भारत कथा माला
उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़ साधुओं और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं
यह किस्सा गाँव पोशंगीपुर का है। पर पुराना, खासा पुराना। उन दिनों गाँव पोशंगीपुर में गधे तो बहुत थे, पर उनमें दो गधे कुछ अलग ही थे। जैसे भगवानजी ने उन्हें बड़ी फुरसत से बनाया हो, बड़ी लगन से भी। खुद अपने हाथों से। इनमें एक धोबी रमईराम का गधा बदरू था, दूसरा कुम्हार रामरतन का गधा, बाँका। दोनों आपस में पक्के दोस्त थे और एक-दूसरे पर अपनी जान निसार करते थे।
जब भी फुरसत होती, दोनों प्यारे दोस्त मिलते और एक-दूसरे को अपना-अपना सुख-दुख सुनाते। यों आपस में कह-सुनकर कुछ हल्के हो जाते थे। मगर दोनों को इस दुनिया से एक बड़ी शिकायत थी कि लोगों ने उन्हें गधा कहकर दुर-दुर तो किया, पर यह नहीं समझा कि किसी गधे का दिल भी तो आखिर सोने का हो सकता है।
“गधे हैं तो क्या, मगर हम भी तो कुछ हैं!” धोबी रमईराम के गधे बदरू ने एक दफा बड़े दर्द भरे स्वर में कहा।
“बिलकुल…बिलकुल…! दुनिया यही तो नहीं समझती।” बाँके ने उसके सुर में सुर मिलाकर कहा। और थोड़ी देर के लिए जैसे सन्नाटा-सा छा गया। अब आगे कहने के लिए बचा भी क्या था?
मगर ऐसा भी नहीं कि किसी ने भी उन्हें न समझा हो। धोबी रमईराम का गधा बदरू अपने घर में एक प्यारे से खुशदिल बच्चे चिंकू की तारीफ करता, तो कुम्हार के गधे बाँका को भी जोश आ जाता। जोर से हीं-हीं करके कहता, “बस भाई, मेरा भी यही हाल है। उस घर में एक मिंकू ही मेरा दुख समझता है और मुझे प्यार करता है। है तो अभी जरा-सा लड़का ही, पर समझदार बहुत है। जब-जब मुझे मार पड़ती है, बेचारा अकेले में पूरे शरीर पर हाथ फेरता है और रोता जाता है। बड़ी हमदर्दी जताता है। और तो और, प्यारे दोस्त, वह मेरे लिए जंगल से बड़ी अच्छी-अच्छी, मुलायम घास भी ले आता है, ताकि मेरा मन खुश रहे। मिंकू न होता तो मेरी तो मुसीबत हो जाती। जिंदगी पहाड़ बन जाती। सच्ची, भगवानजी ने बड़ी कृपा की!”
“अरे वाह, भई, वाह!” धोबी का गधा बदरू तरंग में आकर कहता, “प्यारे दोस्त, कहते हुए डर लगता है कि कहीं कोई नजर न लगा दे, पर मेरा चिंकू भी बस ऐसा ही है। एकदम तुम्हारे मिंकू की तरह। बड़ा सीधा और भला।…और देखो जरा, दोनों के नाम भी तो कितने मिलते-जुलते हैं। एक है चिंकू, दूसरा मिंकू। बस, कमाल ही समझो…!”
थोड़ी देर में दोनों दोस्त गधे मिलकर चिंकू-मिंकू की बढ़-चढ़कर तारीफ करने लग जाते, कि अभी तो भाई, ये दोनों छोटे-छोटे हैं, पर लड़के हैं कमाल के! भगवान इनको बचाए रखे और लंबी उम्र दे। वरना आज की दुनिया में तो बस, कुछ पूछो ही मत। कोई अपने स्वार्थ के दायरे के बाहर देखना ही नहीं चाहता।…बुरा हाल है!
और फिर जैसा कि होना ही था, दोनों दोस्त गधों ने एक दिन चिंकू-मिंकू को मिला ही दिया। वे एक-दूसरे से मिलकर ऐसे खुश हुए, ऐसे खुश कि क्या बताएँ। फिर जल्दी ही वे आपस में ऐसे गहरे दोस्त बन गए कि उनका मन एक-दूसरे से अलग होने का होता ही नहीं था। चिंकू दिन भर पुकारता ‘मिंकू…मिंकू…!’ और मिंकू दिन भर ‘चिंकू…चिंकू…’ की माला जपता। बड़ा मजेदार खेल था। उसमें सबसे ज्यादा मजे आ रहे थे दोनों दोस्त गधों को, जिनकी दोस्ती दिन दूनी, रात चौगुनी परवान चढ़ रही थी।
यों चिंकू-मिंकू भी कहाँ कम थे! जिस तरह दोनों दोस्त गधे फुरसत निकालकर दिन में एक बार जरूर मिलते, ऐसे ही दोनों प्यारे दोस्त चिंकू और मिंकू भी एक बार जरूर मिलते और एक-दूसरे को अपने दिल का हाल बताते। और हाँ, जो भी वे बातें करते, उनमें उनके प्यारे दोस्त गधों की चर्चा जरूर होती थी। उन पर तो वे बस प्राण ही निछावर करते थे।
ऐसे ही समय बीतता रहा। दोनों दोस्त गधों बदरू और बाँका के साथ चिंकू-मिंकू की दोस्ती के भी नए-नए रंग नजर आते रहे। फिर एक दिन की बात, चिंकू के मन में अचानक ख़्याल आया कि कहीं घूमने जाना चाहिए। उसने मिंकू को कहने में जरा भी देर नहीं लगाई, कि “चलो दोस्त, कहीं घूमने चलें।”
मिंकू ने सुना तो बेसाख्ता उछल पड़ा। बोला, “अरे यार, तुमने तो मेरे मुँह की बात छीन ली।…हाँ-हाँ, चलो, घूमने चलते हैं। बोलो, कब चलना है?”
