न्यायाधीश ठुकर ने तीसरे दिन के मुकदमे के तथ्य इकट्ठे करने शुरू कर दिए। उन्होंने ज्यूरी को देते हुए कहा, ‘अब वह ध्यान से गुप्तचर विभाग के इंस्पेक्टर हन्ट का बयान सुनें। इंस्पेक्टर हंट ने अपने बयान में कहा कि वह अभियुक्त को सन् 1934 से जानते हैं। उन्होंने कैदी से बातचीत नहीं की है लेकिन उसकी आवाज को अच्छी तरह से पहचानते हैं। इन्होंने कैदी को समय-समय पर राजनैतिक भाषण देते हुए सुना है। यह 3 सितम्बर 1939 को फाल्कस्टान नामक स्थान पर ठहरे हुए थे और वहां 10 दिसम्बर 1939 तक रहे थे। वहीं इन्होंने जब फाल्कस्टान रेडियो से समाचार आदि सुने, तब इन्होंने उस आवाज को पहचाना कि यह आवाज तो उस कैदी जैसी ही आवाज हैं।’
बहुत से लोग जिन्होंने इस मुकदमे की कार्यवाही अपनी आंखों से देखने के लिए पूरी रात ओल्ड वैली की पत्थर की सीढ़ियों पर बिताई थी, आदमियों से खचाखच भरे न्यायालय के कमरे में घुस आए थे। वे उस कैदी को अपनी आंखों से देखना चाहते थे जिसने काफी समय से जर्मन रेडियो पर अपनी हास्यपूर्ण बोली से अपने आपको पूरी तरह से बचा रखा था। वह यह देखना चाहते थे कि सालिसिटर की मेजों पर पड़ी मोटी-मोटी कानून की किताबें इस कैदी को बचा पाती हैं या नहीं।
पहले दिन की गवाही से स्पष्ट हो गया था कि कैदी ने किस प्रकार कितनी आसानी से धोखा दिया था।
‘इसी वर्ष की 26 मई की शाम को तुम लेफ्टिनेन्ट पैरी के साथ जर्मनी के जंगलों में थे। यह जंगल फ्लैसबर्ग में दनीस फ्रंटियर के आसपास कहीं था?’
‘जी हां।’
‘क्या तुम दोनों आग जलाने के लिए लकड़ियां इकट्ठी कर रहे थे?’
‘जी हां।’
‘हिल्ट, जब तुम लकड़ियां बीन रहे थे तब क्या तुमने वहां किसी आदमी को देखा था?’
‘हमारी एक आदमी से मुलाकात हुई थी जो जंगल में घूम रहा था।’
‘कौन था वह?’
‘एक कैदी था।’
‘क्या उसने तुमसे कुछ कहा था?’
‘उसने नीचे गिरी हुई लकड़ियों की ओर इशारा किया था और बताया था कि उस ओर और भी अधिक लड़कियां पड़ी हुई हैं।’
‘वह पहले कौन-सी भाषा में बोला था?’
‘वह हमसे फ्रेंच में बोला था और फिर बाद में अंग्रेजी में।’
‘क्या तुम उस आवाज को पहचानते हो?’
‘जी हां।’
‘उसकी आवाज जर्मन रेडियो पर घोषणा करने वाले या भाषण देने वाले व्यक्ति से मिलती-जुलती है?’
