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त्रिकाल-संध्या-21 श्रेष्ठ युवामन की कहानियां पंजाब: Family Fights Story
Trikaal-Sandhya

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

Family Fights Story: पिछले कुछ दिनों से घर में पड़ा क्लेश अभी थमा नहीं था। मैंने हर प्रकार से कोशिश कर के देख लिया। प्यार से, गुस्से से। माहौल सुलझने की बजाय उलझता जा रहा है। अब तो घर का शोर घर की दरवाजे-खिड़कियों से बाहर सुनाई देने लगा था। घर से बाहर जाते हुए कोई-कोई पड़ोसी जानबूझकर आवाज देते हुए कहता, “क्या बात है सरदार साहिब। रंग क्यों उड़ा हुआ है? अब तो खुश रहने का समय है।” मुझे कोई जवाब नहीं सूझता, मैं बात को टालते हुए आगे बढ़ जाता हूं, ‘खुश रहने के लिए हाथ-पैर तो सभी मारते हैं। मैं भी मारता हूं। इसलिए दोनों बच्चों को अलग-अलग ढंग से समझाने की कोशिश करता हूं। मगर आजकल के बच्चे कहां कुछ सुनते हैं। कुछ कहने पर काटने को दौड़ते हैं। लड़का अब बड़ा हो गया है और बेटी सिमरन, उससे साल-डेढ़ साल बड़ी है।

मैंने कई बार उन्हें अपने पास बिठा कर समझाया। उस दिन भी आंगन में मैंने बाप के अधिकार से लड़के को कंधे से पकड़ कर समझाया, “जगरूप! तुम अब बच्चे नहीं रहे। सब समझते हो। बार-बार समझाना अच्छा नहीं लगता। घर में जवान लड़की है। आज-कल में उसके रिश्ते की बात करनी होगी। अब हमें मिल-जुलकर, घर की जिम्मेवारियों की ओर तवज्जो देनी चाहिए।” मेरी पूरी बात सुने बिना ही कंधे झटकाते वह तल्खी से बोला, “आपको इन बातों की क्या चिन्ता है? आप मजे ले रहे हो, लेते रहो।” मुंह में बुदबुदाते हुए उसने काफी कुछ अंट-शंट भी कहा। बेशक सब कुछ मेरे पल्ले नहीं पड़ा, मगर उसके गुस्सैल चेहरे से उसका कहा-अनकहा, मुझे समझ आ गया था। कितनी देर तक उसकी ओर देखते रहने के बाद, अपने जवान बेटे के सामने मैंने नजरें झुका लीं। सिमरन भी इसके साथ है। मुंह से भले कुछ न कहे, मगर रसोई में काम करते हुए बर्तन पटकने लगती है। घर का काम करते हए. हर समय माथे पर त्यौरियां चढी रहती हैं। अब जवान बेटी को डांटना भी ठीक नहीं लगता। मैं सोचता, चलो, धीरे-धीरे सब समझ जाएंगे मगर ये दोनों ऐसा व्यवहार करते हैं, मानो मैं इनका बाप न हो कर कोई अजनबी हूं। बात-बात पर व्यंग्य कसने लगते हैं। कभी कहेंगे, “सजने की भी एक उम्र होती है। तीसरे दिन बाल डाई कर लेने से आदमी की उम्र नहीं छिप जाती। दूसरों की तरह ही बाल सफेद हुए हैं, धूप से तो नहीं हुए।”

और तो और मेरे पीछे मेरी जासूसी करते रहते हैं। किसी के आने-जाने पर चाय-पानी बाद में पूछते हैं, पहले उससे टेढ़े सवाल करने लगते हैं। मेरी आंखों में आंखें डाल कर मुझसे पूछेगे, “डैडी! कंपनी बाग के पास काले दुपट्टे वाली आंटी कौन थी, जो आपके पीछे मोटरसाइकिल पर बैठी थी। मेरे फ्रैंड ने फोन करके मुझे बताया।”

कल के बच्चे बात-बात पर मुझे झूठा बनाने लगे हैं। मैं तो सुन कर हक्का -बक्का रह गया। गर्दन झुका कर सोचने लगा, ‘उम्र तो मेरी है, इन पर नजर रखने की। उलटा, हर समय ये मुझ पर नजर रखने लगे हैं।’ मुझे नजर झुकाए देख लड़का फिर कहने लगा, “सिर उठा कर बात करें, आंखों में आंखें डाल कर। और सुनिए, बाहर घूमते हुए हमारे बारे में भी ख्याल रखा करें। गली-मुहल्ले और स्कूल-कॉलेज में हमें भी सिर उठा कर आना-जाना होता है।”

उनकी इन बातों से मुझे अपनी ही औलाद की बातें समझ में नहीं आती। हम भी इस उम्र से गुजरे हैं। अपने मां-बाप के सामने, नजर उठा कर देखने की हिम्मत नहीं होती थी। अब दोनों मेरे बाप बन कर मुझ में नुक्स निकालते रहते हैं और ऐसे सवाल पूछने लगते हैं कि मुझसे जवाब देते नहीं बनता। मैं हर कदम फूंक-फूंक कर रखता हूं। अब तो कई बार अपने ही फोन पर आई अनचाही कॉल को भी मैं डरते हुए काटता नहीं, बल्कि उस कॉल को मैं स्पीकर पर डाल देता हूं। मगर ये अब बच्चे नहीं रहे, सब समझते हैं। ऐसे समय में दोनों भाई-बहन मेरी ओर तिरछी नजर से देखते हुए, लचरपन से मुस्कराते हुए, मुझे शर्मिन्दा करने लगते हैं।

