छलावा-गृहलक्ष्मी की कहानियां
Chalava

Hindi Kahani: शेखर अपनी पत्नी दिव्या को बिलकुल पसंद नहीं करता था,वजह थी इसकी उसका गेहुआं रंग और सीधा स्वभाव।वो दिलोजान से कोशिश करती उसे खुश करने की,स्वादिष्ट खाना बनाती,उसकी हर बात आज्ञा मानकर स्वीकार करती,कभी कोई विरोध न करती पर शेखर को लगता कि वो इस लायक ही नहीं कि उसे इज्जत दी जाए, वो उसे समय, असमय जलील करता रहता।
एक दिन शेखर के बहुत सारे दोस्त बिन बताए उसके घर आ गए, सबकी चाय नाश्ते का इंतजाम दिव्या ने बखूबी कर दिया, कितनी तरह के कटलेट्स, स्वीट्स, चाय कॉफी उसने सबको खिलाई, पिलाई।
“भाभी तो बहुत बढ़िया कुक हैं,उनसे मिलवा भी तो”!, दोस्तों के जोर देने पर शेखर को दिव्या को बुलाना पड़ा, उसे शर्म आ रही थी अपनी बदसूरत पत्नी (जैसा वो अपने मन में समझता था),को सब से मिलवाने में।
पर उन सबने दिव्या की बहुत तारीफ की।यहां तक की कई लेडीज भी दिव्या से कुछ रेसिपीज पूछने लगी।
शेखर को पहली बार लगा कि दिव्या इतनी भी बुरी नहीं है जितनी वो सोचता था।आज तक वो सिर्फ गोरे रंग को ही सुंदरता समझता आ रहा था।उसका आकर्षण उन लेडिज के लिए था जो सज धज कर गुडिया बनी घूमती थीं और नौकरों के सहारे घर बार चलाती।
पर उसकी पत्नी कितनी लगन से घर के काम समेटती, साथ ही उसकी किसी बात पर रिएक्ट भी नहीं करती।ऐसी दिल की खूबसूरती तो आज कल मिलनी नामुमकिन थी।वो भी किस छलावे में जी रहा था। उसे बहुत शर्म आई,”सोने का तिरस्कार कर मैं कंकड़ पत्थर बटोरने में लगा था।”
शेखर का आकर्षण आज पहली बार अपनी पत्नी दिव्या के लिए हुआ।

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