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सिंगल मालट सुर्ख नहीं होती-21 श्रेष्ठ नारीमन की कहानियां पंजाब: Hindi Story
Singal Maalat Surkh Nahi Hoti

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

Hindi Story: जब वह कश्मीरन मेरी गाड़ी से टकराई, मैं भी जल्दी में था। क्लास लेकर यूनिवर्सिटी से फुर्ती से निकला। मुझे उन नौजवानों के पास पहुंचने की जल्दी थी, जिन्हें मिलिट्री ने संगठन की सहायता से ‘ट्रेंड’ करके पार भेजना था पाकिस्तान।

जम्मू यूनिवर्सिटी में उर्दू पढ़ाते हुए और संगठन से जुड़े हुए मुझे कई बरस हो गए थे। बहुत जिम्मेवारियां निभाई परन्तु नौजवानों को प्रशिक्षित कर पाकिस्तान भेजने का काम मुझे पहली बार सौंपा गया था। यह बेहद ‘सीक्रेट मिशन’ था।

वैसे तो संगठन में काम करने के कारण मिलिट्री और आई.बी. के अनेक आला अधिकारियों से मेरी जान-पहचान थी परन्तु कर्नल बराड़ के साथ मेरी मित्रता हो गई थी। यूनिवर्सिटी में मेरा दोस्त कामरेड प्रो. सुरजीत था। हमारी जोड़ी अनोखी थी। थे हम दोनों ही पंजाबी, मैं सरदार और वह मोना। मैं उर्दू पढ़ाता था और वह हिन्दी। मेरे विचार राष्ट्रवादी थे और उसके समाजवादी। परन्तु इन सारी विभिन्नताओं के बावजूद हमारी मित्रता पर कभी आंच नहीं आई थी। क्लास के बाद हम अक्सर ही इकट्ठे चाय पीते-कॉफी पीते थे।

आज मैं उससे आंख बचा कर जरा जल्दी निकला था कि डॉ. डोगरा के क्लीनिक वाले मोड़ पर अचानक वह कश्मीरन पता नहीं कैसे और कहां से गाड़ी से आ टकराई। मैं गाड़ी रोक कर तेजी से नीचे उतरा। वह बेहोश पड़ी थी। यहां अधिकतर लोग मुझे जानने वाले थे। “कोई नहीं, बचाव हो गया।” जैसी आवाजों के साथ लोग उसे उठा कर तुरन्त क्लीनिक ले गए। चैकअप करते हुए डॉक्टर ने बताया, चोट नहीं आई। शायद सदमे से लगता है, दो-तीन दिन से इसने कुछ खाया नहीं। उसने ग्लुकोज लगा कर कछ इंजेक्शन दिए। थोड़ी देर बाद उसे होश आ गया। वह हैरानी से आस-पास देखने लगी। डॉक्टर डोगरा ने उसके माथे पर हाथ रख कर उसे दिलासा देते हुए स्नेह से कहा, “तुम ठीक हो। चिन्ता की कोई बात नहीं। क्या नाम है तुम्हारा?”

“नलिनी गौड़।” उसने मरियल-सी आवाज में कहा।

“तुमने कुछ खाया नहीं?”

उसने ना में सिर हिलाया, “वहां से मुश्किल से बच कर…।” आगे वह कुछ बोल ना पाई।

मुझे एकदम तरस आ गया। “यह बेचारी तो शरणार्थी है।” मैंने पर्स निकाला और डॉक्टर साहब को पैसे देते हुए कहा, आप इसका अच्छे से इलाज करें। मैंने कुछ पैसे उसे भी देने चाहे परन्तु उसने ना में सिर हिलाते हुए ग्लुकोज लगे होने के कारण ढीले से हाथ जोड़े और उसी मरी हुई आवाज में बोली, “हम गौड़ ब्राह्मण हैं। वहां हमारे अपने बाग।” उसकी आंखें भर आई और मन भी। फिर थोड़ा-सा संभली और उसी प्रकार हाथ जोड़ कर कहने लगी, “हो सके तो कोई काम?”

मैंने उसकी ओर गौर से देखा, 30-32 वर्ष की, पूरी कश्मीरी, सुन्दर, चेहरे पर शालीनता। मैंने कहा, “आप पहले ठीक हो जाएं, चिन्ता छोड़ दो। यह अब मेरी जिम्मेवारी है।”

उसने उलझन से मेरी ओर देखा। डॉक्टर ने कहा, “यह सरदार जी प्रोफेसर है, यूनिवर्सिटी में। तुम इन्हीं की गाड़ी से टकराई थी। भले पुरुष हैं, जरूर कुछ न कुछ करेंगे। इनका ऐसा करना बनता भी है।” डॉक्टर डोगरा ने हंसते हुए कहा, “टक्कर जो मारी है।”

“नहीं, नहीं। मेरी गलती थी, सरदार साहब। मुझे माफ करें।” वह बहुत साफ हिन्दी बोल रही थी, उर्दू जैसी…जैसे अधिकतर पढ़े-लिखे कश्मीरी बोलते हैं। उसकी काबिलियत और दर्द ने मुझे गमजदा कर दिया। मैंने कहा, “आप यहीं रहें। कहीं नहीं जाना। मैं शाम को आऊंगा।” उसने हामी भरी। चेहरे पर शुक्रिया के भाव थे। डॉ. को धन्यवाद दिया और उसका ख्याल रखने की हिदायत देकर, मैं क्लीनिक से बाहर आ गया।

यहीं से मुझे रिहायशी कोठी नंबर 409 में जाना था। आम लोगों के लिए यह ठेकेदार शाम लाल की कोठी थी, जो संयुक्त परिवार संग यहां रहता था और मैं उसकी इकलौती बेटी को ट्यूशन देने आता था। वास्तव में यह कोठी ‘इंटेलिजेंस’ का ऑफिस थी जहां इंटेलिजेंस का आला अफसर और मेरा ‘क्लासमेट’ राजिन्द्र अपने स्टाफ के साथ यहां रहता था। मेन गेट में गाडी पार करके मझे अंदर जाना था। अपनी पगडी उतार कर बालों को चोटी में गंथ कर, सिर पर टोपी पहन, शर्ट, टाई आदि उतार कर, ‘टी-शर्ट’ पहन कर पिछले छोटे दरवाजे से निकल कर काला चश्मा लगा कर, सूनी गली में जाना था। जहां पहले ही या मेरे आने के बाद किसी प्राइवेट कार में मुझे कोई ‘इंटेलिजेंस’ वाला बॉर्डर रोड़ पर लिजा कर सूबेदार जोगिन्दर के पास छोड़ कर आना था। वही मुझे मिलिट्री कैंप लेकर जाएगा। आज सारे रास्ते मैं कश्मीरी पंडितों की नियति के बारे में सोचते हुए दुःख और गुस्से से भरता रहा। हमारा संगठन कश्मीरी पंडितों को उनके घरों में फिर से आबाद करना चाहता था। हम सभी इस बारे में भावुकता से सोचते। इसी कारण मैं उस कश्मीरन के लिए कुछ न कुछ करना चाह रहा था।

सूबेदार जोगिन्दर मुझे मिलिट्री कैंप के अंदर परे एक बैरक के कोने में बने कमरे में ले आया। लड़कों ने खड़े होकर सैल्यूट मारा और सावधान खड़े हो गए। सूबेदार जोगिन्दर ने मेरा परिचय करवाया, “ये आपको उर्दू पढ़ाने वाले सर हैं।” फिर मुझे मुखातिब होकर कहा, “ये तीसरी-चौथी तक उर्दू पढ़ चुके हैं।” मैंने लड़कों की ओर निगाह दौड़ाई। वे कुल सात थे। मुझे पूरी क्लास की उम्मीद थी। थे सभी किशोर, चंचल, कुछेक चौदह-पन्द्रह साल के भी। जोगिन्दर कह रहा था, “ये सभी कश्मीरी पंडितों के बच्चे हैं, सर। इनके पूरे परिवार को मार दिया गया। पहले ये यतीम थे, अब इनके मां-बाप, भाई-बहन या चाचा-ताया सब कुछ हम ही हैं।” वे सभी मुझे अपने बेटों साहिल और सुहज जैसे लगे। वे भी बारह और दस वर्ष के थे परन्तु इनकी तरह सहमे और उदास नहीं थे। मैंने उनके पास जाकर सभी को बारी-बारी से गले लगाया। उनकी आहे मुझे भीतर तक चीर गई। मुझे कश्मीरन का कराहना याद आया। उस दिन मैंने लड़कों को और खुद को दिलासा दिलाया और कहा, ‘पढ़ाई कल से शुरू करेंगे।’ मुझे उस कश्मीरन की चिन्ता हो रही थी। बेचारी, कहीं चली ना जाए।

