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भीतरी औरत-21 श्रेष्ठ नारीमन की कहानियां पंजाब: Nariman ki kahaniyan
Bhitari Aurat

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

Nariman ki Kahaniyan: यह क्या हो गया मुझे? मैं गुरु महाराज द्वारा बख्शिश किए अमृत को भंग कर बैठी। जिस धर्म को मैं इतने सब्र और मन मार कर निभा रही थी. अचानक टूट गया। मेरे सारे किए धरे पर पानी फिर गया। चौके में खड़े ही दिल डूबने लगा। सिर घूमने लगा। टांगों में जान बाकी न रही। फिर भी मैं संभल कर अंदर कमरे में बेबे जी के पुराने निवाड़ी पलंग पर जा गिरी।

मुझे अपना माथा तप रहा महसूस हआ। सर्द मौसम में भी इतनी तपिश? सफेद कपड़ों से इतनी गर्मी कैसे निकल सकती है? उफ! यह कैसी आग थी, जो सीने में सुलगने लगी थी? सांस धौंकनी समान चलने लगी।

बाहर मोटर साइकिल स्टार्ट होने की आवाज आई, फिर वह आवाज ड्योढ़ी से बाहर होती हवा के साथ गुम होती गई। बेबे जी ढीले कदमों से भीतर आए और अंगीठी पर रखी गुरु नानक की तस्वीर के आगे हाथ जोड़ कर, आंखें मूंद कर बुदबुदाने लगे, “हे सच्चे पातशाह! रक्षा करना। हम तो पहले से ही टूटे हैं, इस पापिन से हुए अनर्थ को माफ कर देना। पास में पड़ी अपने पुत्र की तस्वीर के आगे खड़े हो कर रोने लगे, “तुम्हें कहां से ढूंढ कर लाऊं मेरे शेर पुत्र। मेरा आंगन सूना हो गया तेरे बिना।”

फिर वह सहजता से पंलग की बाही पर बैठ कर मेरा माथा सहलाने लगे। मेरी आंखें बह निकलीं। घिघिराती आवाज में मैंने कहा, “पता नहीं ऐसा क्यों हुआ मुझसे बेबेजी, पता नहीं क्यों?” बेबेजी मेरा सिर सहलाते रहे और नीर बहाते रहे। मेरी हालत कुछ संभल गई, मैं उठ कर बाहर आ गई। चनाब चूल्हे की राख संग खेल रही थी। बेबेजी ने कहा, “अरे बेटी, रोको उसे, राख के तले अंगार होते है।” मैंने तुरन्त चनाब को उठाया। नल के पास ले जाकर उसका मुंह-हाथ साफ किया। बापूजी कहीं बाहर निकल गए थे।

बेबे जी पीढ़े पर बैठ कर दाल चुनने लगी। चनाब चूजों के पीछे भागने लगी। मैं बेबेजी के पास ही बिस्तर पर जा बैठी, फिर लेट गई। अभी कुछ देर पहले यहां सोहन बैठा था। सोहन के आते ही मेरी धड़कन तेज हो गई। उसे देखते ही क्यों मेरा मन का संयम मेरा साथ छोडने लगता है। उससे बात करते हुए लगता, मानो कहीं दूर से आवाज आ रही हो। उसके जाते ही, मेरी सांस रुकने-सी लगती। बेबेजी फिक्र करतीं, कोई रोग, इसे भीतर ही भीतर घुन की तरह खा रहा है। पड़ोसन से बात करने पर उसने कहा, “लगता है, कोई बाहरी हवा लग गई है। आप किसी ओझा से पूछे।”

बेबेजी ने बापूजी से बात की। स्वभाव अनुसार, उन्होंने सिर हिलाया, जिसका अर्थ न या हां कुछ भी हो सकता था। चेहरे पर चुप्पी साधे वह बाहर खेतों की ओर निकल गए।