फिर भी मैं इन्हें सहज करने की कोशिश करता रहता हूं। मैं एक साथ बैठने के कई बहाने तलाश करता हूं। मैं चाहता हूं कि सोते-बैठते हम छोटी-छोटी बातें करें, हंसी-मजाक करें, जैसा बाप-बच्चों के बीच हो सकती हैं। मैं इस दूरी को दूर करना चाहता हूं। स्वाभाविक माहौल हो घर का, जैसा कि दलजीत के समय हुआ करता था। उसके चले जाने के बाद कितना कछ बदल गया। दलजीत ने सारे परिवार को एक सत्र में बांध रखा था। वह सत्र बेवक्त टट गया और एक-दसरे से जडा सारा परिवार बिखरने लगा। इस सूत्र को गांठ लगा कर जोड़ने की मैं बहुत कोशिश करता हूं। उसी मां का वास्ता देते हुए एक दिन मैंने भावुक हो कर कहा, “काका! तुम्हारी मां का बेवक्त चले जाना हमारे लिए बहत बडी चोट है।” मेरी बात काटते हुए लड़का कहने लगा, “आपको मां के मर जाने का कैसा दु:ख…! आप के लिए मौज-मस्ती करने के सारे दरवाजे खुल गए। लगता तो ऐसा है, इस उम्र में आप पर फिर से जवानी आ गई है।”

अपने हाथों से पाले-पोसे बच्चे के मुंह से ऐसा सुन कर मैं शर्मिन्दा हो गया। इन की ऐसी बेतुकी बातें सुन कर, मैं हर बार निरुत्तर हो कर, दाएं-बाएं झांकने लगता हूं।

दलजीत के बारे में बात करते ही दोनों मुझे कटखड़े में खड़ा कर देते हैं, जैसे उसके जाने के लिए मैं दोषी हूं। उसके निधन को दो बरस हो गए। मैं ही जानता हूं, इन दो बरसों में मैं कैसे नित्य मरता रहा हूं।

जब भी इनकी बेतुकी बातों से मेरा सीना छलनी होने लगता। मेरी सारी दलीलें इनके सामने झूठी पड़ने लगती, तब मैं थक-हार कर पैर घसीटते हुए, अंदर कमरे में लगी दलजीत के तस्वीर के सामने जा खड़ा होता हूं। सुनहरी फ्रेम में जड़ी उसकी तस्वीर कितनी स्वाभाविक प्रतीत होती है, जैसे उसके समय घर में सब ठीक होता था। वह तिल-तिल कर, हमारी आंखों के सामने ही मरती रही। उसका रूप-कुरूप होता गया। उसकी मौत के कई दिनों तक बच्चे ठीक से सो नहीं पाए, रात को चीख कर उठ बैठते थे।

दलजीत के साथ घटी वह घटना मेरे दिमाग के कोने में किसी डरावनी फिल्म समान साकार होने लगी। रोज की तरह ही मैं किसी काम के लिए, उसके पास से उठ कर गया। जाते हुए उसने मुझे घर के लिए लाने वाले कई छोटे-मोटे सामान को दुहराया। छोटी-छोटी बातें करते हुए मुझे बाहर के गेट तक छोड़ने के लिए साथ आई। गुलाबी और जामुनी रंग की मैक्सी पर, ऊपर से लिए ओढ़े दुपट्टे में वह मुझे दूर जाते हुए देखती रही। मैंने भी मोड़ तक जाते हुए कई बार पीछे मुड़ कर देखा। प्यार से हिलते हुए उसके हाथ को देखा। बच्चों को भी सुबह स्कूल भेजते समय वह इसी प्रकार मुस्करा कर और हाथ हिला कर भेजा करती थी।

घर से चल कर मैं अभी चौक के निकट वाले बस स्टैंड तक नहीं पहुंचा था कि पड़ोसी के घर से फोन आ गया। उसने कांपते हुए बताया कि रसोई में काम करते हुए दलजीत के कपड़ों में आग लग गई। मुझे जल्दी से घर पहंचने का कह कर पडोसी ने फोन काट दिया था। खबर सनते ही मेरी टांगें कांपने लगीं और दिमाग चकरा गया। मैं तेजी से घर की ओर दौड़ा। गली का मोड़ मुड़ते ही मेरी धड़कन तेज हो गई। पांव मन-मन भर के हो गए। घर के आगे भीड़ जमा थी। मुश्किल से मैं घर के गेट तक पहुंचा। अंदर-बाहर धुंआं ही धुंआं हुआ फैला था। जली हुई चमड़ी की बदबू दिमाग को चढ़ रही थी। दलजीत कंबल में लिपटे हुए गेट के बीच पड़ी तड़प रही थी।

मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था। मेरी हालत देखते हुए, पड़ोसन अम्मा ने कहा, “वक्त मत देखो। जो भी करना है, जल्दी करो। जगरूप को कुछ सूझ नहीं रहा। बेचारी को डॉक्टर के पास पहुंचाओ। परमात्मा इसकी जान बख्श दे, छोटे-छोटे बच्चे हैं इसके।” अम्मा की बात सुनते ही मेरा गला भर आया। दलजीत के बिना तो घर में रखा कुछ भी नहीं मिलता।

