बुलंदियों को छूतीं ये महिला शख्सियतें

अपने शौक को करियर की शक्ल देने के लिए मेहनती और दृढ़संकल्प होना जरूरी है। जब ये दोनों मिल जाएं तो आपका हुनर खुलकर अभिव्यक्त होता है और आप भीड़ में अपनी पहचान बना पाते हैं। आइए, आपकी मुलाकात भी कुछ ऐसी ही female public figure से करवाते हैं जिन्होंने अपने हौंसलों के दम पर अपने करियर को सफलता के सोपान तक पहुंचाया और हमारे लिए भी प्रेरणा बन कर आईं।

तय करते हैं इल्म के फासलें

लेखन कला से बनाई अपनी पहचान
कलम के चारागाह से रोशन हौंसले


दुर्वा सहाय (फिल्म निर्देशक और लेखक)

इल्म के इन्हीं फासलों को कलम के चराग से रोशन करने वाली इस शख्सियत का नाम है- दुर्वा सहाय। इनकी लिखी हुई कहानियां इनका व्यक्तित्व खुद-ब-खुद बयां कर देती हैं। बचपन से खेलों के प्रति विशेष रूचि रखने वाली दुर्वा की कलम आगे चलकर कई कहानियों की गवाह बनीं और ये सिलसिला अब भी जारी है। उनकी कलम ने महिलाओं से जुड़े विषयों और उनकी समस्याओं को सहजता से ब्यां किया।

दुर्वा सहाय बंगाल से ताल्लुक रखती हैं। मगर उनकी पैदाइश 16 दिसंबर 1962 को बिहार के गया में हुई, जहां उन्होंने अपनी तालीम हासिल की। विवाह जल्दी तय होने के कारण वे उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाईं। उनके पति भी एक जाने-माने लेखक हैं और उनकी सास भी लेखन कला में माहिर हैं। घर में कलात्मक माहौल होने के चलते उन्हें अपने लेखन को आगे बढ़ाने में काफी सहायता मिली। दुर्वा लेखन के साथ-साथ नाट्य कला में भी शौक रखती हैं। इसी के चलते उनका एक अपना कल्चरल सेंटर भी है, जिसकी बुनियाद उन्होंने सन् 2003 में अपने पति के साथ मिलकर रखी, जहां कई नाटकों का निर्माण हुआ और देश के मुख्तलिफ हिस्सों में उनका मंचन भी किया जा चुका है।

इसके अलावा सांस्कृतिक केन्द्र में कई प्रदर्शनियों, कार्यशालाओं, त्योहारों, नृत्य और संगीत कार्यक्रमों का आयोजन भी किया जाता है। दुर्वा सहाय को अपनी फिल्म ‘पतंग’ को, जिसे उन्होंने अपने पति के साथ मिलकर बनाया था, सिल्वर लोटस सम्मान से नवाजा जा चुका है। इसके अलावा लघु कहानियों के संग्रह ‘द पेन’ को भी लोगों ने खूब पसंद किया। उनकी लघु कहानियां लगातार तीन सालों तक फिल्म फेस्टिवल कान्स में प्रदर्शित की गईं। साल 2012 में ‘अन अननोन गेस्ट’, साल 2013 में ‘द मैकेनिक’ और साल 2014 में ‘पेटल्स’ दिखाई गई। इन्हें अपनी लघु कहानियों के संग्रहण रफ्तार के लिए खूब वाहवाही मिली और लोगों का खूब प्रोत्साहन भी मिला, जिसकी बदौलत वो आगे बढ़ती चली गईं।

उन्होंने लघु कहानियों को डायरेक्ट करने के साथ-साथ फीचर फिल्म का भी निर्देशन किया। इसी के तहत उन्होंनें ‘आवरतन’ फिल्म को डायरेक्ट किया। इस फिल्म में पद्मश्री से सम्मानित शोभना नारायण अहम भूमिका में नजर आ रही हैं। गुरु शिष्य परंपरा पर आधारित इस फिल्म में चार पीढ़ियों की गाथा को दर्शाया गया है। दुर्वा ने अपने काम के साथ-साथ अपने बच्चों की भी अच्छे से परवरिश की। इन्हें अपने हर काम में अपनी सास और अपने पति का पूरा सहयोग हासिल हुआ।

