…………….. उधर राजमहल का लॉन कारों तथा बग्घियों से भरा पड़ा था। कुछ मेहमान बेचैनी की अवस्था में इधर-उधर टहल रहे थे तो कुछेक अंदर बैठे अपनी बातों में व्यस्त थे। उन्होंने हॉल में पग रखा तो सब ख़ामोशी से खड़े हो गए। कुछ आदरणीय मेहमानों से बातें करते हुए, एक ओर कृपाल सिंह अपने परिवार सहित बैठे बहुत बेचैनी से उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। कृपाल सिंह की बेटी रुक्मिणी ने आज विशेष रूप से अपना श्रृंगार किया था। वह वास्तव में बहुत अधिक सुंदर लग रही थी, परंतु फिर भी मुखड़े पर भोलेपन से अधिक सुंदरता के अभिमान का खिंचाव था।

राजा विजयभान सिंह ने उसे अधिक महत्व नहीं दिया। सीढ़ियां चढ़ते हुए वह ऊपर के कमरे में पहुंच गए‒ बिना कृपाल सिंह से मिले, बिना उनके स्वागत में मुस्कराए। चौधरी कृपाल सिंह को यह बात बहुत बुरी लगी। वह बल खाकर रह गए, जैसे राजा विजयभान सिंह ने भरी महफिल में उनके मुंह पर थप्पड़ मार दिया हो, परंतु रुक्मिणी के लिए ख़ामोशी धारण करना कठिन हो गया। अभी कुछ दिनों पहले राजा विजयभान सिंह आए थे, तो उससे कितना घुल-मिलकर बातें कर रहे थे, बात-बात पर निछावर हो जाना चाहते थे और इस समय… इस समय उनका व्यवहार कितना अपरिचित है, किस कदर दूरी… जैसे जानते ही नहीं हों या पहली बार देखा है।

वह उठ खड़ी हुई। तेजी के साथ सीढ़ियां चढ़ती हुई ऊपर पहुंची, जहां महारानी बनकर जीवन का हर पल बिताने का उसने बचपन से ही स्वप्न देख रखा था। उसके माता-पिता तथा भाई भी पीछे हो लिए। राजा विजयभान सिंह शराब पी रहे थे। उन्होंने रुक्मिणी तथा उसके पीछे उसके घरवालों को कमरे में प्रविष्ट होते देखा, तब भी कुछ नहीं बोले, शराब पीने में सकुचाए भी नहीं।

‘विजय!’ वह एकदम से बोली। बचपन ही से उनकी हमउम्र होने के कारण वह उसे विजय के नाम से ही पुकारती आई थी। ‘यह क्या हो रहा है? पिताजी के सामने शराब पीते तुम्हें शर्म नहीं आती?’  परंतु राजा विजयभान सिंह ने कोई संकोच नहीं किया, जाम को उन्होंने अपने होंठों से लगाया और एक बार में समाप्त कर दिया। चौधरी कृपाल सिंह ने उन्हें घूरकर देखा और अपने होंठ बिचकाए तो उनकी बड़ी-बड़ी मूंछें फैल गईं। उनकी धर्मपत्नी ने घृणा से अपनी आंखें फेर लीं।

भाइयों की मुट्ठियां भिंच गईं, परंतु राजा विजयभान सिंह ने इसकी ज़रा भी परवाह नहीं की। उन्होंने फिर जाम भरा। चाहा कि होंठों से लगा लें कि तभी रुक्मिणी ने आगे बढ़कर उनकी कलाई थाम ली। कुछ कहना चाहा, परंतु राजा विजयभान सिंह ने बहुत कोमलता से अपने दूसरे हाथ द्वारा उसकी कलाई थामी और छुड़ाकर बोले‒ ‘मुझे मना मत करो। मैं तुमसे मंगनी के लिए इनकार करने का साहस समेट रहा हूं।’

‘विजय!’ रुक्मिणी के मानो पैरों तले से धरती ही सरक गई।

‘हां, रुक्मिणी! मैं…मैं मजबूर हूं।’ राजा विजयभान सिंह ने गंभीर होकर कहा।

‘नहीं-नहीं…! रुक्मिणी ज़ोर से चीख़ी, ‘ऐसा नहीं हो सकता। ऐसा कदापि नहीं होगा।’

‘विजय!’ चौधरी कृपाल सिंह ने भी विरोध करना चाहा।……..