अस्पताल में उसकी हालत देख, डॉक्टरों ने हाथ लगाने से इन्कार कर दिया। वह पुलिस केस होने के कारण भी कतराने लगे। जवान औरत का इस प्रकार से झुलस जाना, देखने-सुनने वाले के मन में कई शंकाएं खड़े करता था। डॉक्टर ने मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए नम्रता से कहा, “भाई साहब! हम आपकी हालत समझते हैं, हमें आपसे पूरी हमदर्दी भी है लेकिन बुरा मत मानना, आजकल दुनिया में बहुत कुछ हो रहा है। बाद में घर-परिवार वाले सौ तरह की बातें करते हैं। लड़की के मां-बाप शोरगुल मचा कर मीडिया को इकट्ठा कर लेते हैं। अस्पताल में भी तोड़-फोड़ करने से नहीं चूकते। हम सभी के लिए बेहतर यही है कि हम ऐसी हालत में संयम और समझदारी से काम लें। पुलिस को इस केस की खबर कर दें। अस्पताल का स्टॉफ तब तक एमरजैसी ट्रीटमैंट शुरू करता है।

डॉक्टर द्वारा समझाए जाने पर पड़ोस में असर-रसूख रखने वाले दो-तीन लोग थाने में रिपोर्ट करने गए। पुलिस के आने तक अस्पताल के स्टॉफ ने दलजीत के शरीर पर दवा लगा दी। कुछ इंजेक्शन दे दिए। इससे उसकी हालत कुछ संभल गई, मगर ….स्थिति काबू में नहीं लग रही थी।

दो घंटे के बाद पुलिस अपनी कार्रवाई करने के लिए पहुंची। आरंभिक जानकारी लेते हुए उन्होंने थोड़ा-बहुत मुझसे पूछताछ की और मौखिक तौर पर हौसला भी दिया। एमरजैंसी वार्ड में पूछताछ कर रहे थानेदार को उसके सवालों के जवाब दलजीत ने हां या न में दिए। उसकी धीमी आवाज से घटना के बारे में इस प्रकार मालूम हुआ, गैस पर रखे दूध के पतीले को उतराते हुए कपड़े के एक सिरे को आग लग गई। उसका सेक हाथ पर लगने से गर्म दूध का पतीला हाथ से छूट गया और कपड़े के सिरे की आग ने उसकी पहनी मैक्सी को पकड लिया और वह आग से घिर गई। पलक झपकते ही ये सब हो गया।

अडोसी-पडोसी ने भी यही कछ बताया। मगर लगा, थानेदार को दलजीत की इस बात पर यकीन नहीं आ रहा था। इसलिए उसने अस्पताल की सीढियां उतरते ही उसके कंधे पर हाथ रखते हए कहा. “सरदार साहब! आने-जाने वालों को निपटा कर, अपने बच्चों को लेकर थाने आइएगा। कछ पूछताछ उन से भी करनी होगी। आपके मुहल्ले में भेजी टीम से भी आपके बारे में रिपोर्ट मिल जाएगी। फिर देखते हैं, किस नतीजे पर पहुंचते हैं।”

थानेदार की नतीजे वाली बात सुन कर मेरे पैरों तले से जमीन खिसक गई। सीढ़ियों की रैलिंग पकड़, मैंने खुद को संभाला।

मुझे कई वर्ष पहले की एक घटना याद आ गई। जब मित्र की पत्नी नहाते समय बाथरूम में गीजर की जहरीली गैस के कारण मौत हो गई। अड़ोस-पड़ोस वालों की मदद से दरवाजा तोड़ कर उस औरत को बाहर निकाला गया। सारा मुहल्ला इस घटना को जानता था। लेकिन उस शरीफ आदमी के हक में किसी ने कुछ न कहा। सभी कन्नी काट गए। उस पर औरतबाज होने का इल्जाम लगा कर, उस पर ससुराल वालों ने कत्ल केस दर्ज करवा दिया। वह अपनी पत्नी की अंतिम यात्रा भी न देख पाया। कई बरस तक जेल और हवालातों के चक्कर लगाते हुए खुद को बेकसूर सिद्ध करने की कोशिशें करता रहा। जब तक वह अपनी बेगुनाही साबित कर पाया, तब तक उसका न परिवार रहा न घर। वह किस ओर निकल गया, आज तक कोई पता-ठिकाना नहीं लगा पाया।

दिमाग में उठ रहे बवंडर के कारण मेरे अंदर श्वास उखड़ने लगे थे। वार्ड में पड़ी दलजीत के पास जाने के लिए सीढ़ियां चढ़ना भी मेरे लिए एक चोटी पर पहुंचने समान लग रहा था। पैर घसीटते हुए किसी तरह मैं उसके बेड के पास पहुंचा। अस्पताल वालों ने उसके गिर्द एक मच्छरदानी तान दी थी। मैं अभी भी उसके पैरों के पास खड़े होकर जाली के अंदर झांकने की हिम्मत नहीं कर पाया था।

पता नहीं, उसे लगाए टीके और दवाइयों का प्रभाव था या कुछ और। वह एकदम अडोल पड़ी थी। उसके शरीर में कोई हलचल नहीं हो रही थी। दलजीत की ऐसी हालत देख कर मेरे दिल-दिमाग सुन्न हो रहे थे। उसके धीमे पड़ती सांस से उसका दिल और भी डूबने लगा।

दलजीत को अस्पताल लेकर आये पड़ोसी और अन्य परिचित काम के बहाने निकल गए। मैंने बैड के पास खड़े होकर वार्ड का मुआयना किया। वार्ड के भीतर दो-चार मरीज अपने अपने बेड पर चपचाप लेटे थे। कोई-कोई धीमी आवाज में खांस या जोर से सांस ले रहा था। कोई बोल नहीं रहा था, कुछ उसकी ओर बिटर-बिटर झांक रहे थे। मैं उनकी इस तिरछी नजर से घबरा गया। अपनी इस घबराहट को छपाने और फिजल की पूछताछ से बचने के लिए मैंने नजरें घुमा लीं। मेरे भीतर अभी भी बुरे ख्यालों का बवंडर चल रहा था।