“अरे यार, कब की क्या बात है? चलो, अभी चलें!” धोबी रमईराम के बेटे चिंकू ने कहा।
“अभी…?” कुम्हार रामरतन के बेटे मिंकू ने थोड़ी देर सोचा। फिर मजे से गरदन हिलाकर बोला, “चलो।”
और वे चल पड़े। एक लंबी, बड़ी ही लंबी यात्रा पर। लेकिन साथ में अपने प्यारे दोस्त गधों बदरू और बाँका को ले जाना न भूले। सच्ची पूछो तो चिंकू-मिंकू दोनों को अपने गधे इतने प्यारे थे कि उनके बगैर तो वे खुद को अधूरा ही मानते थे।
तो चिंकू और मिंकू और अपने-अपने गधों पर बैठे और घूमने चल पड़े। हाँ, चलने से पहले उन्होंने अपने गधों के कानों में यह घूमने वाला आयडिया डाल दिया था, ताकि उन्हें भी पता चल जाए कि अब उन्हें बहुत दिनों तक घर से दूर रहना पड़ेगा। लिहाजा, दोनों थोड़ा-सा अपने मन को सैलानी बना लें।
पर घर से दूर रहने की चिंता किसे थी? उल्टा घूमने जाने की बात सुनते ही दोनों दोस्त गधों ने मिलकर उछलते-कूदते हुए चीपों-चीपोंनुमा ऐसा प्यारा शंखनाद किया कि सुनकर चिंकू-मिंकू खुश हो गए।
चिंकू बोला, “यार, ऐसे प्यारे गधों पर लदना क्या ठीक है? जब थक गए तो देखेंगे। अभी तो पैदल ही चलते हैं।”
मिंकू बोला, “ठीक…!”
दोनों उसी समय कूदकर गधों से उतरे और फिर एक-दूसरे का हाथ, हाथ में लेकर चल पड़े।
आगे-आगे दोनों प्यारे गधे, पीछे-पीछे मस्ती में बतियाते चलते चिंकू-मिंकू। यह छोटा-सा कारवाँ मजे में चल रहा था। जहाँ शाम होती, वे रुक जाते और अगले दिन फिर वही कूच-दर-कूच-दर-कूच। उन्हें पता नहीं था कि किधर जा रहे हैं, कहाँ तक जाएँगे, कब लौटेंगे? बस एक ही बात पता थी, चलना है, चलना है और बस चलते ही जाना है।
रास्ते में जो कुछ खाने-पीने को मिल जाता, उसी से वे काम चलाते और आगे बढ़ जाते। कुछ और नहीं तो रास्ते में जंगली बेर या फिर पेड़ों से फल तोड़कर खा लेते। किसी नदी या तालाब का पानी पीते और फिर अपनी उमंग में आगे चल देते। दोनों गधों बदरू और बाँका के लिए हरी-हरी मुलायम घास की भी क्या कमी थी? लिहाजा वे तो इस सफर में कहीं ज्यादा खुश थे और थोड़े तगड़े भी हो गए थे। अपनी खुशी जताने के लिए जब वे उछलते-कूदते हुए लंबी रेस शुरू कर देते तो पीछे-पीछे चिंकू-मिंकू को भी भागना पड़ जाता। देख-देखकर राह चलते लोग हैरान-परेशान, “अरे भई यह तो राह चलते ही सर्कस हो गया…! हमें क्या पता था कि दुनिया में ऐसे भी प्यारे गधे हैं?”
कोई-कोई पूछ भी लेता, “अरे भाई, कौन-सी सर्कस कंपनी के हो तुम?… कहाँ दिखाते हो तुम अपना खेल? उसका टिकट विकट-विकट कितने का है?” इस पर चिंकू और मिंकू की इतने जोर की हँसी छूटती कि हँसते-हँसते पेट दर्द करने लगता।
यों एक-दूसरे के कंधे पर हाथ रखे हँसते-बतियाते चिंकू और मिंकू अपने प्यारे दोस्त गधों के साथ आगे बढ़ते ही जा रहे थे। रोज नए-नए दृश्य, नए नजारे। नई हवाओं की सरगम। क्या मजे थे, क्या आनंद। हर जगह दीन-दुनिया की नई-नई बातें पता चलती। उन्हें लग रहा था, घर से निकल आए, यह अच्छा ही हुआ। वरना घर में बैठे-बैठे तो आदमी गोबर का चौथ हो जाता। अरे, दुनिया देखो तो समझ में आता है, दुनिया के रंग कितने हैं। इंद्रधनुष में तो सात ही रंग हैं, पर भैया, धरती पर तो हर जगह रंग ही रंग बिखरे हैं।
जिस गाँव में वे ठहरते, वहाँ बच्चे बड़ी उत्सुकता से उन्हें घेर लेते और चिंकू-मिंकू को अपने नए-नए करतब दिखाने का मौका मिल जाता। पहली बार उन्होंने ऐसा खुला-खुला आसमान, खुली दुनिया देखी थी तो लगता था, दुनिया का कौन-सा करिश्मा है जो वे नहीं कर सकते। अपने इस सफर में वे लंबी कूद, ऊँची कूद, बाधा दौड़ और न जाने क्या-क्या अजूबे सीख गए थे, खुद-ब-खुद। और जब वे दर्शकों, खासकर बच्चों के आगे अपनी इन कलाओं का प्रदर्शन करने पर आते तो लोग वाकई दाँतों तले उँगली दबा लेते।
अगले दिन फिर वही यात्रा। थोड़ा आगे निकलते तो रास्ते में कोई-कोई हैरानी से आँखें फाड़े पूछता, “कहाँ जा रहे हो तुम दोनों? कुछ बताओ तो, भाई!”
इस पर चिंकू हँसकर कहता, “यह तो हमको भी नहीं पता, भाई। बस, जहाँ पैर ले जाएँ, वहाँ चल पड़ेंगे।”
“यह तो बड़ी अजीब बात कही तुमने!” सुनने वाला चकरा जाता।
“ना, अजीब कहाँ? असल में हमारे ये दोनों गधे बदरू और बाँका बड़े पक्के दोस्त हैं। ये हैं भी नायाब और इनकी दोस्ती भी नायाब है। एक-दूसरे से पल भर भी अलग नहीं रहना चाहते। सो इन्होंने कहा कि हमारा घूमने का मन है तो हम भी चल पड़े साथ-साथ कि इसी बहाने जरा दुनिया देखेंगे। क्यों जी, कुछ बुरा तो नहीं किया?”
“हाँ, सो तो ठीक है, पर तुम लोग जाओगे कहाँ…?”
“बताया न, जहाँ हमारे ये दोस्त गधे ले जाएँ, वहाँ चल पड़ेंगे। या फिर भैया, तुम्हीं बताओ कि कहाँ जाएँ?”
सुनकर लोग कहते, “बड़े अहमक हैं ये छोकरे। ऐसे भी कोई मुँह उठाकर चल देता है घर से..? हद्द है!”