लेकिन वह वहीं थी। अब काफी ठीक लग रही थी। डॉक्टर को बताया, “फिलहाल इसे घर लेकर जा रहा हूं।” उसने कहा, “यही ठीक रहेगा।”

वह बेहद डरी-सहमी सी पिछली सीट पर बैठी थी, अनमने भाव से, जैसे मौका लगते ही दरवाजा खोल कर छलांग लगा सके। शीशे से देखते ही वह अपने में और भी सिमट गई। आखिर झिझकते हुए बोली, “जी, आप मुझे किसी विधवा आश्रम या…।” मैंने उसकी बात काट कर कहा, “ऐसा बाद में सोच लेंगे। अभी आप मेरे साथ चलें। बिलकुल भी घबराएं नहीं, मेरी बीबी-बच्चे मां है. आप एकदम महफज रहेंगे।” वह खामोश हो गई। घर के अंदर जाने तक वह डरी हिरणी-सी मेरी ओर देखती रही। परिवार को देख कर उसे कछ तसल्ली हई। मैंने मां और पत्नी को बताया, इसका मेरी गाड़ी से एक्सीडेंट हो गया था। परिचय करवाने लगा, तब वह बताने लगी, “मेरा नाम नलिनी गौड़ है जी। अब मेरा दुनिया में कोई नहीं।” वह आंखें भर आईं। मां और पत्नी ने एक साथ, उसे बांहों में ले लिया। वह हिचकियां लेने लगी, जैसे उसके सब्र का बांध टूट गया हो। वह मेरी मां के कंधे पर सिर रख कर फूट-फूट कर रोने लगी। दोनों बच्चे मेरे पास आकर खड़े हो गए। सहमे और भावुक से। मेरा मन घबराने लगा, बार-बार कहा, “बस, बस, आप फिक्र ना करें। उसे यही मंजूर था। आप हिम्मत रखें।”

मेरी मां और पत्नी शरन भी रो रही थी और उसकी पीठ सहलाते हुए दिलासा भी दे रही थीं। छोटा सुहज पता नहीं कब पानी का गिलास ले आया और बोला, “आंटी, आप ना रोएं।” मैंने पानी का गिलास उसकी ओर बढ़ाया परन्तु वह मां और शरन को छोड़ कर, सुहज के सामने घुटनों के बल बैठ गई और उसे अपने साथ लिपटा कर और भी जोर से रोने लगी। हम तीनों ने एक-दूसरे की ओर देखा। मैंने इशारा किया, इसे जी भर कर रोने दिया जाए। वह खूब रोई। आखिर मां ने उसे कंधे से उठाया, सोफे पर बिठा कर, पानी का गिलास उसके मुंह से लगा दिया। मैंने तुरन्त एक निर्णय किया और शरन को एक ओर लिजा कर कहा, “बहुत दुखी है बेचारी! कुछ दिन रख लें इसे अपने पास?”

“मैं भी यही सोच रही थी।” वैसे भी शरन आज्ञाकारी बीबी थी।

हम ड्राईंगरूम में पहुंचे तो वह उठ कर खड़ी हो गई। वह अपने इतना रोने पर शर्मिन्दा थी। कहने लगी, “माफ कीजिएगा, मैं खुद पर काबू ना रख पाई।”

“कोई बात नहीं। ऐसा कुछ महसूस ना करें। आप कुछ दिन यहां आराम से रह सकती हैं। फिर…।” उसने मेरी बात काट दी, “माफ कीजिए, मेरी एक गुजारिश है।” कह कर उसने एक-एक के चेहरे की ओर देखा और बोली, “हम गौड़ ब्राह्मण हैं। परन्तु मुझे घर का सारा काम आता है। अगर आप मुझे यहां काम पर रख लें तो मैं शुक्रगुजार हूंगी।”

जब मैं, शरन और मां आपसी सलाह करके दूसरे कमरे से ड्राईंगरूम में आए तो देखा, वह साहिल और सुहज के साथ ऐसी घुल गई थी, जैसे बरसों से उन्हें जानती हो। वह फिर अदब से खड़ी हो गई और हमारे कुछ कहने से पहले ही कहने लगी, “मुझे रुपया-पैसा कुछ नहीं चाहिए जी। बस रोटी, कपड़ा, रहने के लिए जगह और इज्जत की जिन्दगी चाहिए।”

शरन ने उसे सारा घर और उसका कमरा दिखाया। फिर बोली. “आप लोग बैठो, मैं चाय और कुछ खाने के लिए लाती हूं।” परन्तु नलिनी ने अपना पानी वाला गिलास शरन के हाथ से लेते हुए कहा, “यह फर्ज आज से मेरा है। मैडम, आप एक बार मुझे किचन का सारा सामान दिखा दें।”

मैंने कहा, “नहीं, नहीं, आपकी तबियत ठीक नहीं। आप अभी आराम करें।”

“माफ करे सर, यहां आकर लग रहा है, जैसे मैं अपने ही परिवार में आ गई हूं। अब मैं काफी ठीक हूं। चाय तो अब मैं ही बनाऊंगी। एक गुजारिश और है सर, आप सभी मुझे तुम कह कर बुलाएं या नलिनी की बजाए नीलू कह कर पुकारें। नीलू मेरा छोटा नाम है।”

“ठीक है, मुझसे तो नलिनी बोला भी ना जाता। नीलू ठीक है बेटा।” मां पहली बार कुछ बोली थी। साहिल स्वभाव अनुसार चुप था परन्तु सुहज बोला, “नीलू आंटी, बहुत अच्छे!”

नीलू ने हाथ जोड़ कर हमारा शुक्रिया अदा किया। कुछ ही देर बाद हम उसके व्यवहार और चाय के स्वाद से आनंदित हो गए थे। कश्मीरी पंडितों के काम आने के एहसास के कारण, मैं एकदम खुश हो गया। अब मैं जल्दी से जल्दी उन सातों लड़कों से मिलना चाहता था।

***

अगले दिन मुझे, पहले दिन की तरह उन लड़कों तक पहुंचाया गया। सूबेदार जोगिन्दर ने उन नामों की फेहरिस्त मुझे दी तो मैं चौंक गया। वे सभी मुस्लिम नाम थे और उनके मां-बाप के भी। जोगिन्दर ने कहा, “इनके पहले के नाम व जीवन, सभी कुछ भुला देना है, प्रोफेसर साहब। हमें इन्हें नई पहचान, नई जिन्दगी देनी है ताकि यह कहीं मार न खाएं। मेरी हैरानी कम हो गई, याद आया, यह एक ‘सीक्रेट मिशन’ है। इन्हें सरहद पार भेजने का जिक्र किसी से भी, यहां तक कि घर-परिवार व खुद से भी नहीं करना है। यह राष्ट्र की सुरक्षा का सवाल था। मैं इस कार्य में अत्याधिक परिश्रम से जुट गया। मैं ही क्यों, इस मिशन से जुड़े सूबेदार जोगिन्दर, कर्नल बराड़, आई. बी. डायरेक्टर राजिन्द्र और उसकी टीम, एक मौलवी साहब, जो लड़कों को इस्लामी आचार-व्यवहार और शरीयत सिखाते थे और एक स्वामी जी भी थे। सभी अपना कार्य जिम्मेवारी से कर रहे थे।

स्वामी जी से मैं भी अत्यन्त प्रभावित था। वह तथ्यों पर बोलते, ओजस्वी बोल। यूनिवर्सिटी में जहां मेरा कामरेड मित्र मुझे बहस में पीछे छोड़ देता था, स्वामी जी के भाषण सुन-सुन कर मैं उसे पूरी टक्कर देने लगा था। स्वामी जी कहते. “दनिया में धर्म केवल एक ही है. सनातन धर्म जो सरज की पहली किरण से उदय हुआ। बाकी संप्रदाय हैं, उन धर्मों की जन्म तिथि है। किसी को दो हजार साल, किसी को चौदह सौ साल और किसी को कछ और समय हआ, अस्तित्व में आए हए। जिसकी जन्म-तिथि होती है, उसकी मौत की तिथि भी होती है। परन्तु धर्म न जन्म लेता है और न ही मरता है। आपको इस बात पर गर्व होना चाहिए कि आप सनातनी हो, आर्य पुत्र यानी श्रेष्ठ।” फिर ठंडी सांस ले कहते, “परन्तु अफसोस, दुनिया में लगभग 116 देश ईसाइयों के, 59 देश मुसलमानों के, 6 कम्युनिस्ट देश हैं, कुछ बुद्ध के हैं और हम सवा सौ करोड़ हिन्दुओं का इस दुनिया में कोई देश नहीं। इस हिन्दुस्तान को सही अर्थों में हिन्दू राष्ट्र बनाने का दायित्व अब आपके कंधों पर है।”