पिछले कुछ अर्से से मेरी हालत अजीब होती जा रही थी। तवे पर रोटी जलने लगती। बछेरा सारा दूध पी जाता और मैं कहीं और नजर टिकाए देखती रहती। कोई भी चीज कहीं रख कर भूल जाती। पाठ करते हुए मेरा ध्यान बार-बार टूटने लगता। मेरी ऐसी हालत देख कर बेबे जी का चेहरा उतरने लगा। वह आहे भरती और पुत्र की तस्वीर पल्लु से साफ करते हुए रोने लगती।

मेरा हाल-चाल मालूम करने के लिए भैया-भाभी आए। भैया ने बहुत प्यार से मेरा सिर सीने से लगा कर मुझसे जानना चाहा। लेकिन क्या कहूं, मुझे कुछ समझ में नहीं आया।

“तुम्हारी तबियत तो ठीक है न?” भाभी ने पूछा।

“हां, मैं एकदम ठीक हूं भाभी।” मैंने मुस्कुराने की कोशिश की।

“अपनी खातिर न सही, चनाब की खातिर खुश रहा करो।” भाभी ने चनाब का सिर सहलाते हुए कहा। मैंने हामी भर दी।

“मांजी से मिलने को दिल करता है तो हमारे साथ चली चलो।” भैया ने कहा तो बेबेजी ने तुरन्त कहा, “यदि मन है तो हो आऊं।”

“आपको किसके आसरे छोड़ कर जाऊं? सौ काम हैं करने वाले। दिन खुल जाएंगे तो चली जाऊंगी एकाध दिन के लिए।” मैंने कहा और चौके जा बैठी।

“ठीक तो है।” भैया ने कहा।

“मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा बेटा।” बेबेजी ने कहा।

“पाठ तो करती है न?” भाभी ने पूछा।

“बिना नागा किए ‘पांच बाणियों’ का पाठ करती है। सुबह-शाम गुरुद्वारे भी जाती है। गुरुघर से बहुत प्रेम है इसे। बस यही…।”

गुरुघर में अटूट श्रद्धा थी। पिछली गर्मियों में बंधनी कलां वाले संतजी का कीर्तन चार दिन तक चला। मैं और बेबे रोज जाती। गांव से अन्य लोग भी जाते रहे। संतजी के प्रवचन लोग एकाग्रचित होकर सुनते। मैं भी मंत्रमुग्ध-सी सुनती रहती। उन्होंने शरीर की नाश्मानता के बारे में आत्मा की सर्वव्यापकता के बारे में ज्ञान-भरपूर उपदेश दिया। जीवन और मृत्यु के भ्रम को समझाया। इन बातों में पहले भी मेरी दिलचस्पी रही थी। अब मुझे यह दुनिया झूठी नजर आने लगी। रिश्ते-नाते, साग-संबंधी फीके लगने लगे। अब अपने प्यारे चन्न के असमय चले जाने का दर्द भी कम होने लगा।

आखिरी दिन संतजी ने अत्यन्त वैराग्यमय कीर्तन किया। फिर अमृत संचार हुआ। मैं खुद उठ कर संतजी के चरणों में सिर निवा कर अमृत की दात देने की बिनती की। अमृत छकाने के बाद उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखकर कहा, “अपने जीवनसाथी को भी गुरु से जोड़ना।” यह सुनते ही बेबेजी परल-परल रोने लगी। “जी, वो तो महाराज….।”

क्षण भर के लिए संतजी के चेहरे पर अफसोस उभर आया। फिर गुरुबाणी का उच्चारण कर उन्होंने कहा, “यह दुनिया मुसाफिर खाना है। सभी ने यहां से जाना है। सिमरन करो…केवल ‘नाम ही तेरे संग सहाई…’

रात को ट्रैक्टर पर गांव लौटते हुए लोग-बाग संतजी की प्रतिभा का गुणगान करते रहे। मैं चनाब को गोदी में लिए चुपचाप बैठी रही। मेरा मन हल्का हो रहा था। चांदनी रात थी। किसी के सामने नहीं परन्तु अकेले में मैं उसे ‘चन्न’ कह कर पुकारती थी। वह मुझे बाहों में भरकर चूमते हुए रावी कहता। रविन्द्र से उसने मुझे रावी बना दिया। कहता, “तुम में डूब कर मर जाऊं।”

