Little story of a little pen
Little story of a little pen

Funny Stories for Kids: पता नहीं कब निक्का के मन में कविता लिखने का चाव पैदा हुआ । पर अब तो अपने आसपास जो भी चीज वह देखता है, उस पर झटपट कविता बना लेता है । मम्मी उसे सुनती हैं तो निक्का की खूब बलैयाँ लेती हैं ।
पर निक्का ने पहली कविता कब लिखी ? लो, याद आ गया !…निक्का ने पहलेपहल कविता बनाई थी अपने बगीचे की एक नई क्यारी पर । उसमें फूल ही फूल उगे थे । तरह-तरह के रंग-बिरंगे फूल । हवा के झोंकों के साथ क्यारी के फूल मजे-मजे में अपना सिर हिलाते, और झूम-झूम जाते । निक्का ने देखा, तो बस देखता ही रह गया ।

उसके दिल ने कहा, “निक्का , ओ निक्का ! इस पर तू एक कविता लिख ।” “पर कविता…? मैंने तो पहले कभी लिखी नहीं कविता…!” निक्का समझ नहीं पा रहा था कि वह कविता कैसे लिखे ।
“पर तू लिख तो, लिखकर देख ।” उसके अंदर से आवाज आई । “अच्छा लिखता हूँ, लिखता हूँ अभी !” निक्का ने मन ही मन कहा । उसने फिर से फूलों की क्यारी पर एक नजर डाली । फिर कुछ सोचते हुए वह धीरे से गालों पर हाथ थपथपाने लगा । लगता था, कुछ बात बन रही है । पर अभी उसे पूरी तसल्ली नहीं हुई थी । कुछ देर वह ठुड्डी पर हाथ रखे बुद-बुद करता रहा । इस बीच उसकी निगाह लगातार आसमान में घुमड़ते बादलों पर ही टिकी हुई थी । जैसे उन बादलों में ही कोई कविता लिखी हुई हो,

जिसे वह कापी पर उतारना चाहता था । तभी उसे लगा, जैसे कोई जादू सा हुआ हो । और फिर एकाएक उसके भीतर से आवाज आई, ‘अरे, वाह रे वाह निक्का , कविता तो बन गई ।…’ उसके मन में बड़ी तेजी से कुछ पंक्तियाँ आ रही थीं, जा रही थीं । उसने पेन उठाया और झट काॅपी में कवि ता की ये लाइनें लिख लीं –

फूलों की यह संदुर क्यारी,
मेरा मन इस पर बलिहारी,
आ जा मिंटी, आजारी,
देख जरा फूलों की क्यारी !

लिखने के बाद निक्का को बड़ा अच्छा लगा । वह बार-बार कवि ता की इन लाइनों को मन ही मन दोहराने लगा ।
पर आगे क्या हो, निक्का को यह समझ में नहीं आ रहा था । तभी एकाएक निक्का का ध्यान अपने सात रंग के संदुर से गलुदस्ते की ओर गया । ‘अहा, अगर मैं इस संदुर गलुदस्ते पर भी कुछ लाइनें लिख लूँ तो कितना अच्छा होगा !’ निक्का ने अपने आप से कहा । कुछ देर तक वह क्या री के आसपास टहलता हुआ, अपने रंग-बिरंगे गुलदस्ते के बारे में ही सोचता रहा । थोड़ी देर में उसने अपने प्यारे गुलदस्ते पर भी बड़ी संदुर सी कवि ता बना ली । उसे भी उसने बोल-बोलकर पढ़ा । इसके बाद उसने गेंदे और गुलाब के फूलों की दोस्ती को लेकर दो छोटी-छोटी मजेदार कहानियाँ और लि ख लीं । ये कहानियाँ तो वाकई बड़ी अनोखी थीं । एक कहानी में गेंदा रूठ जाता है, तो गुलाब का फूल बड़ी अदा से उसे मनाता है । दूसरी कहानी में गेंदा और गुलाब दोनों मि लकर जाते हैं, एक बीमार
बच्चे को बहलाते हैं । कहानियाँ लि खकर निक्का मुसकरा उठा । उसने दौड़कर उत्सा ह से भरकर
उन्हें मम्मी और दीदी को सुनाया ।

