Hindi Love Story
Hindi Love Story

 Hindi Love Story: शांति गहरी होती चली जा रही थी और भावना के दिल की धड़कनें भी तेज होने लगी थीं। बालकनी में चुपचाप बैठी हुई भावना अपने जीवन को वरदान या अभिशाप के रूप में देखने में इतनी व्यस्त हो गई थी कि उसे समय और स्वयं का कोई ध्यान नहीं था वह बिल्कुल एक निर्जीव बनने लगी थी आखिर बात ही कुछ ऐसी थी कि कोई भी व्यक्ति असमंजस में पड़ जाए उसके पास रखी हुई डायरी और कलम उसकी उंगलियों के स्पर्श की प्रतीक्षा कर रही थीं कि कब वह उनका स्पर्श करके भावनाओं को शब्दों की आकृति देकर उन्हें सार्थक बनाएगी ” भावना का ध्यान अचानक एक बच्चे की आवाज से टूटता है। वह देखती है बालकनी के नीचे एक बच्चा आवाज दे रहा है – ” मेरी पतंग आपकी बालकनी में आ गई है मुझे वापिस दे दीजिए “।

भावना अपने ” वात्सल्य प्रेम ” को स्वीकार करती हुई उस बच्चे को उसकी पतंग लौटाकर अपने ” निस्वार्थ प्रेम की झलक ” दिखाती है। अपने मन को थोड़ा आराम देकर भावना दोपहर का भोजन बनाना शुरू कर देती है और फिर कुछ देर बाद दरवाजे की घंटी बजती है और भावना दरवाजा खोलती है सामने मनोज खड़ा होता है। मनोज भावना से कहता है – ” जी अंदर आने की अनुमति है “। भावना मुस्कुराते हुए कहती है – ” जी ज़रूर आइए “। 

मनोज और भावना बचपन के मित्र हैं और एक – दूसरे के साथ हर परिस्थिति में कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहते हैं। मनोज कहता है – ” भावना मुझे मालूम है कि जो भी तुम्हारे साथ हुआ वह सही नहीं हुआ है और तुम्हारे जीवन में अभी निरसता नहीं है ईश्वर अवश्य तुम्हारी प्रार्थना को स्वीकार करेंगे तुम इस बार मां नहीं बन पाईं कोई बात नहीं अगली बार तुम अवश्य मां बनोगी “। भावना हल्की – सी मुस्कान के साथ मनोज से कहती है – ” मनोज तुम्हारा बहुत – बहुत धन्यवाद। तुम्हारा साथ मेरे जीवन में बचपन से रहा है मगर मनोज मेरा यह जीवन ” वात्सल्य प्रेम ” स्वीकार करेगा या नहीं मगर मेरे ” निस्वार्थ प्रेम की झलक ” मेरे इस जीवन में हमेशा बनी रहेगी क्योंकि एक स्त्री जब मां का रूप धारण करती है तो प्राथमिकता के अनुसार उसे निस्वार्थ प्रेम को महसूस करना होता है और मैं उसे महसूस करना चाहती हूं “। मनोज कहता है – ” मुझे यही उम्मीद थी “। भावना कहती है – ” यह सब छोड़ो मनोज यह बताओ तुम चाय पियोगे या फिर कॉफी “। मनोज कहता है – ” तुम्हारे हाथों से बनी हुई कॉफी “। 

थोड़ी देर बाद मनोज और भावना बालकनी में कुर्सी पर बैठकर कॉफी पीने लगते हैं। तभी दरवाजे की घंटी बजती है भावना दरवाजा खोलती है और आलोक को देखकर कहती है – ” आलोक सही समय पर आपका घर आना हुआ है मनोज भी आज मिलने आया है “। आलोक मनोज को कॉफी पीते हुए देखता है और पूछता है – ” मनोज कॉफी कैसी है ? मनोज मुस्कुराते हुए कहता है – ” बहुत अच्छी है आप भाग्यशाली हैं आपको प्रतिदिन अच्छी कॉफी पीने को मिलती है “। सभी मुस्कुराने लगते हैं। सभी बातें करने लगते हैं और इतने व्यस्त हो जाते हैं कि समय का पता ही नहीं चलता कि शाम ने दरवाजों और खिड़कियां पर दस्तक देना शुरू कर दिया है। मनोज के फोन की घंटी बजती है और वह किसी कम से चला जाता है। खुशनुमा माहौल अब नीरस होने लगता है। माता – पिता बनने की उनकी ख्वाहिश अब दर्द बनकर उनके साथ में रहने लगती है। दोनों बिना कुछ बोले अपने दर्द को याद करते रहते हैं ” वात्सल्य प्रेम ” और ” निस्वार्थ प्रेम की झलक ” धुंधली रहती है। 

अगले दिन की सुबह आलोक बिना कुछ बोले चुपचाप बालकनी में बैठ जाता है। यह सब देखकर भावना आलोक से पूछती है -” आलोक क्या आपको बहुत बुरा लग रहा है ” ? आलोक कहता है – ” भावना बुरा तो नहीं लग रहा है मगर मेरा हृदय बहुत रोने लगता है यह सोचकर कि हम कभी माता – पिता बन पाएंगे हमारे घर के आंगन में बच्चों की मुस्कान और किलकारी सुनाई देगी या नहीं “। भावना रोते हुए कहती है – ” आलोक मुझे माफ कर दो मैं तुम्हारी दोषी हूं शायद मुझमें कोई कमी है मैं ही तुम्हारी तकलीफों का कारण हूं “। आलोक और भावना एक दूसरे को गले लगकर रोने लगते हैं। भावना कहती है – ” हमारा यह जीवन ” वात्सल्य प्रेम ” स्वीकार करेगा या नहीं मगर हमारे ” निस्वार्थ प्रेम की झलक ” हमारे इस जीवन में हमेशा बनी रहेगी क्योंकि व्यक्ति जब माता – पिता का रूप धारण करते हैं तो प्राथमिकता के अनुसार उन्हें निस्वार्थ प्रेम को महसूस करना होता है और हमें उसे महसूस करना चाहिए “। आलोक कहता है – ” तुमने सही कहा है भावना हमें भी यही करना चाहिए एक – दूसरे का हाथ पकड़कर। 

आलोक और भावना एक – दूसरे को संभालते हुए अपनी जिंदगी को जीने की कोशिश करते हैं और अपनी दैनिक दिनचर्या में वापसी आ जाते हैं। आलोक अपने दफ़्तर चले जाते हैं और भावना अपनी किताबों और कल्पनाओं की दुनिया में चली जाती है। शाम को आलोक घर आ जाता है और दोनों बालकनी में बैठकर कॉफी पीने लगते हैं। एक – दूसरे की तरफ देखकर दोनों रोने की कोशिश करते हैं तभी एक बच्चे की आवाज आती है – ” मेरी पतंग आपकी बालकनी में आ गई है मुझे वापिस दे दीजिए ” । आलोक और भावना दोनों बालकनी से नीचे देखते हैं एक बच्चा उनकी तरफ देखकर मुस्कुरा रहा था। भावना कहती है – ” आलोक यह वही बच्चा है जिसने मुझे इस तकलीफ़ से बाहर निकाला है यह बच्चा ही हमें जीवन का आनंद लेना बताएगा “। आलोक और भावना दोनों नीचे जाकर उस बच्चे के साथ में पतंग उड़ाते हैं और खेलने लग जाते हैं दोनों अपनी तकलीफों को पीछे छोड़ चुके थे और ” वात्सल्य प्रेम ” को स्वीकार करके ” निस्वार्थ प्रेम की झलक ” का आनंद लेने लगते हैं।