……….‘प्रताप…’ राजा विजयभान सिंह ने दूर ताड़ के वृक्षों पर दृष्टि डाली और बहुत गंभीर होकर कहा ‒ ‘भारत स्वतंत्र हो चुका है। अब हम राजा नहीं रहे। हमारी निजी प्रजा भी नहीं रही। अब तुम भी स्वतंत्र हो। तुम्हारी निःस्वार्थ सेवा के लिए हम जीवन-भर अहसानमंद रहेंगे। खजाना, घर तुम्हारे लिए खुला है। तुम जितनी दौलत चाहते हो, ले सकते हो। मेरे दिल में तुम्हारी याद एक भाई के समान स्थिर रहेगी। मैं चाहता हूं प्रताप! अब मैं सदा के लिए यहां से कहीं और चला जाऊं ‒ दूर बहुत दूर। इस महल की दीवारें मुझे काट खाना चाहती हैं।’

कुछ पल तक विजयभान सिंह को उत्तर नहीं मिला तो वह पीछे पलटे। उन्होंने देखा ‒ प्रताप सिंह की आंखों में आंसू थे। विजयभान सिंह का दिल तड़पकर रह गया। आगे बढ़कर उन्होंने प्रताप सिंह की बांहें थाम लीं।

‘प्रताप!’ उन्होंने कहा।

‘महाराज…’ प्रताप सिंह भर्राई आवाज़ में बोला‒‘क्या भारत के स्वतंत्र होने से मैं इस योग्य नहीं रहा कि आपकी छाया बनकर साथ दूं। मेरे पास अब बचा भी क्या है? एक बहन थी रूपा। आपकी दया से अब उसके पास बहुत कुछ है। आपने उसे इतनी दौलत दे दी है कि यदि सात पुश्त तक भी बैठकर उसका घराना खाता रहे तो भी वह दौलत समाप्त नहीं होगी। वह और उसका पति आपको साक्षात् देवता मानते हैं। आपके इस प्रकार चले जाने से उनका भी दिल टूट जाएगा। वह तस्वीर जिसे आप इटली से लेकर आए थे, जो आपको बहुत अधिक पसंद थी और इस महल के सामने वाले कमरे की शोभा भी थी, उसे देखकर तो वह समझती है कि उसे आपके दर्शन प्राप्त हो गए।’

‘वह तस्वीर उसे बहुत पसंद थी।’ राजा विजयभान सिंह ने कहा‒ ‘एक बार जब तुम उसे उस कमरे में लेकर आए थे तो वह उस तस्वीर में खो गई थी। इसलिए वह तस्वीर मैंने उसे भेंट कर दी। एक समय था, जब मैं दूसरों की प्रिय वस्तु छीन लेने में ही अपनी ख़ुशी समझता था। आज दूसरों की सुख-शांति तथा ख़ुशी के लिए अपना सब कुछ लुटा देना ही मेरी वास्तविक ख़ुशी बन गई है।’

‘मुझे मालूम है महाराज! और इसलिए उसने उस तस्वीर को अपनी कोठी के ड्राइंगरूम में बिलकुल सामने ही सजा रखा है। हर पत्र में वह आपको बहुत याद करती है।’

‘वह तुम्हें भी बहुत याद करती है प्रताप…।’ विजयभान सिंह ने एक आह भरकर कहा‒ ‘और इसलिए मैं चाहता हूं कि तुम उसके पास चले जाओ। बहन को अपने भाई की समीपता अधिक आवश्यक होती है।’

‘नहीं महाराज! ऐसा मत कहिए। मैं यहां से कदापि नहीं जाऊंगा। मैं आपके साथ ही रहूंगा। आप मुझे एक मौका और दीजिए। आपके दिल की धड़कन को ढूंढने के लिए मैं आकाश- धरती एक कर दूंगा। मालूम नहीं राधा जीवित भी है कि नहीं। कहीं अपने ऊपर हुए जुल्म के कारण उसने आत्महत्या तो नहीं कर ली?’ उन्होंने एक आह भरी।