फिर वह कहते, “मैं यह नहीं कहता कि सारे मुसलमान अतिवादी है परन्तु दुनिया में जितने भी अतिवादी है, वे सभी मुसलमान है। सो उन्हें जवाब देने के लिए ही तुम में से कोई अभिमन्यु बनेगा, कोई अर्जुन और कोई भीम। यह मत सोचो कि वे गिनती में बहुत अधिक हैं, भीड़ भेड़ों की होती है, शेरों की भीड़ नहीं होती। आप अकेले ही बब्बर शेर के समान हो।” सभी के अंदर पाकिस्तानी और अतिवादियों के विरुद्ध आग भभकने लगती। मैं देखता, लड़कों की मुट्ठियां भिंच जाती, रंग लाल सुर्ख हो जाता, आंखों में खून उतर आता। वह कुछ करने और मरने-मारने के लिए तैयार हो जाते। उसी समय कर्नल बराड़ के इशारे पर सूबेदार जोगिन्दर उन्हें हथियारों की ट्रेनिंग के लिए ले जाता। मेरा जी चाहता, मैं ऊंची आवाज में “भारत माता की जय” का जयघोष करूं। परन्तु यह जोश मैं कामरेड पर उतारता। तब मुझे होश आता, जब वह संदेह से पूछता, “यार, तू आजकल कहां जा रहा है?”

मैं यह कह कर टाल देता, “संगठन का कार्यक्रम था। वहां एक स्वामी जी आए थे।”

वह कहता, “अगर एक स्वामी की बातें सुन कर, तुझ जैसे प्रोफेसर का यह हाल है तो सोचो, जिन मुस्लिम आतंकवादियों के खिलाफ तू बोलता है, वे तो भोले-भाले नौजवान हैं, जिन्हें उनके मौलाना यही सब कुछ कह कर बरगलाते हैं।” अब मुझ पर कामरेड की इन बातों का कोई असर ना होता। मैं पूरी तरह से स्वामी जी के प्रभाव में था।

अब तो मेरा सारा परिवार नीलू के प्रभाव तले भी था। नीलू ने जैसे हम सभी को खरीद लिया था। बाजार से सब्जी वह खुद खरीद कर लाती। कश्मीरी मसाले पता नहीं कहां-कहां से खोज लाती थी। कभी कश्मीरी पुलाव, कभी बिरयानी, सारा घर महकता रहता। अब नीलू के बिना मेरा घर परिवार पूर्ण नहीं था। मां की वह चहेती थी, शरन की छोटी बहन। साहिल अपनी चित्रकारी में मस्त रहता परन्त सहज नील आंटी के आगे-पीछे रहता। नीलू सभी के लिए बहुत करती थी परन्तु सुहज और मेरे लिए कुछ ज्यादा करती थी। मुझे पैग लगाने की आदत थी। संगठन में इसकी मनाही थी। जैसे कहा जाता है कि दूध देने वाली गाय का छोटा-मोटा मारा सींग सहन कर लिया जाता है, यही सोच कर संगठन वाले मेरी इस आदत को नजरअंदाज कर देते थे। शरन को मालूम था परन्तु मैं उससे, मां और बच्चों से छिप कर पीता था। सुहज शरारती था। एक दिन कहने लगा, “ईवनिंग में जब पापा वाशरूम से आते हैं तो बहुत प्यार करते हैं।”

एक दिन मैं वाशरूम गया तो हैरान-परेशान हो गया। मेरा सामान छिपे स्थान पर नहीं था। मैं हाथ हिलाते हुए अपनी स्टडी में आ गया। मेरे पीछे ही नीलू वहां आ गई। मेज के नीचे जहां मैगजीन रखे होते, उस ओर इशारा करके बोली, “सर, यहां पड़ा है सब कुछ। आराम से बैठ कर पिए, किसी को मालूम नहीं होगा।” वह मुस्कुराते हुए स्टडी रूम का दरवाजा भिड़ा गई। मैंने सुना, वह कह रही थी, “कोई पापा को डिस्टर्ब नहीं करेगा। वह जरूरी काम कर रहे हैं।’ उस दिन नीलू मुझे बहुत अच्छी लगी। अच्छी तब भी लगती थी, जब मेरी स्टडी के सारे कागज यथास्थान पर संभालते हुए कभी उर्दू का कोई शेयर गुनगुनाती या जब गायत्री मंत्र, आरती या मूलमंत्र के पाठ का गायन करती तो सारा घर जैसे पवित्र हो जाता और मैं मंत्रमुग्ध। वह बताती, “वहां हमारे घर के पास सरदार अंकल रहते थे, मिलिट्री से रिटायर्ड। उन्होंने मुझे मूल मंत्र सिखाया था और यह भी बताया था कि जब सन् 48 में पाकिस्तानी फौज ने कबायली धावियों से मिल कर कश्मीर पर हमला किया तो कश्मीर को बचाने के लिए आम सिख-सिंहनियां कैसे डट गए थे। इसलिए मुझे सरदार बहुत अच्छे लगते हैं।”

एक शाम मैं लड़कों को पढ़ाने के लिए इस्लाम के इतिहास के कागज सीधे कर रहा था। नीलू इसमें मेरी मदद कर रही थी, हंस कर कहने लगी, “देखें सर, आजकल आप इस्लाम बहुत पढ़ रहे है, कहीं…।” जी में आया, उसे लड़कों को सरहद पार भेजने के सीक्रट मिशन में राजदार बना लूं परन्तु संगठन द्वारा दिलाई सौगंध ने रोक दिया और शरारत से कहा, “सोचता हूं, यदि दूसरा विवाह करना हुआ तो धर्मातरण करके मुसलमान बन जाऊंगा।” “तौबा-तौबा” करते हुए हंसती हुए, कानों को हाथ लगा, अदा से बाहर चली गई।

एक अन्य शाम को मैंने उससे पूछा, “इस्लाम व उर्दू के बारे में तुम इतना कैसे जानती हो नीलू?” उसने आह भरी और उदास हो कर बोली, “वहां हमारे घर के पास अधिकतर मुसलमानों के ही घर थे। लड़कियां हम चार ही थीं। एक मौलवी जी थे, बहत अच्छे और विद्वान। ऐसा समझें कि हम तीन धर्मों वाले घरों में एक साथ पली-बडी।” फिर हंस कर बोली, “बस कोई क्रिस्चियन नहीं थी। वरना उनके बारे में भी जान लेती।” हमारे दरम्यान बहुत-सी बातें होतीं, प्रत्येक विषय पर, परन्तु मर्यादा की लक्ष्मण-रेखा का उल्लंघन हमने कभी नहीं किया।

घर में हम सब बहुत खुश थे परन्तु दो दिन से लड़कों की एक बड़ी समस्या सामने आ खड़ी हुई थी। उनकी ट्रेनिंग बकायदा चल रही थी और वे भी पूरे मन से सब सीख रहे थे कि अचानक मिलिट्री के मौलवी जी ने हमारे सामने मसला रखा कि जब ये लोग उस ओर जाएंगे तो वहां ‘बीफ’ खाना पड़ेगा। इस बारे में क्या करना है? हम सभी उलझ गए। वे तो पंडितों के बच्चे थे। अंडे, मीट से भी दूर और बीफ…मैंने सोचा, ऐसा हो ही नहीं सकता। परन्तु अगले दिन इसका दायित्व स्वयं कर्नल बराड़ ने ले लिया। मैंने पूछा, “क्या करेंगे?” उन्होंने कहा, “जंगल में लिजा कर भूखा रखूगा, फिर अंडा खिलाऊंगा, ऐसे ही चिकन, मीट और …।”

मैंने कहा, “ऐसा हो सकता है?”