पर चिंकू-मिंकू कुछ जवाब न देते। कोई कछ भी कहे, जवाब में हँस देते और प्यार से अपने दोस्त गधों की पीठ थपथपाते हुए आगे बढ़ जाते।
यों चिंकू-मिंकू दोनों ही खुशदिल थे। अलमस्त भी और जबान ऐसी मीठी थी कि जहाँ भी वे जाते, अपने नेक गुणों के कारण उन्हें अच्छे लोग मिल जाते। फिर उनके दोस्त गधे भी किससे कम थे? चिंकू-मिंकू का इशारा समझते ही अपनी ऐसी बाँकी कलाएँ दिखाते कि देखने वाले चक्कर खा जाते। यहाँ तक कि अब तो उन्होंने मिलकर डांस करना भी सीख लिया था। डांस की उनकी एकदम अलग कला थी। एक गोल घेरे के भीतर कुदक्कड़ी के साथ वे सिर हिला-हिलाकर नाचते तो लगता, हर ओर आनंद बरस रहा है। फिर अपने आगे के दोनों पैर उठाकर जब वे पिछले पैरों पर किसी चकरी की तरह गोल-गोल घूम जाते तो देखने वालों का दिल उछलकर बाहर आ जाता और गाँव का खुला मैदान सचमुच सर्कस का तंबू लगने लगता था।
रास्ते में आया बेड़नी गाँव। वहाँ भी चिंकू-मिंकू के गधों ने अपना यही खेल-तमाशा दिखाया तो गाँव के मुखिया रामभद्दर एकदम हक्के-बक्के। उन्होंने पूछ ही लिया, “क्यों जी, चिंकू-मिंकू…? तुम जो भी कहो, वही तुम्हारे ये जादूगर गधे पल भर में कर देवे हैं। तो क्यों जी, क्या ये तुम्हारी बोली-बानी भी समझते हैं, या फिर कोई और ही चक्कर है…?”
इस पर चिंकू ने मुसकराते हुए कहा, “अब बोली-बानी समझते हैं कि नहीं, यह तो क्या कहें, मुखियाजी? पर ये हमारे दिल की भाषा जरूर समझते हैं। इसलिए हमें कुछ कहने की जरूरत ही नहीं पड़ती। ये खुद ही ऐसे होशियार हैं कि अक्लमंदी में बड़े-बड़ों के कान काटते हैं।”
इस पर मुखिया रामभद्दर ने बात ही बात में आसपास के गाँवों तक डोंडी पिटवा दी कि “भाई, बेड़नी गाँव में दो लड़के अपने दोस्त गधों को लेकर आए हैं। बिलकुल जादूगर गधे। जिस-जिस को उनका कमाल देखना हो, वे आज शाम को बेड़नी गाँव के बड़े तालाब के पास वाले मैदान में आ जाएँ।”
और सचमुच शाम तक वहाँ इतनी भीड़ हो गई, जैसे कोई बड़ा भारी मेला हो। हर शख्स उत्सुक था बदरू और बाँका के अजूबे और कमाल देखने के लिए। स्त्रियाँ और बच्चे भी बहुत थे। कुछ तो सुंदर-सुंदर कपड़ों में सज कर आए थे। चेहरे पर उत्साह। सचमुच अच्छे-खासे मेले का दृश्य उपस्थित हो गया। बदरू और बाँका जैसे बिन कहे समझ गए कि क्या करना है। कोई घंटे-डेढ़ घंटे तक दोनों ने अपनी लंबी और ऊँची कूद के ऐसे करतब दिखाए कि लोग तालियाँ पर तालियाँ पीट रहे थे। मगर सबसे बड़ा कमाल तो अंत में हुआ, जब अपना खेल दिखाने के बाद दोनों दोस्त गधों ने सिर झुकाकर वहाँ खड़े लोगों को धन्यवाद दिया और फिर मुखिया रामभद्दर के आगे सिर झुकाकर खड़े हो गए। जैसे कह रहे हों, “हमने तो अपनी कला दिखा दी, मुखियाजी। अब आप को कैसी लगी, यह तो आप बताएँ।”
इस पर मुखिया रामभद्दर ने गेंदे के फूलों की मालाएँ मँगवाकर अपने हाथों से पहले बदरू और फिर बाँका को पहनाई। इस पर इतनी तालियाँ बजीं, इतनी तालियाँ कि चिंकू और मंकू ही नहीं, दोनों प्यारे दोस्त गधे भी निहाल हो गए।
उस रात बदरू और बाँका की बड़ी सेवा हुई। उन्हें बढ़िया घास के साथ-साथ नरम-नरम रोटियाँ और ताजा गुड़ भी खिलाया गया। और कुछ बच्चों ने तो चुपके-चुपके बूँदी के लड्डू भी खिला दिए।
आखिर बेड़नी गाँव के लाड़ले मेहमान थे वे। इसी तरह चिंकू-मिंकू की भी खूब खातिरदारी हुई।
और अगले दिन सुबह होते ही उनका कारवाँ फिर आगे चल पड़ा। कूच-दर-कूच-दर-कूच…!
धीरे-धीरे चिंकू-मिंकू और उनके करिश्माई गधों की चर्चा दूर-दूर तक फैल गई। लोग उन्हें देखते ही दूर से इशारा करके कहते, “वो रहे चिंकू-मिंकू और उनके गधे…!”
सुनकर दोनों दोस्त मुस्करा देते या मिलकर गाना शुरू कर देते, “यह दोस्ती हम नहीं छोड़ेंगे…!”
अब चिंकू-मिंकू को लगने लगा था, यह यात्रा बदरू और बाँका की वजह से ही उनके लिए कुछ खास साबित होने वाली है। इसलिए बड़े से बड़े पैसे वाले धन्ना सेठ हों या बड़ी-बड़ी हवेलियों वाले अकड़ू जमींदार और मुखिया, किसी से वे दबते नहीं थे। कहीं भी जाते, तो बात चलने पर बेसाख्ता उनके मुँह से निकलता, “भई, हमारे गधे ऐसे-वैसे नहीं, कुछ खास हैं…!”
“कुछ खास…? भई, ऐसी क्या खासियत है इनमें?” तमाम पैसे और हवेलियों वाले लोग हैरान होकर पूछते।
“यह तो समय आने पर ही पता चलेगा।” कहकर चिंकू-मिंकू मुसकरा देते। इसका और भी गहरा प्रभाव पड़ता और लोग सोचते, “क्यों न चिंकू-मिंकू कुछ दिन यहीं रुकें ताकि हम भी इनके दोस्त गधों का कोई करिश्मा देख लें…!”
वे अपनी अकड़ छोड़कर गुजारिश करते, “भई चिंकू-मिंकू, कुछ दिन तुम यहीं गुजारो ना। ताकि लोग देखें तो सही कि तुम्हारे गधे क्या-क्या कमाल करते हैं!”
