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चौधरी की अक्ल-21 श्रेष्ठ लोक कथाएं हरियाणा
Chaudhari ki Akal

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

चौधरी की अक्ल: दादा कहानी सुनाने बैठे थे, मोहल्ले के बच्चे उत्सुकता से कहानी आरम्भ होने की प्रतीक्षा कर रहे थे। दादा बोले, एक गांव में एक कुम्हार था। कुम्हार जहाँ होता है, वहां गधा होना भी लाजमी है। क्योंकि गधे के बिना भला कुम्हार का काम कैसे चल सकता है तो हमारे इस कुम्हार के पास एक गधा भी था। गाँव में अक्सर लोग जानवरों के भी नाम रख देते हैं। ये नाम अक्सर उनके रंग-रूप, कद-काठ या गुण-स्वभाव पर आधारित होते हैं। हमारे कुम्हार का गधा खच्चर जितना ऊंचा था। इसलिए कुम्हार उसे लम्बू कहता था। सबसे छोटे बच्चे गोलू ने पूछा- दादा खच्चर क्या होता है?

दादा बोले- गोलू तुमने घोडा देखा है?

गोलू-हाँ दादा जी देखा है वो भरतू टाँगे वाले के पास है ना, और मेरे चाचा के ब्याह में भी तो चाचा घोड़े पर बैठे थे।

दादा-तो बस गधे से बड़ा और घोड़े से छोटा जानवर खच्चर होता है।

कुम्हार पहले खदान से मिट्टी खोद कर लम्बू पर लाद कर घर लाता। फिर चाक पर मिट्टी के बर्तन बना कर आग में पका कर वह बर्तन लम्बू पर लाद कर गाँव भर में घूम-घूम कर बेचता था।

इसी काम से उसकी और परिवार की रोजी-रोटी चलती थी। कुम्हार लम्बू को अपना बेटा कहता था।

लम्बू कई साल से कुम्हार के साथ था और अब वह बूढ़ा हो चला था। उम्र ने उसे कमजोर कर दिया था।

एक दिन कुम्हार मिट्टी खोदकर लम्बू पर लाद कर घर लौट रहा था। अचानक बरसात होने लगी। लम्बू फिसल कर लडखडाया और एक गहरे गड्ढे में जा गिरा। वह गड्ढा असल में एक सूखा कुआं था।

अपने गधे को गड्ढे में गिरा देख कुम्हार घबरा गया और उसे बाहर निकालने के लिए जतन करने लगा। कुम्हार भी बूढ़ा और कमजोर था, गड्ढे से बाहर नहीं निकाल पाया।

कुछ राहगीर भी उसकी मदद के लिए पहुंच गए, लेकिन कोई भी उसे गड्डे से बाहर नहीं निकाल पाया। क्योंकि कुआं बहुत गहरा था। गाँव के सरपंच चौधरी रुलद शहर जा रहे थे. भीड देखकर रुक गए। जब लोगों ने उन्हें सारी बात बतलाई तो वे बोले- मूर्को तुमने बचपन में प्यासे कव्वे की कहानी नहीं सुनी थी। लोग बोले सरपंच जी सुनी थी। कव्वे ने सुराही से पानी पीने के लिए क्या जुगत लगाई थी? ।

उसने सुराही में कंकर-पत्थर डाले थे पर यहाँ पानी नहीं, गधे को बाहर निकालना है?

चौधरी बोला, बात तो एक ही है ना। तुम पत्थर नहीं मिट्टी डालो। मगर थोड़ी-थोड़ी डालना।

गांव वालों ने फावड़े की मदद से गड्ढे में मिट्टी डालना शुरू कर दिया। गधा घबरा कर उठ खड़ा हुआ।

अचानक सबने देखा कि जैसे ही वे उस पर मिट्टी डालते, गधा शरीर को हिला कर मिट्टी झाड़ देता है, मिट्टी कुँए की ताल में गिर जाती है। लोग लगातार मिट्टी डालते रहे। गड्ढे में मिट्टी भरती रही और गधा उस पर चढ़ते हए ऊपर आ गया। अपने गधे की इस चतुराई को देखकर कुम्हार ने खुशी से गधे को गले से लगा लिया और सरपंच व राहगीरों का धन्यवाद कर अपने घर लौट आया। राहगीर सरपंच की अक्लमंदी की प्रसंशा करते रहे।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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