मेरा मायका पक्ष पूरा व्यापारी वर्ग था, जहां काफी लोगों का आना-जाना लगा रहता था। अत:सभी को चाचा, भैया, दादा आदि संबोधन से बात करना हमारे घर की चलन में था। मेरी इच्छा के अनुसार मेरी शादी व्यापारी घर में न करके एक सर्विस वाले माहौल में की गई। पतिदेव भी सर्विस में थे। शादी होकर जब मैं पहुंची तो बहुत सुंदर तरीके से मेरा स्वागत हुआ। ‘जिंदगी की शुरुआत का चांद जब अपनी दस्तक देने को आया तो परंपरागत मुझे मेरी जेठानी जी मेरे कमरे में पहुंचाईं। उनके हाथ में फल-मिठाई से भरी ट्रे थी। साथ-साथ ननद रानी भी एक ट्रे में चाय का थर्मस व कप लिए हमारे साथ-साथ ही कमरे में पहुंची और बोलीं, ‘भाभी आज शाम से भैया के सिर में दर्द है, आज गरमी भी तो बहुत है। भैया आएंगे तो ये गोली व चाय जरूर दे दीजिए। अभी तो दोस्तों के साथ बैठे हैं। जैसे ही पतिदेव आए, थोड़ी देर तो मैं भी चुप रही, पर अचानक चाय के थर्मस पर नजर गई तो तुरंत चाय कप में डाल उनकी तरफ बढ़ाते हुए बोली, ‘भैया जी चाय! आदतन मेरे मुंह से भैया जी निकल गया, लेकिन ये तपाक से बोले, ‘लाइए बहन जी, धन्यवाद। उनका इतना कहते ही मुझे अपने शब्द याद आए और मैं शर्म से लाल हो गई। बाद में हम दोनों बहुत देर तक हंसते रहे

बन घूंघट मुंह दिखाई कैसे दूं

वो महीना मई का था, गरमी बहुत थी। मेरी शादी पटना तय हुई, लड़का गुजरात में डॉक्टर था। दो बार मुझे दिखाने के लिए बुलाया गया। मैं बहुत उदास थी, पत्रकार लड़की वो भी रांची हॉस्टल में रहने वाली, उस पर ये फूहड़ व्यवहार, उदासी को और बढ़ा रहे थे। इधर मेरी एमए की परीक्षा चल रही थी, पत्रकारिता का इंटरनशिप छूट गया था। उसमें मेरा बार-बार पटना जाना मैं पूरी तरह परेशान थी। मैथिल लोगों के रीति-रिवाज अलग होते हैं। मैं लगातार फेरों के समय रोये जा रही थी क्योंकि परेशान थी। हमारे में शादी के बाद लड़की विदा नहीं होती, मायके में रह जाती है। चार दिन दूल्हा भी रहता है, फिर गौने की चलन है, वैसे अब तो सबकुछ बदल गया है। खैर चार बजे मुझे उस कमरे में भेज दिया गया जहां हमारा कोहबर था। मैं पहले दो बार मिल चुकी थी इनसे, फिर शादी में तो कई बार आंखे मिली थी। मैं कमरे में गयी तो मैंने घूंघट नहीं निकाले, कुछ देर बाद ये कमरे में आये, तो मुझे देख अचानक मुंह घुमाकर खड़े हो गए। वो इस ख्वाब में थे कि मैं लंबी घूंघट में मिलूंगी। आप ऐसे? आपने घूंघट ही नहीं किया फिर मैं मुंह दिखाई क्या दूंगा? मैं शर्म से लाल हो गई।

घूंघट की आड़ में चिप्स खाते पकड़ी गई

पेशे से एक डेंटिस्ट थी मैं, इसलिए मम्मी-पापा की दिली ख्वाइश थी कि मेरी शादी भी एक डॉक्टर लड़के से हो। वे चाहते थे, कि मेरा जीवन साथी डॉक्टर हो और हम मिल-जुलकर मुंबई में ही अपना क्लीनिक चलाएं। लेकिन मेरी किस्मत लिखी थी, जबलपुर डेंटल एसोसिएशन के डीन डॉक्टर रमेश चंद्र शुक्ल के छोटे बेटे अजय शुक्ल के साथ दो दिन की परिवारिक औपचारिकताओं के साथ हमारा रिश्ता तय हो गया। मेरे भावी पति अजय जी एक बहुत बड़े हृदय विशेषज्ञ थे। 5 मई को हमारी शादी हुई, इतनी गर्मी थी उस समय कि कुछ खाने-पीने का दिल ही नहीं कर रहा था और 6 जून को रिसेप्शन भी था, इसलिए मैं कुछ ज्यादा ही थकी-थकी और परेशान थी। आज रात हमारी पहली मुला$कात थी, मैं सज-धज कर कमरे में अजय जी का इंतजार करने लगी। इस बीच मुझे बहुत जोर की भूख लगी, मैंने कुछ देर तक तो अजय जी का इंतजार किया फिर अपना बैग खोला और चिप्स के कुछ पैकेट्स निकाले। एक लंबा घूंघट डाल कर मैं पलंग पर बैठ गई और आहिस्ता-आहिस्ता चिप्स खाने लगी। भूख के मारे कब दो पैकेट खा लिए पता ही नहीं चला। अब तो जोर की प्यास लगी हुई थी। पानी पीने के लिए जैसे ही घूंघट उठाया तो सामने अजय जी बैठे हुए थे, हाथों में कोल्डड्रिंक्स पकड़े हुए मुझे कोल्ड ड्रिंक्स का गिलास थमाते हुए कहने लगे डॉक्टर साहिबा चिप्स के साथ कोल्ड ड्रिंक बहुत अच्छी लगती है, मैं दिल का डॉक्टर हूं, आपके दिल का उम्र भर ख्याल रखूंगा। मैं तो शर्म से लाल हो गई!

यह भी पढ़ें –आम के आम, गुठलियों और छिलके के भी दाम