दूसरे राजा-महाराजाओं की तरह वह भी गांव की मासूम जिंदगियों पर जुल्म कर उनकी इज्जत से खेलना अपनी शान समझते थे। एक ही ब्याही नारी से संतुष्ट हो जाना उनके लिए बहुत अपमानजनक-सी बात थी। उन्होंने अपने जीवन में कभी हार नहीं मानी थी। यही हाल रुक्मिणी का भी था। जिस वस्तु को प्राप्त करने की जिद पर वह उतर आती तो उसे प्राप्त करके ही दम लेती थी। राजा विजयभान सिंह को उसने अपने मन-मंदिर में बसाकर पूजा की थी। इस पूजा के पीछे एक ध्येय था, इरादा था, दौलत का लोभ था।
अपनी शान को स्थिर रखने की अटल इच्छा थी परंतु अचानक ही जब आशा के विपरीत राजा विजयभान सिंह ने उससे संबंध जोड़ने से इनकार कर दिया तो उसका दिल टूट गया। चौधरी कृपाल सिंह ने भी इसमें अपना अपमान समझा। उन्होंने चाहा कि उन्हें समझा-बुझाकर राजी कर लें, परंतु राजमहल से आये राजा विजयभान सिंह के करीबी मेहमान ऊपर आ चुके थे, इनमें उनका विश्वसनीय मंत्री प्रताप सिंह भी था। अतः सबके सामने झोली फैलाकर भीख मांगना उन्हें अच्छा नहीं लगा। फिर भी उन्होंने इस इनकार का कारण अवश्य जानना चाहा।
‘हम पूछ सकते हैं इस इनकार की वज़ह क्या है?’ उन्होंने पूछा।
‘मुझे राधा से प्रेम हो गया है।’
‘प्रेम! किस राधा से?’ रुक्मिणी बर्दाश्त नहीं कर सकी तो बीच में कूदी।
‘वह इसी गांव की लड़की है…।’ राजा विजयभान सिंह ने एक आह भरी, ‘मैंने उस पर जुल्म किया है। उसे लूटा है।’
‘इससे तो राजा-महाराजाओं की शान बढ़ती है।’
‘नहीं…!’ राजा विजयभान सिंह ज़ोर से बोले‒‘इससे राजा-महाराजाओं के विरुद्ध गरीब प्रजा में घृणा बढ़ती है। यदि वह मुझसे घृणा नहीं करती होती तो मैं सदा ही अंधा रहता, बार-बार दूसरों पर जुल्म करता रहता। राधा ने मेरी आंखें खोल दी हैं।’
‘तो इसका यह मतलब हुआ कि गांव की एक साधारण लड़की तुम्हारी धर्मपत्नी होगी।’ चौधरी कृपाल सिंह ने व्यंग्य कसा।
‘अवश्य!’
‘और इस राजमहल, इस कस्बे की महारानी होगी?’
‘हर अवस्था में।’
‘और तुम्हारे यह मंत्री, ठाकुर लोग, उसको झुक-झुककर आदाब बजाएंगे।’ उन्होंने समीप खड़े प्रताप सिंह की तरफ इशारा किया, इस विचार से कि वह भड़ककर उनका पक्ष लेने लगे।
‘जब इनका राजा राधा के आगे झुक सकता है, तो इनको भी उसे पूरा-पूरा सम्मान देना पड़ेगा।’ राजा विजयभान सिंह ने पूरे विश्वास से कहा।
‘इतिहास साक्षी है कि बड़े-से-बड़े राज्य में भी ऐसा समय अवश्य आया है, जब किसी राजकुमार, राजा-महाराजा ने अपना दिल हारकर किसी गरीब लड़की का हाथ थामा है।’ सहसा आगे बढ़कर प्रताप सिंह ने कहा‒‘यदि हमारे महाराज के साथ ऐसा हो गया तो यह कोई नई बात नहीं होगी।’
राजा विजयभान सिंह ने प्रताप सिंह को देखा, दबे होंठों मुस्कराए। कृपाल सिंह बल खाकर रह गए। रुक्मिणी के दिल पर आरी चल गई। समीप खड़े रखैल के पुत्रों की मुट्ठियां भिंच गईं।…………..
