andher grehlakshmi kahani



गृहलक्ष्मी की कहानियां: कभी सभ्यता-संवेदना के पर्याय रहे हमारे नगर-महानगर आज कितने रसातल में जा पहुँचे हैं। हम छोटे से सुख और छोटे-छोटे स्वार्थों के लिए कितने घिनौनेपन पर उतर आए हैं। हमारी मानवता, संवेदना कितनी जड़ हो गई है। इन तमाम सवालों को समेटे, एक ऐसे ही महत्वपूर्ण केस की अदालत में सुनवाई चल रही थी। कोर्ट खचाखट भरा था। मामला मानवाधिकार को लेकर था। बड़ी सी कुर्सी पर बैठे माननीय न्यायाधीश महोदय, गंभीरता से बहस सुन रहे थे।

‘जज साहब! ये तो मानवाधिकारों का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन है। बड़े से बड़े अपराधी को भी अपनी बात कहने का मौका दिया जाता है और इन पर तो अभी अपराध सिद्ध भी नहीं हुआ था कि पुलिसिया करतूतों के चलते उनकी जान चली गई।’

अपनी दलील को पुख्ता करते हुए वकील साहब ने बतौर सबूत कई गवाह भी पेश किये। ताकि यह बात साबित हो सके कि पुलिस ने फर्जी मुठभेड़ दिखाकर इन युवकों की जान ले ली।
जोश में आए वकील साहब ने इसके बाद पुलिस की जमकर फजीहत की। जितने भी विशेषणों से वह नवाज सकते थे, उसमें उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी।

जज साहब ने उस दिन की कार्यवाही वहीं समाप्त कर दी और अगली सुनवाई की तिथि निर्धारित कर दी। जज साहब के उठते ही कोर्ट खाली हो गया।

सुनयना भी वहीं बैठी थी। भीड़ निकल जाने के बाद वह पास ही कुर्सी से उठ खड़ी हुई और बड़ी बहन नलिनी का हाथ थामकर कक्ष से बाहर निकल आई। उसने आँखों में गहरा काला चश्मा चढ़ा रखा था। पर चेहरा उसका बड़ा ही विद्रूप और डरावना लग रहा था। ठुड्डी के मांस का लोथड़ा न जाने कैसे नीचे लटक कर गले से चिपक गया था।

लोगों का कहना था कि, यह युवती कभी बेहद खूबसूरत थी। आँखें हिरनी सी सुंदर और जादुई। माँ-बाप ने इन्हीं आँखों पर रीझकर उसे नाम दे दिया-सुनयना। ज्यों-ज्यों वह बड़ी हुई, और निखरती चली गई। दिखने में वह जितनी सुन्दर थी उतनी ही पढ़ने में कुशाग्र भी। लोग उसकी सुंदरता के कायल थे। कॉलेज से लेकर बाहर तक उसी के चर्चे रहते। हर कोई उससे दोस्ती गाँठने को लालायित रहता।

वह अपनी ही दुनिया में मस्त थी। इसी बीच उसे लगा कि उसका एक सीनियर जब तब उसके आस-पास मँडराता रहता और जब-तब फब्तियाँ कसता। शुरू-शुरू में तो सुनयना ने उसे कुछ खास गंभीरता से नहीं लिया। लेकिन जब वह धीरे-धीरे अपने कुछ सिरफिरे आवारा किस्म के साथियों के साथ अक्सर उसके घर के बाहर खड़ा रहने लगा, तो उसने इसकी शिकायत अपने मम्मी-पापा से कर दी। घर में भी चिन्ता बढ़ गई। जवान बेटी को लेकर उनका चिंतित होना स्वाभाविक भी था।

तीन संतानों में सुनयना मँझली संतान थी। बड़ी बहन नलिनी कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर एक स्थानीय स्कूल में अध्यापिका बन गई। छोटा भाई वरुण सुबह-सुबह ही स्कूल निकल जाया करता था। पिता सरकारी सेवा में थे और उन्हें भी सुबह जल्दी ही दफ्तर निकल जाना होता। सुनयना को कॉलेज छोड़ने वाला ऐसा कोई घर में नहीं था और यह फिर एक दिन की भी समस्या थी नहीं।

पिताजी ने मामले को ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया। उनको लगा ये नादान लड़के हैं, नासमझी में शरारत करते ही हैं। थोड़ा डाँट डपटकर सहम जाएँगे। सोचा क्यों न स्कूल के प्रिंसिपल से ही शिकायत कर उन्हें डपट दिया जाए। वह स्कूल जा धमके और अपनी परेशानी बताते हुए उन लड़कों की पेशी करवा दी।

उसके बाद कुछ दिन मामला शांत रहा, तो सुनयना भी बेफिक्र होकर पढ़ाई में व्यस्त हो गई। इस पर घर में सभी ने राहत की साँस ली। लेकिन किसे मालूम था कि यह किसी आने वाले तूफान से पहले की शान्ति थी। कुछ ही दिन बाद एक ऐसी काली साँझ आई, जिसने सुनयना की जिंदगी ही नरक बना दी।