मुझ में अब खड़े होने की भी हिम्मत नहीं रही थी। काफी समय से खड़े रहने के कारण मेरा शरीर दुखने लगा था। हार कर मैं वार्ड के बाहर रखे बेंच पर जा बैठा। दलजीत के माता-पिता सूचना मिलते ही करनाल से चल दिए थे। शाम तक वे पहुंच जाएंगे। मालूम नहीं, वे सीधे अस्पताल आएंगे या घर जाएंगे। उनके साथ कुछ संबंधी भी होंगे क्या….। उनका व्यवहार कैसा होगा। मैं सवालों की इस भूल-भुलैया में उलझ रहा था।

बैठे-बैठे मैं अस्पताल में आते-जाते लोगों की ओर देखने लगा। कभी-कभी मुझे खौफ लगने लगता। इस भीड़ में कुछ लोग मुझे साजिशी प्रतीत होते। कुछ मेरी ओर टेढ़ी निगाह से देखते हुए गुजरते। कोई-कोई मुझ से बातचीत करने का सिरा तलाश रहा था।

मगर मेरा ध्यान वार्ड में पड़ी दलजीत की ओर जा रहा था। जो अब निश्चल पड़ी थी। वह मेरे बारे में ऐसा-वैसा कहने या सुनने के लिए सपने में भी सोच नहीं सकती थी। उसके होते हुए कोई मेरा कुछ बिगाड़ नहीं सकता था। हालांकि थानेदार बार-बार दलजीत से कह रहा था, “मैडम, आप को किसी से डरने की जरूरत नहीं। हम आपके साथ हैं।” मेरी ओर शक्की निगाह से देखते हुए थानेदार ने इशारे से मुझे कुछ दूर खड़े रहने को कहा। दूर खड़े रह कर भी मेरे कान उनकी ओर ही लगे रहे। थानेदार दलजीत के एकदम पास जा कर धीमी आवाज में बात कर रहा था और वह कभी हां या न में सिर हिला रही थी। मैं अंदर से बस टूटता जा रहा था।

बेंच पर बैठे-बैठे ही दोनों बच्चे पास आकर मुझ से सट गए। उनके सिर झुके हुए थे। मैंने दोनों को अपनी निर्जीव बांहों में लेने की कोशिश की। मुझे मालूम था, दलजीत के बगैर हम तीनों ही बिखर जाएंगे।

रात तक दलजीत के माता-पिता भी आ पहुंचे। ऐसे लगा, दलजीत उन्हीं की प्रतीक्षा कर रही थी। बुजुर्ग बाप ने बेटी के सिर पर हाथ रखा। मां ने उसका सिर अपने घुटने पर रख लिया। उसने बस एक बार तैरती सी नजर से मेरी ओर देखा। फिर नजरें फेर लीं और धीरे-धीरे उसकी पलकें मुंद गई। हमारे देखते ही देखते उसने दो-तीन बार हिचकी ली और बस…सब खत्म हो गया। अस्पताल के स्टाफ ने अपनी ओर से कोशिश की परन्तु सब बेकार रहा। उसकी मां ने उस पर पडे कपडे से उसका चेहरा ढक दिया और उसकी दहाडों ने आसमान सिर पर उठा लिया।

अपने हिस्से की जिम्मेवारियां बीच में छोड़ कर, वह सुनहरी फ्रेम में जा बैठी थी। उसकी तस्वीर के सामने खड़ा, मैं घर में रह गए तीनों सदस्यों के बीच चल रही नयी लीला के बारे में सोच रहा था, जिसका कोई सिरा मेरे हाथ नहीं लग रहा था।

मुझे इस प्रकार तस्वीर के सामने दोनों ने बारी-बारी से खड़े देखा। मुझे मालूम था, कुछ न कुछ कहेंगे अवश्य ही, उल्टा-सुल्टा सा। मुझे ध्यान आया, पहले-पहल उनका व्यवहार ऐसा नहीं था। दोनों मेरे बगैर नहीं रहते थे। जिस प्रकार मैंने दो बरस इनकी जरूरत का हर प्रकार से ख्याल रखा, ये दोनों भी अपनी उम्र के अनुसार, मेरा ख्याल रखते रहे। यह तो कुछ ही दिन पहले इन्हें मेरे और गुरमीत के संबंध के बारे में भनक पड़ गई, बस उसके बाद से ही ये दोनों उल्टी-सीधी बातें करने लगे।

मैंने अपनी ओर से बहुत छिपा कर रखने की कोशिश की। हर कदम फूंक कर रखता रहा। परन्तु आज की यह पीढ़ी भला किसी से कम है। ये बात की खाल खींचते, आने-बहाने बात पूछने लगे। उस दिन रोटी देने आई सिमरन कहने लगी, “पापा, हम क्या आपका ख्याल नहीं रखते। कपड़े-लत्ते का भी मैं ध्यान रखती हूं। कोई कसर रहती हो तो बताएं मुझे..?”

