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hot story in hindi- prem ki pyasi प्यार की खुशबू - राजेन्द्र पाण्डेय

Hot Hindi Stories – पराए पुरूष से लगाव

Hot Hindi Stories : मेरा गोरा रंग, बोलती आंखें, कंधों तक बलखाते बाल, चौड़ी छाती, पतली कमर और चिकनी सुडौल जांघे सभी को लुभाती थी। पुरुष मेरे सौंदर्य को देखकर कहते-‘यह लड़की तो किसी रसगुल्ले से कम मुलायम और रसदार नहीं है। इसे देखने मात्र से ही जन्नत की सैर हो जाती है।’

मैं सुन्दर थी। मेरी देह-यष्टि आकर्षक थी। मैं पुरुषों के मुंह से ऐसे शब्द सुनते ही नारी स्वाभाववश खिल जाती और मुझे अपनी खूबसूरती का बरबस ही आभास होने लगता। मैं बुदबुदाए बिना न रह पाती-‘मुझ पर तुम सब मरते हो तो मरो, मैं किसी के हाथ नहीं आने वाली… मैं तो आग हूं, आग। मुझे पकड़ने के लिए पानी बनना होगा। मैं सुन्दर हूं, पर इतनी भोली नहीं हूं कि अपनी प्रशंसा सुनते ही तुम्हारी बाहों में समा जाऊंगी।’

मैं अभी सोच ही रही थी, कि मां की आवाज ने मुझे चौंका दिया। मैं जैसे सोते से जाग उठी। मां मेरे सामने खड़ी मुस्करा रही थी। मेरी मां मुझसे कहीं अधिक खूबसूरत थी। वह एक प्रौढ़ महिला थी, लेकिन देखने में इक्कीस-बाइस की ही लगती थी। वह अपने सौंदर्य और स्वास्थ्य के प्रति हरदम सजग रहती थी।

वह अपने मुंह से कुछ कहती तो नहीं थी, किन्तु उसके मन के भाव से अक्सर ही मुझे लगता कि वह वेदान्त अंकल को पसन्द करती है और पापा उसके अनुकूल नहीं हैं। वेदान्त अंकल कहां से आते थे और मम्मी से उनका संबंध कब से था, इससे मेरा कोई मतलब नहीं था।

इतने में मम्मी चहकती हुई बोली-‘बेटी, तुम आज स्कूल नहीं गई?’ ‘आज तो छुट्टी है।’ मैंने यह कहकर मम्मी की ओर देखा। आज उसने गुलाबी साड़ी बांध रखी थी। मम्मी पर गुलाबी कपड़े बहुत ही खिलते थे। उसका रूप उनमें और अधिक दमक उठता था। मुझे जहां तक मालूम था, मम्मी सजती-संवरती तभी थी, जब वेदान्त अंकल घर पर होते थे या आने वाले होते थे।

वैसे तो सजना-संवरना मम्मी के जीवन का एक अभिन्न हिस्सा था। लेकिन उस दिन वह विशेष रूप से साज-श्रृंगार करती थी, जब वेदान्त अंकल घर पर होते। मैं अचानक ही बोल पड़ी तो वेदान्त अंकल आज आने वाले हैं?’ मेरी समझ में यह नहीं आ रहा कि मम्मी पापा के लिए क्यों नहीं सजती-संवरती है? शायद मां के सपनों के राजकुमार पापा नहीं हैं, वेदान्त अंकल ही हैं।

वैसे यह कड़वा सच भी है। वेदान्त अंकल पापा से अधिक सुन्दर और स्मार्ट हैं। अपने आप को हमेशा ही सुन्दर बनाकर रखते हैं। कपड़े ढंग के पहनते हैं और पापा, पापा तो बिलकुल ही ढीले-ढाले व्यक्ति हैं। एक ही कपड़े को दो-दो रोज तक पहने रहते हैं। शेव तभी बनाते हैं, जब खुजली होने लगती है या उन्हें कोई टोक देता है। मां को तो चुस्त और खूबसूरत पुरुष चाहिए। वेदान्त अंकल चुस्त भी हैं और सुन्दर भी हैं।’

