Mummy, Mummy, make Dahi-Bade
Mummy, Mummy, make Dahi-Bade

Funny Stories for Kids: एक दिन निक्का अपने दोस्त गोगा के घर गया । गोगा की मम्मी ने बनाए थे खब बढ़िया दही-बड़े । निक्काने खाए तो मजा आ गया । उसने पहली बार खाए थे दही-बड़े । सोचा, ‘पता नहीं क्यों, मम्मी यह चीज नहीं बनाती । अब घर जाते ही कहूँगा, मम्मी, मम्मी, दही-बड़े बनाओ।’

निक्का गोगा के घर देर तक खेलता रहा, पर उसका ध्यान तो दही-बड़ों में ही अटका हुआ था । सोच रहा था, ‘काश, मैंने गोगा की मम्मी से कहकर एक-दो दही-बड़े और माँग लिए होते। वो मझे मना थोड़े ही ना करतीं ।…
आहा, कैसी बढ़िया चीज है, दही-बड़े ! पर पता नहीं क्यों, मैंने आज तक खाए ही नहीं । आज गोगा के घर न आता तो मझे पता ही न चलता कि दही-बड़ों में ऐसा अच्छा स्वाद होता है!’

गोगा के घर खब मस्ती करने के बाद निक्का अपने घर की ओर चल दिया । पर दही-बड़े अब भी उसका पीछा नहीं छोड़ रहे थे। सोच रहा था, ‘आज मम्मी के हाथ के बने दही-बड़े खाने हैं। दो-चार नहीं, जी भरकर खाऊँगा । पर कहीं मैं दही-बड़े का नाम ही भल गया तोू ?’ यह सोचकर निक्का रास्ते भर रटता रहा,‘दही-बड़े, दही-बड़े, दही-बड़े…अहा जी, दही-बड़े ! मैं खाऊँगा दही-बड़े, खबूसारे दही-बड़े !’

एक जगह तालाब के किनारे कुछ मजदर लकड़ी के मोटे-मोटे शहतीर उठा रहे थे। निक्का पास ही खड़ा होकर देखने लगा । जब वे भारी-भारी शहतीर उठाते तो एक साथ बोलते, ‘हैया हो, हैया हो…हैया हो!’

निक्का को उन्हें देखकर बड़ा अच्छा लगा । पर उसकी समझ में यह नहीं आ रहा था कि शहतीर उठाते वक्त सारे के सारे मजदर ‘हैया हो, हैया हो’ क्यों बोलते हैं? क्या यह कोई जादवालीू चीज है, जिसे बोलने से शहतीर एकदम हलके हो जाते हैं, उन्हें उठाने में ताकत नहीं लगानी पड़ती?
निक्का सोचता रहा, ‘किससे पछूूँ, किससे पछूूँ…कहीं कोई बरा मान गया तो!’

पर थोड़ीदेर बादसिर पर लाल रंग का मुँड़ासा बाँधे, बड़ी-बड़ी मँछोंवालाू एक खशुदिल मजदूर निक्का की ओर आया, तो निक्का पछे बगैरू न रहा,“अकल, जरा एक बात आप मुझे बताओगे ?”
“हाँ-हाँ, पछो बचुआ । क्या जानना चाहते हो तमु?” उस मजदरूने निक्का को गौर से देखते हुए कहा ।

“अकल, मैं जानना चाहता हूँ कि ये आप सारे लोग भारी-भारी शहतीर उठाते हुए ‘हैया हो…हैया हो’ क्यों बोलते हो? क्या इससे ये हलके हो जाते हैं?” निक्का ने थोड़ा झिझकते हुए पछाू ।

इस पर वह मनमौजी मजदूर इतना हँसा, इतना हँसा कि निक्का तो एकदम हक्का-बक्का ही रह गया कि भला इसमें इतना हँसने की क्या बात है? अरे, मेरे सवाल का जवाब नहीं दनेा चाहते तो न दो, मगर इतना हँसो तो नहीं न ! थोड़ी देर बाद बड़ी-बड़ी मँछों वाले उस लहीम-शहीम मजदूर की हँसीूरुकी तो उसने निक्का को समझाया, “अरे बचआ, ‘हैया हो’ कोई जादूवालीूचीज तो नहीं है, जिससे शहतीर हलके हो जाएँ। पर हम सारे लोग मिलकर ‘हैया हो’ कहकर शहतीर उठाते हैं तो मन में जोश भर जाता है। तब ये भारी- भारी शहतीर उठाने में जरा भी मशु्किल नहीं आती ।”

“ओहो, अकल, तब तो यह ‘हैया हो’ बड़ी अच्छी चीज है!” कहकर निक्का ने मजे से गरदन हिलाई, और मुस्कुराते हुए आगे चल दिया । उस खशुदिल मजदूर की कही बात अब भी उसके भीतर उथल पुथल मचा रही थी ।
थोड़ी देर बाद निक्काने सोचा, ‘अरे भई, मैं उस बढ़िया सी चीज का नाम तो दोहरा लँ, जो मैंने गोगा के घर खाई थी । कहीं भल ही गया तो !’