मम्मी और दीदी ने तारीफ की तो निक्का समझ गया, उसकी कविताएँ और कहानियाँ पास हो गई हैं । फि र उसने दोस्तों को भी अपनी रचनाएँ सुनाईं । सभी
खुश, “अरे वाह, अपना निक्का तो लेखक बन गया !” कुछ दोस्तों ने कहा, “पर निक्का , ऐसा तो हम भी लिख सकते हैं ।”
“तो फिर लिखो न, कौन मना करता है.. ?” निक्का ने कहा । कुछ दोस्तों ने कवि ताएँ लि खकर निक्का को सुनाईं । कुछ ने कहानियाँ । कुछ ने चुटकुले । निक्का के कुछ दोस्त पि छले बरस गरमी की छुट्टि यों में घूमने गए थे । उन्होंने अपनी यात्रा का मजेदार वर्णन कि या । कुछ ने अपने नाना-नानी, दादा-दादी के बारे में बड़े अच्छे और प्यारे संस्मरण लिखे । एक ने अपनी छोटी सी नटखट बहन पर लिखा । एक और ने अपने बेस्ट फ्रेंड पर । निक्का के दोस्त शीलू ने ‘मेरी गली, यानी गली नंबर तीन लाजवाब’ शीर्षक से अपनी गली में रहने वाले लोगों पर बड़े जोरदार शब्दों में लिखा था ।

एक ने तो अपने स्कूल के रिक्शे वाले मोहना पर ही लिख दिया, एक ने घर में सफाई करने वाली बाई लखमा पर । एक ने अपने घर के नौकर हरिया पर बड़ा मजेदार लेख लिखा । निक्का उन्हें पढ़ता और तारीफ करता । उसे अपने दोस्तों की नई-नई रचनाएँ पढ़ना वाकई अच्छा लगता था । उसने अपने पापा से एक बड़ी सी लाल रंग की फाइल माँग ली थी । उसी में उन्हें इकट्ठा करता जाता ।
एक दिन उसके मन में आया, ‘क्यों न मोहल्ले के बच्चों की एक पत्रि का निकाली जाए ?’ उसने दोस्तों से कहा तो सबने कहा, “जरूर…जरूर !” पत्रि का का नाम भी तय हो गया, ‘नन्ही कलम’ ।
फिर उसने सोचना शुरू किया कि पत्रिका निकालने के लिए क्या -क्या काम
करने होंगे ? कौन से काम वह खुद करे, कौन से दूसरों को बाँटे ? ‘चलो, शुरुआत तो की ही जाए !’ सोचकर उसने पापा की फाइल के कुछ पन्ने निकालकर सभी रचनाओं को संदुर राइटिंग में लिखा । फिर उन पर चित्र भी बनाए । यहाँ तक कि बढ़ि या ड्राइंग शीट पर कैमल के रंगों से कवर भी खुद
बनाया ।

ड्राइंग बनकर तैयार हुई तो पूरी पत्रि का का फोटोस्टेट कराने के लिए वह शंकर अंकल के पास ले गया ।
शंकर अंकल पापा के दोस्त थे और बड़े ही प्यारे इनसान । उन्होंने देखा, तो खुश होकर कहा, “ठीक है, ‘नन्ही कलम’ के नन्हे संपादक जी, आपकी पत्रि का की मैं पच्चीस प्रतियाँ तैयार कर देता हूँ !”

यों ‘नन्ही कलम’ के पहले अंक की कुल पचीस प्रतियाँ तैयार हुईं । उनमें से बीस निक्का ने अपने मित्रों को बाँट दीं । बाकी पाँच में से तीन उसने मम्मी -पापा और दीदी को भेंट कीं । एक अपनी हिंदी की मैडम मिसेज कमला आचार्य को दी । और एक प्रिंसिपल हंसा मैडम को । देखकर सब हैरान थे । जैसे यकीन ही न हो रहा हो कि यह क्या जादू हो गया । नन्हे से निक्का की बड़ी छलाँग ! प्रिंसि पल हंसा मैडम ने बड़े ही अचरज से भरकर कहा, “तूने निक्का , तूने निकाली यह पत्रिका ? सचमुच कमाल कर
दिया !…फि र तो सब हम भी तेरी मदद करेंगे ।” अब ‘नन्ही कलम’ हर महीने सामने आती । उसमें मोहल्ले के बच्चों की रचनाएँ होतीं । और बड़े ही चटपटे, मजेदार समाचार । ही-ही-ही हँसाने वाले
चटपटे चुटकुले भी । सब पढ़ते और कहते, “वाह जी, वाह ! बच्चे भी चाहें तो क्या कुछ नहीं कर सकते ।”

ये कहानी ‘बच्चों की 51 नटखट कहानियाँ’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानी पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएंBachchon Ki 51 Natkhat Kahaniyan बच्चों की 51 नटखट कहानियाँ