आज सुबह की ही बात है कि पतिदेव नहाने के बाद अपनी शर्ट कहीं रखकर भूल गए। अब जिद भी यही कि उनको वही शर्ट पहनकर भी जानी है। काफी देर तक उनका रिकार्ड सुनने के बाद मैंने शर्ट ढूंढ़कर दे तो दी लेकिन वह पहनने लायक नहीं रह गई थी। जनाब ने तौलिया समझकर बेड पर रख दी थी और खुद ही भूलवश उस पर बैठ गए थे। शर्ट की हालत देख मैंने माथा पीट लिया, आखिर दूसरी शर्ट से उन्हें काम चलाना पड़ा। तो ऐसे होते हैं भुलक्कड़ पति, जो भूलवश स्वयं गलतियां करते हैं और भुगतना पत्नियों को पड़ता है।
ऐसे ही और भी वैरायटी हैं पतियों की जैसे- सुबक्कड़ पति, भोले पति, बहानेबाज व मनचले पति। फिलहाल मेरे पतिदेव से मुझे कोई शिकायत नहीं क्योंकि वे बेहद भोले और सीधे हैं, सच्चाई में तो वो राजा हरिशचन्द्र से कमतर बिल्कुल नहीं। कारण यह है कि वो कभी झूठ नहीं बोलते और कभी कोई भी गलत काम नहीं करते। उनका मानना है कि अपनी गलती स्वयं ही स्वीकार कर लोगे तो सामने वाला तो आपको झूठा कहेगा ही, अर्थात कुछ गलत हो जाए तो मानो ही मत, फिर सब कुछ ठीक।
वैसे भी प्राचीनकाल से आज तक माता-पिता बेटी को विदा करते समय यही कहते आए हैं कि, ‘मेरी बेटी से कोई भूल-चूक हो जाए तो बच्ची समझकर माफ कर देना। दामाद जी भी यही मानकर कि गलतियां पत्नियों से होती हैं, कभी उंगली खुद पर नहीं उठाते। उठायें भी कैसे, अजी पति तो देवता तुल्य होता है, पत्नी का संरक्षक और भगवान, फिर भगवान के दोष गिनाना भी तो महापाप होता है, इसीलिए भारतीय स्त्री हरसंभव यह पाप करने से डरती है।
हमारे देश में स्त्री को भी ‘देवी का महान पद प्राप्त है जिसकी पद-प्रतिष्ठा धूल-धूसरित हो रही है, उसके जिम्मेदार भी किसी के बेटे या पति या भाई ही होते हैं। समाज इनको दोष देने के बजाय शोषित स्त्री को ही दोष देता है। क्या बेटी या बेटे के जन्म की जिम्मेदार सिर्फ औरत ही है? नहीं, तो क्या कोई पुरुष अपनी पत्नी के बचाव में आगे आकर यह कहता है कि मैं भ्रूण हत्या नहीं होने दूंगा, जो भी बच्चा होगा वो मेरा अंश है। हमेशा पति का परिवार औरत को बेटी पैदा करने का दोषी ठहराता रहा है और पति बहकावे में आकर दूसरा विवाह सिर्फ इसीलिए कर लेता है ताकि उसे कुल का चिराग मिल सके। अरे साहब, सच्चाई स्वीकार कर लेंगे तो इनके पुरुषत्व में कमी आ जाएगी, इनका गौरवपूर्ण पद इनसे छिन जाएगा।
जिस दिन से घर में बेटा पैदा होता है उसके माता-पिता यही सपना देखते हैं कि उनके घर में सबको साथ लेकर चलने वाली सुंदर व शिक्षित बहू आएगी जो बुढ़ापे में उनकी सेवा करेगी। क्या कभी पुत्रियों को पिता ऐसी कल्पना कर सकता है? नहीं, क्योंकि उन्होंने बेटियों को दान करके गुनाह कर दिया है और वे तो उसके घर का पानी भी नहीं पी सकते। तो भई बुरा लगे या भला, सच्चाई यही है कि स्त्री को बनाया ही है भगवान ने सेवा करने के लिए, इसीलिए तो वह अपने पति से आयु में छोटी होती है ताकि बुढ़ापे में भी बुढऊ पति की सेवा करने को वह तत्पर रहे। सच! मुझे तो ईष्र्या होती है, कभी-कभी ये सोच कि भगवान ने धरती पर दूसरे भगवान अर्थात पति के रूप में मुझे क्यों नहीं भेजा?
पहले पत्नियों को एक ही सुख था धन का, जो पति कमाता था और पत्नी उसका संचालन करती थी, अब समय के साथ वो भी छिन गया। अब नारी सशक्तीकरण के चलते उसकी जिम्मेदारियां भी बढ़ गई हैं और वह बाहर सेवा देने के बाद परिवार को उसी मनोयोग से पूर्ण समर्पण के साथ सेवाएं देती है। वो तो कुछ अपवादस्वरूप पुरुष हैं जो अपनी प्रतिष्ठा भूलकर कमाऊ बीबी के गुलाम बनकर उसका घरेलू कामों में हाथ बंटा देते हैं।
पुरातनपंथी विचारधारा वाले पुरुष अभी यूं ही हथियार नहीं डालेंगे आखिर घर का काम करना और बच्चों को पालना तो पत्नी का ही धर्म है और उसे बिना थके मुस्कराते हुए करना प्रत्येक गृहणी को उसे उसके महानतम शिखर पर पहुंचाता है। आखिर पतिदेवता का प्रेमस्वरूप आशीर्वाद और कृपा प्राप्त करनी है तो पूरी परायणता और कर्तव्यनिष्ठा के साथ अपना कर्तव्य पालन करना प्रत्येक स्त्री का कर्तव्य है। कर्तव्य की राह में यदि पत्नी अस्वस्थ होकर शीघ्रता से ‘शहीद भी हो जाती है तो पतिदेवता के कंधों पर यात्रा करके निश्चित स्वर्ग जाती है।
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