उस दिन कॉलेज के बाद सुनयना अपनी सहेली के घर कुछ नोट्स लेने गई थी। लौटते हुए थोड़ी देर हो गई। शाम का धुँधलका छाने लगा था। बस स्टाप पर इक्का-दुक्का लोग ही खड़े थे। सुनयना भी अपनी सहेली के साथ खड़ी बस के आने की प्रतीक्षा कर रही थी।

इतने में धड़धड़ाती एक ही मोटरसाइकिल पर सवार तीन युवक आ धमके और उन दोनों के ठीक सामने आकर रुक गए। वह कुछ सँभल पाती, इतने में ही वह उससे छीना झपटी करने लगे। लड़के नहीं माने, तो उन्होंने चिल्लाना शुरू कर दिया। इस पर वह सिरफिरे युवक मारपीट पर आमादा हो गए।

भीड़ जुटती देख उनमें से एक युवक ने जेब से शीशी निकाली और उसका ढक्कन खोलकर पूरी शीशी सुनयना के चेहरे पर उँड़ेल दी। आस पास मौजूद लोग कुछ समझ पाते, उससे पहले ही वे शरारती युवक बाइक पर सवार होकर भाग खड़े हुए। सुनयना यकायक दर्द से कराह उठी। ऐसा लगा मानो किसी ने कोई उबलती हुई चीज उस पर उँड़ेल दी हो। सुनयना को अपना चेहरा पिघलता हुआ सा प्रतीत हुआ।

‘बहुत घमण्ड है न तुझे अपने चेहरे पर, तो ये ले।’

बस इतना ही सुन पाई सुनयना और उसके बाद क्या हुआ सुनयना को कुछ भी याद नहीं।

होश आया तो वह अस्पताल में थी। चेहरे पर भारी जलन हो रही थी। मानो उसे किसी तपती भट्ठी में झोंक दिया गया हो। चारों तरफ घना अन्धकार था। आसपास खड़े लोगों को वह बातचीत से ही पहचान पा रही थी।

लोग बतिया रहे थे कि उन सिरफिरे लड़कों ने उस पर तेजाब उँड़ेला था। इस हरकत में वह युवक भी सम्मिलित था, जो अक्सर उसे परेशान किया करता था। तेजाब से जलकर पूरा चेहरा कुरूप हो गया था। डॉक्टर कह रहे थे, आंखें भी जा सकती हैं।

‘नहीं ऽऽऽ’ सुनयना की चीख से पूरे अस्पताल में सन्नाटा छा गया। वह बुरी तरह से छटपटा रही थी। कई दिनों तक वह ऐसे ही छटपटाती रही और फिर बेसुध हो जाती। थोड़ी हालत सुधरी तो पता चला कि घटना के दिन आस-पास मौजूद लोगों की सक्रियता से वे तीनों बदमाश पकड़ लिए गए। जिन्हें पुलिस के हवाले कर दिया गया था।

बाद में पुलिस ने खुलासा किया कि इन शातिरों ने पुलिस हिरासत से भागने का प्रयास किया, तो उन्हें रुकने की चेतावनी दी गई। नहीं माने, तो मजबूरन गोली चलानी पड़ी। इस आपाधापी में चली गोलियों से जख्मी तीन में से दो युवकों ने घटनास्थल पर ही दम तोड़ दिया।

बस फिर क्या था, अगले ही दिन से शहर में मानवाधिकार की दुहाई देने वालों के जुलूस-प्रदर्शन शुरू हो गये। पुलिस की कार्रवाई को लेकर उनमें भारी रोष था। धीरे-धीरे लोग भी लामबंद होने लगे। दलीलें दी जाने लगी कि वे भले ही कितने ही बड़े बदमाश क्यों न थे, उन्हें अपने बचाव में सफाई का अवसर दिये बगैर ही मौत की नींद सुला देना तो खुली अराजकता है।

मामले के इस नये मोड़ से इधर सुनयना पर क्या बीत रही थी ये तो सिर्फ वही महसूस कर सकती थी या फिर उसके घर परिवार के लोग।

उधर कुछ समय बाद जब सुनयना के चेहरे की पट्टी खुली तो वही हुआ जिसका अंदेशा था। उसकी दोनों आँखों की रोशनी जा चुकी थी और चेहरा इतना वीभत्स हो गया था कि कोई पहचान भी नहीं पा रहा था कि यह वही सुनयना है।

उसके माता-पिता का तो और भी बुरा हाल था। माँ की आँखों से आँसू थमने का नाम न ले रहे थे। ऊपर से पुलिस की पूछताछ। उसके कई सवाल तो इतने तल्ख और बेहूदे होते कि उनके दुःख भरे मन को और छलनी कर जाते।

‘आपकी बेटी कब से जानती थी उस लड़के को? क्या सम्बन्ध था उसका उन युवकों से?’ जैसे कई बेसिर-पैर के सवाल उन्हें और विचलित कर देते।