वह कहता, “डोंट वरी प्रोफेसर! भूख सब कुछ करवा देती है। समय कुछ अधिक लग सकता है।” मुझे उन्होंने एक सप्ताह की छुट्टी दे दी और कहा, ‘पहले इस मसले को हल कर ले।’

मैंने यूनिवर्सिटी से भी सप्ताह की छुट्टी ले ली और हम सारा परिवार, नीलू सहित जम्मू घूमे, वैष्णों देवी हो आए। नीलू कहने लगी, “चलो कश्मीर चलते हैं। शंकराचार्य मंदिर चलेंगे।” हालात खराब होने के कारण मैं थोड़ा झिझक रहा था परन्तु मां और बच्चे जाने की जिद कर रहे थे। शरन मेरे मुंह की ओर देख रही थी, लगा, वह भी जाना चाहती है। अभी छुट्टियों में तीन दिन बाकी थे। ड्राईवर भी था। मैंने कहा, “ठीक है, सुबह निकल जाएंगे।” सभी खुश हो गए। परन्तु उसी शाम आई. बी. डायरेक्टर मेरे मित्र राजिन्द्र का फोन आ गया कि ‘गुड़िया’ वापस आ गई है। मैं ‘ट्यूशन’ पढ़ाने के लिए आ जाऊं। यह कोडवर्ड था, मिशन पर लौटने का। परिवार जोर-शोर से कश्मीर जाने की तैयारी कर रहा था। बच्चे बहुत उत्साहित थे। मैं उन्हें कुछ भी बताए, ‘अभी आया’ कह कर घर से निकल गया। जब मैं मिलिट्री कैंप पहुंचा तो कर्नल बराड़ ने बधाई देते हुए बताया, ‘बीफ’ वाला मिशन ‘सक्सैसफुल’ हो गया है। मैंने हैरानी से पूछा, ‘इतनी जल्दी कैसे?’ बराड़ मेरे हाथ पर मारते हए हंसा. “अरे चार यार तो पहले से ही चिकन खाते थे। यह मसला तो पहले ही दिन हल हो गया था। बीफ ले गया, तीन दिन भूखा रहने और कुछ करने के जोश में यह मोर्चा भी फतेह कर लिया। अब आप दो दिन जोर लगा दो। इनकी ट्रेनिंग पूरी हो गई है। फिर इन्हें विदा करें।”

मैंने कहा, “मैं तो कश्मीर जाने का प्रोग्राम बना चुका है।”

“प्लीज प्रोफेसर, अब नहीं। रिकएस्ट है।” उसने कहा तो मुझे याद आया, ‘मिशन शुड नॉट स्टॉप।’ मैंने मजाक में सैल्यूट मार कर कहा, “यस सर।” हाथ मिला कर वह खुल कर हंसा। हम बहुत खुश थे। उस दिन देखा, लड़के भी बहुत रोष और जोश में थे। घर आते हुए मैंने पक्का फैसला कर लिया था कि मैं नहीं जा सकता तो कोई बात नहीं। लेकिन परिवार को जाने दूंगा। जब मैंने आकर अपनी मजबूरी बताई कि यूनिवर्सिटी में मेरी एक अर्जेंट ड्यूटी लगा दी गई है तो सभी का मूड खराब हो गया। नीलू तो बहुत ही उदास और परेशान हो गई। काफी देर उन्हें समझाने में लगी कि वे अपना प्रोग्राम ना बदले। ड्राईवर हमारा जाना-पहचाना है, समझदार भी है। शरन ने कहा, “मैं यहीं रुक जाती हूं। आपकी रोटी-पानी…।” मैंने टोकते हुए कहा, “मुझे वैसे भी बाहर जाना है, आप सभी बेफिक्र होकर जाएं।”

अगले दिन उन्हें भेज कर मैं सुबह ही अपने मिशन पर जा पहुंचा। उस दिन पहली बार मेरा फोन बिजी रहा। शाम तक मेरी परिवार के साथ कोई बात ना हो पाई। दो बार नीलू ने, आह भर कर कहा, “सर, आपको बहुत मिस कर रहे हैं।” शरन ने कहा, “अपना ध्यान रखियेगा।” बीच-बीच में सुहज ने कुछ तस्वीरें व्ट्सअप पर भेजीं। मैंने ध्यान से देखा, नीलू उनमें कहीं भी नहीं थी। तस्वीरें वही खींच रही होगी शायद।

“जवाहर टनल’ उन्होंने पार कर लिया था। कभी-कभी डर भी लगता, हालात फिर से खराब होने लगे थे। फिर शाम 5.30 बजे श्रीनगर से काफी पहले किसी ढाबे से सुहज ने सैल्फी भेजी। मैंने देखा, नीलू पीछे खड़ी थी, फोन को कान से लगाए। बावा कलर की साड़ी में वह कमाल लग रही थी। मैंने तस्वीर को जूम करके देखा, नीलू का सैल्फी की ओर ध्यान नहीं था। लगा. वह मझे ही फोन कर रही है। सैल्फी के बारे में कमेंट भेज कर. मैं नीलू को फोन मिलाने लगा, फोन बिजी था। वह मुझे मिला रही होगी। लड़कों को पढ़ाते हुए भी मेरा ध्यान फोन पर लगा रहा। लेकिन फोन ना आया। पन्द्रह मिनट बाद मैंने फिर से फोन मिलाया। वह ‘स्विच ऑफ’ था। शरन को मिलाया, वह फोन भी बंद था। पता नहीं क्यों मेरा दिल जोर से धड़का। मैं क्लास से बाहर आ गया। फोन बजा, मैंने तुरन्त उठा लिया, कर्नल बराड़ था। वह अपने ऑफिस में बैठा ‘तीसरी आंख’ से सब देख रहा था। “क्या बात है प्रोफेसर, फैमिली के बिना दिल नहीं लग रहा? अभी तो दिन भी नहीं हुआ।”

“नहीं कर्नल…बस वैसे ही। अचानक उनके फोन बंद हो गए”

“डौंट वरी, वहां सिग्नल की प्रॉब्लम होती है। कई जगह हमारे जैमर भी लगे हुए हैं।”

“वो तो ठीक है कर्नल…। बस बच्चों की चिन्ता हो रही है।”

“अरे कुछ नहीं यार! अब इन बच्चों को संभालो। मैं चाय भिजवाता हूं।” कर्नल ने फोन काट दिया। मैं रिलैक्स हो कर क्लास में आ गया।

घंटे दो घंटे बाद भी देखा, फोन बंद ही आ रहे थे।

मैंने, कर्नल और राजिन्द्र ने पैग लगाए, खाना खाया। राजिन्द्र का ड्राईवर मुझे घर छोड़ गया। ना शरन का फोन, ना सुहज की कोई पिक। बहुत बार ट्राई किया लेकिन दोनों फोन बंद। तीसरा ड्राईवर का भी। कर्नल की बात याद कर, मन को तसल्ली देनी चाही मगर चैन ना आया। फिर पता नहीं किस समय आंख लग गई।

***

सुबह उठा। उतावलेपन से फोन चौक किया। शायद रात को कोई फोन कॉल या पिक भेजी हो। मगर कुछ नहीं था। फोन किए, मगर सारे ही बंद। जल्दी से तैयार हुआ। राजिन्द्र का ड्राईवर मुझे लेने आ गया। नाश्ता वहीं करना था। नाश्ता करते हुए मैंने राजिन्द्र से कहा, “यार, मेरा मन नहीं मान रहा। तुम कुछ पता करो।” उसने नाश्ता करते ही डायरी खोली, पैन हाथ में लेकर कहा, “गाड़ी का नंबर बता, साथ ही फोन नंबर भी।” मैंने नंबर लिखवा दिए। उसने पियन को बुला कर बशीर खान को अंदर भेजने को कहा। परन्तु मैंने देखा, बिना पूछे ही एक पंडित अंदर आ रहा था। राजिन्द्र ने वह नंबर की चिट उस पंडित को दी और कहा, “पंडित जी, यह कुंडली है। जरा श्रीनगर के आसपास नजर दौड़ाओ।”

“सति बचन जजमान!” कह वह पंडित चला गया।

मुझे राजिन्द्र पर गुस्सा आया, “यार, तुम किन चक्करों में पड़े हो। यह साला पंडित क्या करेगा। वहां किसी अफसर, रिस्पॉन्सिबल पर्सन को फोन करो।” वह कहने लगा, “क्यों तेरा संगठन तो इन बातों का बहुत प्रचार करता है।”

“प्रचार लोगों के लिए होता है, अब हम तो…।”

“शांत प्रोफेसर साहब! नाश्ता करो। मेरा बहुत ही काबिल अफसर है यह बशीर खान।”

“अरे, मैं तो भूल ही गया था, मैं आई. बी. के डायरेक्टर के साथ बैठा हूं।”

ग्यारह बज गए। मैं अनमने भाव से लड़कों की तैयारी करवा रहा था। देखा, राजिन्द्र और बराड़ आपस में कुछ मशविरा करते हुए क्लास की ओर आ रहे थे। मुझे वे परेशान लगे। मेरा माथा ठनका। जल्दी से क्लास से बाहर आ गया। वे कई बार क्लास में आते थे परन्तु अचानक मेरे मुंह से निकला, “सुख तो है?”

