Funny Stories for Kids: निक्का को टॉफियाँ खाना अच्छा लगता था और इधर तो कुछ दिनों से उसकी हालत यह थी, जैसे टॉफी में उसके प्राण बसते हों । खाने को एकबारगी रोटी न मि ले तो चलेगा…पर टाॅफी ? ना जी ना ! एक दिन मनपसंद रंग-बिरंगी टाॅफियाँ न मि लें तो लगता, “ओहो, आज का दिन कैसा मनहूस है !”
रोज वह सुबह-शाम मम्मी से कहता, “मम्मी …मम्मी , पैसे दो । टॉफियाँ लेनी हैं ।”
मम्मी कहतीं, “कि तनी टॅफियाँ खाएगा रे निक्का ! टाॅफी तो कभी-कभी खाने की चीज है । रोज-रोज इतनी टाॅफि याँ खाएगा तो दाँत खराब हो जाएँगे ।” “होने दो मम्मी , होने दो । पर मुझे टाॅफि याँ तो जरूर चाहि ए । टाॅफी न खाऊँ तो मुझे कुछ अच्छा ही नहीं लगता ।” निक्का मासूमि यत से कहता । सुनकर मम्मी ना-ना करते भी निक्का को बटुए से पाँच रुपए का सिक्का निकालकर देती थीं । निक्का दौड़ा -दौड़ा जाता । अपनी मनपसंद टॉफियाँ खरीदता और उन्हें जेब में रख, उछलता-कूदता घर आ जाता ।
पर ज़्यादा टॉफियाँ खाने से निक्का के दाँत खराब होने लगे । कभी-कभी पेट में भी दर्द होता । अब मम्मी टॉफी के लिए पैसे देने में आनाकानी करतीं । तब निक्का ने दूसरा तरीका निकाला । मम्मी जब रसोई में काम में लगी होतीं, वह चुपके से उनके बटुए में से पैसे निकालकर ले जाता । टॉफि याँ खरीदकर बाहर ही खा लेता । फि र उछलता-कूदता घर आ जाता ।
मम्मी कुछ दिनों से देख रही थीं, बटुए में रखे पैसे कम हो जाते हैं । वे समझ गईं, कि यह निक्का की शरारत है । पर उन्होंने निक्का से पूछा तो वह हँसते-हँसते बोला, “मैं क्या जानू मम्मी ?…मैं क्या जानू ?”
एक दिन की बात, दोपहर का समय था । मम्मी अपनी खाट पर लेटी हुई थीं । निक्का चुपके से उठा
और दूसरे कमरे में अलमारी में रखे बटुए को उठा लिया । अभी वह बटुए से पैसे निकाल ही रहा था कि अचानक उसे अजीब-सी, भरभराई आवाज सुनाई दी, “ठहरो…!”
निक्का चौंक गया । उसे लगा, जरूर कमरे में कोई भूत आ गया है, जिसने मेरी चोरी पकड़ ली है । घबराकर बोला, “तुम…तुम कौन बोल रहे हो ? क्या भूत…?”
“नहीं-नहीं, मैं बटुआ बोल रहा हूँ ।” फि र वही आवाज सुनाई दी, “साफ-साफ कह दो, आज तक कि तने पैसे चुराए हैं तुमने ?…नहीं तो तुम एकदम छुटकू से होकर इसी बटुए में बंद हो जाओगे, मक्खी की तरह ! बि ल्कुल मक्खी की तरह ।…समझ गए न ?”
“नहीं-नहीं, ऐसा मत करना । मैं…मैं साफ-साफ बताए देता हूँ ।” निक्का रोआसा हो गया । बोला, “अभी सिर्फ पंद्रह दिन से ही मैंने यह काम शुरू कि या है । रोजाना एक रुपया निकालता हूँ, मम्मी जब दोपहर में सो जाती हैं, तब ।… सुन लिया न प्यारे बटुए ? सॉरी, वेरी सॉरी ! आगे से मैं यह गलती नहीं करूँगा, कभी नहीं…कभी नहीं ! मुझे माफ कर दो ।”
“तो ठीक है, मुझे उसी जगह रख दो, जहाँ से तुमने उठाया था । और फिर कान पकड़कर तीन बार उठक-बैठक लगाओ । मन ही मन कहो– अब मैं चोरी नहीं करूँगा…नहीं करूँगा, नहीं करूँगा ।” फि र वही भरभराई आवाज सुनाई दी ।
निक्का ने झटपट बटुआ रखा । कान पकड़कर तीन बार उठक-बैठक की और मन ही मन जल्दी -जल्दी कहा, “ओ जी ओ, बटुए के भूत ! मैं कसम खाता हूँ कि अब मैं चोरी नहीं करूँगा…नहीं करूँगा…बि ल्कुल नहीं करूँगा ।” और अपनी खाट पर आकर लेट गया । देखा, मम्मी भी अपनी चारपाई पर उसी तरह लेटी हैं ।
उसका मन हुआ, वह मम्मी को उठाकर सारी बात बताए, पर अंदर ही अंदर वह डर भी रहा था ।
उस दिन के बाद जाने क्या हुआ, निक्का ने खुद ही टॉफि याँ खाना कम कर दिया । मम्मी कभी-कभी टॉफी के लि ए पैसे देतीं तो निक्का गुनसुन करके कहता, “नहीं मम्मी , रहने ही दो । क्या फायदा टॉफि याँ खाने से ? कहीं मेरे दाँत खराब हो गए तो…?”
हाँ, उसके बाद एक-दो बार निक्का ने मम्मी से डरते-डरते यह जरूर पूछा, “मम्मी -मम्मी , क्या तुम्हा रा बटुआ जादू वाला है ।…कभी-कभी बोलता भी है ?”
पर मम्मी कभी सीधे-सीधे इसका जवाब नहीं देतीं । हँसकर कहती हैं, “रहने दे निक्का , बटुआ भी कहीं बोलता है ! तूने जरूर कोई सपना देखा होगा ।”
ये कहानी ‘बच्चों की 51 नटखट कहानियाँ’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानी पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं – Bachchon Ki 51 Natkhat Kahaniyan बच्चों की 51 नटखट कहानियाँ
