Bharat Katha Mala
Bharat Katha Mala

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

चौधरी मेडिकल स्टोर से ही लोअर बाज़ार शुरू हो जाता था। पम्मी बड़े गर्व से बतलाता था कि यह उसकी दुकान है। हालाँकि स्कूल का रास्ता हाईवे से होकर जाता था, पर लोअर बाज़ार से जाना इसलिए जरूरी था कि मनसा राम की हट्टी रास्ते में पड़ती थी। उसकी भुनी हुई मूंगफलियाँ और गुड़ से बनी मिठाई हुआ करती, पर यह तभी मुमकिन होता जिस दिन दस पैसे मिलते।

हमारी तिकड़ी का तीसरा, पंकज था। वो अक्सर दुखी रहा करता। कारण था हमारे स्कूल का उसके घर से सटा होना। वो हमारे बहुत से कारनामों से महरूम रहता। उसकी माँ तो दिन में दो-चार बार स्कूल का दौरा भी कर जातीं। पम्मी और मुझे भी हिदायत दे देतीं कि “खबरदार पंकज को लेकर कहीं गए तो।” आधी छुट्टी के दौरान खाना खाते सब किस्से पंकज के लिए सुनाने पड़ते। उसने तो अभी तक “हम दोनों” भी नहीं देखी थी। दिल में क्या होता है, वो तो नहीं पता था, पर लिली अच्छी लगती थी। उसके पास बैठना अच्छा लगता था। उसका छुट्टी हो जाने पर अपने घर जाना अच्छा नहीं लगता था, इसीलिए “अभी ना जाओ छोड़ कर” मन में बज उठता।

सर्दियों के दिन आ गये थे। कोहरा फैल रहा था।

अब तो कई दिन हो गये थे कोहरा फैले। माँ को मेरा अकेले स्कूल जाना बड़ा खलता था। तमाम हिदायतें हर रोज़ दोहरातीं थीं। गाड़ियों के आने जाने और खुदी हुई ज़मीन के बारे में आगाह करने में वो कभी नहीं चूकतीं। बिजली वालों को अक्सर कोसतीं कि ज़मीन खोदे एक अरसा हो गया, पर मुओं ने अभी तक मोटी तार नहीं डाली। मोटी तार का बड़ा-सा रोल दशहरे के मैदान पर पड़ा था। मैं और पम्मी कई बार उसके बड़े से छेद में घुसकर बतियाते रहते। आज भी कोहरा जस का तस नहीं हुआ, बहुत करीब आने पर ही कुछ दिखलाई पड़ता।

बस्ता लटकाए स्कूल के लिए निकल पड़ा, टिफिन आज हाथ में था। लेट हो गया था ना। हालाँकि नाश्ता किये अभी घंटा भर ही हुआ होगा, आमलेट की खुशबू से उसे खाने का मन हो आया। फिर सोचा आधी छुट्टी में क्या खाऊँगा? निर्णय लिया कि मनसा राम की हट्टी से गुड़ की मिठाई रख लूँगा। इसी उधेड़-बुन में मोटी तार के रोल के सामने पहुँच गया। सोचा कि इस से महफूज़ जगह कोई नहीं हो सकती, इत्मिनान से चपाती आमलेट खाऊँगा। मैं अब सरकते हुए रोल की तरफ बढ़ रहा था। अचानक खुस-फुस की आवाज़ कानो में पड़ी। नज़दीक जाने पर मैंने देखा पम्मी अपने टिफिन से टुकड़ा-टुकड़ा अपने ही हाथों से लिली को खिला रहा है। मैं कोहरे में गुम हो गया। स्कूल के लिए लेट था, मन किया घर चलूँ, पर मां से क्या कहूँगा? मन बनाया कि स्कूल ही जाऊँगा। मनसा राम की हट्टी से मैंने कुछ नहीं खरीदा। थोडी देर बाद मैं मर्गा बना. पम्मी और लिली को आते देख रहा था। पता नहीं उन्होंने मास्टर जी से क्या-क्या कहा कि उन्हें कोई सज़ा नहीं मिली। लिली ही आयी थी, यह कहने “मास्टर जी ने कहा है कि क्लास में आ जाओ।”

मैं आज लिली के साथ नहीं बैठा। आधी छुट्टी के वक़्त पम्मी के साथ नहीं खाया। पंकज के साथ उसके घर चला गया। उसकी माँ ने बड़े प्रेम से खाना खिलाया और यह भी कहा कि जब चाहो आ जाया करो। उसकी चोरी मैंने पकड़ ली थी, मैंने पम्मी से नहीं कहा। लिली के साथ अब मैं नहीं बैठता था, ना ही उसकी ओर देखता था। वार्षिक समारोह के समूह गान “सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तान हमारा” में मैंने लिली के साथ भाग नहीं लिया। मुद्दा यह कि जिस हिन्दोस्तान में लिली जैसी लडकी हो वो अच्छा कैसे हो सकता है?