इसी बीच मां ने मुझे टोक दिया-‘यह लड़की तो हमेशा ही कुछ-न-कुछ सोचती ही रहती है। जा, अपनी सहेली माधुरी से मिल आ। वह तुम्हें कल याद कर रही थी।’

मैं अवाक रह गई-‘मां, मुझ पर आज इतनी मेहरबान क्यों है? अचानक ही मुझे माधुरी के घर क्यों भेजने लगी? आखिर माजरा क्या है?’ एक साथ मेरे मस्तिष्क में न जाने कितने ही सवाल उमड़ने-घुमड़ने लगे, लेकिन मुझमें यह पूछने की हिम्मत ही नहीं थी, कि तुम मुझे जबर्दस्ती माधुरी के घर क्यों भेज रही हो? आखिर तुम्हारा इसमें क्या स्वार्थ है? खैर माधुरी से मिलने के लिए तो बेताब मैं भी थी। मैं पैदल ही उसके घर चल दी।

माधुरी का घर हमारे घर से पैदल कोई दस-पन्द्रह मिनट का रास्ता था। मैं माधरी के घर पहुंची तो दरवाजा खुला हुआ था। मैं बिना आवाज दिए ही अन्दर चली गई। घर में उसकी मां के सिवा कोई नहीं था। माधुरी का भाई देवगन भी नहीं था।

मुझ पर उसकी मां की नजर पड़ी तो वह बोली-‘अन्दर आ जा काजोल, काफी दिनों बाद आई है। माधुरी और देवगन तो अपनी नानी के घर गए हैं, कल सुबह तक आ जाने की उम्मीद है। खडी क्यों है? आ बैठ तो सही।’

मैं उसकी मां के साथ बैठकर भला क्या बात करती। दो-तीन मिनट तक खड़ी रही, फिर बोली-आण्टी, मैं जा रही हूं, माधुरी आए तो कह देना मैं आई थी।’ यह कहकर मैं दरवाजे से होते हुए बाहर आ गई।

माधुरी हमउम्र थी, लेकिन उसका भाई देवगन मुझसे एक साल छोटा था। वैसे वह देखने में छोटा नहीं लगता था। देवगन बहुत शरारती भी था। वह केवल शरारती ही नहीं था, बहुत सुन्दर और स्मार्ट भी था। मेरी उम्र यही कोई पन्द्रह-सोलह की थी। देवगन पन्द्रह का था। जीन्स की पैंट और टी-शर्ट में वह किसी राजकुमार से कम सुन्दर नहीं लगता था।

मैं यही सब सोचती हुई अपने घर आई तो दरवाजा धक्का देते ही खुल गया। मैं बरामदे से होते हुए मम्मी के बेडरूम के सामने आई तो किसी मर्दाने आवाज को सुनते ही ठिठक गई-पापा तो घर पर हैं नहीं। दो दिनों के लिए बाहर गए हैं।

फिर यह मर्दानी आवाज कहां से आ रही है और यह आवाज किसकी हो सकती है?’ मैं वहीं खड़ी होकर सोचने लगी, कि यह आवाज कहां से आ रही है। यह आवाज मम्मी के बेडरूम से आ रही थी। मैंने सोचा, ‘शायद पापा आ गए हैं, लेकिन वह तो ऑफिस के काम से गए हैं। काम बीच में ही छोडकर कैसे आ सकते हैं?’

मैं यह सोचते-सोचते दबे पांव मम्मी के बेडरूम की ओर बढ़ गई। दरवाजे के नजदीक आकर खिड़की की ओर देखा तो खिड़की बंद थी। मैं अन्दर झांकना चाहती थी। मेरे मन में वैसे कोई दुर्भावना नहीं थी। मैं तो यह देखने के लिए बेचैन थी, कि कहीं पापा तो नहीं आ गए हैं। तभी मेरी निगाह दरवाजे के गोल छेद पर पड़ी। मैं एक आंख बंद कर दूसरी आंख से उस छोटे से गोल छेद में झांकने लगी।

