जाल—गृहलक्ष्मी की कहानियां: Jaal Hindi Kahani
Jaal

Hindi Kahani: शाम होते होते घबराहट बढ़ने लगी थी जो उसके चेहरे पर भी साफ दिख रही थी जब अपने बेडरूम के एक कोने में रखे ड्रेसिंग टेबल के आईने से उसने खुद को निहारा।
बस एक घंटे बाद ही तो उसे अपने फोन के माध्यम से अपनी कविताओं को सुनाने का मौका मिलेगा एक बड़े मंच पर। वैसे पहले भी तो कई बार वो ऐसे कार्यक्रमों का हिस्सा बन चुकी है।
बाहर बारिश हो रही है जिससे मौसम में ठंडक आ गई है फिर भी घबराहट से उसके चेहरे से पसीने की बूंदें टपक रहीं हैं।
अपनी सूती साड़ी के आंचल से चेहरा पोंछती है फिर अपनी अलमारी खोल उसमें से उस प्रोग्राम में पहनने के लिए साड़ी का चयन करती है।
वैसे आमतौर पर पहले कभी वो ओनलाइन कार्यक्रम के लिए विशेष रूप से तैयार नहीं होती थी पर आज उसे लगा कपड़े बदल लेना ठीक रहेगा। अपनी पसंदीदा लाल रंग की साड़ी जिस पर सुनहरा बोर्डर बहुत सुंदर लग रहा था उसे निकाल कर सीसे के पास आ कंधे पर रखकर देखती है तो खुद से कहती है, ” वाह! बहुत सुंदर लग रही है अदिति तूं तो इस साड़ी में।”

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फिर उसका मैचिंग गोल्डन ब्लाउज और आर्टिफिशियल ज्वैलरी सब एक तरफ बिस्तर पर रख कर अपनी डायरी निकाल आईने के सामने अपनी उन सभी कविताओं को गाने का अभ्यास करती है जो सुबह से कई बार कर चुकी है।
“काश! थोड़ी सुंदर होती!!”
मन में सोचती है पर इस भाव को परे कर खुद से कहती हैं, “मैं सुंदर ना सही पर मेरे लिखे हर शब्द तो सुंदर ही होते हैं और मैं अपनी कविताओं का वाचन भी बहुत अच्छा करती हूं ऐसा किसी भी मंच पर जब भी सुनाया सबने तारीफ की । “
आधे घंटे अभ्यास करने के बाद तैयार हो अपने कमरे में अपने स्टडी टेबल के साथ रखें सोफे पर बैठ जाती है।

