Hindi Motivational
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Hindi Motivational: सुरक्षा जांच की औपचारिकता पूरी कर जैसे ही मैं बिज़नेस लाउन्ज में पहुंची मेरी नज़र एक अति सुंदरी साध्वी पर पड़ी। गोरा ओजमय चेहरा,सुभग नासिका और गुलाबी पतले होंठ जो लगातार मंत्रोचार में व्यस्त दिखे। उम्र कुछ 45 के आसपास होगी। मैंने बगल के सोफे पर अपना बैग रखा और हाथ-पांव फैला लिए पर जाने क्यों नज़रें बार -बार उसी चेहरे की ओर खिंचने लगी।

ये भी अलग ही मनोविज्ञान है कि जिस ओर देखना न चाहे नज़रें उधर ही जाकर टिकती हैं। चंद ही मिनटों बाद जब युवा साध्वी ने आँखें खोली तो उसकी निगाहें मुझ पर आ टिकीं। पल भर के लिए ही नज़रें मिली और मुझे एक भूला हुआ चेहरा याद आ गया। ओह! ये तो मंदा है तभी नज़रें उस ओर ही भटक रही हैं। क्या मंदा ने भी पहचान लिया है मुझे ? जब मुझसे रहा न गया तो बढ़कर पूछ ही लिया क्या आप चंडीगढ़ से हैं?

“हाँ ! मैं तुम्हारी सखी मंदा ही हूँ एक कांफ्रेंस के लिए स्विट्जरलैंड जा रही हूँ।” खंजन चिरैया जैसी बड़ी-बड़ी बोलती आँखें मेरी ओर देखने लगी।

“अरे वाह! तुम्हारा साथ मिल गया है तो मेरा सफर आसानी से कट जायेगा।” मैं भावावेश में बोली पर मेरी चंचला सखी ने बेहद गंभीर मुद्रा में जवाब दिया।

“सफर! हुंह.. सफर आसानी से नहीं कटा करते …कभी-कभी तो यह व्यक्ति का पूरा चरित्र ही बदल देते हैं।”

उसके जवाब पर सहसा मनु की बात याद आ गई। मनु यानी मनीष मेरा इकलौता बेटा बाप बनने वाला है तभी तो आनन फानन में मुझे अमेरिका बुलाया है। इस वक्त बच्चों को मेरी जरूरत है तो मैंने भी खुशी-खुशी अपनी रजामंदी दे दी। सुबह जब घर से निकली तो जेहन में एक ही ख्याल था कि दुबई एयरपोर्ट पर आठ घंटे कैसे बीतेंगे। इसी चिंता में थी कि मोबाइल पर मनु का संदेश आया।

“आप लेखिका हो माँ! आपको कोई न कोई किरदार मिल ही जायेगा..फिर आपको वक्त का पता ही नहीं चलेगा।”

कभी -कभी अनजाने में जो बात कही जाती है वह अनायास ही सच के रूप में सामने आती है और हम यह सोचने के लिए मज़बूर हो जाते हैं कि बिना उपरवाले की मर्ज़ी के एक पत्ता भी नहीं हिलता। हां! मेरा बेटा बिल्कुल सही था। मुझे मेरी नई कहानी का खूबसूरत किरदार मिल गया था।  

हमारी बातें होने लगीं। फिर तो मंदा ने अपना समग्र जीवन मेरे सामने खोलकर रख दिया। गृहस्वामिनी बनने से गृहत्याग करने तक की कहानी को वहीं से शुरु किया जहां हमने अपना बचपन साथ बिताया था। बाद में पिताजी के तबादला हो जाने के कारण हम बिछड़ भी गए थे।

“तुझे मनवीर याद है…?”उसने पूछा।

“वो जो उन दिनों तेरा पीछा करता स्कूल तक आता था?”
मुझे वह गोरा सा लड़का कभी भूला ही नहीं था। मनवीर उसके घर के ठीक सामने रहता था। उसकी हर गतिविधि पर अपनी नजरें टिकाए रहता मानो उसने खुद को मंदा का जासूस नियुक्त कर लिया हो। रोज ही वह स्कूल तक चला आता। मुंह से कुछ नहीं कहता बस स्कूल से आने -जाने के रास्ते में पीछे- पीछे चलता। शायद खूबसूरत पड़ोसन पर अपना अधिकार छोड़ना ही नहीं चाहता था। डरता था कि एक दिन भी पीछा छोड़ा तो उसकी खंजन चिड़िया को कोई और ना उड़ा ले जाये।

