The story of Nikka's shoes
The story of Nikka's shoes

Funny Stories for Kids: निक्का के जूतों ने सचमुच आफत मचा दी थी । इसलिए कि वे जल्दी , बहुत जल्दी फट जाते थे । उसकी मम्मी इस बात से परेशान थीं । निक्का के मुँह से जूते की बात सनुते ही उनका माथा एकदम गरम हो जाता, “अरे, अभी दो दिन पहले ही तो मैं सिलवाकर लाई थी, और आज फिर…!” कभी-कभी वे निक्का को टोकती भी थीं, “अरे निक्का , तुम सँभलकर क्यों नहीं चलते ? क्यों इतनी जल्दी फाड़ लेते हो जूते !” या कभी-कभी झल्ला कर कहतीं, “निक्का , जूते सँभालकर रखा कर न ! कब तक मैं तुझे यों नए-नए जूते लाकर देती रहूँ ? और इनकी मरम्मत करवाना भी तो आसान नहीं । यहाँ आसपास कोई जूता ठीक करने वाला नजर ही नहीं आता ।”
निक्का चुप । जानता था, उसकी एक आदत बहुत खराब है । रास्ते में जो भी चीज नजर आ जाए, उसे वह पैरों से ठोकर मारते हुए चलता है । जैसे रास्ता चलते फुटबॉल खेल रहा हो । इसीलिए उसके जूते हमेशा आगे से फट जाते थे ।
जैसे पुरुष मुँह खोलकर रो रहे हो । “ठीक है, आज तो मैं जूते नए ले देती हूँ । लेकिन अगर ये फटे, तो फिर आगे से फटे जूते ही पहनकर जाना ।” निक्का की मम्मी ने नाराज होकर कहा । अभी वे शायद कुछ और कहतीं, मगर तभी एक अजीब-सी नकसुरी आवाज सुनाई दी, “अरे बीबी जी, सुनो ना । आप क्यों इतनी परेशान हो ?”

निक्का हैरान । निक्का की मम्मी भी हैरान थीं कि यह आवाज कहाँ से आई ? कुछ पता ही नहीं चल रहा था । उन्होंने ध्यान से निक्का के जूतों को देखा, कहीं यह आवाज निक्का के जूतों में से तो नहीं आ रही है । फिर वे कमरे में इधर-उधर देखने लगीं ।

जब कहीं कोई दिखाई नहीं पड़ा , तो निक्का की मम्मी ने बड़ी हैरानी से कहा, “कौन बोला, कौन…? अरे भई, तुम दिखाई तो दे नहीं रहे । तो फिर बोल कहाँ से रहे हो ?” तभी परदे के पीछे से एक दाढ़ी वाला बौना आदमी निकलकर आया । एकदम सर्कस के जोकर जैसा । सि र पर सफेद गोटेदार, नीली चमचम टोपी, हरे कपड़े ।

“मैंने कहा मैडम…मैंने कहा । आप इस बच्चे पर नाराज न हों । बच्चे सारे एक जैसे होते हैं । इस उम्र में शैतानियाँ न करें, तो भला कब करेंगे ? और हाँ, जूतों की सिलाई मैं कर दूँगा । इतनी अच्छी कि आप भी याद करेंगी । ठीक है न बीबी जी !” कहते हुए वह बौना मुसकरा रहा था । बीच-बीच में विन म्रता से सिर भी हिलाता जा रहा था ।
“तुम करोगे सि लाई ? तुम…!” निक्का की मम्मी ने हैरान होकर कहा । “हाँ बीबी जी, आप कहें तो इतनी संदुर और मजबतू सिलाई कर दूँ इन जूतों में कि ये कभी नहीं फटेंगे ।” कहकर उस दाढ़ी वाले बौने ने झटपट-झटपट अपने सामान की गठरी खोली । बड़ी सी सूई और धागा निकाला और जूते
सीने बैठ गया ।
उसके हाथ इतनी फुरती से चल रहे थे कि निक्का और उसकी मम्मी दोनों हैरानी से देख रहे थे । पलक झपकते उसने जूते सी दिए । फिर बोला, “अरे निक्का , जरा पहनकर तो देख !”

“मम्मी , सचमुच ये जूते तो बहुत अच्छे हैं ।” निक्का ने जूते पहने तो खुश होकर मम्मी से बोला, “एकदम फिट हैं ये तो ! बहुत आरामदायक ।” मम्मी खुश होकर बोलीं, “अरे भई बौने, कितने पैसे हुए इसके ?” “अरे वाह, पैसों की क्या बात कही आपने ! निक्का तो मेरा बेटा है । वह खुश होगा तो क्या मुझे अच्छा नहीं लगेगा ? उसकी खुशी ही मेरा इनाम है ।” कहकर दाढ़ी वाला बौना गायब हो गया ।
मम्मी हैरान थीं—यह क्या ! अभी हमारे देखते-देखते कहाँ गायब हो गया दाढ़ी वाला आदमी ? और आया कहाँ से था ? कैसे आकर परदे के पीछे छिप गया और फिर…! कुछ भी उनकी समझ में नहीं आ रहा था । जो कुछ उन्होंने देखा, वह सच था या सपना, वे तो यह भी ठीक-ठीक नहीं समझ पा रही थीं ।
हालाँकि निक्का के जूते एकदम ठीक हो चुके थे, और वे दूर से ही चम-चम चमक रहे थे । तो फि र जो कुछ देखा, उसे वे झूठ भी नहीं कह सकतीं ।

