इस बात को प्रमाणित करने के लिए किसी अध्ययन की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए कि जिनके पास मोबाइल होता है उनके मोबाइल में व्हाट्सएप्प भी होता ही है। जहां मोबाइल है वहां व्हाट्सएप्प तो होगा ही। मेरे मोबाइल में भी व्हाट्सएप्प है और व्हाट्सएप्प में कई ग्रुप हैं। इनमें से कुछ ग्रुप में मैं अपनी इच्छा से जुड़ा हूं, किसी में जबरन जोड़ लिया गया हूं, किसी में हाथ-पैर जोड़ कर जुड़ा हूं। किसी में कोई जोड़-तोड़ कर के जुड़ा हूं, किसी में कड़ा विरोध सह के जुड़ा हूं, किसी ग्रुप के बाहर जुड़ने के लिए खड़ा हूं। किसी ग्रुप में यूं ही पड़ा हूं। किसी ग्रुप में शामिल होने के लिए लड़ा भी हूं, क्योंकि किसी व्हाट्सएप्प ग्रुप का सदस्य या एडमिन न होना मतलब किसी के पास आधार कार्ड न होने जैसा है।

कई ग्रुप अनचाहे बालों की तरह मेरे मोबाइल में उग आते हैं। इन्हें मैं नियमित रूप से ‘रिमूव’ करता रहता हूं, पर ये फिर उग आते हैं। शायद अनचाहे बालों की तरह इनका भी कोई स्थायी निदान नहीं है।

कुछ ग्रुप ट्रेन के लोकल डिब्बे की तरह होते हैं। ऐसे ग्रुप में एडमिन और सदस्य ठसाठस भरे होते हैं। जिस तरह हर स्टेशन पर ट्रेन के रुकते ही और सवारियां चढ़ जाती हैं। वैसे ही इन ग्रुप में भी जब देखो कोई न कोई सदस्य ऐड होते ही रहता है। ट्रेन के डिब्बे की तरह ग्रुप इतना भरा होता है कि ग्रुप में कितने लोग हैं, कौन क्या है, कौन क्या कह रहा है, किसी को कुछ समझ नहीं आता। इतनी भीड़-भाड़ होती है कि किसी की किसी को सूझ नहीं पड़ती। पर कोई ऐसे ग्रुप को छोड़ता भी नहीं है।

अब ग्रुप के ‘अंदर की बात’ कुछ ग्रुप शांत झील की तरह होते हैं। इनका पूरा काम-काज बहुत ही शांतिपूर्ण तरीके से होता है। एडमिन सहित सभी सदस्य धीर-गंभीर बने रहते हैं। यहां किसी स्कूल जैसा अनुशासित वातावरण होता है। सभी सदस्य अच्छे बच्चों की तरह बिहेव करते हैं। कहीं कोई उठापटक नहीं।

पर ज्यादातर ग्रुप अशांत प्रकृति के ही होते हैं। कुछ ग्रुप में तो दिन-रात खौलते पानी की झील जैसा माहौल होता है। एडमिन के साथ हर सदस्य बस उबल रहा होता है। ऐसे ग्रुप में वर्च्युअल मारामारी  और हाथापाई के दृश्य आये दिन होते रहते हैं। कभी तो ऐसा लगता है कि जैसे ये लोग आमने-सामने होते तो एक दूसरे को रैपटा ही जड़ देते या पैर पकड़ लेते या आपस में गुथ्थमगुथ्था हो जाते। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि ये लोग लड़ते-भिड़ते कहीं मोबाइल से बाहर ही न आ जाए या इनके झगड़े के दबाव से कहीं मोबाइल ही न फट जाए।

अब और ‘अंदर की बात’ हर ग्रुप में एडमिन का अहम रोल होता है। व्हाट्सएप्प ने एडमिन को कई अधिकार दिए हैं। इन अधिकारों का उपयोग और दुरूपयोग एडमिन अपनी समझ से करते रहते हैं। कुछ एडमिन हिटलर की तरह तानाशाह होते हैं। ग्रुप को अपनी जागीर समझते हैं। ग्रुप के सदस्य इनकी तानाशाही से आतंकित रहते हैं। ऐसे एडमिन अपनी ऊंगली पर रिमूव की तलवार लेकर ग्रुप में घूमते रहते हैं। कभी भी किसी को भी ग्रुप से उड़ा देते हैं। आव देखा न ताव, कर दिया घाव।

एक और बहुत ‘अंदर की बात’। कोई ग्रुप पर्यावरण प्रेमी होता है। सुबह से ही फूल पत्ती वाले संदेश शुरू हो जाते हैं। पर कुछ ग्रुप फूल पत्तियों के सख्त खिलाफ होते हैं। जहां ग्रुप में कोई फूल पत्ती दिखी तुरंत सांय-सांय करती एडमिन की गाड़ी वहां पहुंचती है और फूल पत्ती के साथ उस सदस्य को भी ग्रुप से बाहर फेंक दिया जाता है, जिसने वहां फूल पत्ती डालने की हिमाकत की। यहां ग्रुप को बगीचा बनाने की बगावत नहीं चलती।

कुछ एडमिन ‘गेले’ टाइप के होते हैं। ग्रुप की किसी भी गतिविधि पर इनका कोई नियंत्रण नहीं होता है। कोई सदस्य इनकी बात नहीं सुनता है। ग्रुप में अराजकता का माहौल रहता है। एडमिन किसी असहाय की तरह ‘मैं क्या कर सकता हूं’ वाले इमोजी भेजता रहता है। कुछ ग्रुप ऐसे भी होते हैं, जिनमें जरूरत से ज्यादा एडमिन होते हैं, जितने सदस्य उतने एडमिन। इसका एक फायदा भी है यदि किसी कारण ऐसे ग्रुप पर कोई कानूनी कार्यवाही हो जाए तो नियमानुसार सभी को एकसाथ जेल होगी तो सब साथ में तो रह सकेंगे। किसी से किसी को कोई शिकायत नहीं होगी।

कुल मिला कर जितने मोबाइल उतने व्हाट्सएप्प, जितने व्हाट्सएप्प उतने ग्रुप, जितने ग्रुप उतने एडमिन, जितने एडमिन उतने उनके रूप, रंग, तेवर। बाकि ग्रुप के सदस्यों का क्या है, उनकी जिंदगी तो ‘ऐड’, ‘रिमूव’, ‘लेफ्ट’, ‘एग्जिट’ में ही निकल जानी है।

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