यों चिंकू और मिंकू के रहने का बढ़िया इंतजाम हो जाता। साथ ही बदरू और बाँका को भी नई जगह नए-नए खेल दिखाने का मौका मिल जाता। दूर-दूर के गाँवों के लोग भी ठठ के ठठ चले आते कि भाई, जरा इन दोस्त गधों बदरू और बाँका की एक झलक ही देख लें। सुना है, ये तो सर्कस के शेर और हाथियों से भी ज्यादा कमाल दिखाते हैं।’
चलते-चलते आखिर चिंकू और मिंकू एक दिन गाँव गज्जूधामी में आ गए। रौनता पहाड़ से सटा हुआ खूब बड़ा-सा गाँव था गज्जूधामी। वहाँ हर ओर हरियाली थी, रौनक भी। गाँव के लोग भी अच्छे थे। चिंकू बोला, “मिंकू यार, थोड़े दिन यहाँ रुककर चलते हैं।”
मिंकू बोला, “ठीक है।”
गाँव के बाहर एक बड़ा-सा बरगद का पेड़ था। उसी के नीचे उन्होंने डेरा जमाया। पास ही तालाब था। आम, अमरूद और जामुन के पेड़ थे। उन्होंने जी भर फल खाए, तालाब का ठंडा, मीठा पानी पिया और तनिक आराम करने के लिए लेट गए। दोनों गधे भी आसपास चरने लगे।
गाँव गज्जूधामी में एक लालाजी थे। लाला गुलजारीलाल। बड़े अच्छे और भले। वे शाम के समय घूमने निकले तो देखा दो गधे उछल-कूद करते हुए अजीब-अजीब खेल दिखा रहे हैं। फिर बात ही बात में उन्होंने एकाएक डांस करना भी शुरू कर दिया। लालाजी हैरान! उन्होंने गधे तो बहुत देखे थे, पर ऐसे नाचने वाले गधे तो जिंदगी में पहली बार ही नजर आए। आसपास देखा तो चिंकू और मिंकू भी नजर आ गए जो अपने दोस्त गधों का कमाल देख-देखकर खुश हो रहे थे।
लालाजी पर तो जैसे जादू ही हो गया। उनके कदम वहाँ रुके तो रुके ही रह गए। उन्होंने इशारे से चिंकू और मिंकू को पास बुलाया। पूछा, “क्यों बच्चों, क्या ये तुम्हारे गधे हैं?”
चिंकू-मिंकू ने मुस्कराकर कहा, “हाँ, लाला जी! पर इन्होंने आपको तंग तो नहीं किया न!”
“न-न, बेटा, ऐसे प्यारे गधे हैं ये कि तंग तो क्या करेंगे? पर ये तो भाई, गधों जैसे गधे नहीं हैं, पूरे कलाकार हैं। ऐसे गधे तो मैंने कभी नहीं देखे।”
सुनकर चिंकू और मिंकू हँसने लगे। उन्होंने लालाजी को बताया कि कोई महीना भर पहले ही वे अपने प्यारे गधों बदरू और बाँका को दुनिया की सैर कराने के लिए घर से निकल आए हैं। ताकि उनके दोनों प्यारे दोस्त गधे भी रोज-रोज के कामों से थोड़ी मुक्ति और खुलापन महसूस करें।
बदरू और बाँका अपनी तारीफ सुनकर झट वहाँ आ गए और इतनी उत्सुकता से चिंकू-मिंकू व लालाजी की ओर देखने लगे, जैसे उनकी बातें समझ रहे हों।
लाला गुलजारीलाल से अब रहा न गया। उन्हें चिंकू-मिंकू और उनके गधे इतने भा गए कि बोले, “भाई, आगे तुम्हें जहाँ भी जाना हो, बाद में जाना। अभी तो कुछ दिन गज्जूधामी में ही गुजारो।”
बस, उसी दिन से लालाजी ने चिंकू-मिंकू और उनके दोस्त गधों को अपने घर में ही रख लिया। वहाँ चिंकू-मिंकू के साथ-साथ उनके प्यारे गधों की भी अच्छी खातिर होती। दोनों समय उनके लिए हरी घास का इंतजाम होता। चिंकू-मिकू की भी अच्छी खातिर हो रही थी।
बीच-बीच में लालाजी पूछ लेते, “हाँ, तो कहाँ से आए हो, भैया…? क्या नाम बताया गाँव का…पोशंगीपुर? पर तुम तो छोटे-छोटे से हो। अचानक घर छोड़कर क्यों निकल पड़े, भाई?”
इस पर चिंकू ने उन्हें सब कुछ बता दिया। बोला, “बस, दुनिया देखने की तमन्ना थी लालाजी, सो निकल पड़े। और देखा जाए तो घर कहाँ नहीं है? सारी दुनिया ही तो आदमी का घर है।… अब आप ही देखो, कल तक न आप हमें जानते थे और न हम आपको। पर आज ऐसा लग रहा है कि यह घर जितना आपका है, उतना ही हमारा भी…! दुनिया तो प्यार की भूखी है, लालाजी! क्यों मैं गलत कह रहा हूँ?”
चिंकू छोटा ही था, पर बात ऐसी कि लाला गुलजारीलाल के दिल को छू गई। बोले, “बेटा, तुम दोनों हो तो छोटे से, अभी बालक ही हो। पर दिल तुम्हारा बड़ा है और सच्चा भी है। इसलिए तुम्हारी बातें सुनकर बड़ा अच्छा लगता है। ऐसे ही तुम्हारे गधे हैं इतने शांत कि लगता है, पिछले जन्म में जरूर कोई साधु-महात्मा रहे होंगे!”
चिंकू-मिंकू दोनों हँसने लगे। बड़ी मीठी-मीठी हँसी। पास बैठे गधों बदरू और बाँका के चेहरे पर भी ऐसी मिठास थी, जैसे लालाजी की बात सुनकर अंदर ही अंदर हँस रहे हों।
मिंकू बोला, “लालाजी, हर कोई तो यह बात नहीं समझ सकता न! आपकी नजर औरों से अलग है तो आपको हममें कुछ अच्छाई नजर आ गई। नहीं तो बहुत से लोग तो ऐसे हैं कि उनके दरवाजे पर खड़े हों तो सोचेंगे, कहाँ से आ गए ये कंगाल?…कपड़े भी मैले और फटे-पुराने हैं। वे तो अपने नौकर से कहकर जल्दी से हमें दफा करवा देते!”