“हां, हां डौंट वरी।” कर्नल ने अपना तकिया कलाम बोला, “डौंट वरी, बस रुटीन।” उसने हंसने की कोशिश की।

लेकिन मुझे रुटीन नहीं लग रही थी और वो थी भी नहीं। जब राजिन्द्र मुझे कंधे से थाम, एक ओर चल दिया, “चलो यार, चाय पीते हैं।”

कर्नल बराड़ के दफ्तर में बैठ, मैं पानी का गिलास रखने ही लगा था कि कर्नल ने कहा, “देखो अभी फिक्र की कोई बात नहीं है।” लेकिन राजिन्द्र ने उसे हाथ से चुप रहने का इशारा किया।

“देखो प्रोफेसर, बात थोड़ी-सी चिन्ता की तो है, परन्तु तुम जरा संयम से सुनना। श्रीनगर से पहले एक सूने मोड़ पर गाड़ी मिली है अपनी। ड्राईवर बेहोश था। वह अब अस्पताल में है। होश में आने के बाद उसने बताया कि पीछे ढाबे से चाय पी कर चले तो उन्हें नींद आने लगी, बाकी उसे कुछ मालूम नहीं।”

“और शरन…बच्चे ?” मेरी जान निकलने लगी।

“डोंट वरी, सारा इलाका सर्च किया है।” परन्तु राजिन्द्र ने कर्नल को फिर से चुप करवा दिया। “उनका अभी पता नहीं लगा। उस ढाबे से पता लग गया है। उन सभी को उठा लिया है। उनमें से दो लड़के अभी फरार हैं, बाकी का कुछ पता नहीं।”

मेज पर मुक्का मारने की बजाए, मैंने माथा फोड़ लिया।

“प्रोफेसर, अब घबराने से कुछ नहीं होगा। हम हर पल तुम्हारे साथ हैं। तुम हमारी ‘हैल्प’ करो। बताओ यह सारा प्रोग्राम कैसे बना। कोई खास बात?” उसने पानी का गिलास मेरी ओर बढ़ा दिया। कर्नल ने कहा, “डोंट वरी, हम जमीन-आसमान एक कर देंगे।”

मैं कुछ संभला। पानी का चूंट भरते हुए अपना दुःख भी निगल लिया और पूरी तफ्सील से पिछले हफ्ते की सारी गतिविधियां राजिन्द्र और उसके पास आकर बैठे रीडर को नोट करवा दी।

“….फिर वे पूरे सात बजे चले गए।” इतना कहते ही मेरा दिल एक बार उछला। मैं उठ कर खड़ा हो गया, “राजिन्द्र, मैं अभी श्रीनगर जाऊंगा।” कर्नल ने उठ कर मेरे कंधे पर हाथ रखा, “चलेंगे यार, सभी चलेंगे। अब दो बज गए हैं, चलो खाना खा लें।”

“खाना?” मैंने गुस्से से उसकी ओर देखा।

“हां खाना। देख प्रोफेसर, मुसीबत कितनी भी बड़ी क्यों न हो, भाई खाना नहीं छोड़ना चाहिए। नहीं तो लड़ेंगे कैसे और फिर जीतेंगे कैसे?” राजिन्द्र ने कहा, “यह ना सोचो कि कुछ हो नहीं रहा। मेरी एक टीम सुबह से रवाना हो चुकी है। बराड़ हमारे जाने के लिए हैलीकॉप्टर का बंदोबस्त कर रहा है। सड़क के रास्ते तो हम आज वहां पहुंच नहीं सकते।” वह मुझे समझाते हुए दिलासा भी दे रहा था, “भाभी और बच्चों की मुझे कम चिन्ता नहीं लेकिन हमें तगड़ा होना पड़ेगा।”

फिर उसने कर्नल बराड़ से कहा, “तुम हैलीकॉप्टर अरेंज करवाओ बराड़। हम मेरे ऑफिस जा रहे हैं। मैं कुछ फॉरमैल्टीज पूरी कर लूं। तुम हमें कॉल कर देना।”

राजिन्द्र ऑफिस आकर कुछ जरूरी काम निपटाने लगा। लेकिन मुझ से बैठा नहीं जा रहा था। मैं कमरे में इधर-उधर घूमते हुए सोचने लगा, आखिर बच्चों के साथ क्या हुआ होगा?

राजिन्द्र ने कहा, “फैमिलीज की कुछ फोटोज चाहिए प्रोफेसर।”

मैंने कहा, “मैं घर से ले आता हूं।” यह भी याद ना रहा कि फोटो तो मोबाईल में ही है।”

“मैं ड्राईवर को बुलाता हूं।” लेकिन बैल मारते हुए वह रुक गया, बोला, “ठहर यार, मैं भी तेरे साथ ही चलता हूं।” फिर उसी डायरी में लिखते हुए बुदबुदाया, “5.40 पर उनके फोन स्विच ऑफ हुए, इकट्ठे ही। ट्रेस भी नहीं हो रहे। शायद उसी समय सिम निकाल कर ‘डिस्ट्रॉय’ कर दिए गए होंगे। हां सच, तुमसे आखिरी बार बात कितने बजे हुई थी प्रोफेसर?”

मैंने कहा, “बात नहीं हुई। पिक भेजी थी बेटे ने 5.30 पर।”

“साढ़े पांच’ उसने दिमाग पर जोर दिया। साढ़े पांच, फिर पांच चालीस पर फोन बंद हो गए। वो पिक दिखाओ जरा।”

मैंने मोबाईल निकाला और उसे तस्वीर दिखाने लगा। उसे ध्यान से देखते हुए वह बोला, “यह पीछे कौन है। बावा कलर की साड़ी वाली?”

मैंने कहा, “नीलू है, मतलब नलिनी गौड़। शराणार्थी है बेचारी। यह भी साथ ही थी।”

“साथ ही थी, मतलब यहीं से साथ गई थी?”

“हां, पांच-छह महीने से हमारे साथ ही रहती है घर में। शरन के साथ कामकाज करवा देती है।”

वह पिक को बडा करके देखने लगा. फिर बैल दबा दी। पियन आया उसने कहा, “बशीर को बुलाओ।” बशीर अंदर आया, अब वह सरदार के गैटअप में था। राजिन्द्र ने फोन उसकी ओर बढाते हए नील की ओर इशारा किया। बशीर ने दो सैकेंड भी ना लगाए और जल्दी से बोला, “जुबैदा सर।”

“हैं..?” राजिन्द्र कुर्सी से उछल पड़ा, “हां वही है न? मुझे शक पड़ा था।”

मैं भी कुर्सी से उठ खड़ा हुआ, “नहीं यार, यह नीलू है। मेरी गाड़ी से टकरा गई थी। तब से हमारे ही घर पर रह रही थी। बहुत अच्छी है बेचारी।” मैं उसके बारे में और कुछ नहीं जानता था। “गौड़ ब्राह्मण की लड़की है कश्मीर से। इसका कोई भी सगा नहीं बचा। नलिनी नाम है इसका।”

नलिनी नहीं राजिन्द्र ने गुस्से से मेरी ओर बढ़ते हुए कहा, “यह तेरी अम्मा जुबैदा है, हाडकोर टेररिस्ट, छब्बीस आतंकवादी ऐक्शनों में ‘डायरेक्ट इंडायरेक्ट रूप से इंवॉल्व है…नलिनी हूं …घुग्गु साला…।”

मेरा मन नहीं मान रहा था। इन्हें जरूर कोई भ्रम हुआ है। लेकिन राजिन्द्र दांत पीस रहा था और अपने हाथ पर मुक्के मार रहा था। फिर उसने माथे पर हाथ मारा और बैठते हुए पूरे दुख से बोला, “ओ मेरे भगवान, बच्चे?” और उसने दोनों हाथों से अपना सिर थाम लिया। उसकी यह हालत देख कर मेरा ध्यान नीलू से हट कर बच्चों की ओर गया। मैं बशीर की ओर बढ़ा और पूछा, “आपको पक्का मालूम है?” लेकिन बशीर की बजाए राजिन्द्र मुझ पर टूट पड़ा, “तुम चुप रहो प्रोफेसर। तुम्हारी जगह कोई और होता तो मैं थप्पड़ मार-मार कर मुंह तोड़ देता। साले तुमने आज तक इसके बारे में कुछ बताया क्यों नहीं?”