न्यायाधीश ने दोबारा कैदी की आवाज का टेप चालू कर दिया।
* * *
न्यायालय में एक ओर एक मोटी औरत बैठी हुई थी। वह धूल भरा काला कोट और काले पंखों वाला टोप पहने हुए थी। उसकी बड़ी-बड़ी आंखों और गोलमटोल चेहरे पर असंतोष की छाया थी।
उसके पास ही बैंच पर भूरे रंग का बहुत पुराना सूट पहने एक आदमी बैठा था। मोटी औरत ने कानाफूसी के अंदाज में उस आदमी से कहा, ‘मैं इस आवाज को अच्छी तरह पहचानती हूं।’
वह आदमी कुछ सिकुड़ गया। उसका कद छोटा था लेकिन वह सुन्दर था। उसके चेहरे पर चोट का नीला निशान था। वह निशान दायीं आंख से ठोड़ी तक था। इस निशान के कारण ही उस औरत की उसके प्रति दिलचस्पी बढ़ गई थी।
उस आदमी का नाम डेविड एलिस था। उसकी आंखें जज की ओर लगी हुई थीं।
उस इंस्पेक्टर ने कैदी की आवाज को पहचाना था। सेना की अनुसंधान शाखा के एक कैप्टन ने भी उस आवाज को पहचाना था।
एलिस ने निश्चय कर लिया था जब तक वह लंदन में रहेगा बोलकर कोई जोखिम नहीं उठाएगा। वह जब तक कोई नई ठोस योजना नहीं बना लेगा अपने आपको गूंगा-बहरा ही प्रदर्शित करेगा। उसे अपनी आवाज को बदलने के लिए कुछ न कुछ करना ही होगा। लेकिन क्या किया जाए यह वह निश्चय नहीं कर पा रहा था। ओल्ड वैली शेर की मांद की तरह था जो पुलिस और सेना के अधिकारियों से घिरा हुआ था। उनकी संगीनों के भय से वह उस चमकीले पत्थर को अपने मुंह में से एक बार भी नहीं निकाल सका था जो उसने अपनी जीभ के नीचे छिपा रखा था।
मोटी औरत ने कहा, ‘जब प्रमाण के लिए यह आवाज ही काफी है तो यह लोग इस केस का फैसला क्या नहीं कर डालते?’
एलिस ने उसकी बात पर भौं सिकोड़ कर विरोध प्रकट किया तो वह मोटी औरत बड़ी उदारता से बोली, ‘लो सैंडविच खाओ। मुकदमे की कार्रवाई तो दोपहर तक चलती रहेगी। बैठे-बैठे भूख लग आई है। बदन भी टूटने लगा है।’
एलिस ने सिर हिलाया और एक सैंडविच उठा लिया। उसने अभी तक दोपहर का खाना नहीं खाया था। भूख के कारण पेट में उथल-पुथल हो रही थी। लेकिन वह कानून की इस रणभूमि को छोड़ना नहीं चाहता था।
‘मेरे पास काफी खाना हैं। जब भी मैं कहीं जाती हूं खाना साथ ले जाती हूं।’ उस मोटी औरत ने कहा।
एलिस ने बिना कोई उत्तर दिए रोटी का एक टुकड़ा उठा लिया और उसे धीरे-धीरे चबाने लगा।
जज साहब कैदी का बयान पढ़ने लगे, ‘कैदी ने अपनी इच्छा से व्यक्तिगत काम के लिए जर्मन रेडियो सर्विस में काम करना शुरू किया था।’
एलिस सोचने लगा, ‘उसने जो कुछ किया था व्यक्तिगत काम के लिए ही किया था। इस देश ने तो कभी उसे कोई मौका ही नहीं दिया।’
