किताबी बगीचा-21 श्रेष्ठ बालमन की कहानियां गुजरात
Kitabi Bagicha-Balman ki Kahaniyan Gujarat

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

किताबी बगीचा-शुक्रवार को शाला से वापस घर लौटते वक्त टिकूडा ने कहाः “अगले दिन शनिवार है। उद्यान में पढ़ने के लिए जाना है। तुझे आना हो तो तैयार होकर रहना।”

शाम को अखाड़े में हुतुतुतु खेलते-खेलते यह बात होती थी।

शाला से छूटकर सबसे पहले सीधा घर पर जाते स्कूल, बैग रखकर, हाथ-पैर धोकर बाद में खेलने के लिए जाते हैं।

हमारा अखाड़ा मतलब आनंद विहार। उसका विशाल मैदान शाम के पांच बजे से हमारी प्रतीक्षा करने लगता है। वहां गेम ऑफ थ्रोन्स, हुतुतुतु, लंगड़ा खेल, खो-खो, वोलीबोल जैसे खेल खेलने को मिलता है। व्यायाम के भी कई साधन है।

कॉलेज के छात्र स्कूल के बच्चों को भिन्न भिन्न खेल सिखाते हैं। सब अलग-अलग टीम में विभाजित हो जाते हैं। सात बजने के बाद सूर्यास्त के वक्त प्रत्येक छात्र कतार में खड़े हो जाते हैं। इसमें सब अपनी बारी आने पर अपना क्रमांक बोलते हैं। पचास, साठ तो हाजिर होते ही है, पर कभी-कभार सवा सौ भी हो जाते है।

रविवार को क्रिकेट खेलने के लिए हम सब मैदान में पहुंच जाते हैं।

पूनम के दिन हर कोई अपने घर से खाना लेकर आता है। सब साथ बैठकर भोजन करते हैं। महीने में एक दिन चलते-चलते नजदीक के किसी स्थल पर पिकनिक में जाने का आयोजन भी करते हैं।

अगले दिन किरीट और प्रह्लाद भी पढ़ने के लिए उद्यान में जाने वाले थे। अश्विन और छोटा नियमित पढ़ने जाते थे। दोनों बहुत होशियार थे। परीक्षा नजदीक आती। तब बाकी के उद्यान का लाभ लेते थे।

पास में ढेर सारी बिल्डिंग हैं। बिल्डिंग के बाद सीधी सड़क है। इस सडक के सामने एक बडा तालाब था। अब तालाब लगभग मिट्टी से भर गया है। उसके आधे हिस्से में नगरपालिका ने उद्यान बनाया है।

मैंने तो अखाड़े से घर आकर हाथ-पैर धोकर खाना खा लिया। स्कूल मेंसे दिया हुआ होमवर्क भी जल्द ही कर लिया।

अगले दिन सुबह का स्कूल था। स्कूल से छूटने के बाद उद्यान में पढ़ने के लिए जाना था। उस विचार में कब नींद आ गई पता ही नहीं चला।

पढ़ने के लिए उद्यान में दाखिल हुआ। जो देखा उससे मुझे आश्चर्य हुआ। पैर के नीचे हॉकी के मैदान में होती है। ऐसी हरे रंग की चद्दर जैसा घास था। जो गुद्गुदी करता था। थोड़ी दूरी पर दस-बारह फीट के अंतर पर घने वृक्ष थे। प्रत्येक वृक्ष पर भिन्न-भिन्न रंग के फल लटक रहे थे। फल बड़े थे और उसकी चमक भी कुछ अलग प्रकार की थी।

उद्यान में हरी चद्दर जैसी लोन थी। उस पर चलते वक्त टी.वी. में देखा हुआ हॉकी का खेल याद आ गया। मुझे लोन पर चलने का और पैर सरकाने का बहुत मजा आया। थोड़ी-थोड़ी दूरी पर बादामी और थोड़े काले तने वाले वृक्ष भी थे।

मैं एक वृक्ष के पास गया। उस वृक्ष के ऊपर दो-तीन लडके अलग-अलग शाखा पर बैठकर पढ रहे थे। मैं जिसको फल मानता था वह तो प्लास्टिक की बैग में लटकती किताबें थीं।

प्रत्येक वृक्ष के तने पर अलग-अलग विषय के नाम लिखे थे। एक गणित का वृक्ष था। दूसरा वृक्ष विज्ञान का था। गुजराती का वृक्ष विशाल था।

वृक्ष के मोटे तने के ऊपर दो से तीन फीट की दूरी पर अलग-अलग शाखाएँ झूल रही थीं। उन शाखाओं पर पांच फीट की दूरी पर सरलता से हाथ फैलाकर किताबें ले सके। इस तरह लटकाई हुई थीं। किताबें प्लास्टिक की थी। बारिश में भीगे भी नहीं। प्लास्टिक पर रंगीन चित्र के साथ छपाई की गई थी। चित्रों को देखकर ही आधा समझ में आ जाता था। ये किताबें हाथों में लेकर पढ़ने का मन करे, ऐसी हल्की थीं।

टिकुडा आज समाज विज्ञान के वृक्ष की ओर गया। मैंने पर्यावरण का तना पकड़कर एक शाखा पर जगह ढूंढ निकाली। नीचे चटाई जैसी घास पर शीतलता थी।

मंद-मंद चलती हवा मन को प्रफुल्लित करती थी। एक पाठ तो जल्द ही पढ़ लिया। अब मुझे समझ में आया कि ‘मरख पेटी’ अभ्यास में कितनी विघ्नरूप होती है। अरे, टेलीविजन! टेलीविजन पर कार्टून और दूसरी चीजें देखने के बाद पढ़ाई में एकाग्रता कैसे आती?

अचानक मेरी नजर, मैं जिस शाखा पर बैठा था, उसके तने पर गई। तो वहां तने में परदे पर पर्यावरण के पाठ एक के बाद एक दिखाई देते थे। मैंने नजदीक जाकर देखा तो उसकी गति कम करने की चाबी भी थी। मैं जो पाठ पढ़ गया था उसके देखने के लिए चाबी दबानी होती थी। एक बार पाठ पढ़ लेने के बाद फिर से देखने से मुझे ठीक से समझ में आ गया। साथ में एक बात यह भी निश्चित हुई कि पहले एक दफा ध्यान से पढ़ना चाहिए ही।

स्वच्छता और प्रदूषण के बारे में पढ़ने का इतना मजा आया कि पूछो ही मत। गंदगी फैलने से बीमारी होती है। यह बात मुझे पक्की समझ में आ गई। प्रदूषण रोकने की प्रत्येक बात मुझे बराबर याद रह गई। मैं तो जोर-जोर से बोलने लगा।

“कब का क्या हड़बड़ा रहा है? उठ खड़ा हो जा। सुबह का स्कूल है। स्कूल जाने में देर होगी।” मां ने टटोलने हए कहा।

स्कूल में जाते वक्त मुझे किताबों के उद्यान के बारे में ही विचार आते रहे। ऐसे उद्यान हो तो पढ़ने का कितना मजा आता!

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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