Hindi Social Story
Hindi Social Story

Hindi Social Story: जगदीश बाबू घर के मुखिया  खानपान में बड़े शौकीन व्यक्ति थे, भोजन में घी-दूध से विशेष प्रेम था|
 भोजन करते समय उनकी दाल के साथ अलग से कटोरी में हींग ज़ीरे की बघार अलग से रखी जाती  थी, अगर कभी चूक हो जाती तो वह मन से भोजन न करते।
 उन्हें प्रसन्न करने के लिए बस देशी घी का नाम ही पर्याप्त होता। सब कुछ उन्हें देशी घी में बना ही पसन्द आता।
सेवानिवृत्ति के बाद उनके दो ही काम थे बढ़िया खाना,  और पूजापाठ ।
उनका हर कपड़ा रोली सिंदूर से अक्सर सराबोर रहता और अच्छा भोजन खाने पर हाथ आशीर्वाद से।
परन्तु हृदय रोगी हो जाने के बाद से  से  उनकी पत्नी प्रभाजी  उन्हें डॉक्टर के कहे अनुसार रोज बस थोड़ा सा ही घी  दाल के साथ देतीं।
बड़ी बहू तो उन्हें डॉक्टर की राय और  सास की आज्ञानुसार  घी, मक्खन के दूसरे विकल्प देती पर उनका मन न भरता।
 अब  छोटे बेटे के ब्याह के बाद से शर्माजी के पास  दो बहुओं के विकल्प  हो गए थे ।
अपनी बात मनवाने के क्योंकि  उस को अभी ज़्यादा जानकारी न थी।
जैसे ही उनकी थाली सजी उन्होंने प्रेम से भोजन किया और घी की अलग बघार की कटोरी देख कर तो छोटी बहू पर अति प्रसन्न हो गए।
खूब सारे आशीर्वाद के साथ मोटा नेग भी दिया बहू को, अब सभी घरवाले खा-पी कर आराम करने लगे।
 सन्ध्या-आरती का भी समय हो गया और दिसंबर का महीना था सो रोली आरती की तैयारी करने लगी दीपक में घी कम होने की खबर उसने जब प्रभाजी को दी।
तो  प्रभाजी ने किरण से कहा, “अपने कमरे से घी की बाल्टी निकाल लाओ| “
रोली को आश्चर्यचकित नज़रो से अपनी तरफ देखते हुए वो नज़रे झुका कर बोलीं, “यहाँ घी दूध दो लोगों से बहुत बचाना पड़ता है, एक बिल्ली से और दूसरा तुम्हारे ससुर जी से ।
उन्हें जितना घी पसन्द है उतना ही नुकसान करता है तो छुपा के रखना पड़ता है।”
 तब तक किरण परेशान होते हुए वापस आयी, मम्मीजी !लगता  है कि पापा फिर से  उठा ले गये।”
किरण ने अपनी तीन वर्षीय बेटी कोमल को बाबा के तख्त के नीचे झाँकने को कहा तो वहाँ बाल्टी भी  मिल गयी घी की| पर …जमें हुए घी के बीच में बहुत बड़ा गड्ढा भी था|

