोग सुनते रह जाते,राधा तो उसे
देखते ही पहली नज़र में अपना दिल हार बैठी,उस दिन उसकी सारी चंचलता जैसे छू हो गयी थी…
उस दिन के विजेता वो दोनों ही रहे थे,ट्रॉफी लेने जब वो दोनों मंच की सीढ़ियां चढ़ ऊपर जाने लगे,अचानक
राधा का संतुलन बिगड़ गया,वो गिरने ही वाली थी कि उसने राधा को संभाल लिया,उफ्फ क्या जादुई स्पर्श
था उसका…लगा जैसे सारा बदन झंकृत हो उठा हो।जल्द ही राधा ने खुद को संभाला और तालियों की
गड़गड़ाहट में इनाम की ट्रॉफी ली।
एक बार फिर उसके हाथ से हाथ टकराया था राधा का और सारे शरीर में करंट सा दौड़ गया।
मोहन ने बड़ी मीठी नजर से उसे देखा था…”आप ठीक तो हैं?”मोहन ने पूछा और राधा ने सिर हिला दिया
था,आंखों आंखों में जबाव दिया….”कौन कमबख्त संभलना चाहता है,काश!कुछ ऐसा हो जाए , मैं फिर गिरू
और आप मुझे संभाले!!”
“कुछ कहा आपने?”मोहन ने पूछा था।
आ.. न तो..नहीं…वो सोते से जागी और मोहन मुस्करा दिया।
कितने समय तक प्यार के उस पहले एहसास को जीती रही थी राधा,लगा था सारी दुनिया सुहानी हो गई
है,अकेले बैठे बैठे मुस्करा देती,कभी भी गुनगुनाने लगती,उसे खिड़की से बाहर झांकना अच्छा लगता था,घंटों
खड़ी रहती शायद मोहन का दीदार हो जाए!कभी भी कल्पना में वो सामने से आता दिखने लगता और राधा
के कपोल रक्तिम हो उठते,टांगे कांपने लगती और होंठ थरथरा जाते,तभी मां आवाज़ लगाती और राधा सिर
पर हल्की सी चपत लगाते हुए कहती, मै प्रेम में बाबरी हो गई हूं,जल्दी ही मुझे मोहन का दिल टटोलना पड़ेगा
कि वो मुझे कितना चाहता है!!कहीं ये आग एक तरफा तो नहीं?”
अगले दिन राधा की बेचैन निगाहों ने मोहन को कॉलेज में ढूंढा,सारे दिन प्रतीक्षा की पर वो नहीं दिखा।राधा
की भूख प्यास उड़े गई,सहेलियों ने कहा,तुझे क्या हुआ है?तबियत ठीक है?अब न हंसती है,न बोलती
है,चुपचाप टकटकी लगाए दरवाजा ताकती रहती है,किसी के आने का इंतजार है?”
उसकी प्रिय सहेली मोना बहुत चुलबुली थी,राधा की चुप्पी उसे खल रही थी,उसने राधा को छेड़ा…”कहीं तुझे
लवेरिया तो नहीं हुआ?”
राधा घबरा गई…”चुप…प्पपप्पप…सबके सामने कुछ मत बोल!”
“अच्छा तो तुझे लव हुआ है…किससे??बता ना…चल जिससे भी हुआ अच्छा हुआ पर इजहार जल्दी कर देना
कहीं दिल की दिल में रह जाए…”
राधा ने दिल मजबूत किया,किसी ने बताया,मोहन लाइब्रेरी में मिलेगा,वो वहीं आता है,किसी रिसर्च प्रोजेक्ट में
बिजी है आजकल।
राधा,अगले दिल,सुबह सात बजे से कॉलेज आकर बैठ गई,विशेष रूप से तैयार हुई थी आज वो,कितनी
खूबसूरत दिख रही थी,सफेद कुर्ते पर दिलकश लाल गुलाब प्रिंट,चटक लाल रंग का चूड़ीदार पायजामा,लंबी
सी चोटी गुंथी हुई थी,बालों की कई घुंघराली लट उसका खूबसूरत चेहरा चूमती हुई, कजरारी बड़ी आंखें
बेसब्री से मोहन का इंतजार कर रही थीं,आज तो उससे दिल की बात कह ही दूंगी…सच कह रही है
मोना,जितना वो हैंडसम है,कोई उससे पहले,उसके सामने प्यार का इजहार न कर बैठे कहीं?