“हां वही! एक रविवार जब माँ घर पर थी तब मनवीर को माँ से यह कहते हुए सुना कि वह मुझसे बहुत प्यार करता है और मुझसे शादी करना चाहता है! यह सुनते ही मेरा सिर भन्ना गया। गुस्से से पारा गर्म हो गया तो सामने आकर बोल पड़ी, क्यों प्यार करते हो मुझसे क्यूंकि मैं खूबसूरत हूँ ! इस घर में नौकरानी की तरह क़ैद में रही और फिर तुम्हारे घर में क़ैद कर दी जाऊँ ! मुझे ये रिश्ता हरगिज़ मंज़ूर नहीं! मेरे आक्रोश के आगे माँ चुप हो गयी फिर माँ से भी जवाब तलब किया,’ नौकरानी तो मैं हूँ ही अब मनवीर जैसा नौकर मिल गया तो आपकी तो ऐश हो जाएगी।’उस रोज मेरे क्रोध के आगे माँ की एक न चली और मनवीर का किस्सा वहीं ख़त्म हुआ। कहीं न कहीं मेरे लिए मन ही मन यही सपने संजो रखे थे जो अब धराशायी हो चुके थे।  जैसे जैसे मैं बड़ी होने लगी वैसे ही वैसे और भी रिश्ते आने लगे। जब भी कोई रिश्तेदार मिलने आता,रिश्ते की बात चला देता। सामान्य बातचीत मुझे कभी बुरी नहीं लगती थी मगर जब भी कोई मेरी खूबसूरती की चर्चा करता मैं हत्थे से उखड़ जाती। एक दिन जब कुछ सहेलियों ने मेरी नाराज़गी की वजह पूछी तो मैंने उन्हें बताया कि मेरी नाराजगी अपने आप से है। खूबसूरती की खूब सजा पाई है मैंने। मेरी माँ हमेशा मेरे छोटे भाई के साथ ही कहीं भी आतीं -जातीं और मेरे जिम्मे घर के सारे काम छोड़ जातीं। वह नौकरी करती थीं और मैं अपनी दादी के साथ ही घर में रहकर घर के सारे काम-काज संभालती। मेरा बचपन बस यही सुनते हुए निकला कि ‘बाहर जाएगी तो लोग पीछे पड़ेंगे तू बहुत खूबसूरत है न!’यही कारण है कि मुझे खूबसूरत शब्द से नफरत हो गयी है।”

“इसके बाद क्या हुआ…?”

उसका दुख सुनकर बड़ा बुरा लग रहा था। उसकी बातों में कुछ तो था जो मुझमें भी कुछ पैदा कर रहा था। हां! एक जिज्ञासा ने जन्म ले लिया था। हिंदी के सफर और अंग्रेज़ी के सफ़र में ज्यादा अंतर नहीं लग रहा था। उसकी जगह कोई और भी होता तो उसे भी खूबसूरती से उतनी ही नफरत होती जितनी उसे थी। इसी खूबसूरती ने उसे पहरे में रखा और समय से पूर्व ही परिपक्व भी बना डाला।


“मनवीर को मना करने के बाद मेरा विवाह एक बहुत अमीर घराने में किया गया। यहाँ भी सभी मेरी खूबसूरती के दीवाने हो गए पर वो ना हुआ जिसे होना चाहिए था। पहली रात से लेकर आखिरी रात तक लगभग हर रोज़ ही कुलदीप एक ही सवाल करता,