जिनकी शायरी में झलकता है जिंदगी का अक्स

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दो किनारों को मिलाया था फकत लहरों ने

हम अगर उसके न थे वो भी हमारा कब था

अमीता परशुराम (मनोवैज्ञानिक और शायरा)

ये मिसरे उस शख्सियत की कलम से तहरीर हुए हैं, जिनकी शायरी में औरत की जिंदगी का अक्स नजर आता है। जी हां, उस शख्सियत का नाम है अमीता परशुराम उर्फ मीता। जिंदगी के हसीन लम्हों को लेखन में समेटने की कोशिश करने वाली इस बेमिसाल शायरा की शायरी में शब्दों की जादुगरी साफतौर से देखी जा सकती है। इनकी शेरो-शायरी में जिंदगी के वो खूबसूरत रंग नजर आते हैं, जो हर शख्स की जि़ंदगी से होकर गुजरते हैं।

अमीता बेहद संजीदगी से अपने विचारों को कागज पर उकेरने का हुनर जानती हैं। इनका जन्म 15 दिसंबर 1955 को हुआ। बंटवारे के वक्त इनके माता-पिता पाकिस्तान गुजरांवाला से भारत आए थे। इनके वालिद को उर्दू जुबान पर अच्छाखासा उबूर हासिल था, जिसके चलते उन्होंने जि़ंदगी के बहुत से सबक अपनी शायरी के जरिए इन्हें सिखाए। अमीता को अपने वालिद से उर्दू अदब विरासत में मिला। अमीता को बचपन से ही कविताएं लिखना बेहद पसंद था। इन्होंने छठी कक्षा में सबसे पहली कविता लिखी और उसके बाद ये सिलसिला यूं ही जारी रहा। पेशे से प्रोफेसर रह चुकीं अमीता परशुराम ने दिल्ली युनिवर्सिटी के जीसस एंड मैरी कालेज में तकरीबन चार दशक तक बतौर एसोसिएट प्रोफेसर अपनी पढ़ाई को अंजाम दिया।

अमीता को गजलें और नज्में लिखना और सुनना दोनों ही बेहद पसंद हैं और वे उर्दू के अजीम शायर दाग देहलवी से बेहद मुतासिर हुईं। इन्हें पढ़ाई से बेहद लगाव था और साइकोलोजी इनका पसंदीदा विषय था। तकरीबन पंद्रह साल पहले कुछ अपनों के अचानक चले जाने के कारण अमीता के जीवन में कई बदलाव आए और शायरी को लेकर उनकी संजीदगी बढ़ने लगी। इन्हें गजले लिखना बेहद पसंद है। इनकी गजलें इनकी सोच को बयां करती हैं। सन् 2009 में इन्होंने बज्म की शुरुआत की। बज्म जनरेशन नेक्शन के जरिए मीता युवाओं को शेरों शायरी से जोड़ना चाहती थीं। इसी के चलते उन्होने सा-रे-ग-म-प में अपने हुनर का लोहा मनवा चुके जैजि़म शर्मा को गजलों की बारीकियों से रू-ब-रू करवाया और फिर उनकी एक डेब्यू एलबम भी लांच की।

अमीता जी की गजलों में श्रृंगार रस के चलते बहुत से गायकों ने इनकी लिखी गजलों और नज़्मों को अपनी सुरीली आवाज से नवाजा। इश्क लम्हे, इरशाद कहूं और क्या, प्यार बेपनाह गजल एल्बम मार्केट में आई और लोगों ने उनकी खूब हौसला अफजाई भी की। जि़ंदगी के तजुर्बे और हालात को अल्फाज की रोशनी के जरिए अपनी जिंदगी में उतारने वाली अमीता ने अपने शौक के साथ-साथ अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाया। उन्होंने वक्त के मुताबिक काम के साथ सही तालमेल बैठाया। उन्हें जीवन के हर कदम पर अपने हमसफर का पूरा सहयोग मिला।

