Mutthi Bhar Rait
Mutthi Bhar Rait

Hindi Best Story: एक बात वो समझ पाई, कि इस नई कशिश में उलझ कर बंदा अपने घर भी नहीं गया, जबकि मौका होली का था।

सच कहते थे लोग! बुजर्गी आने के बाद से गुजरा वक्त कुछ ज्यादा ही टीसता है । सबसे ज्यादा तो वो चोटें दुखने लगती है, जो दिल पे अपने परचम छोड़ गई हो। वो, जवानी के दिन थे। जब हर कोई
न मालुम कैसी-कैसी खुशफहमियां पाले रहता है। याद आया, जब पारो अपने ‘वुड बी’ से पहली दफा मिली थी। उन दिनों उसका हफ्तावार अपने होमटाउन जाना बदस्तूर जारी था। अकेलेपन की वजह से उसकी अम्मा किराएदार जरूर रखती थीं। उस दफा कोई फैमलीवाला बंदा नहीं मिला था, तो अम्मा ने एक बैचलर को कमरा रेंट पर दिया। जो कि ताजादम पीडब्ल्यूडी में इंजीनियर लगा
था।

टॉल, डार्क और स्मार्ट भी था। पारो जब वीकेंड पे घर पहुंची तो काफी रात हो चुकी थी। अम्मा ने किराएदार रखने के बाबत उसे सुबह बताया। वो उस वक्त सफेद लखनवी चिकन का कुर्ता पायजामा बतौर-ए-नाइटसूट के पहने थी और उसकी बॉबकट जुल्फें आवारा सी झूल रही थीं। इंजीनियर
साइड से जीना उतरते जमीनी मंजिल पे आ रहे थे। शायद अम्मा ने उन्हें सुबह की चाय पे बुला रखा था। पारो को पीछे से देखा तो जनाब समझे कि- ‘हमें तो लड़की बताई गई थी, ये तो लड़का
मालुम पड़ता है।’
खैर!
चुप हो के तख्त पे बैठ गए जो कि बरामदे में पड़ा था। फिर वो जब पलटी तो मुआमला साफ हुआ। जनाब मुस्कुराए, लेकन मुस्कुराहट उनकी मूंछों में ही रह गई, फिर भी पारो को नजर आ गई और जी में आया- तो ये है लम्बू इंजीनियर। फिर भी घंटी तो बजी नहीं, लेकन कुछ अपनाइयत सी फीलिंग उसे आई। शायद उनके बीच लव बॉम्बिंग शुरू हो चुकी थी। कहने लायक तो कुछ भी नहीं था। लेकिन दिमागों में कुछ क्लिक कर गया होगा। शायद, वो शहजादा जिंदगी से टकरा
गया था जिसके ख्वाबों में पारो अब तक के मुब्तला रही होगी।

अगले रोज होली थी। सुबह से लग के उसने और अम्मा ने गुझिया बनाई, फिर जायकेदार लंच का भी मजा लिया गया। और अब इंतजार किया जा रहा था कि होली के तमाशे निढ़ाल हो के घरों में दुबक जाएं तो सब लोग कहीं घूमने निकल सकें। मार्च में मौसम यूं भी खुशगवार होता है। चार बजे सब लोग रेलवे स्टेशन को निकले। तो एक ही रिक्शे में अम्मा बीच में और दाएं बाएं वो दोनों पीछे हुड पे टिक गए।
जर्द सूट में पारो को जनाब बेबाक देखा कि और वो नजरअंदाज करती रही। झुकती शाम में पलटती हुई लाल धूप दरख्तों से छनकर सबके चेहरों पे पड़ रही थी और तीन लोग अपने-अपने अंदर कुछ बुन रहे थे। इस बात से बेफिकर कि हकीकत सपनों जैसी खूबसूरत नहीं हुआ करती। जिस ट्रेन में
सवार हुए उसे तो कहीं बहुत आगे तलक जाना था, जबकि उनकी मंजिल तो बस गोला गोकरननाथ तक ही थी और सब वहां आधे घंटे में पहुंच भी गए। मकसद था बस गोला मंदिर। जिसकी जियारत के बहाने सैर-सपाटे हो रहे थे। रात तक के थके-मांदे मुसाफिरों की वापसी हुई और फिर धुत पड़ के सोए।