“हाँ, बात तो सच्ची कहते हो, भाई! जमाना आजकल ऐसा ही है। वैसे देखा जाए तो कपड़े और ऊपरी चमक-दमक की क्या बात है? कोई भी बाजार से चीजें खरीद ले। असली बात तो दिल की है और अच्छा दिल, सच्चा दिल कहीं से खरीदा नहीं जा सकता। वह तो आदमी भगवान के घर से ही लेकर आता है…!”
लालाजी को चिंकू-मिंकू से बातें करना अच्छा लगता था और चिंकू-मिंकू को भी लगता था, जरूर लाला गुलजारीलाल से उनका पिछले जन्म का कोई रिश्ता है। इसीलिए तो वे इतना प्यार देते हैं और उन पर जान छिड़कते हैं।
लाला जी ने चिंकू-मिंकू और उनके गधों के रहने की खूब अच्छी व्यवस्था कर दी थी। साथ ही चिंकू और मिंकू के लिए नए कपड़े भी बनवाए।
पर लाला गुलजारीलाल का एक नौकर था छकोरीलाल। वह चिंकू-मिंकू और उनके गधों से बुरी तरह चिढ़ता था। उसने लालाजी से कहा, “अजी लालाजी, कुछ खास नहीं हैं ये गधे। और ये चिंकू-मिंकू तो पूरे गप्पी हैं, खाली-पीली मुफ्त का खा-खाकर मोटे होते जा रहे हैं। लालाजी, आप तो ठगे गए।”
लालाजी ने हँसकर टाल दिया। पर बात चिंकू-मिंकू के गधों बदरू और बाँका को अखर गई। तब बदरू ने सोचा कि कुछ तो करके दिखाना चाहिए और जल्दी ही।
उसी शाम जब चिंकू-मिंकू लालाजी से बातें कर रहे थे, बदरू ने लालाजी के घर के सामने वाले खाली मैदान को अपनी कलाबाजी के लिए चुन लिया। उसने अचानक एक लंबी छलाँग ली और तेजी से दौड़ते हुए एक के बाद एक सात गोल-गोल चक्कर लगाए। उसके बाद ही उसका कमाल शुरू हो गया। उसने उसी घेरे के अंदर अपना सर्कस शुरू कर दिया। वह इस कदर ऊपर उछल-उछलकर जंप लगा रहा था कि लालाजी ही नहीं, चिंकू-मिंकू भी हैरान रह गए।
लालाजी बोले, “अरे भई, यह बदरू को क्या हुआ?”
पर तब तक चिंकू माजरा समझ गया था कि छकोरीलाल की बात बदरू को लग गई है और वह दिखा देना चाहता है कि वह और गधों से अलग है। उसमें कुछ न कुछ तो ऐसी खास बात है कि देखकर दुनिया हैरान रह जाए।
चिंकू हँसकर बोला, “लगता है लालाजी, आज इसने कुछ ज्यादा चारा खा लिया है। तो जरा खाना पचाने के लिए वर्जिश कर रहा है।”
“वर्जिश…? पर मैंने तो आज तक किसी गधे को वर्जिश करते नहीं देखा।” लालाजी हैरान-परेशान होकर बोले।
पर इतने में ही देखते-देखते वहाँ बहुत सारे लोग इकट्ठे हो गए। उनमें गाँव के बच्चे भी थे। बदरू का हाई जंप देख-देखकर उन्हें मजा आ रहा था और वे ही-ही-ही करके हँस रहे थे।
अब तो पूरे गाँव में हल्ला हो गया, “अरे देखो रे देखो, चिंकू-मिंकू के गधे सर्कस दिखा रहे हैं, सर्कस!”
देखते ही देखते पूरा गाँव वहाँ इकट्ठा हो गया। बूढ़े, जवान, औरतें, बच्चे…! लग रहा था, कोई बड़ा तमाशा हो रहा है और सचमुच बदरू जो खेल कर रहा था, वह आज तक किसी ने देखा नहीं था। बल्कि कोई सोच भी नहीं सकता था कि कोई गधा भी ऐसी-ऐसी कलाबाजी दिखा सकता है।
गाँव में आते-जाते लोग यह विचित्र नजारा देखकर अचकचा गए। आपस में कहने लगे, “देखो, भाई देखो, एक अजूबा!”
देखते ही देखते वहाँ अपार भीड़ लग गई।
बदरू कुछ थकने लगा तो बाँका ने मैदान सँभाला। उसने पहले हाई जंप का ऐसा कमाल दिखाया कि देखने वाले बोले, “वाकई, ये गधे हैं तो कुछ खास। वरना तुम्हीं बताओ, गधों को कहीं तुमने इस कदर ऊँचा कूदते देखा है?”
कुछ देर बाद दोनों दोस्त गधों ने हाई जंप और लांग जंप का कमाल दिखाया। ओलंपिक खेलों की तरह दोनों का अनोखा कंपिटीशन देख-देखकर लोगों को मजा आ रहा था। उनमें से कुछ बदरू को बढ़ावा दे रहे थे तो कुछ बाँका को। और तालियों पर तालियाँ पिट रही थीं।
अब तो गज्जूधामी गाँव में चिंकू और मिंकू ही नहीं, उनके दोनों दोस्त गधों का भी सिक्का जम गया। लोग छकोरी को लताड़ रहे थे, “देख रे छकोरी, तू कह रहा था कि इनमें कोई कमाल नहीं? तो तूने देखे हैं ऐसे सर्कस वाले कलाकार गधे..?”
बेचारा छकोरी मुँह चुराए इधर-उधर दुबका फिरता था और लालाजी के चेहरे पर ऐसी मीठी मुस्कान थी कि क्या कहें। मानो वे बिन कहे ही कह रहे हों, “भई, मैंने तो पहले दिन ही पहचान लिया था कि ये चिंकू-मिंकू और उनके दोस्त गधे कोई मामूली नहीं हैं। इनके अंदर बहुत कुछ छिपा हुआ है, बहुत कुछ। देखो, आज सामने आ गया न!”