बसंत ने दस्तक दी। फूलों की घाटी-सा खिल उठा था शहर, इन दिनों। इम्तिहान के दिन भी नज़दीक थे। खूब पढना पड़ता।

आज स्कूल में इंस्पेक्शन थी। इंस्पेक्टर देर से आये, छुट्टी देर से हुई। मैंने वापसी का नया रास्ता खोजने की सोच ली-दरिया के किनारे-किनारे होते हुए मैं अस्पताल के पास पहुंचा ही था, बड़े से चीड़ के दरख्त तले मैंने लोगों के एक झुण्ड को रोते हुआ सुना। करीब पहुंचा तो सफ़ेद कपडे ओढ़े कोई लेटा था। लोग दहाड़ मार-मार कर रो रहे थे- “क्यों चला गया छोड़ कर?”

कोई क्यों चला जाता छोड़ कर और कहाँ? सवाल घर कर गया।

लिली के पिता का तबादला हो गया। जाने से पहले खेल के मैदान में वो मुझसे मिलने आयी थी। उसने कहा था कि आज वो हमारी तिकड़ी के साथ भोजन करेगी। मैंने इंकार नहीं किया था।

मन के किसी कोने में घर बना लिली कहीं दूर चली गयी। पम्मी से दोस्ती तो थी, पर जब कभी औषधि की ज़रुरत पड़ती उसकी दुकान से नहीं खरीदता।

परीक्षा फल आया, अगली कक्षा में हो गया था। वो दोनों भी। पंकज के घर में टी-टी का टेबल था। हफ्ते में दो-एक बार हो आया करता. बस शर्त यह थी कि वो मेरी तिपहिया चलाएगा। जिसके बारे में उसकी माँ को कोई भनक नहीं लगनी चाहिए। यह जोखिम भरा काम स्कूल और उसके घर के पिछवाड़े में ही करना पड़ता। जिसके बदले मेरी माँ मुझे ढूँढती फिरतीं।

बालमन की कहानियां
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हमेशा के लिए चले जाने का या बिछड़ जाने का दंश क्या होता है, उसकी समझ तो नहीं थी. फिर मन दखी क्यों रहता था?

पम्मी अब भी दोस्त था, उसके मुहं से मैंने कभी लिली के बारे में नहीं सुना। मैंने भी लिली को कभी माफ़ नहीं किया। यही वजह रही होगी कि उसे भुला नहीं पाया। हम दोनों और वो एक, कैसे? या मैं अपने तक ही था, उसको लेकर?

फल पकने लगे थे। लिली को रेड जून सेब बहुत पसंद थे। पूरी तरह से मीठे नहीं होते थे, पर लाल हो जाते थे, खट्टे-मीठे। जहाँ वो चली गयी, पता नहीं वहां सेब होते भी हैं या नहीं? मां कहती थीं जहाँ सेब नहीं होते हैं वहां आम होते हैं।

पम्मी कभी-कभी कहता कि लोअर बाज़ार उसके पापा का है। क्योंकि पहली दुकान उनकी है। मैं कहता, गुड़ और मूंगफली लाया कर, अपनी मनसा राम की दुकान से। तो वो चिढ़ जाता, हाँ लिली को विक्स की गोलियां ज़रूर देता था।

मुझे याद नहीं कौन-सा, पर एक बड़ा-सा फूल खिला था, कुहल के बीचों-बीच घराट के आगे। चट्टान पर मैंने बस्ता पटका और छलांग लगा दी। उस फूल के पोधे की जड़ इतनी मजबूत थी की मैं तो सरक गया, लेकिन पौधा वहीं का वहीं। पंकज ने नहीं बचाया होता, तो नदी तक बह जाता। भीगे हुए पंकज को देख उसकी माँ ने उसे बहुत पीटा था और मुझसे दूर रहने की हिदायत दी थी। किसी और के यहाँ टी-टी टेबल नहीं था। अभी तो बहुत खेलना था, छोड़ना पड़ा। पंकज को मां का रवैया अच्छा नहीं लगा था। मैंने भी कई दिन उससे बात नहीं की थी। मैं उन दिनों सोच रहा था कि लिली के बिना भी तो रह रहा हूँ।