एक बात वो समझ पाई, कि इस नई कशिश में उलझ कर बंदा अपने घर भी नहीं गया, जबकि मौका होली का था। तब लगा कि रिश्ते खून से ज्यादा एहसास में जिए जाते हैं। फिर कुछ इत्तफाक ऐसे बने कि पारो का ब्याह उसी इंजीनियर से हो भी गया। ये सुन रखा था कि जनम-मरन और ब्याह पहले से तयशुदा वक्त पे ही होते हैं। जिंदगी में जहां कुछ खुशबाश लम्हे उसने दिए थे, वही बहुत सारी तल्खियां भी बयक वक्त में जुड़ती गई। वो सब तो फितनों का दौर था, जबकि पिक्चर अभी बाकी थी।
तो फिर याद आया, और एक किस्सा कुछेक बरस याद करने लायक, जो एक कसक छोड़ गया था, तो वो एक ढ़लती जा रही शाम थी। जब पारो अपने शौहर का इंतजार करती हुई डिनर की तैयारियां करती जा रही थी। उस रोज उसने सकट का व्रत रखा हुआ था, तो जरा-सी कमजोरी भी मालुम दे रही थी। साथ के साथ पूजा करने की तैयारियां भी चल रही थी, जिसमें कुछ सामान कम था, तो उसने अपने शौहर से फेहरिस्त थमाते हुए कह रखा था कि आप लेते आइएगा।
लेकिन इंतजार के लम्हे घंटों में तब्दील होते चले गए और जब रात के ग्यारह बजे, तो हुजूर तशरीफ लाए। पान खा-खा के मुंह लाल हो रखा था और किमाम की खुशबू से सांसे तो क्या सारा माहौल ही गमक गया। जरा और पास आए तो कुछ भभके से उड़े। तब मामला पारो को कुछ और ही समझ
आने लगा।

इससे पहले की वो कुछ पूछती जनाब से खुद ही बोलना चालू कर दिया’ आज तो पारो गजब हो गया। मैं ऑफिस से निकल के घर आने ही वाला था कि बॉस से सरकारी मुद्दों को लेके बहस होना शुरू हो गई। मारे जोश के वो मेज के ऊपर चढ़ के लड़ने लगे, क्योंकि वो तो टुइयां से हैं। बहस बढ़ती
गई। तो मैंने भी हाथ छोड़ दिया। मारामारी में हमें कुछ खयाल ही नहीं रहा। बॉस के दो दांत भी टूट गए। तो उन्होंने थाने में रिपोर्ट कर दी। तब फिर मुझे भी एफआईआर करनी पड़ी। इसी में इत्ती सारी देर हो गई। और बताओ तुम्हारी पूजा का क्या कैसे हुआ।’ पारो तो धक सी रह गई। यकीन तो नहीं ही आ रहा था, इस कहानी पर। फिर भी कोई चारा नहीं था, सिवाय मान लेने के। ये पूछना भी रही गया कि ये शराब के भभके और इस बुरी तरह पान खाने की क्या कहानी है? पारो का सारा गुस्सा भी अब तक काफूर हो चला था, क्योंकि वो अब समझ ही नहीं पा रही थी कि कैसे और
क्या कहा जाए?

तब उसने कहा- ‘पूजा तो आधी अधूरी सी हो गई। अब से हम बाज आए इस व्रत उपवास से। फिर हमने तो खाना खा लिया। अब तुम्हारा भी लगा देते हैं।’
और वो शौहर की प्लेट लगाने चली ही थी कि जनाब से फरमाया- ‘मुझे भूख नहीं है। रहने दो।’
परेशान सी पारो फिर पलंग तरफ बढ़ गई। उसे लगा कि उलझन में जनाब की भूख भी उड़ गई होगी। बाहर से तो कुछ खाया नहीं होगा, अगर ये कहानी गढ़ी हुई नहीं है। अगली सुबह पारो के शौहर
दूध की बाल्टी उठा के घोसी के यहां दूध लेने चले गए। इतने ही में उनके एक नदीद (कलीग) टीएस
उर्फ त्रिलोकी सिंह घर आ पड़े। तो पारो ने वो रात वाला किस्सा बयां कर दिया। अब टीएस के पेट में मरोड़ें उठने लगी क्योंकि किस्सा सुनके वो फौरन ही वहां से चलता बना। और रास्ते में जो भी जाननेवाला मिला उसे वो किस्सा सुनाता चला गया। दो रोज ही में अब हालत ऐसी हो गई कि जो
भी पारो के शौहर से मिलता, इस किस्से के बाबत दरयाफ्त करता और जवाब में वो मुस्कुरा के रह जाता। इस जवाबदेही पर वो कोई सफाई भी देने लायक नहीं था, क्योंकि बॉस के तो सारे दांत सलामत थे, सभी को नजर आ रहा था।