‘वह जीवित है‒ जीवित रहेगी।’ प्रताप सिंह ने तड़पकर कहा‒ ‘भगवान इतना निर्दयी नहीं, जो आपकी अवस्था नहीं समझे! आप यहीं रहें…इसी राजमहल में, हमारे राजा बनकर, हमेशा ही। हम अवश्य कोई ऐसा रास्ता ढूंढ निकालेंगे, जिसके कारण उनका पता लग जाएगा। हम ऐसी परिस्थिति उत्पन्न कर देंगे कि उनके दिल की सारी घृणा आपके प्रति प्यार में परिवर्तित हो जाएगी।

आप हमारे मालिक हैं, वह हमारी महारानी होगी। भारत स्वतंत्र हो चुका है, परंतु आपके खानदान की रीति कभी नहीं बदलेगी। वही शान, वही शौकत सदा स्थिर रहेगी ताकि मुझे जीवन-भर आपकी सेवा करने का सुअवसर प्राप्त होता रहे।’

 विजयभान सिंह का दिल तड़प उठा। आशाओं के सहारे संसार स्थिर है। शायद राधा का पता चल जाए। शायद वह उन्हें क्षमा कर दे। शायद परिस्थितियां उसके दिल में उनके प्रति प्यार भर दे। प्रताप सिंह ठीक ही कहता है, आशा है तो जीवन है।

चौधरी कृपाल सिंह के यहां रहते हुए राधा को लगभग नौ मास हो चले। भारत की स्वतंत्रता उन पर बिजली बनकर टूटी थी। सरकार ने कुछ ही दिनों के अंदर उनकी जागीर छीन ली थी। बची-खुची ज़मीन किसानों में बांट दी। उनकी जायदाद का हिसाब केवल एकमात्र लड़की को दृष्टि में रखते हुए किया गया। उनके लड़के रखैलों के थे, इसलिए किसी को भी हकदार नहीं बनाया। कृपाल सिंह की कमर टूट गई। ले-देकर उनके पास अब थोड़ी ज़मीन थी और अपनी एकमात्र कोठी। कोठी अपनी शान को तरस रही थी, जिस पर जाने कितने ही ऐसे लोगों की आंखें थीं, जिनके कृपाल सिंह भारत की स्वतंत्रता से पहले के कर्ज़दार थे। यदि कुछ और उनके पास सरकार से बचा तो उसे कर्ज़ देने वालों ने हड़प लिया। आजकल वह काफी परेशान रहते थे, परंतु फिर भी उन्होंने आशा का दामन नहीं छोड़ा था।

राधा शतरंज के मोहरे के समान उनके हाथ में थी। इसलिए वह बहुत बेसब्री से समय की प्रतीक्षा कर रहे थे और समय अब लगभग आ ही चुका था। इन मोहरों को उन्होंने बहुत संभालकर रखा था। उन्हें मालूम था कि विजयभान सिंह के पास दौलत का अंबार है। स्वतंत्रता से उस पर कोई अंतर नहीं पड़ेगा। वह राधा को चाहता है। उसकी खोज में है, इसलिए उन्होंने राधा को दिन के समय बाहर कम ही निकलने देते थे। किसी-न-किसी बहाने उसके कान इस प्रकार भर दिए कि राधा के दिल में विजयभान सिंह के लिए और भी घृणा बढ़ गई थी।

कृपाल सिंह कहते‒ ‘तुम्हारी ख़ुशी के लिए मैंने प्रयत्न किया था कि विजयभान सिंह तुम्हें अपना ले, परंतु वह स्पष्ट इनकार कर गया। आजकल उसके पास तीन बीवियां हैं चौथी की तैयारी है। कुछेक संतानें उसकी इधर-उधर पल रही हैं, जो रंगरलियों के कारण उत्पन्न हुई थीं। आजकल वह इन संतानों को मरवाने का प्रयत्न कर रहा है ताकि उसकी बदनामी न हो।’ राधा सुनती तो कान पर अंगुली रख लेती, फूट-फूटकर रो पड़ती। दिल की गहराई से उसे कोसती।

सोचती कि अपने होने वाले बच्चे पर वह उस निष्ठुर की छाया भी नहीं पड़ने देगी। भारत स्वतंत्र हो चुका है। यदि समय ने उसका साथ दिया, यदि उसकी संतान किसी योग्य हुई तो वह उसके द्वारा उस पापी विजयभान सिंह को सख्त-से-सख्त सज़ा देने की चुनौती अवश्य देगी।

आगे की कहानी कल पढ़ें, इसी जगह, इसी समय….

 

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