अन्दर का नजार देखकर मुझे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ। मैंने अपनी आंखें मलकर फिर उस गोल छेद से झांका तो वही दृश्य नजर आया। इस बार अविश्वास करने का कोई सवाल ही नहीं था। वेदान्त अंकल बिल्कुल ही निर्वस्त्र थे और मम्मी चड्डी-बनियान में थी। इस मुद्रा में दोनों ही बहुत खुश थे। एक-दूसरे की आंखों में आंखें डाले यूं बैठे थे जैसे एक-दूसरे को सम्मोहित कर रहे हों।

इतने में मम्मी ने वेदान्त अंकल के पेट में गुदगुदी की। वह अनायास ही हंसने लगे और हंसते-हंसते ही उन्होंने मम्मी को अपनी गोद में उठाकर बिठा लिया। मम्मी उनके गले में बांहें डालते हुए बोली-‘तुम्हारी बांहों का स्पर्श बड़ा ही उत्तेजक है। दिगम्बर ने तो मुझे कभी ऐसा आनंद दिया ही नहीं।’

‘तुम्हारा पति दिगम्बर कोई मर्द थोड़े ही है, वह तो भोदू है। न जाने कैसे उसके साथ तुम रहती हो।’ वेदान्त अंकल यह कहकर हंसने लगे।

‘दिगम्बर तो एक खम्भा है, जिसकी आड़ में मैं तुम्हारे साथ रहती हूं। दिगम्बर जैसे पति को उंगलियों पर नचाना मुझे खूब आता है।’ मम्मी यह कहते-कहते काफी आक्रामक हो गई और उसने वेदान्त अंकल के गाल को दांतों से काट लिया। वेदान्त अंकल भी कहीं चूकने वाले थे।

एक हल्की-सी सीत्कार लेते हुए उन्होंने मम्मी को बांहों में समेट लिया, फिर उसके होंठों को जोर से भींच लिया-‘अब कैसा लग रहा है?’ ‘कैसा क्या लग रहा है। अच्छा लग रहा है। क्या तुम्हें नहीं पता, स्त्रियां दर्द से मिठास चूसती हैं।’ मम्मी के शब्द यह कहते-कहते लड़खड़ा गए।

उसकी आंखें बंद हो गई। दोनों एक-दूसरे के होंठ ऐसे चूस रहे थे जैसे लॉलीपाप या आईस्क्रीम चाट रहे हों। तभी वेदान्त अंकल ने मम्मी को एक हल्की-सी थपकी लगाई। इस थपकी के जवाब में मम्मी ने भी उनकी पीठ पर एक हल्की-सी चिकोटी काट दी।

सेक्स का इतना जीवन्त और उत्तेजक दृश्य मैंने पहली बार ही देखा था। मेरा रोम-रोम रोमांचित हो उठा। मेरे कपड़े पसीने से नहा गए। मुझे इस खेल को देखने में आनंद भी आ रहा था और घृणा भी हो रही थी। घृणा इसलिए हो रही थी, क्योंकि यह खेल मेरी मम्मी किसी दूसरे मर्द के साथ खेल रही थी।पापा के साथ वह खेल में शामिल होती तो शायद मुझे घृणा न होती या मैं इतनी देर तक यहां न खड़ी होती।

इतने में ही मैंने देखा, दोनों एक-दूसरे से थक-हार कर ऐसे दूर-दूर बैठे हांफ रहे हैं, मानों दो शिकारी कुत्ते बराबर की कुश्ती लड़ते-लड़ते थक गए हों और पुनः लड़ने के लिए सुस्ता रहे हों। तभी मम्मी ने हाथ का इशारा करते हुए कहा-‘आओ यहां मेरे पास…आज तो होंठ ऐसे चूस रहे थे जैसे कोई आईस्क्रीम चूसता हो।’

‘क्या तुम इस मामले में पीछे थी?’ वेदान्त अंकल यह कहकर जाने के लिए उठ खड़े हुए। मम्मी ने उनका हाथ झुककर पकड़ लिया-क्यों, दिल भर गया?’ ‘अब बस भी करो। काजोल कहीं आ गई तो मुश्किल हो जाएगी।’