उसे क्या बताता? जवान होती बेटी को कैसे समझाऊं…आदमी की सारी हसरतें कपड़ों की तहों तक ही सीमित नहीं रहती। यह घटना भी अचानक ही मेरे साथ घट गई थी।

तीखी दोपहर में बाईपास से निकलते हुए, रास्ते में खड़ी दो अधेड़ स्त्रियां अगले मोड तक जाने के लिए मेरे मोटरसाइकिल पर बैठ गई। उनसे छोटी-मोटी बातचीत शुरू हुई, जो काफी आगे निकल गई। अंत में एक औरत ने यह कहते हुए मेरे अंदर खलबली मचा दी, ‘जगह हमारे पास है, पांच सौ का खर्चा है।’ सुन कर मैं दुविधा में पड़ गया। मुझ से सट कर बैठी औरतों के तराशे शरीरों के एहसास के कारण मैं इनकार न कर पाया। उनमें से एक औरत ने किसी से फोन पर बात की और फिर मुझे किसी नयी कॉलोनी में चलने को कहा। पीछे बैठी औरत मेरी बगल से बाजू निकाल कर मुझे दाएं-बाएं मुड़ने का इशारा करती रही जबकि मैं चेहरे पर शराफत का चेहरा लगाए मोटरसाइकिल दौड़ा रहा था। हमने उस कॉलोनी की सड़कों पर कई चक्कर लगाए। उन्होंने एक-दो बार फोन भी किया, परन्तु सामने से हरी झंडी नहीं मिल रही थी। वह ‘बस कछ और देर’ कह कर घंटा भर मुझे इधर-उधर घुमाती रही। कॉलोनी में इक्का-दुक्का ही घर निर्मित थे। तेज दोपहर में सड़क पर कोई विरला ही दिखाई दे रहा था। जैसे-जैसे समय निकल रहा था, मेरे भीतर उत्सुकता बढ़ती जा रही थी। मेरे भीतर करंट सी एक लहर उठती और मेरे भीतर एक सनसनी सी छेड़ जाती। उस झुनझुनाहट के कारण ही मैंने शायद तीखी दोपहर की तपिश महसूस नहीं की। मैं मोटरसाइकिल के बैक मिरर से उन दोनों औरतों को तोलता रहा। तभी उन्हें कहीं से हरी झंडी मिल गई और उन्होंने एक टेढ़े मोड़ को काटते ही ब्रेक मारने को कहा। मेरे अंदर भी चाव उमड़ने लगा। पेट में लड्डू फूटने लगे। अभी हम आखिरी मोड़ से पीछे ही थे कि दो पुलिस वालों ने हमें रुकने का इशारा किया। जिन्हें देखते ही मेरे होश उड़ गए। ब्रेक लगाते हुए मैं मुश्किल से मोटरसाइकिल संभाल पाया।

“किधर….?” उनमें से एक ने मेरा उतरा चेहरा देखते हुए पूछा।

“यहां प्लॉट देखने आए थे जी।” मैं कांपती आवाज में मुश्किल से कह पाया।

“ये औरतें कौन हैं, इतनी तेज धूप में उन्हें अपने पीछे बिठाए घूम रहा है?” दूसरे सिपाही ने औरतों की ओर मुंह करके पूछा।

“मालूम नहीं सर, इन्हें यहीं कहीं ही आना था। इसलिए मेरे पीछे बैठ गई।”

“पिछले एक घंटे से तू इन्हें लेकर इधर-उधर आवारागर्दी कर रहा है। कौन सा ऐसा प्लॉट है, जो तुम्हें अभी तक मिला ही नहीं।” सुन कर मैं ठंठबर गया। मुझ से कोई जवाब देते न बना।

“तुम दोनों को उस दिन समझ में नहीं आया। आज फिर निकल पड़ी तुम।” परे खड़ी औरतों की ओर देखते हुए एक ने उन्हें डपट दिया।

“भाजी, खर्चे की तंगी के कारण ही आना पड़ता है, वैसे किस का जी चाहता है, इस प्रकार धक्के खाने के लिए।” मैंने देखा, उनके चेहरे पर ज्यादा डर या खौफ नहीं था, जैसे वे पहले से ही एक-दूसरे को जानते-पहचानते हों।

“कहीं एस.एच.ओ. साहब ने दुबारा देख लिया तो इस बार तुम्हारी जमानत नहीं होगी। दौड़ जाओ यहां से भलीमानस बन कर।” पुलिसवालों की झूठी धमकी सुन कर वे खाली प्लॉट की ओर चल दी।

गर्दन झुकाए मैं अपने ही बारे में सोच रहा था। शर्मिन्दगी और मायूसी के कारण मुझ में आंख उठा कर देखने की हिम्मत नहीं रही थी। पसीने की धाराओं से मेरी दाढ़ी के बाल बिखरने लगे थे।

“गुरबाज! जरा तलाशी लो ज्ञानी जी की। ऐसी औरतों के साथ मौज-मस्ती के लिए जेब में और कौन सा सामान लिए घूम रहा है।” दूसरा सिपाही मेरी जेबों की तलाशी लेने लगा। डर के मारे मैं चुपचाप उसके सामने खड़ा रहा। वह मेरी जेब से मोबाइल निकाल, डायल किए गए नंबरों की जांच करने लगा। फिर उसने पूछा, “ये जुगराज कौन है। बहुत बार फोन किया है तुमने इसे।”

कांपती आवाज में मैंने बताया, “जनाब! मेरा लड़का है, कॉलेज में पढ़ता है, प्रथम वर्ष में।” बात सुनते ही उसके चेहरे पर लचरपन फैल गया। मेरी बात बीच में ही काटते हुए उसने कहा, “अच्छा! फिर फोन करके बता दे लड़के को तुम्हारी कारस्तानी के बारे में। यहीं बुला लेते हैं उसे भी। जरा अपने बाप के लाईफ शौ का नजारा भी देख ले वो भी।” कहते हुए उसने उस नंबर पर अंगूठा रख दिया। जिसे देखते ही मेरी जान सूख गई। मुझे लगा, यह अंगूठा किसी बटन पर नहीं, मेरे गले पर रख दिया गया हो और मैं बलि दिए जाने वाले जानवर की तरह जान बख्श देने के लिए हाथ-पैर मारने लगा।

“ना जनाब! ऐसे मत कीजिए। घर-बाहर मेरी इज्जत मिट्टी में मिल जाएगी। बस ऐसे ही मेरी मति मारी गई जनाब।” उनके घुटनों पर गिर कर मैं मिन्नत करने लगा।