……..‘चौधरी साहब! मैं मजबूर हूं… मैं बहुत अधिक मजबूर हूं। यह मंगनी कल तक हो सकती थी, आज सुबह तक हो सकती थी‒ परंतु अब नहीं हो सकती। हरगिज़- हरगिज़ नहीं।’ राजा विजयभान सिंह ने मानो अपनी परेशानी में फंसकर हांफते हुए कहा।

‘लेकिन यह रिश्ता पहले ही तय हो चुका था और इसकी तारीख भी तुम्हारी इच्छानुसार ही रखी गई थी।’ चौधरी कृपाल सिंह ने कहा।

‘रिश्ता तय करने वाले अब इस संसार में नहीं रहे चौधरी साहब! और यह तारीख भी उस समय निश्चित की गई थी, जब मैं अंधा था, कुछ देख नहीं सकता था। मुझे नहीं मालूम था कि लोग हमें ऊपरी दिल से सम्मान देते हैं और दिल की गहराई से नफ़रत करते हैं। तब मैं बहरा था, गरीबों पर हुए जुल्म और सितम के कारण उनकी चीख़ और पुकार नहीं सुन सकता था, परंतु आज मेरी आंखें खुल चुकी हैं। कानों के पर्दे साफ़ हैं। आज मेरे दिल की आवाज़ मुझे धिक्कार रही है। मुझे अपने आप से घृणा होने लगी है। क्यों नहीं भगवान ने इस खानदान के बज़ाय मुझे किसी गरीब घर में जन्म दे दिया? मुझे अपने पापों के प्रायश्चित में इस प्रकार घुट-घुटकर तो नहीं जीना पड़ता।’

चौधरी कृपाल सिंह बेलापुर के एक बिगड़े हुए ज़ागीरदार थे, सारी दौलत अपनी झूठी शानो-शौकत को स्थिर रखने के लिए बहाते रहे थे, चाहे इसके लिए उन्हें अन्य बड़े ज़ागीरदारों से कर्ज़ ही क्यों न लेना पड़ा हो। कर्ज़ धीरे-धीरे करके इतना अधिक हो गया कि इससे मुक्ति पाने के लिए उनके पास अब केवल एक ही चारा रह गया था… अपनी एकमात्र पुत्री का विवाह वह शीघ्र ही राजा विजयभान सिंह से कर दें।

यह उनका सौभाग्य था कि विजयभान सिंह के पिता ने उनकी बेटी को स्वयं ही अपनी बहू बनाना स्वीकार कर लिया था, अपनी मित्रता के कारण। बेटी का विवाह हो जाए तो वह अपनी शान और शौकत को पहले के समान स्थिर रख सकते थे, क्योंकि राजा विजयभान सिंह के पास असीमित धन था। बेटी अपने पिता का सम्मान बनाए रखने के लिए उनकी सहायता करती है। इधर कुछ दिनों से जब उन्होंने सुना था कि अब शीघ्र ही भारत स्वतंत्र होने वाला है और सरकार रजवाड़ों और ज़ागीरदारों की सारी जायदाद छीनकर गरीब जनता में बांट देगी तो उनकी चिंता और भी बढ़ गई थी।

उन्हें ज्ञात था कि सरकार उनकी जायदाद का ‘असेसमेंट’ उनकी केवल जायज पत्नी की एकमात्र पुत्री को ही दृष्टि में रखकर करेगी। उनकी रखैल द्वारा उत्पन्न हुए पुत्रों को सरकार उनकी जायदाद पर कोई अधिकार नहीं देगी। रखैल से उनके कई पुत्र थे, परंतु जायज पत्नी से केवल रुक्मिणी ही उत्पन्न हुई थीं, जो वास्तव में अपनी सुंदरता का उत्तर नहीं रखती थी। राजा विजयभान सिंह के पिता ने इसलिए अपनी दोस्ती के नाते इस संबंध को स्वीकार कर लिया था‒ बहुत पहले ही, और इसलिए चौधरी कृपाल सिंह निश्चिंत होकर रुपया बहाते रहे। जानते थे कि राजा विजयभान सिंह उनकी एक ही संतान है तथा सारी संपत्ति का एकमात्र मालिक शादी के बाद रुक्मिणी की जिद पर उन्हें दौलत देने से इनकार नहीं करेगा।

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