अमीता जी को गजलों के साथ-साथ बागवानी से भी खासा लगाव है। इसके अलावा वो रोजाना खुद के लिए भी कुछ वक्त जरूर निकालती हैं, जिसमें वो लिखती हैं। अमीता जीवन को प्रेरित करने वाली किताबें पढ़ना पसंद करती हैं और समाजी मुद्दों से जुड़ी फिल्में देखना भी उनके शौक में शुमार है। वे मानती हैं कि खुशहाल जि़ंदगी के लिए बहुत जरूरी है कि हम एक तरफ समाज के रिश्तों को जरूर निभाएं, मगर साथ ही अपनेआप को भी समझें और वक्त दें। इन दोनों चीजों में संतुलन बैठाकर ही हम खुशहाल जिंदगी बिता सकते हैं।

हर क्षेत्र में माहिर

भंवर से लड़ो, तुंद लहरों से उलझो
कहां तक चलोगे किनारे-किनारे

अश्विनी आहेर (मॉडल और अदाकारा)

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इन्हीं पक्तियों को अपने जीवन का मकसद बनाने वाली इस शख्सियत का नाम है अश्विनी आहेर। जो जीवन में इस कदर आगे बढ़ीं कि फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। एक सफल मॉडल, शानदार अदाकारा और बेहतरीन समाज सेविका के तौर पर एक आला मकाम हासिल करने वाली इस शख्सियत के जीवन में कई मुश्किलें आईं, मगर मंजिल तक पहुंचने की चाह उनके जज्बे और बुलंद इरादों को नहीं हिला पाई।

शिरडी में पली-बढ़ी अश्विनी हमेशा से एक मॉडल के तौर पर खुद को साबित करना चाहती थीं। स्कूली पढ़ाई खत्म होने के बाद उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। मगर बावजूद इसके वो बतौर इंजीनियर अपनी पहचान बनाने की जगह मॉडलिंग क्षेत्र में आगे आईं और फिर सबसे पहले टाइटन वॉच फैशन शो में हिस्सा लिया, जहां उन्हें लोगों का खूब प्रोत्साहन मिला। अश्विनी ने कभी भी मॉडलिंग के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए कोई भी प्रशिक्षण हासिल नहीं किया। भले ही उनके सफर की शुरुआत इवेंट्स से हुई, मगर आगे चलकर वे फैशन शोज का हिस्सा बनीं और इसके अलावा वो कई मैगजीनों की कवर गर्ल रहीं। साथ ही, एक नेशनल मॉडल के तौर पर उन्होंने कई कार्यक्रमों में हिस्सा लिया। वे इन्शियॉन इंटरनेशनल सिंगल मीडिया फेस्टिवल, दक्षिण कोरिया 2018 का भी चेहरा रहीं और उन्होंने भारत को रिप्रेजेंट भी किया।

अश्विनी ने मोस्ट स्टाइलिस्ट फैशल मॉडल का भी खिताब अपने नाम किया। कई ब्रांड्स के साथ भी काम किया। वे समाज सेवा में भी विश्वास रखती हैं, जिसके चलते जोगेश्वरी स्नेह सदन अनाथालय के 33 बच्चों का ख्याल रखती हैं। उनके इस सफर में उनकी मां का भरपूर योगदान रहा। कम उम्र में पिता को खोने के बाद घर की सभी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाने के साथ-साथ अश्विनी ने जीवन में एक खास मुकाम हासिल किया। अश्विनी अपने भाई-बहन के भी बेहद करीब हैं और अपने परिवार का पूरा ख्याल रखती हैं।

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