अब मुझे पछतावा होने लगा। मैं मुश्किल से कुर्सी तक पहुंचा और कुर्सी पर जा गिरा। राजिन्द्र को मेरा ध्यान आया, वह उठा और मेरे पास आकर बोला, “सॉरी यार! तुमने झटका ही इतना बड़ा दिया। तुम्हें मालूम नहीं प्रोफेसर, यह साली कितनी खतरनाक ‘टेररिस्ट’ है। उसने नीलू को कितनी ही गालियां दी, “लेकिन तुम चिन्ता ना करो, हम फैमिली को कुछ होने नहीं देंगे।”

अब मुझे स्थिति की भयानकता का एहसास होने लगा। मैंने उसका हाथ पकड़ कर भर्राए स्वर में कहा, “राजिन्द्र, कैसे भी करो, मेरा परिवार यार…।” आगे की बात कह ना पाया। मैं दोनों बाज और सिर मेज पर रख कर रोने लगा। राजिन्द्र मुझे चुप करवाने लगा, अचानक वह सीधे होते हुए बोला, “ओह माय गॉड! बशीर जल्दी करो, हरी अप, हरी अप। प्रोफेसर के घर पहुंचो, सारा घर फुल सर्च…। बंब सुकैएड…। मैं बराड़ को ‘इंफार्म’ करता हूं। यह फोन ‘रिसर्च विंग’ में भेज दो।” मुझे समझ में नहीं आ रहा था परन्तु मैं इतना देख रहा था कि राजिन्द्र ने नीलू का सच जुबैदा के बारे में बताने पर बराड़ ने भी राजिन्द्र की तरह ही ‘रिएक्ट’ किया था। राजिन्द्र बिना गाली के जुबैदा के बारे में बात नहीं कर रहा था। उधर शायद बराड़ भी ऐसा ही कर रहा था।

हमारी कॉलोनी में जैसे भूचाल आ गया। मुझे घर के अंदर ना जाने दिया गया। मैंने जिद की परन्तु राजिन्द्र ने मुझसे चाबियां लेते हुए गुस्से से कहा, “बस अब तुम चुप रहो प्रोफेसर। प्लीज और बेवकूफी मत करो।” उन्होंने सारा घर छान लिया लेकिन शायद उनके काम की कोई भी चीज उन्हें ना मिली। लोग छतों-दीवारों पर चढ़ कर देखने लगे। कई पड़ोसी आकर मुझसे पूछने लगे, “क्या हुआ प्रोफेसर साहब?” मैं चुप रहा। क्या बताता। इतने में राजिन्द्र और बराड बाहर आए। कॉलोनी में मेरी इज्जत के बारे में शायद अब राजिन्द्र को ख्याल आया। वह कुछ ऊंचे स्वर में बोला, “सब ओ.के. है। नार्मल है। देखें, प्रोफेसर साहब की फैमिली कल कश्मीर गई थी, अभी तक ‘मिसिंग’ है। हमें नौकरानी पर शक था, इसलिए यह ‘सर्च’ जरूरी था।”

“नीलू पर शक…? नहीं जी, नीलू तो बेचारी…।” अड़ोस-पड़ोस वाले नीलू के बारे में अच्छा कह रहे थे। राजिन्द्र और बराड़ गुस्से से बड़बड़ा रहे थे, “साली ने सभी को बुद्ध बना कर रखा है।” राजिन्द्र मेरी बांह पकड़ कर मुझे अंदर ले गया। बराड़ भी साथ था। सारा सामान बिखरा पड़ा था। राजिन्द्र ने गोल्ड और नकदी मुझसे अलमारी के लॉकर में रखवाए। यह सब शरन को ही मालूम था, अब तो वैसे भी कुछ सूझ नहीं रहा था। राजिन्द्र ने सब लॉक कर चाबियां मुझे सौंपी और कहा, “बाकी सामान कल आकर देखेंगे। यहां कुछ आदमी रुकेंगे। हम श्रीनगर चलते हैं।” मैं कठपुतली बना हुआ था। चलते समय देखा, मीडियावालों की बाढ़ आ गई थी। लेकिन बिना कुछ बोले हम वहां से निकल गए।

तीसरे दिन हम श्रीनगर से वापस आ गए। सिर्फ झख मार कर, कुछ पल्ले ना पड़ा। शाम को जब घर पहुंचे तो देखा गांव से आकर बड़े भाई, भाभी और भतीजी ने घर संभाल लिया था। उन्होंने बताया कि टी. वी. पर खबर सन कर वे उसी दिन आ गए थे। मेरे फोन से तो किसी रिश्तेदार को जवाब नहीं मिल रहा था। भाई ही सभी से बातें कर रहा था। बड़े भाई को देख कर मेरे सब्र का बांध टूट गया। मैं दौड़ कर उनके गले से लग गया। कई दिनों से डावांडोल हुआ मन, आंखों के रास्ते बह निकला। पल क्षण में मेरे हंसते-बसते घर के उजड़ जाने के कारण सभी नि:शब्द खड़े थे।

जल्दी ही गाड़ी मुझे लेने आ गई। राजिन्द्र ने बुलाया था। वह और बराड़ ड्राईंग रूम में बैठे थे। मेरे बैठने पर राजिन्द्र ने कहा, “प्रोफेसर, एक खबर मिली है, कुछ तसल्ली वाली।”

“क्या?” मैं बेहद उतावला हो गया।

“यह तो नहीं मालूम कि फैमिली कहां है, परन्तु सूत्रों के अनुसार, ‘इनफॉर्मेशन’ है कि अभी तक सब ठीक-ठाक है।”

“मैंने पहले ही कहा था, नीलू मेरे परिवार के साथ ऐसा कुछ नही कर सकती।”

“बड़ा आया नीलू वाला। कुछ और सुनोगे मुझसे। उसे बार-बार नीलू कहना बंद करो। वह जुबैदां है। यहां यह खबर तसल्ली वाली है, वहीं ‘डेंजरस’ भी है।”

“कैसे?” पूछने पर बराड ने कहा, “टेररिस्ट उनके बदले अपनी मांगे मनवाएंगे।” इतने में नौकर पैग और खाने-पीने का सामान ले आया। इतने दिन उनके साथ रहने के कारण मैं भी फौजी जीवन का आदी हो गया था। पैग लगाने के बाद मैंने कहा, “और आप उनकी मांगें मानोंगे नहीं।” राजिन्द्र थोड़ा ताव में आ गया, “यह हम-तुम बीच में कैसे आ गया प्रोफेसर। हम सब एक साथ लड़ रहे हैं।”

मैंने दूसरा पैग उठाया, “लड़ हम इकट्ठ रहे हैं लेकिन जिस पर बीतती है, उसे मालूम होता। तुम्हें क्या मालूम, सारे परिवार का इस प्रकार चले जाना।”

“हां भई, हमें क्या पता। बराड़ ने अपना पैग उठाया और बाहर की ओर देखते हुए उदास स्वर में बोला, “हमें क्या मालूम परिवारों का चला जाना।”

“इसे क्या हुआ अब, मैंने कुछ गलत तो नहीं कहा।”

“नहीं प्रोफेसर, आप गलत कहां कहते हैं। लेकिन सुनिए कर्नल बराड़ का एक बेटा और बेटी थी। बेटा आतंकवादियों ने मार दिया। वाईफ तब से ही तलाक और बेटी को लेकर कनाड़ा अपने मायके जा बैठी है। ना खुद बात करती है, ना बेटी को करने देती है। अकेला लड़ रहा है, हर फ्रंट पर। मैं, मेरा परिवार कहां रहता है, खुद से भी छिपा कर रखता हूं। जब अफगानिस्तान गया था छः महीने के लिए, चलते समय परिवार इस प्रकार रोता रहा कि जैसे अब।”

“सॉरी यार!” लेकिन उन्होंने मझे बोलने ना दिया।

“नहीं, नहीं सुनो। ये केवल हम दोनों का मामला नहीं है, प्रत्येक छठे जवान और चौथे अफसर का यही हाल है। लेकिन माफ करना, आप हमारे परिवारों के बारे में कितना पूछते हैं?”