सचमुच बदरू और बाँका ने अपने इस अनोखे प्रदर्शन से चिंकू और मिंकू का भी मान बढ़ा दिया था।
“भई वाह, भई वाह…!” देखने वाले कह रहे थे।
खुद चिंकू-मिंकू को नहीं पता था कि बदरू और बाँका ऐसी अद्भुत कलाएँ भी दिखा सकते हैं। यहाँ तक कि गधे बदरू और बाँका भी यह नहीं जानते थे। पर वे समझदार थे। समझ गए कि चिंकू-मिंकू की बात छोटी नहीं पड़नी चाहिए। और सच ही इस समय चिंकू-मिंकू की छाती गर्व से फूली हुई थी।
कुछ दिन बाद की बात है, चिंकू-मिंकू गहरी नींद में सोए हुए थे, तभी अचानक बदरू और बाँका ने जोर-जोर से उछलना-कूदना शुरू कर दिया। यह देखकर चिंकू-मिंकू भी जाग गए। उन्होंने देखा, बदरू और बाँका बार-बार लालाजी के आँगन की ओर इशारा कर रहे हैं। वहाँ से कुछ खटपट की आवाजें आ रही थीं।
हो न हो, ये चोरों का ही काम है। चिंकू-मिंकू समझ गए। पर आधी रात का समय था। घोर अँधेरा और साँय-साँय करता सन्नाटा। अगर वे लाला जी को पुकारेंगे तो भी आवाज वहाँ तक नहीं जाएगी। तो अब क्या किया जाए? दोनों नन्हें दोस्तों की समझ में नहीं आ रहा था।
तभी बदरू और बाँका ने जैसे अपना कर्तव्य तय कर लिया। उन्होंने जोर-जोर से उछलते हुए चीपों-चीपों का शोर मचाना शुरू कर दिया। ऐसी ऊँची पुकार कि जैसे आकाश को भेद डालेंगे।…चोरों की मंडली बदरू और बाँका की इस आकुल पुकार से बुरी तरह घबरा गई। उन्हें डर था कि कोई जाग न जाए। इसलिए जो भी गहने-लत्ते उनके हाथ लगे थे, उन्हें समेटकर वे बाहर भागे।
पर चोर चोरी करके दरवाजे से बाहर निकले ही थे कि बदरू ने एकाएक जोर की दुलत्ती मारकर, उनमें से एक चोर को गिरा दिया। बाँका ने बिजली की-सी तेजी से दूसरे चोर का पीछा किया तो वह सामने पड़े एक बड़े पत्थर से टकराकर गिरा और खूनमखून हो गया। बाँका समझ गया कि चोर की हालत बुरी है। वह एकदम फौजी जवान की तरह तनकर उसके पास खड़ा हो गया, ताकि वह भागने की कोशिश करे तो उसकी अच्छी तरह खबर ले सके।
इस बीच चिंकू और मिंकू ने जोर से दरवाजा खटखटाकर लालाजी को आवाज लगाई। उधर बदरू और बाँका भी लगातार चीपों-चीपों का शोर मचा रहे थे।
चिंकू-मिंकू और उनके दोस्त गधों की आवाजें सुनकर लालाजी जागे तो उन्हें माजरा समझ में आया और यह भी कि बदरू और बाँका ने चोरों को पकड़वाने में कैसी बहादुरी दिखाई है।
आखिर दोनों चोर पकड़े गए और हवालात में बंद हो गए। इस पर गाँव के लोग तो हैरान थे ही, पुलिस के सिपाही भी बदरू और बाँका की तारीफ करते थक नहीं रहे थे।
गज्जूधामी और आसपास के गाँवों के लोग आपस में चर्चा कर रहे थे, “हमने तो ऐसे कमाल के गधे नहीं देखे, भाई।”
“हाँ भई, हाँ। ये तो सचमुच अनोखे हैं…!”
चिंकू-मिंकू को अपने प्यारे गधों की तारीफ सुनना बहुत अच्छा लग रहा था।
गज्जूधामी गाँव में वसंतपंचमी पर बड़ा भारी मेला लगता था। दूर-दूर से लोग उसे देखने आते थे। एक दिन लालाजी ने चिंकू और मिंकू से कहा, “इस मेले में बदरू और बाँका भी अपने कमाल दिखाएँ तो कैसा रहेगा?”
चिंकू और मिंकू बोले, “ठीक है, लालाजी। बदरू और बाँका भी जरा उछल-कूद लेंगे तो उनकी अच्छी वर्जिश हो जाएगी।”
और सचमुच वसंत मेले में इस बार हर किसी के होंठों पर बस बदरू और बाँका का ही नाम था। लोग कहते, “बड़ा नाम सुना है भाई, इन दोस्त गधों का। आज उनका कमाल देखेंगे।”
वसंत मेले में कई कलाकारों ने अपने कमाल दिखाए। वहाँ सिनेमा और नौटंकी के कार्यक्रम थे तो कुश्ती के भी। पर लोग तो सबसे ज्यादा बदरू और बाँका को ही देखने आए थे। शाम के समय जब बदरू और बाँका के प्रदर्शन की बारी आई तो हजारों दर्शक वहाँ मौजूद थे। सबकी आँखें इन दो कलाकार गधों पर ही टिकी थीं। चिंकू और मिंकू भी उत्सुक थे कि देखें तो उनके दोस्त गधे आज क्या कमाल दिखाते हैं। शायद बदरू और बाँका भी समझ गए थे कि आज उनकी परीक्षा का दिन है। इसलिए वे भी पूरे जोश में थे।
दोनों दोस्त गधों ने पहले लंबी दौड़ का कमाल दिखाया। दौड़ते हुए वे टेढ़े-बाँके होकर ऐसी-ऐसी विचित्र छलाँगें भरते कि देखने वाले दाँतों तले उँगली दबा लेते। लोग कहते, “यह तो चीते जैसी छलाँग है। गधे जैसी तो नहीं।”
कोई-कोई कहता, “लगता है, ये दोनों गधे पिछले जन्म में चीते रहे होंगे।”
“हाँ, भई हाँ!” सुनने वाले अचरज से भरकर कहते।
यह अजूबा देखने वाली अपार जनता ने तालियाँ बजाकर अपना जोश दिखाया।
इसके बाद बदरू और बाँका के बाकी खेल भी हुए। उन्होंने गोल घेरे में गोल-गोल घूमते और कुदक्कड़ी करते अपना मनमोहक नाच दिखाया तो सारे दर्शक झूम उठे। अंत में उन्होंने सिर झुकाकर जनता का अभिवादन किया। फिर लाला गुलजारीलाल के आगे विनम्र भाव से सिर झुकाए खड़े हो गए। जैसे कह रहे हों, “लालाजी, हमने आज ठीक-ठीक करतब दिखाया है न?”