“तू इतनी खूबसूरत है तो तेरा कोई तो लफड़ा होगा। …….! “

जब भी यह सुनती तब समझाती कि मुझे इन चीज़ों में कभी कोई रूचि न थी तब अगला सवाल, “मुझ जैसे कुरूप के साथ तुमने शादी क्यूं की ? दुनिया के आगे मेरा मज़ाक बनाने के लिए ?” हीन भावना से ग्रसित उसकी बातों से दिल ऊब चला था। सच तो यह है कि मैंने कभी किसी से प्यार किया ही नहीं था। पति के रूप में कुलदीप को पाकर उससे जितना ही नर्म व्यवहार करती वह मेरे साथ उतना ही कठोर व्यवहार करता। मेरे समर्पण को अपना अपमान समझता। ससुराल वालों का कपड़ों का व्यापार था। सभी साथ ही रहते थे। एक दिन तो हद ही हो गयी जब सास ने मुझसे पूछे बिना ही यह एलान कर दिया कि मेरा पहला बच्चा ननद को दिया जायेगा क्यूंकि वह निःसंतान है। 

मैं पेट से थी। पहली बार मेरी सेवा हो रही थी पर मेरे लिए नहीं बल्कि उस शिशु के लिए जो मुझे किसी और को देना था। समय पूरा होते ही बेटी हुई। बिल्कुल मेरा ही नन्हा रूप। उसे देखते ही मेरे अंदर ममत्व उफान लेने लगा। मैं उसे अपनी नजरों से ओझल नहीं करना चाहती थी पर कुलदीप ने साथ न दिया। जब मर्द ही मर्द की तरह पेश न आए तो कैसा लगता है यह तब महसूस किया। जिसके साथ होकर भी अकेली थी उसके साथ रहने का कोई मतलब न था तब मैंने तय कर लिया कि अब अपनी सीमाओं को स्वयं तोडूंगी। इस बार न तो झुकना और न रुकना है। जब छोटी सी उम्र में माँ का विरोध किया था तब अकेली थी मगर अब मेरे साथ मेरी एंजेल थी। मेरा जीता- जागता खिलौना,मेरी अपनी बेटी मेरे साथ थी। मैंने न तो किसी से पूछा और न ही किसी को कुछ बताया। अपनी बच्ची को साथ लेकर घर छोड़कर निकल आई। मायके आकर ही अपनी बेटी का लालन पालन किया। बेटी पढ़ लिख कर नौकरी करने लगी है और मैंने सन्यास ले लिया है।”

मेरा कौतुहल देखा तो वह भी आइने की तरह पारदर्शी होती चली गई। उसने सबकुछ मेरे आगे खोलकर रख दिया। सच कहूं तो वैराग तो उसने बचपन में ही ले लिया था तो भला सुहागन की जिंदगी कैसे बसर करती। 

आज अपनी चिरयौवना सखी से अनायास मिलने को इत्तेफ़ाक़ नहीं बल्कि ईश्वर प्रदत्त एक अवसर कहूँगी। सफर के दौरान उससे हुई बातों ने उसका थोड़ा तो दर्द कम किया ही होगा। बिछड़ने का समय नजदीक आया तो उसकी खूबसूरती का राज पूछ लिया,

” जाते जाते ये तो बता दे कि तू इतनी कम उम्र कैसे दिख रही है?”

“पिछले दस वर्षों से इस्कॉन मंदिर की सेवा में हूँ। कृष्णा से प्यार करती हूँ इसलिए तरुणाई लौट आयी है। “

यह बोल कर वह बेबाक हंस पड़ी और मैं सखी से लिपट गयी। कहते हैं न सच्चे दोस्तों के संगति से दुःख घटता है। मंदा के चेहरे पर भी आत्मसंतोष की झलक आ गई तो वह पुनः ध्यानमग्न हो गई,

“हरे रामा -हरे कृष्णा.. हरे कृष्णा हरे -हरे ….हरे कृष्णा- हरे रामा …हरे रामा हरे -हरे ….”

फ्रैंकफर्ट के लिए फ्लाइट की बोर्डिंग शुरू हो गई तो सखी से विदा लेते हुए आंसू के कुछ बूंद आँखों के एक कोने में आ रुके। रुंधे गले से उसका नाम भी न निकला तो तेज़ कदमों से बाहर निकल आई। अपने पौत्र को देखने के जोश ने सखी से बिछड़ने के दुःख को कम कर दिया था।