मैं शर्मिन्दा हुआ, बाहर की ओर चल दिया। देखा, बराड़ चांद की ओर टिकटिकी लगाए देख रहा था। मैंने उसे बाहों में भर लिया, “सॉरी यार! मुझे मालूम नहीं था। चलो, अंदर चलो।”

“डोंट वरी प्रोफेसर, चलो, चलो…।” उसने नॉर्मल दिखने का यत्न किया। लेकिन मैंने देखा कि उसने तरीके से आंखें पोंछी। अंदर आकर कहा, “मुझे माफ कर दें, हम सिवलियन आपके समान ‘सैक्रीफाईस’ नहीं कर सकते।”

नहीं, नहीं प्रोफेसर साहब! खैर छोड़ो…। बराड़ ने बात बदली और राजिन्द्र से कहने लगा, “प्रोफेसर साहब को नलिनी के अर्थ तो आते ही होंगे।”

“आते होंगे, तब भी मैं ही बताऊंगा।” राजिन्द्र सहज होने लगा, “नलिनी एक घूमने वाली नलकी को कहते हैं, जिसे तोता पकड़ने वाले स्थिर पानी के ऊपर अमरूद या मिर्च के साथ फिट कर देते हैं। तोता, जैसे ही उसे खाने लगता है, वह घूम जाती है। उल्टे लटके तोते को अपना साया पानी में दिखाई देता है। डरते हुए वह नलकी को छोड़ता नहीं, फंस जाता है और पकड़ा जाता है।”

“हां तो ऐसे फंसाया उसने प्रोफेसर साहब को।”

“हां कर्नल, वैसे अधिकतर प्रोफेसर तोते ही होते हैं।” राजिन्द्र ने चोट कर, मेरी ओर तिरछी नजर से देखा। मैंने कहा, “मैं लव जेहाद में नहीं फंसा, जिसमें तुम्हारे कई अफसर फंसे हैं।”

राजिन्द्र गुस्से से बोला, “ये साली चीज ही ऐसी होती है और वो जुबैदा, वो तो..।” वह फिर से गालियां देने लगा। अचानक बराड़ जोर-जोर से हंसने लगा, “ये गालियां आपके कारण नहीं निकल रही, जुबैदां एक बार भाई साहब को भी बुद्ध बना चुकी है।”

मैं चौंका, “कहां… कब?”

“हरिमंदर साहब…। इन्हें दिखाई दी, इन्होंने शक पड़ने पर उसे बुलाया तो कहने लगी, “वीर जी, मैं सतनाम कौर जम्मू से,” और इनके हाथ पर प्रसाद रख कर फतेह बुला गई।” सुनते ही मैं हंस दिया, राजिन्द्र ढीला पड़ते हुए कहने लगा, “वो तो यार परिक्रमा का मामला था, नहीं तो मैं…”

परिवार का दुःख भूलने वाला नहीं था परन्तु इनका दुख जान कर अपना दुःख जरूर कुछ कम हो गया। ‘सर्वेलेंस’ पर लगा कर मेरा फोन मुझे दे दिया गया। ‘भई आई. बी. के पास फोन होने के कारण आतंकवादियों ने संपर्क नहीं किया था। मेरे पास होने पर शायद करें। बेशुमार फोन आए हुए थे। लेकिन अननोन नंबर कोई नहीं था। इतने फोन, इन्होंने पता नहीं कैसे हैंडल किए होंगे।

अगले दिन घर में तिल भर की जगह खाली नहीं थी। अड़ोसी-पड़ोसी, सगे-संबंधी, शहर के लोग, यूनियन और यूनिवर्सिटी जैसे सारे ही पहुंच गए थे। कामरेड मेरे दु:ख में आधा हो गया था। मुझे मालूम हुआ, यूनिवर्सिटी को एक दिन बंद रखा गया है। लोग अब शहर बंद करवाने के लिए जोर दे रहे हैं। मैंने शहर बंद करवाने से रोका। पलिस और एजेंसियों की बहत किरकिरी हो रही थी। गलती मेरी थी। घर तो नीलू को मैं लाया था। अब वह मेरे परिवार के साथ क्या करेगी, सोच कर दिल कांप रहा था।

अगले दिन गली में खड़े थे। सुबह के साढ़े दस बजे होंगे। सामने आकर एक ऑटो रुका। उसमें से दो बुर्के वाली औरतों ने सभी का ध्यान अपनी ओर खींचा। यहां तक कि पिछले कुछ दिनों से गली में रेहड़ी वाली शरणार्थी औरतें भी पास आ गईं। फिर मुस्लिम टोपियां पहने दो बच्चे कुरते-सलवार व जैकेट पहने उतरे। सभी हैरानी से देख रहे थे कि एक बच्चा रोते हुए मेरी ओर लपका, “पापा।” मुझसे हिला न गया। मैं घुटने के बल बैठ गया और उसकी ओर बांहें फैला दीं। यह तो मेरा ‘सुहज’ था, पीछे साहिल था। शरन और मां ने बुर्के उठा दिए। बस इतना ही मैं देख पाया। मेरी आंखें धुंधला गईं।

अचानक एक शोर उभरा, “रुकिए मैडम, रुकिए। रुको लड़को स्टॉप! मैंने देखा, रेहड़ी पकड़ी शरणार्थी औरतों के हाथ में ‘पिस्टल’ थे। कितने ही आदमियों ने मेरे परिवार को घेर रखा था। सुहज चीखें मारता, बांह छुड़ाने के लिए जोर मार रहा था। मैं उनकी ओर बढ़ा, तभी पुलिस की कई जिप्सी सामने आ कर रुकी। एस.पी. गिल जवानों सहित भागते हुए आता दिखाई दिया। मुझे कुछ हौसला हुआ, मैं उनकी ओर बढ़ा, “गिल साहब, फिर ले जा रहे हैं मेरे परिवार को।” “नहीं, नहीं प्रोफेसर साहब। ये सभी हमारे ही अफसर हैं। रेहड़ी वाली लेडीज भी। आप घबराए नहीं। ‘यूअर फैमिली इज सेफ!’ आप अपना फोन सुनें।” अब मेरा ध्यान फोन की ओर गया, जो कितनी देर से बज रहा था। उठाया तो राजिन्द्र था, “प्रोफेसर, घबराओ नहीं। फैमिली को अंदर लेकर नहीं जाना। यह खतरनाक हो सकता है। सबसे पहले हमें ‘चैकअप’ करने दो।” राजिन्द्र को मैं कहने ही वाला था कि एक वैन आकर रुकी और मेरे परिवार को उसमें बिठा लिया गया। मुझमें पता नहीं कहां से इतनी ताकत आ गई। मैं भाग कर उनके रोकने के बावजूद वैन में चढ़ गया। वे मुझे उतारने लगे तो गिल ने इशारे से उन्हें ऐसा करने से मना कर दिया।

“मां आप ठीक हो, शरन?” मैंने आगे बढ़ना चाहा तो एक अफसर ने रोक दिया, “सर प्लीज, अपनी सीट पर रहें।” शरन ने सिर्फ हाथ जोड़ दिए। उसकी आंखें धाराप्रवाह में बह रही थी। मां कुछ हौसले से बोली, “शुक्र है बेटा, वाहेगुरु और उस मेरी बेटी नीलू का, जिसने हमें मौत के मुंह से बचा लिया। वह हमें ये बुर्के पहना कर पता नहीं कहां-कहां पर छिपाती रही। आप भी बेचारी जुबैदा बनी, नहीं तो वे तो ले ही गए थे। पता नहीं, क्या करते मेरे मासूमों के साथ।” मां ने आंखें पोछी। मैंने आकाश की ओर हाथ जोड़े और मां को रोक रही लेडीज पुलिस की ओर भी।

“पापा, नील आंटी ने मेरा नाम शाहिद रखा और साहिल का रफीक। मम्मी रहीमा बेगम और बड़ी मम्मा फातिमा।” वैन में मुझे साथ देख कर बच्चे भी कुछ राहत महसूस कर रहे थे। बहुत कम बोलने वाला साहिल बोला, “नीलू आंटी, जुबैदा और टेररिस्ट बन कर हमें तो निकाल लाई, लेकिन खुद पता नहीं कहां रह गई?”

