Jeena Issi ka Naam Hai
Jeena Issi ka Naam Hai

Hindi Social Story: गाँव की संकरी गलियों में, पीपल के नीचे बैठी एक बुज़ुर्ग महिला की हँसी दूर-दूर तक गूंजती है। चाय की केतली सीटी देती है, और उसके संग झूमता है उनका ठहाका — मस्त और बेपरवाह।

“अम्मा तो गज़ब की हैं!”  
“हँसी में जैसे शहद घुला हो!”*
“बूढ़ी हो गईं हैं, पर दिल तो अब भी जवाँ है!”

कभी बालों में गजरा लगा लेती हैं, कभी बच्चों के साथ लट्टू घुमा देती हैं। हर दुखी चेहरा उनके पास आकर कुछ पल में ही मुस्कुराना सीख जाता है।
लेकिन कोई नहीं जानता कि ये हँसी, ये शरारतें, दरअसल एक जिद हैं — ज़िंदगी को हर हाल में मुस्कराकर जी लेने की जिद। इन्हें प्रेमवश सभी अम्मा पुकारने लगे, पहले इनका नाम था श्यामा — गाँव की सबसे सुंदर और होशियार लड़की।  
सोलह की उम्र में ब्याह हुआ। रामप्रसाद मास्टर के साथ जोड़ी ऐसी बनी कि लोग मिसालें देने लगे।  
रामप्रसाद पढ़ा-लिखा, सलीकेदार इंसान था। उसने श्यामा को अपने नाम के आगे सिर्फ़ ‘पत्नी’ नहीं, बल्कि साथी माना।
पर यह साथ ज़्यादा दिन न टिक सका।
एक बरसात की रात आई… और रामप्रसाद एक दुर्घटना में दुनिया से चला गया।

श्यामा अकेली रह गई — एक साल की बेटी सुनैना को गोदी में लिए, सूनी माँग और काँपते मन के साथ।  
गाँव की औरतों ने आँखें तरेरीं —  
“अब भी साड़ी में लाल बॉर्डर पहना है?”
“इसकी तो किस्मत ही काली निकली!”
उस दिन श्यामा ने बिंदी पोंछ दी, चूड़ियाँ तोड़ दीं, और श्रृंगार को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया।  
अब उसका श्रृंगार था — संघर्ष।
श्यामा ने खेतों में काम किया, दूसरों के कपड़े सीए। हर दिन की थकान को एक प्याली चाय और अपनी बेटी की मुस्कान में घोलकर पी जाती थी।
वक्त बीता, सुनैना जवान हुई। श्यामा ने जैसे-तैसे उसकी शादी करवाई।  
आशा थी कि अब बेटी को वो सुख मिलेगा जो उससे छिन गया था।पर किस्मत एक बार फिर उसकी ख़ुशियों को निगल गई—  
सुनैना के पति की एक दुर्घटना में मौत हो गई।  
वो भी… गर्भवती थी।
उस दिन उसकी आंखें सूखी थीं, चेहरा निर्विकार, बस होंठों पर एक धीमी फुसफुसाहट थी —  
“अब और नहीं रोएँगे… अब तो बस जीना है, और जीना ऐसा कि मौत भी शरमा जाए!”
गाँव ने फिर देखा — वही श्यामा अब अम्मा बन गई हैं।  
चाय की दुकान पर बैठकर बच्चों से पहेलियाँ बूझती हैं,  
औरतों को आत्मनिर्भर बनने के तरीके सिखाती हैं,  
कभी खेत में, कभी पंचायत में, हर जगह उनकी मौजूदगी एक प्रेरणा है।
उनकी मुस्कान अब हथियार है — उस समाज के खिलाफ जिसने कहा था,  
“विधवा की ज़िंदगी सिर्फ़ छाँव होती है — धूप नहीं!”
अम्मा ने वही धूप बनना चुना —  
दूसरों को जलने वाली नहीं, बल्कि चमकने वाली।
लेकिन हर रात, जब सब सो जाते हैं,  
अम्मा अपनी पुरानी संदूक से एक चिट्ठी निकालती हैं —  
रामप्रसाद की आख़िरी लिखी चिट्ठी।  
साथ में होती है एक जोड़ी हरे कांच की चूड़ियाँ।
चुपचाप उन्हें देखती हैं, हल्के से मुस्कुराती हैं,  
और फिर सब कुछ संभालकर रख देती हैं
जैसे खुद को संभाल लिया हो।
कई बार सुनैना पूछ बैठती है —  “अम्मा, कभी दोबारा शादी का नहीं सोचा?”
अम्मा हँसती हैं — वो हँसी जिसमें करुणा भी है और विजय भी —  
“हमने जीवन को नहीं चुना बेटा,  
जीवन ने हमें चुना…  
अब इस तन्हाई से भी दोस्ती हो गई है।”
आज जब अम्मा का नाती कॉलेज जा रहा है,  
सुनैना एक सरकारी स्कूल में पढ़ा रही है,  
तो अम्मा फिर उसी पुराने चूल्हे पर चाय चढ़ाती हैं।
तभी पास की गली से एक छोटी बच्ची दौड़ती हुई आती है,  
हाथ में एक चमकती लाल बिंदी —  
“अम्मा, ये आपके लिए!”
बिना कुछ कहे, बच्ची वह बिंदी अम्मा के माथे पर चिपका देती है।
श्यामा… नहीं, अब फिर से ‘अम्मा’, उस बिंदी को छूती हैं,  
आँखें नम हैं — मगर होंठ मुस्कुरा रहे हैं।
धीरे से अम्मा बड़बड़ाती हैं, “जीवन है… चलता ही रहता है… और चलना भी चाहिए।”
बाहर शाम उतर रही है। भीतर रेडियो पर पुराना गाना बज रहा है — “जीना इसी का नाम है…”
अम्मा की उंगलियाँ रसोई के किसी काम में लगी हैं, पर होंठ अपने आप गुनगुनाने लगते हैं।
थोड़ी देर बाद आवाज़ धीमी पड़ती है, और फिर अचानक थम जाती है।
अम्मा वहीं चौकी पर बैठी-बैठी सो जाती हैं — आँखें बंद, माथे पर हल्की सलवटें, होंठों पर अधूरी मुस्कान।
गाना अब भी बज रहा है… पर अब वो गुनगुना नहीं रहीं है।