निश्चित समय पर मोहन आया,वो ही चिर परिचित मुस्कराहट,राधा को देखते ही पहचान गया…हेलो! कैसी हैं
आप मिस …शायद नाम भूल गया था वो।
“राधा..”,राधा ने बताया…
“यस राधा!आपसे मिलना ही नहीं हुआ उस दिन के बाद से.. मै भी बिजी चल रहा हूं,आप ठीक?”उसने पूछा।
“जी…” बड़ी मुश्किल से राधा के मुंह से निकला,क्या हो गया था उसे,उसके होंठ सूख गए,गला अवरुद्ध हो
गया,बस उसे जाते देखती रही,जाते हुए वो उससे हाथ मिला गया था और राधा,अपना हाथ ही देखती रह गई
थी,कितने आगामी दिनों में उसने वो हाथ भी नहीं धोया था,इसे मोहन ने छुआ था,उसकी खुशबू मेरे हाथ
,उसके दिल दिमाग में समा गई थी और वो उसे महसूस करना चाहती थी।
फिर दो एक मौके और मिले पर फिर “ढाक के तीन पात “ही हुए,पता नहीं वो भी राधा की हालत से नहीं
समझता था या समझना ही नहीं चाहता था कि उसकी पहली नजर ने राधा के दिल पर क्या जादू चलाया
था।राधा रोज मौके ही ढूंढती रह गई अपना हाले बयां उससे करने को पर वो नकामयाब रही,शायद पहले प्यार
का अंजाम सबके साथ ऐसा ही होता हो…वो सोचती।
लेकिन इससे पहले कि राधा उससे अपने प्यार का इजहार कर पाती,उसकी माँ ने उसे, उसके लिए आये,
किसी बड़े घर के इकलौते बेटे रूप सहाय के रिश्ते की खुशखबरी सुनाई।
राधा बहुत रोई,चीखी,चिल्लाई कि अभी मैं आगे पढ़ना चाहती हूं ,पर ससुराल वालों का आग्रह था कि लड़की
पढ़ाई बाद में भी जारी रख सकती है सो घर में उसकी किसी ने न सुनी।
उसने पढ़ाई बदस्तूर जारी रखी शादी के बाद भी,पति रूप सहाय खुद प्रोफेसर थे,बहुत बिजी रहते,उसने
कोशिश की,उनसे तालमेल बैठाने की,उनके पास बैठती,उनकी कहानी,कविताएं पढ़ कर उनकी समीक्षाएं
भी करती पर उन्होंने उसकी कद्र कभी नहीं की।उनके विचार में,स्त्रियों को ज्यादा पढ़ लिख कर क्या करना
है,बाद में तो किचेन में ही आधी जिंदगी गुजारनी है।
राधा शॉक्ड थी पति के ये विचार जानकर,उसे लगा ये दोहरे व्यक्तित्व के मालिक हैं,जो सबको दिखाते हैं मैं
हूं,वो तो ये बिलकुल नहीं हैं,समाज में स्त्रियों के उद्धारक,घर की अपनी स्त्री का ही सम्मान नहीं करता,ये
कसक उन्हें सताने लगी और खुद को कुछेए की मानिंद खुद में समेटती चली गई वो।
वो दिन था और आज का दिन था,राधा को कभी किसी ने न समझा,बाद में उसे समझ आया था कि उसकी
शादी उसके पापा और उसके ससुर के बीच एक बिज़नेस डील से ज्यादा कुछ नही थी।
कितने वर्ष हो गए थे उसे अपने पति के साथ,दो जवान बच्चों की मां भी थी अब वो,पर चाह के भी उस पहली
मुलाकात(अपने सीनियर वाली) की पुलक और आनंद न पा सकी थी वो।जानती नहीं थी क्या बात थी उस
पहली नजर के प्यार में,उसमें जो एक पल में पा गयी थी, वो और अब बरसों से उस मीठे अहसास से वंचित थी|