अपने से आधी उम्र की दो औरतों को एक साथ बिठाए घूम रहा है। अब रो रहा है। अभी तो तुम्हें चौकी चलना ही होगा। अब तो अखबार में फोटो छपेगी तुम्हारी। गली-मुहल्ले और सगे-संबंधियों में वाह-वाह होगी। तुम पहले ही रोने लगे।” पुलिसवाले ने एक ही सांस में कहा। मेरा दिल बैठने लगा। वे मेरी इस हालत का मजा ले रहे थे। उनके हाथ में मेरी दुखती रग आ गई थी। कुछ पल रुक कर, मैंने कांपते हाथों से अपना पर्स खोला। उसमें बिजली का बिल भरने के लिए रखे साढ़े चार हजार रुपये उनकी जेब में डाल दिए। जेब गर्म करने के बाद भी उन्होंने बातों ही बातों में कई प्रकार की पूछताछ कर, मेरा कुत्ते जैसा हाल करने में कसर न छोड़ी और साथ ही यहां से भाग जाने का भी दबका मारा। मैंने मोटरसाइकिल स्टार्ट कर, एक बार भी पीछे मुड़ कर नहीं देखा।

अपनी ओर से तो इस बार भी मैंने कोई जल्दबाजी में कदम नहीं उठाया था। जिस कारण बच्चों ने घर में क्लेश खड़ा कर रखा था। गुरमीत मेरे एक मित्र की नजदीकी रिश्तेदारी में से है। वह अपने ब्याहता जीवन में बहत दख झेल चकी। अदालती फैसले का इंतजार करते-करते उसके काले बाल सफेद होने लगे। परन्त वह पत्नी न बन पाई। उसका एक बच्चा भी है, जो उससे छीन लिया गया। कई बरस बूढ़ी मां के साथ रहती रही। पिछले बरस मां भी भगवान् को प्यारी हो गई। भाई-भाभी उससे कन्नी कटते हैं। वह भी मेरी तरह अकेलेपन के लिए आसरा चाहती थी। इसी आस में हर प्रकार से सोच-विचार करके मैंने अपना यह फैसला बच्चों को बता दिया। सुनते ही दोनों ने आसमान सिर पर उठा लिया। किसी को बताने में भी झिझकते नहीं, बल्कि कहते हैं, “समझाएं हमारे डैडी को, इस उम्र में दूल्हा बनने की धुन सवार है इन्हें। बाहर लोग हम से मजाक करेंगे।”

उस दिन के बाद मैं कई बार उनसे कह चुका हूं, भई धीरज रखो। ऐसे व्यवहार न करो। लेकिन मेरी कही बातों का कोई असर उन पर नहीं होता। उस दिन लड़के को अलग ले जा कर मैंने समझाना चाहा, “बेटा! जब घर में बेटी-बहन जवान हो रही हो, तब कई प्रकार की मुश्किलें और परेशानी सामने आती है। जिन्हें समझना तुम्हारे-मेरे बस में बिलकुल नहीं।” सुन कर आगे से कहने लगा, “डैड! सिमरन के बहाने ऐसे और बहाने मत बनाएं। उसकी गोदी में खिलाने की उम्र नहीं है। पूरा घर संभालती है। अब बड़ी क्लास में पढ़ती है वो।”

जुगराज के मुंह से बात सुन कर मैं बेशक चुप हो गया था परन्तु आज भी मुझे डॉक्टर शर्मा की बात याद आने पर मैं कच्चा पड़ गया था। सिमरन कुछ दिनों से अनमनी सी लग रही थी। इसलिए मैं उसे डॉक्टर के पास ले गया। डॉक्टर ने छोटी-मोटी जांच करने के बाद मेरे हाथ में एक स्लिप दे कर निकट मैडिकल स्टोर से कोई दवा लाने के लिए कहा। जब तक मैं दवा लेकर वापस आया, डॉक्टर के पास एक बुजुर्ग औरत बैठी थी। मेरे हाथ से दवा लेते हुए डॉक्टर ने सहजता से मुझसे कहा, “सरदार साहब! चिन्ता की कोई बात नहीं। बेटी ने बताया मुझे, दरअसल उसकी डेट पास आ रही है। इन दिनों में स्त्री-शरीर कुछ ढीला पड़ जाता है।” डॉक्टर के लिए यह बात करना स्वाभाविक था परन्तु वहां खड़े हुए मैं शर्मिन्दगी में डूब गया। सिमरन ने भी नजरें झुका ली। केबिन में बैठी उस बुजर्ग औरत ने पहले मेरी ओर दखा, फिर सिमरन की पीठ सहलाते हुए बोली, “बिटिया! ऐसे समय में मम्मी के साथ आते हैं।” उसके मुंह से मम्मी का नाम सुन कर हम दोनों के चेहरों पर चिन्ता की लकीरें गहरी हो गई।

इसलिए मैंने गरमीत वाला निर्णय लिया था। अब ये दोनों ही मेरे और गुरमीत के मध्य दीवार बन कर आ खड़े हुए थे। इस मामले में मैं भी हार मानने वाला नहीं था। इसी कारण मैंने उस दिन एक और पैंतरा बदलते हए कहा, “मेरी बात जरा ठंडे मन से सोचो। मेरी तरह तुम भी सारा दिन कितने ही काम रहते हैं। पहले कॉलेज जाना, फिर टूयूशन। घर के भी कितने छोटे-मोटे काम होते हैं। मेरा सारा ध्यान सिमरन में रहता है। वह घर में अकेली होती है। आजकल जमाना कितना खराब है। तुम खद समझदार हो। मेरी बात पर गौर करो।” कह कर मैं कुछ देर के लिए चुप हो गया। उसके चेहरे के भाव बदले परन्तु इससे उसकी भीतरी हिलजुल का पता नहीं लग पाया। फिर वह दो-चार दिन चुप रहा और शांत भी। शायद इस मसले पर कोई राय बना रहा हो।