मैं उसके मुंह पर हाथ रख देती, “नहीं चन्न, ऐसे कुबोल मत बोला करो।”

फिर वह होने वाले बच्चे का जिक्र छेड़ता। पेट को सहलाते हुए कहता, “बेटी हुई तो नाम चनाब रखेंगे, बेटा हुआ तो ब्यास।”

“लेकिन चन्न, नाम में क्या रखा है?” उसकी बातों में खोते हुए मैं कहती।

“सारी महिमा ही नाम की है। तुम मुझे चन्न की बजाए बैल या बछड़ा कह कर देखो। सयाने कहते हैं, ऐसा काम करो, मौत के बाद भी नाम चमके।”

“फिर मरने की बात” मैं टोकती।

हर पांचवे-छठे दिन मौत का जिक्र आ ही जाता। सोहन बताता, “बहुत अच्छा गाता था। जब भी गाता, शिव का ‘जोबन रुते मरना’ ही गाता। कॉलेज में इसके गाने की बड़ी चर्चा रहती।

आखिर वह दिन भी आ गया। सारा दिन चन्न घर था। शाम को यह कह कर निकला कि कादियां से आढतिए से पैसे ले आऊं। झोना के लिए दवा लेनी है और स्कूटर में पेट्रोल डलवाना है। बस तुम तैयार रहना, आते ही बटाला सर्कस देखने जाएंगे।

मैं तैयार होकर इंतजार कर रही थी। वह गेट पर आकर तीन सीटी बजाएगा। बाहर स्कूटर रुकने की आवाज आई परन्तु सीटी बजने की नहीं। एक अजनबी आदमी ने आकर बताया, “ट्रक से टक्कर हो गई स्कूटर की। मील पत्थर से चरनजीत का सिर फूट गया। वह हिला तक नहीं, गांव के आदमियों ने बापूजी को घेर लिया। सभी पोस्टमार्टम की बात करने लगे। रिटायर थानेदार बराड़ कहने लगा, “हम पोस्टमार्टम नहीं होने देंगे। मैं खुद जाकर डी.एस.पी. से मिलूंगा।”

सभी ने सहमति प्रकट की।

मेरा जी चाहा, गर्भ में पल रहे बच्चे को मुक्के मार कर मार दूं। उसी समय थानेदार की बहु मेरे पास आकर मेरा मेकअप साफ करने लगी। मुझे समझ में नहीं आ रहा था। आंखें लगातार बहने लगी थीं।

अगले दिन चन्न को चिता पर रख दिया गया। बापूजी द्वारा अग्नि देते ही मैंने आसमान को चीर देने वाली चीख मारी। सारा गांव त्राहि-त्राहि कर उठा। मेरे बाल खुले हुए थे। भैया ने मुझे संभाल रखा था। दोनों के बापू एक-दूसरे को ढांढस बंधा रहे थे।

अचानक मेरे पेट में असहनीय दर्द उठा। जब मुझे होश आया, मैं अंदर के कमरे में थी। बराड़ की बहु ने मेरा ध्यान छोटी-सी बच्ची की ओर दिलाया। मैंने उठने की कोशिश की परन्तु शरीर ने साथ नहीं दिया।

दसवें दिन भोग के बाद कुछ-कुछ चलने लगी। लोगों का आना-जाना अभी बना हुआ था। चन्न के दोस्त-मित्र सभी आते। सोहन कई दिनों तक अपने घर ना गया। उसने छोटे-मोटे से लेकर हर बड़े उत्तरदायित्व को आगे बढ़ कर निभाया।

दो महीने बाद मेरा भाई और बापू आए। उनसे गले मिलते ही मैं रोने लगी। दोनों बुजुर्ग इस अनहोनी के बारे में बातें करते रहे। आखिर मेरे बापू ने कहा, “अगर किस्मत में सुख होता तो यह हादसा न घटता। यह इसके भाग्य की बात है। अब यह यहां रह कर क्या करेगी? अगर आप कहें तो हम इसे अपने साथ ले जाएं। बाकी आप जैसा मुनासिब समझें।”