“हाय-हाय !लगता है बुढ़ऊ, फिर कहूँ छुपाये धरे हैं घी वो दुःखी हो कर बोलीं, इन्हें खुद से कोई प्रेम नहीं है”प्रभाजी रूआंसी होकर बोलीं।
उधर शर्माजी के मासूम चेहरे पर विजयी मुस्कान थी।हम भी देखेंगी कि बुढ़ऊ कब तक चुरा के घी खायेंगे।
उन दोनों के बीच घी को लेकर तू डाल-डाल मैं पात-पात वाली स्थिति होती और बहुओं के पेट में हँस-हँस कर बल पड़ जाते।
तीन दिन बाद  रोली को रसोईघर में देख शर्मा जी ने  उसकी तरफ कटोरी में घी रख के बाहर से खिसका कर कहा, “रोली! घी की बघार बना देना लेकिन अपनी माताजी को मत बताना।”
रोली को भी उनका मासूम चेहरा देखकर बड़ी दया आयी, बच्चे और बूढ़े एक जैसे ही होते है ये सोचकर  उसने उन्हें बघार तैयार कर के दे दी|
दोपहर में उसने  प्रभा जी से कहा, “माताजी अगर हम सब ऐसे सख्ती करेंगे तो शायद पापाजी का मन ज्यादा होगा। अगर हम लोग उन्हें थोड़ी सी घी की  बघार दे देंगे तो हो सकता है वो इतना ज्यादा घी खाना खुद ही छोड़ दें। “
किरण ने भी हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा कि माताजी  थोड़ी नरमी बरतिएगा तो शायद पिताजी हमारी बात मान लें।
प्रभाजी उदास स्वर में बोलीं, कि ये मेरी तो सुनते नहीं हो सकता है तुम्ही लोगों से सुधर जाएँ। ऐसा हुआ भी मगर पिक्चर अभी बाकी थी…
शर्मा जी, ताक लगाकर रोली और किरण दोनों से बघार तैयार करवा कर बच्चों के जैसे छुपा कर रखते फिर हीटर के पास ही पिघला लेते।

एक दिन वो दाल में बघार मिलाने ही जा रहे थे कि प्रभाजी के आने की आहट से ही उनसे कटोरी छूट गयी और प्रभाजी ने सजा के तौर पर उनसे बातचीत बन्द करने का निर्णय ले लिया।
अबतो वाक़ई  उन्होंने घी खाना  बन्द कर दिया   एक हफ्ता बीत गया, प्रभाजी का दिल भी उन्हें  कम खाते देखकर पिघलने लगा।
पर शर्मा जी के सीधेपन का रहस्य उनकी क्या ,  सबकी समझ से परे था।
 उनमें सुधार देखकर प्रभाजी ने भी उनकी चौकीदारी ज़रूर बन्द कर दी |
शर्माजी ने  रोली को थोड़ा सा मक्खन देकर बघार तैयार करने को कहा। उसकी शादी को तो महीना भर ही हुआ था इसलिये वह ससुरजी को मना करने की स्थिति में नहीं थी।
वह प्रेम से भोजन करने के बाद आँगन में रखी चारपाई पे बैठकर धूप सेंकने लगे।
इधर  प्रभाजी ने  उनकी थाली देखकर पकड़ लिया कि ये रोज़ ही घी खाते हैं।
उनके कमरे की तलाशी लेने  के लिए उन्होंने  किरण को भी बुला लिया।मगर घी-मक्खन का कोई पता नहीं लग रहा था
आखिर ऐसे कहाँ धरे हैं ये रामजी!ज़मीन खा गई या आसमान निगल गया  अगर होता तो कहीँ तो दिखाई पड़ता।
अब प्रभा जी अपने शक़ करने की आदत पर पछता रहीं थी। इधर बाहर बैठे शर्मा जी को धूप में थोड़ी गर्माहट लगी तो उन्होंने स्वेटर और कुर्ता उतार दिया अब वह   इनर ही पहन कर धूप सेंकने लगे|
इनर पर पेट के पास एक  बड़ा सा  सिंदूर का दाग लगा था जो  अचानक  गीला होने लगा।
कोमल अंदर चिल्लाते हुए आई अम्मा! बाबा के पिट्टू (पेट )में  खून निकल रहा है।
 सब घबराते हुए आँगन में  भागे मगर शर्मा जी खुद को किसी को छूने भी नहीं दे रहे थे|
 बहुएँ तो पास जा नहीं सकती थीं।ऐसे में हथियार बनाया गया कोमल को, किरण ने उसे समझाकर कहा “देखो बाबा के कहाँ चोट लगी है?”
बालहठ के आगे तो भगवान की भी नहीं चलती,
कोमल ने जैसे ही बाबा का इनर ऊपर खिसकाया तो उनकी जेब वाली बनियान के अंदर से  निकला अमूल बटर का पैकेट जो धूप और शरीर की गर्मी पाकर पिघल गया था।
 इधर शर्माजी का गोलमाल पकड़ा गया, उधर प्रभाजी की बड़बड़ा रही थीं ,” बाबा बन गए लेकिन इनका बचपना न गया।”