उसकी चुप्पी से मुझे अपनी और गुरमीत के बीच की दूरी कम होती दिखाई देने लगी। अपने अंधेरे कोने के फिर से जागृत होने की चाहत में अपने-आप से ही कई प्रोग्राम बना लिए। मुझे मालूम है, गुरमीत के आने से यह दोनों भी खुश हो जाएंगे। घर संभल जाएगा। मेरी जिन्दगी भी फिर पटरी पर लौट आएगी।

उस दिन मैं पिछले कई दिनों से खरीद कर रखी गुलनार पगड़ी की पूनी लड़के के साथ मिल कर करवाई और शीशे के सामने खड़े हो कर संवार कर पगड़ी बांधी। मैं छोटी-मोटी तैयारी में भी किसी प्रकार की ढील नहीं देना चाहता था। घर में आ रहे इन सुनहरे पलों का आनंद मैं अपने बच्चों के संग लेना चाहता था।

जिस दिन से मैंने सिमरन के पहलू की बात छेड़ी थी, जुगराज अपने भाई-पन के कारण गंभीरता दिखा रहा था। घर में चल रहे इस क्लेश से वह भी उकता गया लगता था। ऐसे लगा, जैसे वह किसी ठोस नतीजे पर जा पहुंचा हो। इस कारण उसके चेहरे पर भी मेरे जैसी रौनक लौट आई थी। वह इधर-उधर टहलते हुए गुनगुनाने लगा था। उसका इस प्रकार खुशी की रौं में टहलना मुझे घर में उरतरने वाली नयी बसंत ऋतु के संकेत समान प्रतीत हो रहा था।

इस कारण मैंने फोन पर गुरमीत से इस खुशी को साझा करते हुए, उससे कंपनी बाग में मिलने का समय भी तय कर लिया था। मैं चाहता था, हम मिल कर अगले प्रोग्रामों पर विस्तार से चर्चा कर ले। मैंने जल्दी से अपना खाना निपटाया। कपडे-लत्ते बदल कर, अपने जूते को भी झाड कर, उसे पालिश से चमकाया। चलते हुए शीशे में खुद को एक बार फिर से निहारा। पता नहीं, नयी पगड़ी के उभरते रंग के कारण या किसी अन्य चाव के कारण मुझे अपना चेहरा निखरा-निखरा और ताजा लग रहा था। मैंने पगड़ी को आखिरी टच दिया।

लडका धीमे-धीमे पैर रखते हए मेरे पास आ खडा हआ। हल्का-हल्का मुस्कराते हुए। शीशे से मैंने चोर नजर से उसकी ओर देखा। मुझे मालूम था, वह कुछ कहने के लिए आया था, पहले की तरह ताना मारने नहीं। खुश लग रहा है। लड़के के इसी मूड में आने का मुझे इंतजार था। परन्तु मैं अपनी ओर से कोई जल्दबाजी नहीं दिखाना चाहता था। इसलिए मैं चुप रहा या जान-बूझकर उसकी ओर अधिक ध्यान नहीं दिया। मुझे मालूम था, इस उम्र में यह बात को अधिक देर तक छिपा कर नहीं रख पाएगा। पिछले दिनों में तैयार की अपनी राय मुझे अवश्य बताएगा, खुशी-खुशी। जिसे सुनने के लिए मैं भी उतना ही उतावला था, परन्तु अपनी जल्दबाजी प्रगट नहीं करना चाहता था।

लड़के ने बात शुरू करने से पहले मेरी ओर चेहरा घुमाया। मैंने भी शीशे से उसकी ओर निगाह टिका दी। उसने धीमी आवाज में बोलना शुरू किया, “पापा! आपने उस दिन ठीक ही कहा था। सिमरन का इस उम्र में अकेले रहना ठीक नहीं। उसे और भी मुश्किलें और परेशानियां हो सकती हैं, जिन्हें न हम समझ सकते हैं और न वह हमें बता सकती है। इसलिए मैंने पहले सिमरन से बात की थी। वह भी पूरी तरह से सहमत है। हम दोनों ने मिल कर करनाल नानी से भी बात की है। थोड़ा ना-नुकर करने के बाद वो भी मान गए। आज दोपहर वो हमारे पास आ जाएंगे। पक्के तौर पर रहने के लिए। जब तक हम चाहेंगे, वे हमारे पास ही रहेंगे। उन जैसा सयाना और समझदार हमें कोई अपना नहीं मिलेगा। इसलिए हमें न सिमरन की चिन्ता करने की आवश्यकता है और न ही घर की। वे सब कुछ संभाल लेंगे। आप भी अब अपनी फालतू की योजनाओं पर फुलस्टॉप लगा दें। घर का माहौल पहले जैसा होने दे।” कहते हुए लड़का चुप हो गया।

मुझ पर खड़े-खड़े ही बिजली आ गिरी। मैं भीतर तक जल कर राख हो गया। मेरा सारा किया-कराया मिट्टी में मिल गया। उसकी कही बातें मेरे सीने में गोली के समान आ कर लगी और मैं छलनी-छलनी हो गया। पास खड़ा लड़का मुझे काट-खाने लगा। मेरा कहीं भाग जाने का जी चाहने लगा। इसलिए मैं बिना कोई हूं-हां किए बाहर निकल गया।

