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"तू मां कहलाने लायक नहीं"—गृहलक्ष्मी की कविता: Mother Poem
Tu Maa Kehlane Layak Nahi

Mother Poem: जो तू लड़ती मेरे हक को, मुझ को जिंदा दफनाती नहीं,
मैं दिल से कहती हूं औरत, तू मां कहलाने लायक नहीं।

मां बनना तो सौभाग्य होता, चाहे बेटा हो या बेटी हो,
मैं अगर जन्मी बेटी तो इसमें मेरा दोष नहीं।
तू मां कहलाने लायक नहीं।

मां तो खुद गीले में सोती, ताकि बच्चे का बिछौना सूखा हो,
पर तू तो निकली बड़ी स्वार्थी, तेरे जैसी मां ना हो।
तू मां कहलाने लायक नहीं।

सुना था मां कभी कुमाता नहीं होती, आज अपवाद देख लिया,
तेरी ममता का आंचल छोटा था, इतना मैंने समझ लिया।
तू मां कहलाने लायक नहीं।

तुने मुझको जन्म दिया मर्जी से, मैंने कहां कुछ बोला था,
किसी के बहकावे में मुझे दफनाया, ये दोष ना तेरा थोड़ा था।
तू मां कहलाने लायक नहीं।

तेरी मर्जी के बिन सुन ले, कोई ना मुझको मार सके,
जो की तूने थोड़ी हिम्मत तो,ये दुनिया वाले कुछ भी नहीं।
तू मां कहलाने लायक नहीं।

तू भी तो कभी जन्मी होगी, क्या तुझको यूं दफनाया था,
लड़का लड़की दोनों समान आज, दोनों में भेद कुछ भी नहीं।
तू मां कहलाने लायक नहीं।

तरस जाएगी कोख तेरी अब , मर्द भी वंश को तरसेंगे,
एक बेटी ना जन्मेगी धरा पर, तब मेरा मूल्य समझेंगे।
तू मां कहलाने लायक नहीं।

मां तो स्वयं ईश्वर है होती, जो बच्चों की ढाल बने,
यह कैसा कलयुग आया भगवन, मां ही बच्चे का संताप बने।
तू मां कहलाने लायक नहीं।

मां तो वह है जो बच्चों की खातिर, ईश्वर से भी लड़ जाती,
तेरे जैसी मां ना देखी जो, खुद जन्मी को दफनाती।
तू मां कहलाने लायक नहीं।

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