घबराहट अभी भी हो रही है अपनी कांपती उंगलियों से संचालिका द्वारा भेजे गए लिंक को खोलती है।
थोड़ी देर बाद…
अभी भी काव्यगोष्ठी चल रही थी ओनलाइन और अदिति जो कि थोड़ी देर पहले ही उस लाइव प्रोग्राम का हिस्सा थी जो एक घंटे का कार्यक्रम था पर वो दस मिनट बाद ही खुद को उस स्टुडियो से बाहर देख रही थी।
उसने अपने मन को समझाया शायद नेटवर्क प्राब्लम होगी उसे थोड़ी देर बाद जोड़ लिया जाएगा।
कई बार उसने कोशिश की पर उसे दुबारा उस कार्यक्रम में शामिल नहीं किया गया।
रात का खाना बनाना और कई सारे काम थे। बेटे की स्कूल ड्रेस प्रेस करना भी बांकी रह गया था। दिन भर इस काव्यगोष्ठी में अपनी कविताओं को छांटने और सुनाने का अभ्यास करने में ही पूरा दिन निकल गया था उसका।
अदिति को यह गुण बचपन से ही विरासत में मिला था जिसकी पहचान उसे कोरोना काल में कुछ साहित्यिक एप के माध्यम से हुई। जिसमें पढ़ने के साथ साथ लिखना भी आसान था।
उसकी लिखी एक कविता पर बहुत से लोगों की वाह वाह क्या बात है जैसी समीक्षा देख वो लगातार लिखती ही गई। फिर कुछ ओनलाइन मंचों से जुड़ने का मौका मिला और वो अपनी कविताओं का वाचन करती। सब उसकी खूब तारीफ करते जब वो कैमरा ऑफ करके सुनाती। फिर उसके अंदर का वो डर जो बचपन से बैठा हुआ था जब उसकी शक्ल के कारण उसके लंबे रंग के कारण उसे उपेक्षा का शिकार होना पड़ता था हर जगह चाहे वो घर हो या बाहर।
अब उसे लगने लगा था कि इस आभासी दुनिया में और इस साहित्यिक दुनिया में आपकी काबिलियत देखी जाती है ना कि आपकी शक्ल। वो पिछले तीन साल से लगातार लेखन में ऐसी डूब गई थी कि अब उसे साहित्य के सिवाय कुछ नजर नहीं आता , हमेशा कल्पना की दुनिया में रहने वाली अदिति साहित्य जगत में अपनी पहचान बनाने लगी थी।
कुछ दिन पहले जब उसे एक ओनलाइन मंच पर अपनी कविताएं सुनाने के लिए आमंत्रित किया गया तो उसे इस बात का अंदाजा ही नहीं था कि वो जिस मंच से जुड़ रही है वहाँ साहित्य नहीं कुछ और ही चल रहा है। एक जाल बिछाया जा रहा है सुंदर औरतों के लिए।
उसने भी अपना परिचय और फोटो भेज दिया था और उस कार्यक्रम का बैनर जब बनकर आया तो उसने अपने फेसबुक और व्हाट्स अप पर शेयर भी कर दिया था कार्यक्रम लिंक के साथ।
जैसे ही कार्यक्रम की शुरुआत हुई और उसने अपनी पहली छंदमय कविता सुनाई तो संचालिका महोदया के हाव-भाव बदले हुए दिखे ऐसा लग रहा था वो किसी बात से परेशान थी । किसी से फोन पर बात कर रहीं थीं और उनके चेहरे पर भी पसीने की बूंदें फोन के स्क्रीन पर भी साफ दिखाई दे रहीं थीं।
फिर बाकी प्रतिभागियों के सुनाने के बाद पुनः उसे अपनी दूसरी कविता सुनाने के लिए कहा। उसने कुछ पंक्तियां सुनाई ही थी कि तभी उसकी मम्मी का फ़ोन आ गया, उसने तुरंत फोन काटा और क्षमा याचना के साथ अपनी कविता पूरी करने लगी।
यह कविता जिसका चयन उसने तुरंत किया था कार्यक्रम के विषय को देखकर जो आधी आबादी यानी स्त्री विशेष पर थी ।
दबी हुई इक इच्छा मन में, हरदम है रहती।
मैं आकाश कभी पंछी बन, पंख खोल उड़ती।।
उसने बड़े मन से यह छंद गीत लिखा था और उसका वाचन भी बहुत अच्छा हो रहा था, ऐसा उसे लग रहा था।
पर अभी भी संचालिका के चेहरे पर घबराहट साफ दिख रही थी। उन्होंने अदिति के उस गीत पर कोई समीक्षा ना करते हुए कहना शुरू किया कि उनके नेटवर्क में प्राब्लम है किसी भी समय कार्यक्रम बंद करना पड़ सकता है। ऐसा बोलते समय उनकी आवाज कांप रही थी।

अदिति को लगा… पता नहीं उससे क्या ग़लती हो गई जो अब वो बाकी प्रतिभागियों की तरह स्क्रीन पर नजर नहीं आ रही।
कार्यक्रम चलता रहा जो वो फेसबुक पर देख रही थी ।
एक घंटे का कार्यक्रम डेढ़ घंटे चला , तीन के स्थान पर अब दो ही प्रतिभागी और संचालिका दिख रहीं थीं।