“बेटा, वह लड़की, नीलू तो थी ही नहीं, जो हमारे घर पर रहती थी। वह तो उनके साथ ऐसे बातें करती, जैसे सचमुच जुबैदा हो।” मां ने आह भरी, “हमें बस चढ़ाने तक साथ रही।” शरन पहली बार बोली, “हमें यही पक्का करती रही, घर तक पर्दे में रहना। मैं खुद आ जाऊंगी, कहते-कहते चली गई।”

“आ जाएगी वह। देख लेना तुम। बहुत चंट है।” मैं मां को क्या बताता कि अब वह कभी वापस नहीं आएगी। उस बेचारी के साथ ‘वो’ पता नहीं, क्या-क्या करेंगे। मेरा रोम-रोम नीलू का शुक्रगुजार था। मेरे हाथ फिर से अपने आप जुड़ गए।

अस्पताल आ गया। अधिकारियों ने मुझे दूर कर दिया। लेकिन उतरते समय सुहज कुछ पल के लिए गले लगते ही मेरी जेब में एक कागज डाल गया और कान में ‘सीक्रेट है’ भी कह गया। अधिकारी फैमिली को लैब में ले गए। वह अंदर शरन और बाकी सभी की नस-नस टोह रहे थे कि कहीं कोई विस्फोटक या कोई अन्य यंत्र उनके शरीर में फिट ना किया हो। या कोई खतरनाक ‘वायरस’ ना हो। मैं आंख बचा कर बाथरूम में जा घुसा। वह कागज निकाला। खत था, उर्दू में, नीलू का लिखा हुआ था।

“आप मेरे बारे में बहुत कुछ जान गए होंगे सर, मैं जुबैदा ही हूं। रफीक और शाहिद मेरे बेटे थे। साहिल और सुहज की उम्र के। रहमान मेरा खावंद था। मैंने आपको सच बताया था कि मैं तीन धर्म वाले परिवार में पली-बढ़ी हूं। झूठ केवल इतना कि मैं पंडित जी की नहीं, मौलवी जी की बेटी हूं। ससुराल में खावंद और बच्चों संग खुश बसती थी। एक रात ‘वो’ आ गए। खाना खाया और चले गए। मेरे रोकते-रोकते भी रहमान इसकी सूचना मिलिट्री को दे आया। मुकाबला हुआ, उनमें से दो मारे गए। रहमान को ईनाम भी मिला, रायफल भी और महफूज रखने के वायदे भी। लेकिन एक दिन वो फिर से फौजी वर्दी में आए और हम चारों को अगवा करके ले गए। किसी तहखाने में कितने दिन तक तकलीफें देने के बाद, उन्होंने मुझे उन तीनों से अलग कर दिया और कहने लगे “अगर उन्हें जिन्दा देखना चाहती है तो यह पैगाम दे आ।” फिर यह अमल बार-बार दुहराया जाने लगा, ‘ये सामान पहुंचा दे।’ मैं उनका प्रत्येक काम करती रही। लेकिन उन्होंने मझे रहमान और बच्चों की कुछ तस्वीरों या एकाध मूवी के उनसे कभी नहीं मिलवाया। अब तो मालूम भी नहीं कि वे कहां हैं? हैं भी या नहीं। महफूज है कि…।” मेरा फोन बज रहा था। राजिन्द्र फोन पर कह रहा था, “कहां चला गया प्रोफेसर? आ जा, फैमिली को संभाल ले। सब ओ. के. है।” सुख का सांस आया।

घर में एक बार फिर से मीडिया और लोगों का हजूम उमड़ आया। मीडिया वाले शरन से सवाल पर सवाल कर रहे थे। लेकिन उन्हें कुछ मालूम ही नहीं था। उन्होंने अफसरों को बताया था, उन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान पर आंखों पर पट्टी बांध कर लिजाया जाता था। जो भी करती थी, नीलू ही करती थी। लेकिन मीडिया के सवालों से परिवार खासा परेशान था। मां ने भी मझसे कहा. “पत्र. लोग नील के बारे में क्या कह रहे हैं. क्या वह आतंकवादी जुबैदा थी? जुबैदां तो वह हमें बचाने के लिए बनी थी।” बच्चे और शरन भी मेरी ओर उलझन से देख रहे थे। मैंने हाथ के इशारे से उन्हें समझाया, मीडिया की आदत होती है। फिर भाभी ने मोर्चा संभाला, “छोड़ो अपना इंटरव्यू करना, फिर करना…। बेचारे, कब से भूखे होंगे, रोटी-पानी खाने दे उन्हें।” भाभी जबर्दस्ती फैमिली को उठा कर दूसरे कमरे में ले गई। मैं ‘स्टडी रूम’ का दरवाजा बंद कर खत पढ़ने लगा, “दीदी और बीजी को बताना कि रहीमा मेरी सगी आपा है और फातिमा मेरी मां। सर, ‘संगठन’ को मैंने पहली बार ‘डबल क्रॉस’ किया है। मेरा क्या बनेगा, खुदा जाने परन्तु साहिल और सुहज को बचा कर, इस बार मैंने अपने रफीक और शाहिद को बचा लिया है। इसी बात की तसल्ली है। अब हो सके तो आप उन सातों लड़कों को बचा लें, उनका खून बहने से बचा ले सर।”

“अरे, यह तो सब कुछ जानती थी।” मेरे मुंह से निकला। मैं खत आगे पढ़ ना पाया। मैंने खत को तह लगा कर भीतरी जेब में रख लिया और बाहर निकल आया। बिना किसी से कहे, गाड़ी लेकर राजिन्द्र के दफ्तर जा पहुंचा, “उठ राजिन्द्र, कैंप जाना है।”

“अब क्या हो गया ?” वह थोड़ा घबराया।

“तुम चलो, मैं रास्ते में बताता हूं।” मैंने गाड़ी चलाते हुए खत निकाल कर राजिन्द्र को दे दिया। वह उलट-पलट कर बोला, “यह तो उर्दू में है।”

“हां, मुझे मालूम है, तुम्हें नहीं आती। मैं बताता हूं, यह खत नीलू का है। सारा बाद में पढ़ कर सुना दूंगा, अब बस इतनी-सी बात जान लो कि इसमें लिखा है. मैं उन सातों लडकों को बचा लं।”

“मुझे पहले से ही शक था कि वह जानती थी।” कह कर राजिन्द्र, बराड़ को फोन मिलाने लगा। तब तक हम कैंप पहंच गए। अंदर गए तो सबेदार जोगिन्दर से कर्नल बराड के बारे में पूछा। उसने कहा, ‘सर, क्वार्टर में हैं।” हम क्वार्टर पहुंचे। देखा, बराड़ सिविल में बैठा, पैग बना रहा था। बोला, “आओ यार! स्कॉच पिलाता हूं तुम्हें। ‘सिंगल माल्ट’ सीधी स्कॉटलैंड से आई है।” मैंने राजिन्द्र को इशारा किया कि वह उन लड़कों के बारे में पूछे। तभी बराड़ ने पैग थमा दिए। पैग टकरा कर राजिन्द्र ने ‘कोडवर्ड’ में पूछा, ‘गौरेया…?”

लेकिन बराड़ कुछ और ही बताने लगा, “मैंने कहीं पढ़ा था कि ‘पियोर स्पिरिट’ केवल आर्मी वालों और सिंगल माल्ट में होती है।” राजिन्द्र ने सिर हिलाया, “सच में…।”

मैं चुप रहा, बराड़ बोला, “हां गौरेया? उड़ गई परदेस। अभी अगली यूनिट के हवाले करके आया हूं।”

“नही-नहीं बराड़ साहब, रोको उन्हें, वे मारे जाएंगे।”

“जाने वाले को कौन रोक सकता है प्रोफेसर साहब? बराड़ शांति से पैग डाल रहा था, बोला, “वहां ना हमारा कोई ‘इंटरफेयरेंस’, ना गौरेयों से क्नेक्शन।”

मैं मायूस होकर सिर पकड़ने लगा। अचानक मेरी नजर पैग पर जा पड़ी, हैरान होकर मेरे मुंह से निकला, “यारो, सिंगल माल्ट सुर्ख तो नहीं होती।”

उन दोनों ने पैग की ओर देखा। कुछ देर तक भयानक चुप्पी पसरी रही। आखिर कर्नल बराड़ बेहद ठंडे और उदास सुर में कहने लगा, “आप ठीक कहते हो प्रोफेसर, इसमें पता नहीं किस-किस का खून मिला हुआ है।”

मुझे बराड़ का बेटा, जुबैदा का अथाह दर्द, हमारे इधर और उधर के कितने ही परिवार और वे सातों लड़के याद आए।

राजिन्द्र बोला, “पैग तुम्हें दिखाई दिया, हम दिखाई नहीं दिए, सभी के सभी सुर्ख।”

मैं कभी पैग की ओर, और कभी अपने हाथों की ओर हैरानी से देख रहा था।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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