लेकिन वह संदुर सी टोपी वाला बौना ? वह आया कहाँ से और गया कहाँ ? जब कुछ भी समझ में नहीं आया, तो हारकर वे घर के कामों में लग गईं । अगले दिन निक्का स्कूल गया, तो हर कि सी की निगाहें उसके जूतों पर थीं । उसके कई दोस्तों ने पूछा, निक्का , तुमने नए जूते लिए हैं न । दूर से ही
चमक रहे हैं ।
पर जब निक्का ने बताया कि ये उसके पुराने जूते ही हैं । कल उसने मरम्मत करवाई है, तो कि सी को यकीन नहीं हुआ । निक्का के मन में आया कि वह नीली टोपी पहने उस अजीब से बौने के बारे में भी दोस्तों को बताए, जिसने कल उसके जूते सिए थे । पर उसे लगा, कोई उसकी बात पर यकीन नहीं करेगा । उलटा सब हँसी उड़ा एँगे । सोचकर वह चुप रहा ।
निक्का को जूते इतने आरामदायक लग रहे थे कि पूरे दिन उसका मन बड़ा खुश रहा । लेकिन शाम को वह स्कूल से लौट रहा था, तो उसने फिर से अपनी वही आदतें दोहरानी शुरू कीं । रास्ते में धूल में जो कंकड़-पत्थर पड़े थे, उन्हें वह पैर के जूते से ठोकर मारने लगा । यानी राह चलते फुटबॉल…! यही तो उसका प्यारा शौक था ।

पर आश्चर्य, जब-जब वह जूते से ठोकर मारता, तब-तब बड़े जोर की आवाज आती, “अरे बचाओ, अरे बचाओ, मुझे निक्का से बचाओ !” देखते ही देखते वहाँ बहुत से लोग इकट्ठे हो गए । सब हैरानी से देख रहे थे, कि यह आवाज कहाँ से आ रही है । एक बूढ़े आदमी ने कहा, “मुझे तो लग रहा है, यह आवाज निक्का के जूतों में से आई थी ?”
“पर यह कैसे हो सकता है ?” बाकी लोग बड़े अचरज से निक्का के जूतों को देखते हुए कह रहे थे ।

निक्का को यह अजीब लगा । पर वह सि र झटककर बेपरवाही से आगे चल पड़ा । थोड़ी देर बाद उसने फिर जूते से ठोकरें मारीं, तो उसमें से बड़े जोर की घंटी बजी, जैसे आग लगने पर फायर ब्रिगेड की घंटी बजती है । ‘आग…आग…आग…!’ अब तो सारे लोग आकर निक्का के इर्द-गिर्द खड़े हो गए । वहाँ लोगों की अपार भीड़ जुटने लगी । सब पूछने लगे, “अरे भई निक्का , क्या हुआ ! क्या हुआ निक्का ? क्या तुम्हा रे जूते में आग लग गई ? आखिर कौन सी इमरजेंसी आ गई ।” कुछ लोग निक्का के पापा को भी जानते थे । उन्होंने बड़ी हमदर्दी से कहा, “क्यों निक्का , सब ठीक तो है न ? कोई मुश्किल हो तो हमें बताओ । कहो तो
तुम्हारे पापा को फोन करके बुला दें ।” लोगों की इतनी भीड़ दखे कर निक्का घबरा गया । मुँह छिपाकर सीधे घर की ओर भागा ।

हालाँकि पुरानी आदत आसानी से कहाँ छूटती है ? दो-एक दिन ऐसे ही राह चलते अजीबोगरीब नाटक हुआ । लोगों की भारी भीड़ जुट गई । लोग उसकी ओर इशारा कर-करके हँस रहे थे । एक ने तो कहा भी, “यह जो छोटा-सा निक्का है न, बार-बार इसी के जूतों में आग लग जाती है, न जाने क्यों ? तभी तो फायर ब्रिगेड का अलार्म बजता है इतनी जोर से ।” निक्का को बड़ी शर्म आई । फिर तो जल्दी ही जूते से ठोकर मारकर चलने वाली आदत उसने छोड़ दी । अब उसके जूते हर वक्त चम-चम चमकते । लगता, जैसे बिल्कुल नए हैं । बड़े दिनों से वे फटे भी नहीं थे ।
मम्मी खुश । अब उन्हें कभी नहीं कहना पड़ता था कि ‘निक्का , अपने जूते सँभाल ! भला ये इतनी जल्दी -जल्दी फटते क्यों हैं ?’

ये कहानी ‘बच्चों की 51 नटखट कहानियाँ’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानी पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएंBachchon Ki 51 Natkhat Kahaniyan बच्चों की 51 नटखट कहानियाँ