लालाजी को बदरू और बाँका पर इतना लाड़ आया कि उन्होंने दोनों को छाती से लगाकर प्यार किया और फूलों की माला पहनाई। फिर उन्होंने चिंकू और मिंकू को भी हार पहनाकर स्वागत किया, जिन्होंने बदरू और बाँका को बिलकुल दोस्त जैसा प्यार दिया था।
सब ओर तालियों की ऐसी गड़गड़ाहट हो रही थी कि चिंकू-मिंकू फूले नहीं समाए। उन्हें लगा, सचमुच किसी ने उन्हें समझा है और दिल से आदर दिया है।
उस इलाके के बड़े सेठ मेहताब राय भी बदरू और बाँका के अनोखे करतब देखने आए थे। लोग उन्हें राजा साहब कहकर बुलाते थे। चिंकू-मिंकू के दोस्त गधों के कमाल देखकर वे भी बहुत खुश हुए।
उन्होंने चिंकू-मिंकू को बुलाकर पूरे दस हजार रुपए इनाम में दिए। कहा, “हमारी ओर से दोनों दोस्त गधों को यह इनाम…!”
चिंकू-मिंकू ने हाथ जोड़कर आभार प्रकट किया तो दोनों दोस्त गधों ने भी जोर-जोर से गरदन हिलाकर अपनी खुशी प्रकट की। यह देख राजा साहब भी हँस पड़े।
राजा साहब के एक पुराने दोस्त पुन्नी साहब भी गधों की यह लीला देखने आए थे। देखकर अवाक थे। उन्होंने गधों का ऐसा कमाल न पहले कभी देखा था, न सुना था। पुन्नी साहब ने सोचा, “ये गधे तो तीन लोक से न्यारे हैं। काश, ये मेरे पास हों, तो मेरी शान कितनी बढ़ जाएगी!”
उन्होंने राजा साहब से कहा, “ये गधे तो मुझे हर हाल में चाहिए। मैं इनके मुँह माँगे दाम देने को तैयार हूँ।”
राजा साहब को बात कुछ पसंद नहीं आई, पर दोस्त का दिल भी वे नहीं दुखाना चाहते थे। बोले, “इस बारे में आप खुद बात करके देख लीजिए। चिंकू-मिंकू मान जाते हैं तो ठीक, वरना ज़बरदस्ती आप करें, यह मैं पसंद नहीं करूँगा।”
अगले दिन पुन्नी साहब ने चिंकू-मिंकू को लाल पत्थरों की अपनी आलीशान हवेली में बुलाया। बड़ी खातिरदारी की। फिर कहा, “भाई, तुम्हारे गधे हमें भा गए हैं। तुमने इन्हें खूब सिखाया है।…बहुत खूब! हम पूरे पचास हजार रुपए देते हैं, तुम हमें ये दोनों गधे दे दो। तुम तो काबिल हो। चाहोगे तो ऐसा कमाल दिखाने वाले दो-चार और गधे तैयार कर लोगे।”
सुनकर चिंकू-मिंकू का तो दिमाग ही चकरा गया। बड़ी देर तक तो उन्हें यही समझ में नहीं आया कि पुन्नी साहब कह क्या रहे हैं और उन्हें क्या जवाब दिया जाए?
चिंकू को ज्यादा गुस्सा आ रहा था। उसने साफ शब्दों में कहा, “आप मालिक हैं, जो चाहे ले लें। आप जान माँगें तो दे सकते हैं, पर अपने दोस्त गधे नहीं।”
और मिंकू बड़े ठंडे लहजे में बोला, “पुन्नी साहब, आप इन गधों को लेना चाहते हैं तो बस एक ही तरीका है। आपके गाँव के पास एक नदी बहती है, जिसकी धार, सुना है बड़ी तेज है। आप रात को हमें नदी में फिंकवा दीजिए और फिर इन गधों को भी ले लीजिए। वरना अपने जिंदा रहते तो हम आपको इन्हें हाथ भी नहीं लगाने देंगे…!”
सुनकर पुन्नी साहब सिहर गए। पहले तो उन्हें कुछ बुरा लगा, पर फिर खुद ही उन्हें शर्म आई। उन्होंने फौरन ढेर सारे नोट निकालकर कहा, “ये लो, पूरे दस हजार रुपए। तुम्हारा इनाम…! मैं तो तुम्हारी परीक्षा ले रहा था।”
चिंकू-मिंकू ने पुन्नी साहब के दिए दस हजार रुपए भी उसी थैले में रख लिए, जिसमें राजा साहब के दिए नोट रखे थे। उस थैले को जतन से उन्होंने एक छोटी-सी संदूकची में रखा और आगे बढ़ गए।
सोच रहे थे, यहाँ तो सबने बड़ी खातिर की। बड़ा मान-सम्मान भी मिला। पता नहीं, अब आगे कैसे-कैसे लोग मिलेंगे और क्या-क्या देखना पड़ेगा।
पर अब तो सबको पता चल गया कि चिंकू-मिंकू के पास पूरे बीस हजार रुपए और कमाल के गधे हैं तो ठग पीछे लग गए। वे उन्हें तरह-तरह के प्रलोभन दे रहे थे, “हम तुम्हारे लिए एक घर बनवा देंगे, जिसके सामने तुम्हारे दोनों गधों के लिए हरा-भरा मैदान भी होगा। तुम्हारी और तुम्हारे दोस्त गधों की जिंदगी मजे में कटेगी। ऐसा घर तो एक लाख में भी नहीं मिलता। पर हम तुम्हें बीस हजार में ही दिला देंगे। तुम भी क्या याद करोगे?…जिंदगी बन जाएगी। फिर मजे में खाना-पीना, मौज उड़ाना।”
सुनकर चिंकू-मिंकू दोनों के कान खड़े हो गए। दोनों दोस्त गधे भी कम होशियार न थे। उन्होंने अपनी विचित्र उछल-कूद से उन ठगों को खूब छकाया। चलते-चलते कभी बदरू उन्हें जोर की दुलत्ती मार देता तो कभी बाँका ऐसी चोट करता कि वे तिलमिला जाते। बदरू ज्यादा मस्ताना था। सो एक-दो ठगों को तो उसने जमीन पर गिराया और पटका भी। बीच-बीच में ठग-मंडली की ओर निशाना बाँधकर वह ऐसी कुदक्कड़ियाँ मारता कि ठगों के हौसले पस्त हो गए। खेल-खेल में ऐसी तीखी चोट और दुलत्तियाँ उन्होंने जिंदगी में पहली बार खाई थीं। कहीं हँसी न उड़े, सोचकर वे धीरे से कराहते, मगर चोटें सचमुच गहरी थीं। सो बार-बार बिलबिला उठते।
आखिर ठग मंडली समझ गई कि चिंकू-मिंकू ही नहीं, उनके गधे भी वाकई समझदार हैं। यहाँ दाल नहीं गलने की। सो राम-राम करके किसी और राह पर ही चले गए।
चिंकू-मिंकू ने चैन की साँस ली। बदरू और बाँका भी जगह-जगह मस्ती से हरी घास चरते और आसपास की जगहों को बड़े कौतुक से देखते हुए आगे बढ़ते जा रहे थे। कहीं नदी, कहीं जंगल और पहाड़, कहीं हरे-भरे खेतों का विस्तार। सोच रहे थे, यात्रा में मुश्किलें तो आईं, पर फिर भी यह यात्रा कम रोमांचक न थी। जिंदगी भी तो ऐसी ही है। कभी सुख, कभी दुख। पग-पग पर मुश्किलें। पर इसी का तो मजा है। इसी से जिंदगी जीने में इतना रोमांच है। उधर चिंकू-मिंकू सोच रहे थे, घर जाकर इन पैसों से कोई ढंग का काम करेंगे और ऐसा इंतजाम करेंगे कि बदरू और बाँका की जिंदगी भी थोड़ी आसान हो जाए। उनके रहने के लिए एक-एक अच्छी-सी कुठरिया भी बनवानी होगी, ताकि सर्दी, गरमी, बारिश की आफत से वे बचे रहें।
अभी चिंकू और मिंकू यह सोच ही रहे थे कि तभी उनके सुख-सपनों को चूर-चूर करती एक कड़क आवाज सुनाई दी, “अरे छोकरो, रुक जाओ अपनी जगह, वरना…!”