आईने के पास आकर एक बार फिर निहारा खुद को, सही तो लग रही थी आज। हल्का मेकअप भी किया था। उसने कपड़े बदले यह सोचकर कि इतनी अच्छी साड़ी रसोईघर में पहनकर काम करूंगी तो कहीं दाग धब्बे ना लग जाएं। पर मन अटका हुआ था उस काव्य पाठ वाले कार्यक्रम में ही।
कार्यक्रम खत्म होने के बाद उसने संचालिका को फोन किया यह जानने के लिए कि उसकी प्रस्तुति कैसी थी और दस मिनट बाद ही वो कार्यक्रम से बाहर क्यों हो गई । कारण वही सुनने को मिला कि उनके फोन की नेटवर्क प्राब्लम के कारण उन्हें नहीं जोड़ पा रही थी।
ऐसा कैसे हो सकता है यही सोचते हुए
अदिति रात के खाने की तैयारी में जुट गई।किचन समेटते समेटते रात के साढ़े बारह बज गए पर उसका पूरा ध्यान उसी कार्यक्रम पर था । जब सोने आई तो एक बार उसी कार्यक्रम को देखना शुरू किया और फेसबुक पर आए कमेंट पढ़ने लगी। उसकी दोनों कविताओं में किसी की भी समीक्षा नहीं थी पर यकायक उसकी नजर एक कमेंट पर अटक गई जिसमें लिखा था।
‘इनको कौन लाया है कार्यक्रम में? मंच की प्रतिष्ठा और कार्यक्रम के स्तर का भी ध्यान रखना चाहिए।’
अदिति को वो पूरा खेल समझ आ गया क्यों उसे दस मिनट बाद ही बाहर कर दिया गया था । यहाँ भी वो उपेक्षा की शिकार हुई। उसकी कविताएं नहीं उसकी शक्ल के आधार पर वो उपेक्षित हुई।
यह आइना सच बोलता है और मेरे मन का आइना झूठ बोलता है कि तू सुंदर है क्योंकि तेरा मन सुंदर है पर ऐसा नहीं है बाहरी दुनिया आपका बाहरी रंग रूप देखती है। जो दिखता है वही बिकता है। पैकेट सुंदर हो तो अंदर का घटिया माल भी मंहगे दामों में बिक जाता है।
संचालिका को लगातार अध्यक्ष का फोन और मैसेज आ रहा था, उस पर भी प्रेशर बना हुआ था। गलती उसकी भी तो नहीं थी, वो मैसेज अध्यक्ष का ही था।
रात भर नींद आंँखों से कोसों दूर थी। मन में ठान लिया था कि अब किसी भी काव्य गोष्ठी में शामिल नहीं होगी और ना ही कभी कुछ लिखेगी।
सुबह से आईने में अपनी शक्ल देखने से भी गुरेज कर रही थी। गुस्सा आ रहा था सब पर और यह वाक्य कानों में गूंज रहे थे.. इनको कौन लाया यहां पर…
‘भगवान लाए… उसकी माँ लाई… और यहाँ तक छंद गीत गाने लायक उसके सभी छंद गुरु लाए…
पर क्यों लाए ?? ‘
यह सवाल खुद से कर रही थी और अपनी आंखों के आंसुओं को रोक नहीं पा रही थी।
क्यों नहीं कोई उसके अन्तर्मन में बसे आईने से उसे देखता है।

अगले ही दिन जहां से उसने छंद ज्ञान लिया है और वहीं अब इस ज्ञान को बांट रही है, उसकी कई शिष्या का फोन लगातार आया। कई बार इग्नोर किया… किसी से कोई बात नहीं करेगी कुछ नहीं बताएगी… रात क्या हुआ उसके साथ। किस हाल में है वो कुछ नहीं कहेगी किसी से भी।
लेकिन जब उसकी प्रिय शिष्या जो कि उससे उम्र में काफी बड़ी है और अदिति उन्हें अपनी बड़ी बहन मानती हैं , उनका फोन उठा लिया…
” हैलो गुरुदीदी आप अपना वाट्स अप चैक कीजिये और चार बजे ज़ूम मीटिंग में जरूर आइएगा। “
चाहते हुए भी वो उस विनम्र आग्रह को ना ठुकरा पाई।
गुरु पूर्णिमा के अवसर पर बहुत ही सुंदर कार्यक्रम का आयोजन किया था और सभी साधकों और गुरुओं ने उसकी जमकर तारीफ की थी। यहांँ उसकी शक्ल नहीं सीखने सिखाने की लगन से अपनी पहचान बनाई थी।
बाद में पता चला कि जिनकी टिप्पणी से वो इतनी आहत हुई थी वो बहुत ही घटिया इंसान हैं जो सुंदर लड़कियों और महिलाओं को अपने जाल में फंसाकर उनका शारीरिक और मानसिक शोषण करते हैं।
उस उपेक्षा के कारण वो बहुत बड़े संकट में घिरने से बच गई। अच्छा ही हुआ जो वहां उसके अन्तर्मन के आइने से अदिति का वास्तविक सौंदर्य उन्होंने नहीं देखा वरना वो भी अन्य कवियत्रीयों के समान उन लोभी लालची लोगों के जाल में फंसे जाती।