पारो भी चुप नहीं रह पाई- ‘मुझे क्या मालुम था कि सारी कहानी सिर्फ हमें बहलाने भर की थी।’
शौहर फिर गुस्साया- ‘तुम और टीएस दोनो गुब्बारे ऐसे कमजर्फ हो।’

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इधर पारो भी बड़ी बेचैन रही थी। अगले रोज अपने ऑफिस में भी वही बात जब अपनी दोस्तों से कही तो सबों की हमदर्दियों हासिल हुई। यूं ही बातों-बातों में जब फिर एक रोज उसी किस्से का जिक्र आया तो जरीन हंसने लगी। तब पारो ने पूछा- ‘क्या बात है?’ हंसते-हंसते ही उसने जवाब दिया,
‘ऐसी कोई भी मारपिटाई तुम्हारे शौहर ने नहीं की थी। उसकी तो सारी तीरन्दाजी तुम्हीं पे चलती है।’
‘तुम्हें कैसे मालुम।’ पारो को ताज्जुब हुआ। तब जरीन ने बताया- ‘हमारे एक रिश्तेदार उसी ऑफिस में हैं जहां तुम्हारे मियां पोस्टेड हैं और उस रात वो पियक्कड़ों की सोहबत में रहा होगा। सुना है आजकल पीने का शौक जनाब को जोरों पे है।’
तब पारो का मुंह खुला ही रह गया। फिर उसे रह-रह के अपने शौहर पे बड़ा गुस्सा आया। सारी कहानी कितनी लाजवाब फिट करी थी। जरीन ना होती तो उसकी सारी बदमाशी का पता भी पारो को न चलता। फिर भी उसने घर आ कर कोई दंगा नहीं किया क्योंकि पता था कि जब वो कहीं भी हारने
लगता है, तो गाली-गलौज पे उतर आता है। और उस तरह की बदतमीजी पारो को और भी ज्यादा नाबर्दाश्त हो जाती।

लेकिन ‘टीएस’ का गाया हुआ किस्सा मशहूर तो हर जगह हुआ और उसके शौहर को बहुत जगह पे इसका सामना भी करना पड़ा। तब सारी खिसियाहट फिर आके पारो ही पे उतरी। तकरीबन चीखता सा बोला- ‘क्या जरूरत थी तुम्हें टीएस से अपनी बात कहने की।’
तो पारो भी चुप नहीं रह पाई- ‘मुझे क्या मालुम था कि सारी कहानी सिर्फ हमें बहलाने भर की थी।’
शौहर फिर गुस्साया- ‘तुम और टीएस दोनो गुब्बारे ऐसे कमजर्फ हो।’
तब पारो ही चुप हो गई ये सोचकर कि ‘उल्टा चोर कोतवाली करे है।’ और उसके चुप रह जाने से झगड़ा होने से बचा।
लेकिन, उसके बाद से पारो का इत्मिनान गायब होता चला गया। यहां तक कि शौहर की कही सच बात भी उसे अब अफ्सानवी ही लगती थी। मोतबर जरिये से उसने ये भी सुन रखा
था कि शौहर किसी का भी हो, ‘मुीभर रेत’ मानिंद ही होता है। फिर कभी उसने मुी को कसके बांधा ही नहीं वर्ना जो कुछ जरा-सा रेत होने का भरम था, शायद वो भी ना रह जाता।