‘विजयभान सिंह…’ सहसा कृपाल सिंह ने खिसियाकर अपनी मूंछों पर ताव दिया और बोले‒‘तुम्हें इस अपमान का मूल्य चुकाना होगा।’
‘कितनी दौलत चाहिए?’ राजा विजयभान सिंह ने अपना जाम पीते हुए लापरवाही से पूछा।
कृपाल सिंह के गाल पर मानो भरे दरबार में एक बार फिर तमाचा पड़ गया। होंठों को चबाकर वह क्रोध से बोले‒‘हम किसी से भीख नहीं लेते।’
‘मुझे मालूम है…’ राजा विजयभान ने कहा‒‘आप ही नहीं, मेरे बाप-दादा भी किसी से कभी भीख नहीं लेते थे। आप लोगों को न मिले तो छीन लेने पर विश्वास करते हैं।’
‘विजय…’ चौधरी कृपाल सिंह क्रोध सहन नहीं कर सके तो ज़ोर से चीख़े।
‘प्रताप सिंह…’ उनकी परवाह न करते हुए राजा विजयभान सिंह भी चीख़ पड़े, ‘इनके लिए खजाने का मुंह खोल दो।’ और फिर उन्होंने जाम होंठों से लगाकर समाप्त कर दिया।
चौधरी कृपाल सिंह आग-बबूला हो गए। अब यहां ठहरना भी उनके लिए बहुत अपमान की बात थी। उन्होंने रुक्मिणी का हाथ पकड़ा। अपने बेटों को घूरा, जो खड़े-खड़े केवल तैश खाकर ख़ामोश थे, वह बोले‒‘विजयभान सिंह! हमारा नाम भी चौधरी कृपाल सिंह है। एक दिन हम इस अपमान का बदला लेकर ही रहेंगे।’
रुक्मिणी ने राजा विजयभान सिंह को घूरकर देखा बहुत घृणा के साथ।
‘चल बेटी…’ चौधरी कृपाल सिंह बोले और रुक्मिणी को साथ लिए तेजी के साथ बाहर निकल गए। उनके पीछे उनका पूरा घराना भी चलता बना।
राजा विजयभान सिंह ने कुछ नहीं कहा। उसी प्रकार गंभीर रहे। न ही कृपाल सिंह की बात की परवाह की। देखा तक नहीं, फिर अचानक ही पलटे। मेहमान समीप खड़े उनकी आज्ञा की प्रतीक्षा कर रहे थे।
‘आदरणीय मेहमानों…!’ उन्होंने गंभीर होकर कहा‒‘पार्टी में सम्मिलित होने में आप लोगों को जो असुविधाएं हुई हैं, उनके लिए मैं क्षमा चाहता हूं। आइए! हम पार्टी आरंभ करें। नीचे और भी कुछ मेहमान हमारी प्रतीक्षा कर रहे हैं।’
चीयर्स‒ कई जाम आपस में टकराए।
चीयर्स‒कई आवाजें एक साथ हॉल में उभरीं।
चीयर्स‒ लोगों ने दिल खोलकर आनंद उठाया।
राजा-महाराजाओं की पार्टी में सम्मिलित होना एक गर्व की बात होती है, इसलिए सभी मेहमान इसका लाभ उठा रहे थे। राजा विजयभान सिंह ने यहां भी सबसे क्षमा मांगते हुए कह दिया था कि उनकी मंगनी की तारीख स्थगित हो गई है, क्योंकि जिस लड़की से वह मंगनी करना चाहते थे, वह आ नहीं सकी।
उस शाम की पार्टी बहुत शानदार रही… बहुत देर तक रौनक बरकरार रही। शायद राजा विजयभान सिंह के दिल में उत्पन्न हुए इस विश्वास पर कि एक दिन ऐसी ही पार्टी में राधा उनकी बांहों में होगी और लोग डाह करते हुए देखेंगे कि वह कितनी सुंदर है बिलकुल मोम की गुड़िया। रेशमी शाही वस्त्र में उसका रूप गुलाब के समान खिल उठेगा।
राजा विजयभान सिंह बात-बात पर खिलखिला पड़ते थे, थोड़ी देर पहले हुई तनातनी से बेअसर। राजमहल के अंदर मेहमानों का उन्होंने दिल खोलकर स्वागत किया।………..
आगे की कहानी कल पढ़ें, इसी जगह, इसी समय….
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