फिर एक दिन पंकज मेरे पास आया और कहा कि पम्मी के साथ हम सब दशहरा मैदान में गुल्ली-डंडा खेलने जायेंगे। मैंने मना नहीं किया। इससे पहले मैं पूछता, उसने ही कह दिया कि उसकी मां अपने मायके गई हैं। शाम को वहीं मिले। मैंने देखा मोटी तार का वो रोल वहां नहीं था। उसने अच्छा नहीं किया था, पर रहता, तो इससे उसकी याद तो बनी रहती थी। मैंने उस दिन गल्ली-डंडा नहीं खेला था।

अगले दिन मैंने दूर तक रोल ढूंढा, पर वो नहीं मिला।

इस दिन मैं स्कल नहीं गया था। मन में था कि काश मैं लिली के साथ इसी रोल में बैठ भोजन करता।

गर्मियों की छुट्टियाँ आ गयीं, आम का मौसम आ गया। दशहरी की खुशबू नथुनों में भर जाती। अक्सर हम घर नहीं जा पाते थे। कभी-कभार ताया जी आम की पेटी भेजते तो मां उसे मोहल्ले भर में बाँट देतीं। कहतीं, पड़ोस भी तो घर-सा होता है। इन आमों की खासियत यह भी थी कि इनके पेड़ को दादा के साथ उनके तीन भाइयों ने पुश्तैनी घर के पिछवाड़े में मिलकर लगाया था।

पम्मी हर छुट्टियों में अपने नानके जाता। इस बार भी गया, पर मुझे बताये बिना।

बताए बिना किसी का चले जाना मुझे कभी नहीं भाया। उसे मैं रूठ जाना समझता था, बिना किसी कारण। हो सकता है बिना किसी कारण ही मैं ऐसा समझता होऊँ।

लिली की याद के नाम पर केवल वो रोल था। जो अब मैदान से नदारद था। मैंने सोचा था कि पंकज से पूछूगा कि उसने तो नहीं देखा? मैंने ऐसा नहीं किया।

आज स्कूल से लौटते मैंने बड़ी देर तक सड़क पर डलते हुए तारकोल को देखा। तारकोल के एक टुकड़े को उठा उसे गोल-गोल घुमाता, उसे खींचकर कुछ बनाता। वहां से उठा तब, जब तारकोल ने मेरे हाथों को लपेटे में ले लिया। दोनों हाथ आपस में चिपक गये। मजदूर ने मेरे गले में बस्ता डाला था। घर लौटा तो मां ने बहुत पीटा था। फिर मिट्टी के तेल से रगड़-रगड़ कर तारकोल उतारा था।

पम्मी इन दिनों था नहीं। पंकज की मां लौट आई थी। छुट्टियों में स्कूल का काम मैं निपटा चुका था। समय नहीं कटता था पब्लिसिटी का प्रोजेक्टर खराब था, सो कोई फिल्म-विल्म भी नहीं। एक अजीब-सी कशिश थी, तारकोल में। उसे मैं कई रूप दे सकता था।

आज फिर सड़क-सड़क हो लिया, तारकोल की तलाश में। सड़क के उस हिस्से का काम खत्म हो गया था। पास के दुकानदार ने बतलाया तारकोल पी डब्ल्यू डी के गोदाम में मिलेगा। मैं पहुँच गया। चौकीदार से माँगा। उसने डांट दिया। मैं लौटने लगा तो उसने कहा अच्छा जाओ वो अंदर ड्रम पड़ा है, उसमे से एक टुकड़ा ले लो। मैं टुकड़ा लेने झुका ही था कि ड्रमों के अंबार के पीछे वही बड़ा वाला रोल पड़ा था, धूल मिट्टी से सना। ड्रमों और उसके बीच कांटेदार तार थी। मैंने ज्यूं-त्यूं लाँघ ली। बगल में बिजली वालों का गोदाम था। वो रोल जो सपाट पड़ा था, उसमें बहुत खूबसूरत फूल खिला था। मैंने थोड़ी देर रोल को छुआ। महसूस किया, जैसे ही फूल तोड़ने को था, चौकीदार चिल्लाया, तोड़ना मत यह कुमुदिनी का फूल है। मैंने गौर से देखा, तो सफेद कपड़ों में लिली खड़ी थी।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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