“बापूजी ने दृढ़ता से कहा, “मिलने-मिलाने के लिए ले जाना चाहते हैं तो आप लाख बार ले जाएं सरदार जी। लेकिन मेरी हाथ बांध कर विनती है, अगर हमारा पुत्र नहीं रहा तो इस बेटी को हम से जुदा न करें। मेरे लिए बेटियों से बढ कर है। हमारे पास इसके अलावा और कौन है? हम बूढों का एक यही तो सहारा है।”

नजरें झुकाए बैठे भैया ने कहा, “लेकिन मौसाजी, यह पहाड़ जैसी उम्र कैसे कटे? मतलब।” फिर गला साफ करके कहा, “सिर्फ तेईस साल की उम्र है। इतना लंबा रास्ता।”

“मैं तुम्हारी बात समझ रहा हूं पुत्र। बापूजी ने कहा, “मैंने बेटी कहा है, बहू नहीं। ऐसी कोई स्थिति आई तो मैं अपने हाथों से इसे बेटी बनाकर विदा करूंगा। इस समय यह मेरे घर की इज्जत है, मेरी पगड़ी की इज्जत है। आप आते-जाते रहें। यह भी आती-जाती रहेगी। परन्तु घर अब इसका यही है।”

बापूजी ने पगड़ी के लड़ से आंसू पोंछे।

जिस आंगन में मेरा चन्न घूमता-फिरता था, उसे छोड़ने का मेरा भी मन नहीं था। यदि भाग्य में सुख होता तो यहीं मिल जाता। उम्र का क्या है, चन्न संग बिताए दो वर्षों को याद करते हुए गुजर जाएगी। अब मेरा यही धर्म है, मैं इस घर की इज्जत को निभाऊं। चन्न की निशानी को सीने से लगा कर दिन काट लूंगी।

दूसरे-चौथे दिन सोहन आ जाता। चन्न का सबसे गहरा दोस्त, भाइयों से भी बढ़ कर। बेबेजी और बापूजी उसे पूरा मानते। मुझे बहनजी कह कर पुकारता। मैं उसे ‘भा जी’ कहती। वह हमेशा मुझे टोकता, चरनजीत बड़ा था मुझसे पूरे छः दिन। आप मुझे नाम से पुकारा करें। लेकिन मेरी हिम्मत न होती। वह कई तरह की बातें करता। वह जाने के लिए कहता, मैं उसे कुछ देर और रुकने के लिए कहती। वह चनाब को कंधे से लगा कर आंगन में चक्कर लगाने लगता। लगता, जैसे चन्न ही घूम रहा हो।

सोहन आते ही बेबेजी और बापूजी के चरण छूता। बेबेजी उसे गले से लगा लेते। बापूजी उसकी पीठ थपथपाने लगते, “तेरे बगैर और कौन है हमारा पुत्र? शाबाश है तुझे।”

चन्न की बातें छिड़ने पर माहौल गमगीन हो जाता तो सोहन उठ कर पट्टे कुतरने लगता। कमीज उतार कर भैंस को नहलाने लगता। पिछवाड़े बनी क्यारी में पानी के छींटें दे देता। रसोई से गिलास ले, खुद फ्रिज से पानी ले लेता। बेबेजी कहती, मैं देती हूं तो कहता, “चरनजीत, भी हमारे घर पर आकर हुक्म नहीं चलाता था। खुद ही पानी ले लेता था।” आंखें पोंछता और आह भर कर चल देता।

मेरे द्वारा अमृत छक लेने पर उसने टिप्पणी की, “यदि धर्म के तंग दायरे में कैद होना है तो इसका कोई फायदा नहीं। धर्म का सिद्धांत आदमी को हर दिशा में फैल जाने की जांच सिखाता है। ये रहतनामे, बंधन, रुकावटें, परहेज, मैं इनके पक्ष में नहीं हूं।

