Hindi Sister Story: “केशव !,कैसे चलेगा …ऐसे…!,कहां से होगा सब… क्या करें हम… कहां जाएं… किसके सामने रोएं… और हाथ फैलाएं…!!”
मेरी पत्नी माला मेरे कंधे पर सिर रखकर बिलख-बिलख कर रो रही थी।
रोने वाली बात ही थी। मैं भी घबरा गया था। ऐसा लग रहा था कि पांव के नीचे से किसी ने पूरी जमीन ही खींच दी हो ।
माला के आंसू थम नहीं रहे थे और मेरी घबराहट!
कई महीनों से लगातार कमर ,पीठ और पैरों में दर्द रह रहा था।
लगातार वजन गिरता जा रहा था और कमजोरी बढ़ती जा रही थी ।
पहले मैंने इसे बहुत ही हल्के में लिया था लेकिन जब सब लोगों ने मुझे डॉक्टर के पास जाने की सलाह दी तो मेरे होश उड़ गए।
मेरी एक किडनी खराब हो चुकी थी। डॉक्टरों ने उसे ट्रांसप्लांट करने के लिए कहा था।
मेरे होश उड़ गए थे। एक आम मिडिल क्लास परिवार में यह किसी त्रासदी से कम नहीं था ।
मुंह पर मेरी बेटी की शादी थी। उसकी शादी में खर्च करूँ या अपनी किडनी खरीदने में!
बाहर किडनी की कॉस्ट कम से कम दो ढाई लाख रुपये थी ।
बावजूद ,उसकी भी गारंटी नहीं थी कि यह ट्रांस्प्लांट कामयाब होगा भी या नहीं।
मैं बहुत ही मायूस हो गया था। मैं माला को सांत्वना दे रहा था तभी सुमन दी का फोन आ गया मेरे हेलो करते ही उन्होंने कहा
“बउआ,तेरी तबीयत तो ठीक है ना!”
” बड़ी दी प्रणाम !, मैं कुछ कहता उससे पहले ही माला ने फोन छीन लिया और कहा
” बड़ी दीदी, हम बड़े मुसीबत में घिर गए हैं। इनका एक किडनी खराब हो चुका है । डॉक्टरों ने एक महीने का समय दिया है।
अब इस मुसीबत में हम पहले मधु बिटिया की शादी करें या किडनी खरीदें।
बड़ी दिक्कत हो गई है। इतना पैसा भी नहीं है। क्या करें कुछ समझ नहीं आ रहा है?”
सुमन दी यह सुनकर घबरा गई। मैंने माला को आंखें दिखाया और उससे फोन छीन लिया।
दीदी को मैंने टालते हुए कहा
” दीदी उतनी घबराने वाली बात नहीं है। आप निश्चिंत रहिए।”
सुमन दी घबराते हुए बोली
” बहुत ही डरने वाली बात है बउआ। इससे ज्यादा डरावनी बात और क्या हो सकती है..?
रात मैंने ऐसा ही सपना देखा था! मां और बाबा दोनों आकर कह रहे थे ..सुमन, बउआ को संभाल लेना! वह बहुत डरता है!
… मुझे लग रहा था कि कोई ना कोई गड़बड़ होने वाली है! तुम चिंता मत करो। सब ठीक हो जाएगा।”
” दीदी बस मधु की शादी हो जाए सही समय पर भगवान इतनी मोहलत दे दे !”मैंने लंबी सांस ली।
” भगवान तुम्हें बहुत सारा समय देगा भगवान करे तुम्हारी लंबी आयु हो। चिंता मत करो। सब ठीक होगा।”
सुमन दी से बात करने के बाद थोड़ी सी पॉजिटिव एनर्जी मेरे अंदर आ गई।
डॉक्टरों ने जितनी भी देखरेख और दवा और रिस्ट्रिक्शन जो भी लिखा था। मैं सारा फॉलो करने लगा।
एक महीने का समय दिया था। कमजोरी जाने का नाम ही नहीं ले रही थी ।
पंद्रह दिन बीते थे। मैं मेरी तबीयत अचानक खराब होने लगी ।
मैं बाहर बैठकर पेपर पढ़ रहा था और मुझे चक्कर आने लगा।
मैंने किसी तरह से माला और मधु को आवाज देकर कहा..” माला.. माला…!”
उसके बाद मुझे कुछ भी याद नहीं रहा ।
आज पूरे छह दिनों के बाद होश में आने के बाद मैंने अपनी आंखों अस्पताल के बेड पर पाया।
मेरे चारों तरफ मशीन की आवाज आ रही थी ।हाथों पर स्लाइन बॉटल लगा हुआ था ।
सामने कुर्सी पर माला और मधु दोनों बैठी हुई थीं।
धीरे-धीरे मैंने अपनी आंखें खोली तो माला और मधु दोनों के चेहरे पर एक जीवंत मुस्कुराहट आ गई।
मैंने प्रश्नवाचक निगाहों से उन दोनों की तरफ देखा।
माला की आंखों से आंसू बरसने लगे।
उसने कहा “केशव ,सुमन दी ने अपना एक किडनी तुम्हें डोनेट कर दिया ।
मैं ने आश्चर्य से कुछ बोलने की कोशिश की पर मेरे मुंह पर मास्क लगा हुआ था ।मैं बोल नहीं पाया। मेरी आंखें पनीली हो गई और आँसू बहने लगे ।
जुबान रखते हुए भी मैं गूंगा हो चुका था।
मुझे याद आया सुमन दी को दुल्हन के रूप में विदा करने से पहले माँ ने सुमन दी से कहा था
“बेटी बड़ी संतान का यह फर्ज होता है कि वह अपने छोटों का ख्याल रखें और अपना फर्ज कभी ना भूलें।
बड़े ही छोटों को जोड़कर रखते हैं!”
सुमन दी ने अपना अंतिम फर्ज भी पूरा कर दिया।
रेशम के धागे जो वह उन्होंने मेरे हाथों में अपनी रक्षा के लिए बांधा था और मैंने बड़े भरोसे से वचन दिया था कि मैं तुम्हारी रक्षा करूंगा !
आज मैं ही याचक बन गया ।उन्होंने मेरी जिंदगी भी दान दे दी ।
थैंक यू बड़ी दी!, मैं तुम्हारा या एहसान कभी नहीं भूलूंगा !”
मैंने दूसरी तरफ नजर घुमाई देखा एक अलग बेड पर सुमन दी बेसुध सी पड़ीं थीं।
कृतज्ञता में मेरे दोनों हाथ जुड़ गए ।
यह भी देखे-दिखावे का नकाब-गृहलक्ष्मी की कहानियां