चिंकू-मिंकू घबराए, अब यह कौन-सी नई बला आ गई? वे अपनी जगह खड़े हो गए। देखा, तीन लंबे-चौड़े मुच्छड़ लोग उनकी ओर बढ़ते आ रहे हैं। तीनों के हाथ में मोटे-मोटे लट्ठ।
“सुनो छोकरो, यहाँ हमारी सरकार है। हम हैं गुंडा सरदार बुल्ली बाबू के लोग। जो कुछ तुम्हारे पास है, हमारे हवाले करो, वरना…!”
तीन गुंडे और तीनों बड़े-बड़े लमढींग। देखकर चिंकू-मिंकू थोड़ा अचकचाए। समझ नहीं पा रहे थे, इस बला से कैसे निबटें?
इतने में तीनों गुंडों ने आगे बढ़कर चिंकू-मिंकू की पैसों वाली संदूकची और उनके करिश्माई गधों को भी छीनना चाहा। अब तो बदरू और बाँका, दोनों हो गए आगबबूला। उनकी आँखों से जैसे चिनगारियाँ निकल रही थीं। दोनों बिजली की सी तेजी से उछले और दुलत्तियाँ मार-मारकर उन बदमाशों की हालत खराब कर दी। तीनों बदमाशों की हालत खराब हो गई। बदरू और बाँका ने पैरों से बुरी तरह मार-मारकर उनकी मट्टी पलीद कर दी। इतने में मदद के लिए उनका एक और साथी आया तो वह भी बुरी तरह पिटा। बेचारों ने ऐसे गधे पहली बार देखे थे और ऐसी मार तो यकीनन पहली बार खाई थी। बस, वे सिर पर पैर रखकर ऐसे भागे, जैसे दिन में ही भूत देख लिया हो।
चिंकू-मिंकू ने उनकी हालत देखी तो गर्व से अपने वीर और रणबाँकुरे गधों की पीठ थपथपाई। बदरू और बाँका ने विजय गर्व से चीपों-चीपों का शोर मचाकर आकाश और दिशाओं को भी गुंजायमान कर दिया।
सचमुच चिंकू-मिंकू की यात्रा का यह सबसे रोमांचक पल था। पर इसी के साथ ही उन्हें घर की भी याद आई।
चिंकू बोला, “भाई मिंकू, खूब बचे भई, खूब बचे। हमारे दोस्त गधों ने वाकई कमाल कर दिया। पर भाई मेरे, अब घर लौटना चाहिए।”
मिंकू बोला, “हाँ-हाँ, चलो।”
पर वापसी की यात्रा भी इतनी आसान कहाँ थी? चलते-चलते भी उन्हें पूरे तीन दिन लग गए। तब अपना गाँव पोशंगीपुर दिखाई दिया।
देखते ही वे उवावले होकर अपने-अपने घर की ओर दौड़े। पर बीच में ही गाँव वालों ने लपक लिया। गाँव के पुराने तालाब के पास खासी भीड़ जमा हो गई। वहीं अम्माँ, बापू और उनके घर के और लोग भी आ गए। बड़े-बूढ़े उन्हें छाती से चिपकाकर प्यार कर रहे थे। साथ ही जानना चाहते थे कि वे कहाँ-कहाँ गए और उनके साथ क्या बीती?
चिंकू-मिंकू घर लौटे तो डरे हुए थे कि पता नहीं कितनी डाँट-फटकार मिलेगी। पर उनकी अनोखी कला और बहादुरी की कहानियाँ गाँव में भी पहुँच चुकी थीं। सभी उन्हें देखकर खूब खुशी से चहक रहे थे और उनसे तरह-तरह के सवाल पूछ रहे थे।
उस दिन के बाद से गाँव में गधों को भी इज्जत मिलने लगी। लोग कहते, “ये गधे देखने में भले ही सीधे लगते हों, पर होशियारी में तो किसी से कम नहीं। और फिर ये किसी को नुकसान भी नहीं पहुँचाते और अपने आप में मगन रहते हैं। यह तो बढ़िया बात ही हुई न!”
गधों को भी अब गाँव में रहना अच्छा लग रहा था। चिंकू-मिंकू के घर वाले भी अब उनका खासा ख़्याल रखते थे। चिंकू-मिंकू के पास जो पैसे थे, उससे दोनों दोस्त गधों के लिए अलग-अलग कुठरिया भी बनी। जहाँ वे बड़ी मौज में रहते।
हाँ, साल में एक बार दोनों दोस्त गधे चिंकू-मिंकू के साथ घूमने जरूर जाते और तब ऐसे-ऐसे कमाल दिखाते कि देखने वाले लोग ताज्जुब में पड़ जाते। चिंकू-मिंकू ने सोचा है कि वे इस बारे में अखबार में लेख लिखेंगे, ताकि दूसरे लोग भी ऐसे नायाब गधों के बारे में जान सकें।
आपको कभी इस बारे में चिंकू-मिंकू का लेख पढ़ने को मिले तो मुझे बताना न भूलना।
भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’