लेकिन सुनयना को इस हादसे ने और भी मजबूत बना दिया। तन और मन दोनों की पीड़ा सहते हुए वह जिस संयम से सारे सवालों का जवाब देती, लोग देखते ही रह जाते।

कुछ महीनों बाद सुनयना अस्पताल से घर वापस आ गई। धीरे-धीरे चेहरे के घाव तो भरने लगे, लेकिन मन के घाव भरना नामुमकिन था। वह बार-बार अपने चेहरे पर हाथ फेरकर घावों की टोह लिया करती। कभी अपनी बहन तो कभी मम्मी से पूछती। वे सकपका कर रह जातीं। फिर उसका मन रखने को कह देती, जल्द ही वह ठीक हो जाएगी। पर मन ही मन सोचते, वह अगर खुद ही अपन यह वीभत्स चेहरा देख लेती, तो क्या बर्दाश्त कर पाती। फिर खुद को समझाते- ‘शायद इसीलिए ईश्वर ने उसकी आँखें छीन ली होंगी?’

सुनयना कुछ और ठीक हुई, तो उसने ब्रेल लिपि सीखना आरम्भ कर अपनी पढ़ाई आगे जारी रखने की ठानी। क्या हुआ अगर उसका तन कुरूप हो भी गया तो उसके मन और दिमाग को तो कोई कुरूप नहीं कर सकता।

पढ़ाई से उसे कुछ और मानसिक बल मिला। उसने धीरे-धीरे न्यायालय में भी इस केस की सुनवाई की तिथि में जाना प्रारम्भ कर दिया। वह कोर्ट की कार्रवाई सुनती और यह भी महसूस करती कि कैसे वकील और मानवाधिकार संगठनों से जुड़े लोग पुलिस के हाथों मारे गए इन युवकों को महिमामण्डित कर रहे हैं। उसको लगता, इनका वश चले तो ये लोग उन्हें शहीद का ही दर्जा दिलवा दें।

आज सुनयना सुबह ही उठकर तैयार हो गई थी। आज न्यायालय में माननीय जज साहब के सामने उसकी गवाही होनी थी। उसके मम्मी पापा दोनों सहमे हुए से थे। हालाँकि उन्हें विश्वास था कि दृढ़ संकल्प व शान्त मन की सुनयना सारे हालातों पर पूरे हौसले से पार पा लेगी, लेकिन फिर भी उन्हें डर लग रहा था कि कहीं विपक्ष का वकील कोई ऐसे सवाल न कर दे जिससे वह आहत हो उठे।

नियत समय पर अदालत की कार्रवाई आरम्भ हुई। दोनों ओर से सवाल-जवाब हुए। वकील सवाल पूछ चुके तो सुनयना ने जज साहब से अपनी बात कहने का अनुरोध किया। उन्होंने सहर्ष उसे मंजूरी दे दी।

सुनयना ने सबसे पहले मानवाधिकार संगठन से जुड़े लोगों को उनकी सक्रियता के लिए धन्यवाद दिया। फिर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की। अपराधियों से पुलिस द्वारा खुद ही निपट लिए जाने पर उसने जहाँ अफसोस जाहिर किया, वहीं अपने दिल का गुबार निकालते हुए, अपनी व्यथा भी जाहिर कर दी।

उपस्थित लोगों से उसका सवाल था-‘क्या मानवाधिकार संगठन सिर्फ मृत व्यक्तियों के लिए ही हैं! क्या मेरे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं हुआ है, क्या हक था उन्हें मेरी आँखें छीन लेने का और मेरा चेहरा कुरूप कर डालने का! जो व्यक्ति इस दुनिया से चला गया, उसे तो जीवन से छुटकारा मिल गया, लेकिन मुझे तो जीना है। इन्हीं हालात में जीना है। यह कितना दुष्कर और दुरूह है, इसे कोई समझ पाएगा! मुठभेड़ को लेकर हायतौबा मचाने वाले और मानवाधिकारों की दुहाई देने वालों को क्या यह नहीं दिखता कि मेरे भी तो अधिकारों का हनन हुआ है। क्यों किसी एक भी व्यक्ति के मन में मेरे अधिकारों के हनन की बात नहीं आई! क्या यह मेरे प्रति अन्धेर नहीं है? आप सब धैर्यपूर्वक मेरे प्रश्नों को समझियेगा और सोचियेगा क्या मैं कहीं गलत हूँ।’

फिर एक गहरी साँस लेकर उसने अपने विचार रखने की अनुमति देने के लिए जज साहब का शुक्रिया अदा किया और हाथ में पकड़ी छड़ी का सहारा लेकर वह धीरे-धीरे कठघरे से बाहर निकल आई।

पूरे हाल में सन्नाटा पसर गया। सिर्फ सुनयना की छड़ी की आवाज ही उस सन्नाटे को तोड़ रही थी।

सुनयना के ये सवाल सिर्फ उसकी ही पीड़ा से नहीं जुड़े थे, बल्कि समाज में मानवाधिकारी और समाज सेवा का डंका पीटने वाले तथाकथित संगठनों पर करारी चोट भी थे।

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