वेदान्त अंकल की आवाज में थकान थी, लेकिन मम्मी के चेहरे पर थकान की शिकन तक भी नहीं थी। उसकी आंखों में तो अभी यौन-आमंत्रण हिलोरें मार रहा था। उसने वेदान्त अंकल को खींचकर पलंग पर बिठा दिया-‘काजोल अपनी सहेली के घर गई है।

वह अभी नहीं आने वाली…’ मेरे शरीर में एक सिहरन-सी दौड़ गई। ‘तुम भी…।’ वेदान्त अंकल ने यह कहते-कहते मम्मी को बांहों में भींच लिया-‘लगता है अब कल वाले आसन का इस्तेमाल करना पड़ेगा।’ ‘करों न, मना किसने किया है।’ मम्मी यह कहते-कहते हंसने लगी। अंकल ने उसको पलंग पर पटक दिया। मम्मी का पूरा शरीर पलंग पर मचल रहा था। अंकल ने हाथ बढ़ाकर टेपरिकार्डर ऑन कर दिया संगीत की धुन बड़ी ही उत्तेजक और दिलकश थी।

तभी अचानक ही मुझे छींक आ गई। सारा गुड़-गोबर हो गया। मैं हड़बड़ा कर अपने कमरे की ओर भागती चली गई और पलंग पर निढाल पड़ गई। मुझे अपने आप पर बहुत ही खीझ आ रही थी-‘इस नासपीटी छींक को क्या अभी ही आना था। सारा खेल बिगाड़ दिया।

इतने में दरवाजा खुलने की ‘भडाम’ की आवाज हई। मैं फटाफट पलंग से उठकर कपडे बदलने लगी. ताकि मम्मी यह समझे कि मैं माधरी के घर से अभी-अभी आ रही हैं। इसी बीच मम्मी मेरे कमरे में दाखिल हई। मैंने देखा, वह काफी भयभीत थी। वह मेरे करीब आकर बोली-‘कब आई?’

‘अभी चली ही तो आ रही हूं।’

‘माधुरी घर पर ही थी?’

‘हां, घर पर ही थी।’ मैं इतना कहकर बाथरूम में आ गई और स्वयं को सहेजने-सम्भालने की कोशिश करने लगी। मुझे डर था कि कहीं मैं मां-बेटी के मर्यादित रिश्ते की गरिमा को भूलकर कोई अशोभनीय बात न कर बैलूं। मैं मां से कोई सवाल करना नहीं चाहती थी, क्योंकि मां की यह अपनी जिन्दगी थी। न जाने किस मजबूरी में वह यह सब कर रही थी।

कोई कारण जाने बिना मां को कुछ कहना मुझे ठीक नहीं लग रहा था। वह पापा से इतनी बड़ी बेवफाई क्यों कर रही थी, यह बात मुझे भीतर-ही-भीतर कचोट रही थी। मैं शुरू से ही उस विचारधारा की थी, जो भी काम करो खुलेआम करो। किसी से धोखाधड़ी न करो।

कोई भी काम बुरा नहीं होता, वह तब बुरा हो जाता है, जब वह सबकी नजरों से बचाकर किया जाता है। मम्मी को पापा पसन्द नहीं हैं या वे उसको खुश नहीं रख पाते हैं तो वह वेदान्त अंकल के साथ उन्हें तलाक देकर रह सकती है। ऐसे छुप-छुप कर वह जो कर रही है, उससे तो परिवार में गंदगी ही फैल रही है।

मैं बाथरूम से कोई दस मिनट के बाद आई तो मम्मी अपने बेडरूम में थी। वेदान्त अंकल जा चुके थे। मैं उनके सामने जान-बूझकर नहीं गई थी, कि कहीं वह शरमा न जाए या मम्मी को मुझ पर शक न हो जाए।

मैं अपने कमरे में आकर अभी बैठी ही थी कि मम्मी हंसती हुई आकर बोली-‘काजोल, तुम्हारे वेदान्त अंकल आए थे। तुम उनसे मिल भी न सकी। मैंने बेकार ही तुमको माधुरी के घर भेज दिया। आओ मेरे साथ कमरे में…,’ यह कहते-कहते मम्मी ने मेरी बांह पकड़ ली और मुझे खींचते हुए अपने कमरे में ले आई।