पर इतनी देर में वह दही-बड़े तो एकदम भूल ही गया था। उसे याद रहा, ‘हैया हो, हैया हो…हैया हो!’परे रास्ते वह ‘हैया हो’ ही रटता रहा । सोच रहा था, आज चाहे कुछ भी हो जाए, पर मैं मम्मी के हाथ के बने हैया हो खाकर ही रहूँगा ।

घर पहुचँते ही निक्का फौरन दौड़ता हुआ मम्मी के पास गया । ठुनककर बोला, “मम्मी तुम तो मुझे जरा भी प्यार नहीं करती हो!” सनुकर मम्मी चकराई । बड़े प्यार से बोलीं, “क्यों निक्का, ऐसे क्यों बोल रहे हो तमु?” इस पर निक्का ने मँह फुलाकर कहा, “मम्मी, तम मुझे कभी ‘हैया हो’ बनाकर तो देती नहीं हो! अगर तम मुझे प्यार करतीं तो क्या कभी हैया हो बनाकर न देतीं?…पता है, आज गोगा की मम्मी ने कै से बढ़िया-बढ़िया ‘हैया हो’ बनाए थे। तम भी झटपट बना दो ना, मेरी प्यारी मम्मी ।”
“हैया हो!…पर हैया हो क्या चीज है? मैंने तो आज तक इसका नाम नहीं सनुा ।” मम्मी ने हैरान होकर कहा ।

“सनुा है जरूर, बस तम कंजूस होू । मेरे लिए हैया हो बनाना नहीं चाहतीं । नहीं तो अब तक एक-दो बार तो जरूर बनाकर खिलाए होते, जैसे गोगा की मम्मी ने आज मुझे खिलाए हैं!” कहकर निक्का जोर-जोर से रोने लगा । निक्का के रोने की आवाज पड़ोस की रधिया चाची ने भी सनुी । वे दौड़ी- दौड़ी आईं। बोलीं, “क्या बात है देवयानी, निक्का क्यों रूठा हुआ है? देखो तो, बेचारे का मँह रो-रोकरु दही-बड़े जैसा सज गया हैू ।” सनुते ही निक्का का रोना एकदम बंद । उछलकर बोला, “मम्मी…मम्मी, अब याद आ गया । हैया हो नहीं, दही-बड़े…! तम मुझे दही-बड़े बनाकर खिलाओ। अभी के अभी, बिल्कुल अभी ।”
“ओहो! तम मुझे दही-बड़े कहते निक्का, तो अब तक तो बन भी गए होते।” कहकर मम्मी खब जोर से हँसींू । उसी समय मम्मी ने प्यार से दही-बड़े बनाए। निक्का ने जी भर खाए, साथ ही रधिया चाची ने भी । हाँ, निक्का का दही-बड़े और हैया हो वाला किस्सा परे अलबेलापूर में इस कदर फैला कि वह
जिधर भी जाता, लोग उसे रोककर पछते, “निक्का रे निक्का, सच-सच बता, हैया हो खाएगा या दही-बड़े ?”

सनुते ही शर्म से निक्का का चेहरा लाल हो जाता । उस दिन के बाद वह दही-बड़े का नाम कभी नहीं भलाू । और हाँ, दही-बड़े तो वह आज भी बड़े ही शौक से खाता है। कभी-कभी खाते-खाते ही गाने भी लगता है –

दही-बड़े जी, दही-बड़े, खाओ भाई दही-बड़े ।
बड़ा चटपटा स्वाद निराला,
जाने क्या-क्या इसमें डाला,
खाकर जी होता मतवाला,
इसीलिए तो ठेले पर
खाते बाब, खाते लाला ।
तम भी खाओ खड़े-खड़े
दही-बड़े जी, दही-बड़े,
खाओ भाई, दही-बड़े…!

निक्का के दोस्त इसे सनुते हैं तो बड़े खश होते हैं, और फिर राम जी की दुआ से कहीं न कहीं दही-बड़े पार्टी का इतजाम भी हो ही जाता हैं । कभी निक्का के घर, तो कभी गोगा या शील के घरू । और खाकर हँसते-हँसते सब कहते हैं, “अरे बाबा रे बाबा, ये दही-बड़े तो बड़ी कमाल की शै हैं। कितना ही
खाओ, मगर जी कभी भरता ही नहीं ।…शायद भगवान जी ने इसे खास तौर से हम बच्चा-पार्टी के लिए ही बनाया होगा!”
इस पर बड़े जोर की हा-हा, ही-ही हवा में गँजूने लगती है, जिसमें निक्का की खदुर-खदुर सबसे अलग पहचान में आ जाती है।

ये कहानी ‘बच्चों की 51 नटखट कहानियाँ’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानी पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएंBachchon Ki 51 Natkhat Kahaniyan बच्चों की 51 नटखट कहानियाँ