मुझे मालम नहीं था कि मैं इनके पक्ष में थी या नहीं लेकिन मैं संतजी के बताए रास्ते का पालन कर रही थी। सिमरन करने में मेरी सुरति जुड़ने लगी थी। सुबह-शाम पाठ करना, गुरुद्वारे जाना, चूल्हा-चौका संभालना, घर के छोटे-मोटे कामों के साथ चनाब को संभालना। दिन व्यवस्तता में बीत जाता परन्तु रात का सूनापन काटे न कटता। पता नहीं कब मेरे ख्यालों में सोहन आने लगा। स्थिर रात में मुझे उसका स्वर सुनाई देता। आंखें बंद करती तो सामने वो दिखाई देता। सोते हुए चनाब का हाथ-पैर मुझे लग जाता तो मैं एकदम चौंक कर उठ जाती। उसके बाद सोहन के बारे में सोचते हुए मेरी आंख न लगती। शरीर तपने लगता। जी चाहता, सोहन मेरे तपते शरीर को आकर छ ले। मेरे शरीर को होंठों से सहला दे।

सूनी रातें और भी लंबी होने लगीं। सब्र का बांध टूटने लगा। सीने में कुम्हलाया पौधा फिर से अकुरित होने के लिए हिलने-जुलने लगा।

सोहन से बातें करते हुए मैं खो जाती। वह मुझे बहन कह कर पुकारता तो मुझे कोफ्त होती। वह चुटकी बजा कर पूछता, “कहां खो गए?”

उस दिन सोहन आया। महरून रंग की पगड़ी में उसका चेहरा चमक रहा था। उसने ड्योढ़ी में मोटर साइकिल खड़ा किया। मंडी से आया था, आढतिए से हिसाब करके। बापूजी को हिसाब समझाने लगा। बेबेजी चनाब को गोदी में लिए बैठी थी। मैं चौके में खड़ी हांफ रही थी। दिमाग में कुछ सरक रहा था।

“पानी दे जा रविन्द्र।” बेबेजी ने पुकारा।

मैं पानी का गिलास भर लाई। पानी लेते हुए सोहन मुझे देख, स्वाभाविक-सा मुस्कुराया। उसने आधा पानी पीकर गिलास मुझे थमा दिया। अचानक प्यास से मेरे होंठ खुश्क हो गए। मैंने गिलास मुंह से लगा लिया और बाकी रह गया पानी पी गई। आखिरी चूंट भरते ही मुझे होश आ गया। बेबेजी का मुंह खुला का खुला रह गया। बापूजी अवाक् रह गए। सोहन के हाथ में पकड़ा पेन रुक गया।

मैं तेज कदमों से चौके की ओर गई। खाली गिलास चूल्हे के सामने फेंक दिया। मेरा सिर घूमने लगा। पता नहीं कैसे हिम्मत कर, मैं अंदर बेबेजी के पलंग पर जा गिरी।

मैं रो रही थी, निरंतर। भीतर से कुछ बह निकलना चाहता था। दिमाग में कछ भी स्पष्ट नहीं था, ना आंखों के आगे कोई साबत दृश्य।

उस रात बेबेजी ने चनाब को अपने पास सुला लिया। मेरा सारा शरीर तपता रहा। मैंने गले में धारण की, किरपान उतार कर रख दी।

सुबह मैं स्नान ना कर पाई। ना ही गुरुद्वारे गई। बेबेजी ने भी मजबूर नहीं किया। बापूजी के चेहरे पर चिन्ता के गहरे साये थे। नाश्ता कर, वह खेतों की ओर चले गए। बेबेजी किसी पड़ोसन के पास चली गईं। मैंने मुर्गियों को आंगन में खुला छोड़ दिया। उसी समय मोटर साइकिल की तीखी आवाज सुनाई दी। मेरा सिर चकराने लगा। सोहन को अपने पास आते देख मेरी टांगें जवाब दे गई। चाबी को अंगुली पर घुमाते हुए बोला, “यह क्या किया तुमने कल?”