ब्रिटेन की फासिस्ट यूनियन में शामिल होने से पहले वह हर सप्ताह पैंतीस शिलिंग कमा लेता था। वह टिन पाट स्टेट के ऑफिस में क्लर्क था। उसने अच्छी नौकरी पाने की बहुत कोशिश की थी लेकिन उसे अच्छी नौकरी नहीं मिली थी। उसे अच्छी नौकरी मिलने के रास्ते में सबसे बड़ा व्यवधान था उसका पिता। जिसने अपनी बेटी की हत्या की थी और इस अपराध में वह बीस वर्ष से जेल में था। हालांकि अपनी बहन की हत्या में उसका कोई हाथ नहीं था लेकिन वह एक हत्यारे पिता का पुत्र था। बस इस कलंक ने उसकी उन्नति के सारे रास्ते रोक दिये थे। वैसे उसे अपनी बहन से बहुत घृणा थी। अगर उसके बूढ़े बाप ने उस लड़की की हत्या न की होती तो वह खुद उसका गला घोटकर उसे मार डालता। उसने अपनी बहन को अपनी आंखों से दूसरे पुरुषों के साथ घूमते हुए देखा था। उसने लोगों से झूठ बोल रखा था कि उसे एक नाट्य क्लब में औरतों के कमरे में अच्छी नौकरी मिल गई है। उसने अपने आपको बेचकर काफी पैसा इकट्ठा कर लिया था।
लेकिन बहन की हत्या हो जाने और पिता के इस अपराध में जेल जाने के बाद भी कहानी खत्म नहीं हुई। जो भी उसे देखता वही कहता, ‘यह वहीं है जिसके पिता ने अपनी ही लड़की की हत्या की थी।’ लेकिन जब उसने काली कमीज पहन ली तो लोगों ने डर कर अपने मुंह बंद कर लिए।
वह फिर जज की ओर देखने लगा।जज कैदी के बयान को पढ़ रहा था-
‘मैंने देश को छोड़ने का निश्चय इसलिए किया था कि मैं अपने उन विचारों को जर्मनी में जाकर बड़ी आसानी से प्रकट कर सकूंगा जिन पर ब्रिटिश सरकार ने युद्ध के समय से पाबन्दी लगा रखी है। इसके साथ ही मैंने यह भी निश्चय कर लिया था कि अब मैं ब्रिटेन कभी नहीं लौटूंगा। इसलिए मेरे लिए यही उचित होगा कि मैं जर्मनी की नागरिकता प्राप्त करने के लिए वहां की सरकार से प्रार्थना करने और जर्मनी में ही अपने स्थाई निवास के लिए एक मकान बना लूं।’
एलिस की विचारधारा फिर अतीत की ओर मुड़ गई। जर्मनी ने उसे काली कमीज पहनने के कारण प्रति सप्ताह पांच पौंड दिए। ब्रिटेन में मिलने वाले वेतन से यह वेतन कहीं अधिक था। वहां किसी ने भी उसके पिता के अपराध को उस पर नहीं थोपा। और फिर उसे माइक्रोफोन पर बोलने के लिए सौ मार्क्स रोजाना मिलने लगे थे।
‘एक सैंडविच और लो।’ मोटी औरत ने उसकी विचारधारा छिन्न-भिन्न कर दी।
उसने सैंडविच उठा लिया और सिर हिलाकर उस औरत को धन्यवाद दिया। वह सोचने लगा कि अगर उस औरत को यह पता चल जाए कि मैं कौन हूं तो बुरी तरह घबरा उठेगी।
लंच के लिए जज साहब चले गए तो उस औरत ने कहा, ‘जानते हो मैं तुम्हें खाना क्यों खिला रही हूं? क्षमा करना, मैं यह जानना चाहती हूं कि क्या तुम युद्ध-बन्दी हो?’
एलिस हिचकिचाया, लेकिन खामोश रहा।
मोटी औरत ने पूछा, ‘क्या बन्दी-कैम्प में तुम्हें यातनाएं दी गई थीं?’
एलिस ने घृणा से मुंह मोड़ लिया और गुर्राकर बोला, ‘चुप रहो।’
औरत के दिल को धक्का-सा लगा? उसके चेहरे पर निराशा झलक आई।
एलिस ने महसूस किया कि उस औरत की नजरें उसी पर लगी हुई हैं। लेकिन वह अपने सामने सीधा ही देखता रहा। उसने मुड़कर फिर उस औरत की ओर नहीं देखा। वह उस कैदी के बारे में सोचने लगा कि अगर वह उस कैदी के स्थान पर होता तो कैसा लगता। जैसे-जैसे समय बीतता जा रहा था। उसका मानसिक और शारीरिक तनाव बढ़ता जा रहा था।
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