मैंने देखा, पलंग पर ढेरों सामान बिखरे पड़े थे, जिनमें ज्यादा मेरे लिए ही थे। मैं सब कुछ भूल-भालकर पलंग पर उछल कर चढ़ गई और अपने दोनों हाथों से कपड़े फैला-फैलाकर अपने नाप के कपड़े देखने लगी। गुलाबी मिनी स्र्कट-टॉप, जींस की टाइट पैंट और लो-कट टी-शर्ट, आसमानी गाउन, और भी न जाने कितनी ही पोशाकें वेदान्त अंकल मेरे लिए लाए थे।

तभी मम्मी मुस्कराती हुई बोली-‘तुम्हें कपड़े पसन्द आए? देखा, तुम्हारे अंकल कितने अच्छे हैं। तुम्हारा कितना ध्यान रखते हैं।’

‘ओह मम्मी, अंकल कितने स्वीट हैं।’ मैं यह कहती हुई मम्मी के गले से लग गई। मम्मी का चेहरा खिल उठा।

और मैं किन्हीं ख्यालों में खो गई-‘लेकिन अंकल यह सब क्यों कर रहे हैं? मम्मी को पापा से हथियाने के लिए? क्या मुझे इन कपड़ों को स्वीकार करना चाहिए? मम्मी शायद इन कपड़ों का लालच दिखाकर मुझे अपने पक्ष में करना चाहती है। वह मुझे अपनी तरफ मिलाकर रखना चाहती है। वेदान्त अंकल यह अच्छी तरह जानते हैं कि मां को हासिल करना है तो बेटी को भी खुश रखना होगा। मां बिना बेटी के हाथ नहीं आने वाली।

कुछ भी हो, मम्मी जब वेदान्त अंकल के साथ खुश है तो मुझे क्या हो सकता है, पापा मम्मी को यौन संतुष्टि नहीं दे पाते हों। वेदान्त अंकल यौन-कला में माहिर हैं। उन्हें यौन-जीवन को जीना आता है। मां को नाखुश करने का या दोषी ठहराने का मेरा कोई हक नहीं बनता है।’ मैं यह सोचते-सोचते खिलखिला कर हंस पड़ी-‘मम्मी, मैं मान गई वेदानत अंकल को…कपड़ों की खरीददारी करने में वह औरतों से भी दो कदम आगे हैं।’

‘और एक तुम्हारे पापा हैं, जिन्हें कुछ भी नहीं आता… न जाने वह कौन-सी मनहूस घड़ी थी, कि मैं उनके खूटे से बांध दी गई।’ मम्मी यह कहते-कहते काफी भावुक हो गई। मैंने देखा, उसकी आंखें भीग आई थी। उसके चेहरे पर पापा के प्रति वितृष्णा के भाव पसर आए थे।

मैं बोली-‘मैं तुम्हारे साथ हूं, मां। तुम क्यों अपना मन दुखी करती हो? पापा को जैसे जीना है वैसे उन्हें जीने दो और तुम्हें जैसे जीना है वैसे जीओ।’ मेरे यह कहते-कहते उसने मुझे गले से लगा लिया मुझे इस बात का कहां बोध था, कि पति-पत्नी के जीवन की राहें अलग-अलग हो जाती हैं तो उनकी संतान त्रिशंकु-सी बन जाती है। तो उसका हित कोई नहीं सोचता।

मैं सोच रही थी-‘पापा बाहर जाकर क्या करते हैं? यह किसी ने भी तो नहीं देखा है। हो सकता है उनका भी किसी पा से संबंध हो। मम्मी के संबंध के बारे में मुझे इसलिए पता है, क्योंकि मम्मी के साथ मैं रह रही हूं। हो सकता है, पापा मम्मी से भी दो कदम आगे हों। मैं केवल मम्मी को ही बुरा क्यों मानूं। पापा भी तो बुरे हो सकते हैं।’ मैं यह सोचते-सोचते ही- अपने कमरे में आ गई।

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