मैं उसके सामने खड़ी थी। मेरी चाल देख कर वह हैरान रह गया। मैंने तेज आवाज में कुछ कहा। मुझे याद नहीं, क्या कहा। परन्तु उसकी आधी-अधूरी बात मुझे सुनाई दी, “तेरा दिमाग खराब हो गया है। मैंने तुम्हें बहन समझा? तुम होश में नहीं हो। बेबेजी कहां हैं, बापूजी कहां हैं।” वह ठंठबर गया। मैंने आगे बढ़ कर उसकी बांह पकड़ने की कोशिश की, वह झटके से बांह छुड़ा कर मोटर साइकिल की ओर लपका। मैं जोर से चीख उठी। चीख सुन कर चनाब डर गई। पड़ोसन चाची भागते हुए आई। उसने मुझसे बहुत कुछ पूछा, लेकिन मैं बिटर-बिटर ताकती रही। बेबेजी आ गए। उसने कहा, “मैंने आपसे पहले ही कहा था, इसे कोई बाहरी कसर हो गई है। मेरी मानो तो पंडोरी वाले बाबाजी को बुला लो।”

एक सप्ताह तक सोहन घर न आया। मेरी हालत और भी बेकाबू होने लगी। बेबेजी मेरे सिर में बादाम रोगन की मालिश करतीं। बापूजी ने बताया, गांव भर में लोग मेरे बारे में बातें करने लगे थे। मैं स्वयं बेहद परेशान थी।

आखिर एक दिन काला चोगा पहने दो बाबा हमारे गेट में दाखिल हुए। बेबेजी ने सिर झुका कर उनका अभिवादन किया। उनका भयानक रूप देख कर मेरी चीखें निकलने लगीं। बाबा ने अपना हाथ ऊपर उठाया और जोर से चीख कर बोला, “देख लिया हमने, आते ही देख लिया, एक ही चुटकी में, बस एक ही चुटकी में भागेगी तूं।” फिर उन्होंने आंगन में बिछे पलंग पर अपना आसन जमाया। बेबेजी से कहा, “इस बच्ची पर एक औरत का कब्जा है। उसने इसे दबोच रखा है। हम ठीक कर देंगे माता। तुम सामग्री तैयार करो।”

बापूजी सामग्री जुटाने में व्यस्त हो गए। आंगन के बीच में धुआं जला दिया गया। दोनों बाबा चिमटा खड़काते हुए आंगन में चक्कर लगाने लगे। मुझे उस धुएं के पास बिठा दिया गया। बाबा ने अपना चिमटा मेरे सिर पर रखा, मुंह में बुदबुदाया और बोला, “जाएगी कि नहीं?”

मेरी सरति खोने लगी थी। सिर खद ब खद हिलने लगा। बाल खल गए। बालों का एक गच्छा बाबा की मुठ में था। शरीर पर पडती मार का मझ पर कोई असर नहीं हो रहा था। मुझे कोई होश नहीं थी। बाबा का चीखना और मेरा सिर हिलाते जाना जारी था।

“क्या चाहती है तू?” बाबा ने शह लगा कर मेरे भीतर बैठी उस औरत से सवाल किया।

“मैं सोहन को चाहती हूं?” मैंने बेसुरति के आलम में कहा।

“यह सोहन कौन है?” बाबा ने गरज कर कहा। बेबेजी ने दांतों से होंठों को काटा। बापूजी ने सिर झुका लिया। आस-पास खड़े लोग खुसर-पुसर करने लगे।

“मैं सोहन हूं।” दो पैर आगे बढ़ा कर सोहन बोला। मेरे भीतर की औरत ने शायद सुन लिया। उस औरत ने आंखें फैला कर उसकी ओर देखा। मेरे निढाल और क्लांत शरीर को उसने हिम्मत दी और सामने खड़े सोहन के गिरेबान को पकड़ कर उसे झिंझोड़ने लगी, “अभी भी चुप ही रहेगा कि मरवाएगा मुझे इन दुष्टों से? बोल! बोल! बोल!”

सोहन को पसीने छूटने लगे। बाबा ने अगली कार्रवाई करने के लिए चिमटा ऊपर उठाया तभी सोहन ने गहरी आवाज में कहा, “बस, बस…। यह हमारे घर का मसला है बाबा जी। आप अब जाएं।”

मैंने सोहन की आंखों में देखा। आंसू उसकी गालों तक सरक आए। मेरे बिखरे बालों को उसने सहलाया। उसका हाथ लगते ही लगा, सिर में भभकती आग शांत होने लगी। शरीर पर चिमटे से पड़ी मार टीसने लगी।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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