गली में ढीले कदमों से जाते हुए कईयों ने दुआ-सलाम की। मैंने उनके सामने बनावटी मुस्कराने की कोशिश की और सिर को हिलाते हुए दुआ-सलाम कबूल किया परन्तु मुंह से कुछ न कहा। जी चाह रहा था, यहां से कहीं दूर भाग जाऊं। आज मेरा किसी से भी बातचीत करने का मन नहीं कर रहा था। इसी दौरान गुरमीत का दो-तीन बार फोन भी आया परन्तु मैंने फोन नहीं उठाया। मुझे मालूम था, वह मुझे कंपनी बाग में मेरा इंतजार कर रही होगी. जहां पहले भी हम कई बार मिलते रहे थे। वह मझे लगातार व्हाटसअप्प पर मैसेज करती रही और कारण पछती रही। मैं खद भूल-भुलैया में उलझ गया था। मुझे इसमें से बाहर निकलने का कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था। मैं खुद ही अपने आसपास निर्मित अनकल्पित दीवारों से दिन भर टक्कर मारते हए इधर-उधर भटकता रहा।

अपने हाथ से पालिश की हुई जूती में से अचानक कील उभर आई थी, जो बार-बार मेरे पैर की एड़ी में चुभ कर मुझे परेशान कर रही थी। नयी बांधी पगड़ी अब मुझे अधिक कसी हुई प्रतीत होने लगी थी। इस कारण मेरे कान दर्द करने लगे थे। मैंने कई बार पगड़ी हिला कर अपने कानों को सहलाने की कोशिश की परन्तु मुझे रत्ती भर भी राहत न मिली।

घर से कई बार लड़के का फोन आया। उसने बताया कि नानी आ गई। घर आ जाओ। उसके मुंह से बार-बार नानी सुन कर मैं खुद को जमीन में धंसते महसूस कर रहा था। मैं सोचने लगा, मालूम नहीं बच्चे, इस प्रकार हर ओर से घेर कर मुझ से किस जन्म का बदला ले रहे हैं। घर आई उस बुजुर्ग औरत को मैंने सदा मां वाला आदर-सत्कार दिया था। वह मेरे बारे में सुन कर क्या सोचती होगी। जिसके सामने मैंने कभी आंख उठा कर नहीं देखा था।

अभी दिन पूरी तरह से ढला नहीं था। गली में कई जगहों पर लाईटें जलने लगी थी। मैं दिन भर की उधेड़बुन के बाद घर की दहलीज पर पहुंचा हालांकि मेरा घर में दाखिल होने का बिलकुल जी नहीं चाह रहा था। परन्तु सारा दिन इधर-उधर भटकते हुए मेरी टांगें अब जवाब देने लगी थीं। अनमने भाव से मैं घर में दाखिल हुआ। दोनों बच्चे अपनी नानी के साथ बहुत खुश दिखाई दे रहे थे। मैंने आगे बढ़ कर दलजीत की मम्मी के पांव छुए। उन्होंने मेरे अधझुके सिर पर प्रेम से हाथ फिराया और आशीर्वाद दिया। मेरा हाल-चाल पूछा। मेरा गला भर आया। मैं कुछ कह न पाया। उन्होंने सोफे पर आगे सरक कर मेरे लिए जगह बना दी। मैं गर्दन झुकाए उनके पास बैठ गया। मुझ में उनसे नजर मिला कर बात करने या उनके सवालों के जवाब देने की हिम्मत बाकी नहीं रही थी। वह भी चुपचाप मेरी ओर देखती रही। पता नहीं, फिर उसके दिल में क्या आया। सिमरन के हाथ से पानी का गिलास लेकर मुझे खुद थमाते हुए कहा, “शमशेर बेटा! लो पानी पिओ। दिन भर की भागदौड़ के बाद त्रिकाल संध्या समय यूं मुंह लटका कर नहीं बैठते। दो वख्त का एक ही समय होता है यह। इस समय जब रात-दिन एक-दूसरे के गले लग कर एक हो रहे हों, इस सुमेल समय में परमात्मा का शक्र करते हैं। अपने परिवार में बैठ कर हंसी-मजाक करते हैं।”

सांस लेने के बाद बोली, ” मैं तम तीनों की भीतरी दविधा को समझती हूं शमशेर सिंह! तुम्हारे आने से पहले मैं इन बच्चों को यही समझा रही थी। बेवक्त गई दलजीत का दुख हम भूल नहीं पाएंगे, परन्तु पुत्र संभालना तो होगा ही। जीते जी कोई मर नहीं सकता। जैसे बच्चों को मां की गोदी और प्यार की जरूरत होती है और आदमी को औरत की, उसी तरह बसते घर में हमेशा एक गृहिणी ही शोभा देती है।’ फिर पास खड़े सिमरन और जुगराज की ओर देखते हुए बोली, “ये दोनों बिना मतलब ही कई बार तल्ख हो कर ऊल-जलूल बताते रहे। चलो जाने दो। यह नया खून है। तुरन्त गर्म हो जाता और फिर ठंडा भी। हमने उम्र देखी है। मुझे मालूम है, तुम ने जो भी सोचा होगा, बहुत सोच-समझ कर ही फैसला लिया होगा।”

मेरी जेब में पड़ा फोन बज उठा। मैंने आराम से फोन हाथ में लिया। स्क्रीन पर गुरमीत का नंबर देख कर मेरी आंखें चमक उठी। मैंने सिर उठा कर देखा। दोनों बच्चों के चेहरों पर गहरी मुस्कान थी और दलजीत की मम्मी के चेहरे पर ऋषियों समान शांति। पता नहीं खुशी से या किसी अन्य कारण से मेरी आंखें भर आई। मुझे लगा खौलता हुआ सागर बैठ गया हो और सब कुछ आम सा होने लगा हो।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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