मैं ने अपने जीवन में ‘क्रेडिट शब्द पहली बार तब सुना जब मैं छठी कक्षा में था। हमारे मोहल्ले में किराने की एक नई दुकान खुली थी। पिताजी ने कहा कि उस दुकान से एक किलो शक्कर ले आओ और कहना पैसे बाद में देंगे। जब मैं दुकान पर पहुंचा तब दुकानदार ने कहा हम ‘क्रेडिट नहीं देते। मैंने वापस आकर पिताजी से कहा तब उन्होंने कहा ‘शाम को देखता हूं। शाम को दफ्तर से लौटने के बाद पिताजी मुझे साथ लेकर दुकान गए। पता नहीं उनकी दुकानदार से क्या बात हुई पर शक्कर मिल गई। दुकानदार ने एक कॉपी में कुछ लिखते हुए कहा कि जब भी कुछ चाहिए हो छोरे (मुझे) को भेज दिया करो। उस दिन के बाद दुकानदार ने कभी मुझे कोई सामान देने से मना नहीं किया। मेरे दुकान जाते ही मुझे मनचाहा सामान मिल जाता और मेरे सामने ही वह उस कॉपी में कुछ लिख लेता। माताजी को इस तरह क्रेडिट की शक्कर की मिठास पसंद नहीं थी। उसका कहना था ऐसी मीठी चाय पीने से तो अच्छा है कि फीकी चाय पी जाये। पर पितृसत्ता के कारण हम क्रेडिट की मीठी चाय पीते थे। चाय मीठी होती गई। कॉपी मोटी होती गई। नवीं कक्षा में विषय चयन का प्रश्न था। मेरे सभी मित्रों ने कॉमर्स लिया तो मैंने भी कॉमर्स ले लिया। उस दौर में ऐसा ही ट्रेंड था। दूसरा कारण उसमें बुक कीपिंग जैसा एक विषय था। उस समय तक मुझे किताबों में कुछ रूचि होने लगी थी इसलिए ऐसा लगा कि इस विषय में किताबों के साथ रहने मिलेगा। यहां मुझे दूसरी बार ‘क्रेडिट की किताबी परिभाषा का ज्ञान मिला। डेबिट व्हाट कम्स इन क्रेडिट व्हाट गोज आउट। यह परिभाषा किराने की दुकान वाली क्रेडिट की परिभाषा से अलग थी। कठिन भी थी इसलिए समझ में नहीं आई पर पास होने के लिए रट्टा मार लिया।

उस दौर में ऐसा ही ट्रेंड था। सुनते हैं आज भी वही ट्रेंड है। परीक्षा में कभी क्रेडिट के साथ डेबिट मैच नहीं हुआ। पर रट्टे के दम पर पास होता रहा। दोस्तों में क्रेडिट उसी का ज्यादा होता जिसकी जेब में रोकड़ा हो या जो बड़े बाप की औलाद हो। मेरे मामले में दोनों ही बातें नहीं थी। कुछ ही दोस्त थे जिनके पास दोनों था पैसे और पापा। ऐसे दोस्तों की क्रेडिट ज्यादा थी। उन गिनती के दोस्तों के क्रेडिट के सामने मेरे जैसे कई दोस्तों का डेबिट भी कम पड़ता था। नौकरी में लगने के बाद तो ‘क्रेडिट की अलग ही परिभाषा सुनने को मिली। एक दिन मेरे सहकर्मी ने मुझसे कहा ‘यार तुम दिन रात गधे की तरह काम करते हो पर तुम्हारे काम का क्रेडिट तो दूसरे लोग खा रहे हैं।

यह सुन कर मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा। मैंने अपने शैक्षणिक जीवन में कभी नहीं पढ़ा था कि क्रेडिट खाया भी जाता है। मैंने अपने सहकर्मी से पूछा कि क्रेडिट खाना किस कोर्स में पढ़ाया जाता है। उसने हंसते हुए कहा यह किसी कोर्स में नहीं सिखाया जाता अपने आप ही सीखना पड़ता है। जब नई-नई शादी हुई तब पहली बार दामाद बन कर ससुराल गया, साथ में छोटा भाई भी था। ससुराल में मेरे स्थान पर बड़े दामाद की ही पूछ परख ज्यादा हो रही थी। मैं तो नया-नया दामाद बना था। मेरा छोटा भाई समझ गया कि ससुराल में मेरी कोई क्रेडिट नहीं है। उसने मुझे अकेले में कहा कि भाई साहब यहां तो बड़े दामाद को आपसे ज्यादा क्रेडिटमिल रहा है।

आपको कुछ करना पड़ेगा। मैंने सोचा नया-नया मामला है जब मैं पुराना हो जाऊंगा तब मुझे भी क्रेडिट मिलने लगेगा पर छोटे भाई का कहना था, नए को ज्यादा क्रेडिट मिलना चाहिए। कुछ करना पड़ेगा। उसने क्या किया यह तो मुझे पता नहीं पर मुझे क्रेडिट मिलने लगा। अब तो ‘क्रेडिट की नई परिभाषा ही जीवन की परिभाषा बन चुकी है। जेब में क्रेडिट कार्ड भरे पड़े हैं। घर में हर चीज क्रेडिट पर ली हुई है। घर के बाहर खड़ी गाड़ी भी क्रेडिट पर ही उठाई हुई है। यहां तक कि तन पर पहने कपड़े भी क्रेडिट कार्ड से ही लिए हुए होते हैं। अब तो क्रेडिट ही जीवन है। यदि जीवन से क्रेडिट निकल जाये तो सब डेबिट ही डेबिट है। महीने का राशन भी क्रेडिट कार्ड से ही आता है, अत: अब तो रग-रग में क्रेडिट ही है। एक अंतिम परिभाषा और है कि जीवन के क्रेडिट के पल धीरे-धीरे डेबिट होते जा रहे हैं। जिस दिन डेबिट क्रेडिट बराबर हो जायेगा जीवन का खाता बंद ही हो जायेगा। 

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