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चार मित्र-21 श्रेष्ठ लोक कथाएं झारखण्ड: Four Friends Story
Four Friends

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

Four Friends Story: एक राज्य में चार मित्र थे। एक बढ़ाई, एक सोनार, एक लोहार और एक खुद वहां का राजा। सभी मित्र विवाहित थे। एक समय ऐसा आया कि उन्हें धन कमाने के लिए अपने देश को छोड़कर प्रदेश में जाने की आवश्यकता महसूस हुई। राजा भी धनाभाव से पीड़ित था। अतः वह भी उनके साथ चलने को तैयार हो गये। सभी कमाने-खाने के लिए एक साथ निकल पड़े।

रास्ते में नदी-नाला, टुंगरी-टांड़, पहाड़-मैदान मिलता रहा। उसे पार करते हुए वे अपने-अपने घोड़ों को आगे बढ़ाए जा रहे थे। अब सामने एक घनघोर जंगल था। वे जंगल में प्रवेश कर गए। अंदर काफी दूर निकल आने पर उन्होंने पाया कि जंगल तो खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा है। इधर अंधेरा भी हो चला था। उन्होंने वन में ही रात बिताने की सोची। सबने खूब सोच-विचार किया और जंगली जानवर से बचने के लिए एक-एक कर पहरा देने की ठानी।

प्रथम पहर में सुनार का नंबर आया। फिर बढ़ाई का। तृतीय पहर में लोहार ने जब पहरा देकर राजा को उठाया और खुद सोने लगा, तब राजा अपनी तलवार लेकर इधर से उधर घूमते हुए पहरा देने लगे। अचानक एक दैत्य कहीं से प्रकट हुआ। राजा के तीनों मित्रों को सोए देखकर उसके मुंह में पानी भर आया। वह उन्हें खाने के लिए लपका। राजा यह देखकर चकित रह गए। उन्होंने झट से म्यान से तलवार निकाली और राक्षस पर वार कर दिया। एक ही बार में राक्षस धराशायी हो गया।

सामने राक्षस दो टुकड़ों में बिखरा पड़ा था। और राजा को नींद आने लगी। वह एक किनारे जाकर एक पेड़ के नीचे सो गए। सुबह की किरणों ने अपना जाल फैलाया, तो तीनों मित्रों की नींद खुली। उन्होंने राजा को पहरे पर नहीं देखा। उन्हें लगा, राजा को पैसे की क्या कमी…वह जरूर घर चले गए होंगे।

‘हम लोग किसी कीमत पर घर नहीं जाएंगे। हमें कमाने के लिए आगे जाना ही होगा।’

‘हां! हां!! चलो। राजा तो धोखा दे दिया।’

‘पहले खाना तो खा लो।’ सोनार और बढ़ई की बात सुनकर लोहरा बोला।

उन लोगों ने बढ़ई को खाना लगाने का जिम्मा दिया। बढ़ई ने तीन जगह खाना लगाया। पर वह चार जगह लग गया। सब भक! बारी-बारी से बाकी दोनों ने भी खाना लगाया लेकिन हर बार खाना चार जगह में बदल जाए। अब उनका माथा ठनका। वे समझ गए कि हो न हो राजा जंगल में ही कहीं हैं। वे इधर-उधर भटक रहे होंगे।

अपने हिस्से का भोजन कर राजा के हिस्से का भोजन वहीं छोड़ कर उनकी तलाश में भटकने लगे। राजा कहीं नहीं दिखाई पड़े। वे खोजते हुए दुमुहनी के पास पहुंचे। उस जगह से रास्ता दो भागों में बंट गया था। एक बहुत लंबा। दूसरा छोटा। लंबे मार्ग को तय करने में नौ महीने लगते। छोटे मार्ग को छह महीने में तय किया जा सकता था।

उन्होंने राजा को समझाने के लिए एक पत्र लिखकर उस दुमुहाने पर रख दिया। पत्र में लिखा था- आप छोटे रास्ते से नहीं आना। आगे घनघोर जंगल है। लंबे रास्ते से ही आना।

राजा भी उन्हें खोजते हुए वहां पहुंच गए। पत्र पढ़ लेने के बावजूद छोटे मार्ग पर चल पड़े। लेकिन बीच में ही भटक गए। वे जिधर से भी निकलना चाहें, उधर ही घना और न खत्म होने वाला जंगल। वे भटकते रहे। कपड़े तार-तार… भूख से हाल बेहाल! पंछियों को उन पर दया आ गई। उन्हें राजा की दशा पर रोना आने लगा। वे सब रोने लगे।

पार्वती जी ने पक्षियों के रोने की आवाज सुनकर शिवजी से उधर ही चलने की प्रार्थना की। पहले तो महादेव नहीं मानें। पर पार्वती जी के हठ के आगे झुक गए। उन्होंने राजा से मिलकर वरदान दे दिया। राजा को जंगल से बाहर भी निकाला। उसकी हालत सुधरने लगी। वह अपने महल में आकर फिर से बस गए। कुछ दिनों के बाद उनके तीनों मित्र भी घर लौट आए। लेकिन उन तीनों की निर्धनता दूर नहीं हुई थी।

राजा ने उन सबको अपने यहां काम पर रखकर उनकी दरिद्रता दूर कर दी। चारों मित्र के जीवन में फिर से खुशहाली छा गई।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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