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कथा-कहानी

 दस वर्ष की मिनी की आंखों से नींद कोसों दूर थी। उम्र के हिसाब से दिमाग पर अनावश्यक दबाव की वजह से वह तनावग्रस्त हो उठी। दिनभर की बातों को उसने एक बार याद किया कि उससे कोई भूल तो नहीं हुई। उसने सुबह से अपने कार्यों को याद करके सोचने का सिलसिला शुरू किया। सुबह उठते ही पीठ पर पुस्तकों का बोझ लादकर वह स्कूल गई।स्कूल पहुंचने तक पीठ में दर्द होने लगा।

सप्ताह भर पहले ही तो उसे बुखार आया था। अब दो दिनों से वह स्वस्थ है। कुछ कमजोरी तो कुछ नींद न पूरी होने के कारण नींद से पलकें झुकने लगी। शिक्षिका ने उसे झिडक़ी देकर क्लास से बाहर निकाल दिया।कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। उस शीतलहरी में बरामदे में वह ठंड से कांपने लगी। स्कर्ट पहनने की वजह से पैर एकदम ठंडे हो गए। ‘मैम… ठंड लग रही है, अंदर आ जाऊं?’ बहुत ही संकोच एवं विनम्रता से उसने पूछा, ‘नहीं’ बहुत ही रुखाई से शिक्षिका ने जवाब दिया।

ठंड से कांपती वह पूरे पीरियड यही सोचती रही कि मैम ने उसे अंदर आने की अनुमति क्यों नहीं दी। घर में मम्मी-पापा का खौफ तो स्कूल में शिक्षिका का। शाम में वह ट्यूशन जाती है।आते ही उसे मम्मी फिर पढऩे बैठा देती है। इतने सारे होमवर्क को पूरा करने पर भी मम्मी-पापा हर वक्त ‘पढ़ो-पढ़ो’ कहते रहते हैं। आखिर कितना पढ़े वह। पार्क में बच्चों को खेलते देखकर उसका मन भी मचल उठता। उसे बेहद दुख होता कि इतना पढऩे पर भी मम्मी-पापा की डांट अथवा मार खानी पड़ती है।

उसका बचपन तो बहुत कम उम्र में ही पीछे छूट गया, जब वह तीन वर्ष की थी। नई ड्रेस, सुंदर टिफिन बॉक्स को देखकर वह बहुत खुश थी।मम्मी-पापा देर से दफ्तर से आते इसलिए खानेपीने में देर होती। देर रात तक मम्मी-पापा टीवी देखते तो बार-बार उनकी नींद टूट जाती। सुबह गहरी नींद में थी कि मम्मी ने उठा दिया। आंखे बंद किए ही उसने ब्रश किया।स्कूल में शिक्षिका सिखाती, ‘मछली है जल की रानी, जीवन है इसका पानी…।’ उसे अच्छा लगता यह सब। बहुत से बच्चे स्कूल के पास आते ही रोना शुरू कर देते। कुछ बच्चों की मम्मी प्यार से समझाकर उन्हें गेट के अंदर भेजती तो कुछ बच्चे डॉट खाकर स्कूल के अंदर प्रवेश करते। घर आने पर भी वह हमेशा गाती, मछली है जल की रानी।

अचानक उसकी नींद उचट गई। वर्षो बाद आज फिर वह मछली है जल की रानी, धीरे-धीरे गुनगुनाने लगी। उसे लगा वह एक मछली है, जिसके चारो तरफ किताबें शिक्षिका, ट्यूशन तथा मम्मी-पापा हैं जो उसे कह रहे हों- पढ़ोपढो…। वह हड़बड़ा कर उठ बैठी। अंधेरे में चारो तरफ देखा तो डर और भी बढ़ गया। भय और प्यास से उसका कंठ सूख गया।उसके दिमाग की नसें फटने लगीं। मम्मी कहती हैं, ‘खूब पढ़ो और डॉक्टर बनो’ तो पापा कहते हैं, ‘इंजीनियर बनो।’ कोई उसे नहीं कहता, ‘ट्यूशन से आकर या होमवर्क करके थक गई हो…, थोड़ा पार्क में खेल आओ…।’ श्रेया, प्रिया सभी तो शाम में खेलती हैं। अंधेरे में वह देखने का प्रयास करने लगी।

तभी उसे याद आया कि कल सुबह ही बुआ आ रही है।बुआ की याद आते ही उसके पूरे जिस्म में भय की एक लहर सी दौड़ गई। बुआ तो टीचर है, अब उसकी खैर नहीं। वह तो उसे हर वक्त पढ़ाती रहेंगी और फिर ठंड में बाहर निकाल देंगी। वह हाथ जोडक़र ईश्वर से प्रार्थना करने लगी, ‘हे भगवान बुआ न आए।’ सुबह बुआ के आते ही घर में हलचल सी मच गई। वह दूर खड़ी चुपचाप बुआ को देखती रही। मन में इच्छा हो रही थी कि जाकर उन्हें प्रणाम करे पर भय से पांव कांप रहे थे। तभी बुआ ने कहा, ‘अरे मिनी दूर क्यों खड़ी है?’

मिनी ने आकर उन्हें प्रणाम किया तो बुआ ने उसे सीने से लगा लिया। बुआ उसके लिए ढेर सारे उपहार लेकर आई थी। दिनभर मिनी यही सोचती रही कि बुआ उसे अब पढऩे को कहेंगी। लेकिन बुआ तो बहुत अच्छी-अच्छी बातें बताती रहीं। हर वक्त वह मिनी की प्रशंसा करतीं।

मिनी की मम्मी बुआ से शिकायत करने को तत्पर बैठी थीं। उन्होंने शिकायत का पिटारा खोल ही दिया, ‘पढऩे-लिखने में इसका मन लगता ही नहीं है, ना पढऩे के बहाने तलाशती है, पार्क में खेलते बच्चों को देखती रहती है, हर वक्त खोयी-खोयी सी रहती है, कैसी मुरझा सी गई है, इसकी टीचर तथा हम सभी इसके दुश्मन हैं, किताबों को तो यह देखना तक नहीं चाहती।’

‘अरे भाभी अब बस भी करो, यह तो बड़ी अच्छी बेटी है, अच्छा मिनी तुम कौन-कौन से खेल जानती हो?’ मिनी को पास बिठाते हुए बुआ ने पूछा। मिनी चुपचाप बुआ का मुंह देखती रही। आखिर वह क्या जवाब दे, खेलने का उसे कोई मौका ही नहीं दिया गया था। बुआ स्थिति का अवलोकन करके सारी बात समझ गई। उन्होंने प्रसंग को बदल दिया।

मिनी आश्चर्य में पड़ गई। बुआ टीचर है पर पढऩे-लिखने की बातें नहीं करती? कितनी मनोरंजक घटनाएं दिनभर सुनाती रहीं। शाम में मिनी को लेकर वह पार्क चली गईं। बच्चों के बीच उसे खेलने को छोड़ दिया और वहीं घास पर बैठ गई। मिनी का उत्साहवर्धन करती रहीं और घर जाकर भी उसकी प्रशंसा सब से की। मिनी का आत्मबल बढ़ाने का हर संभव प्रयास किया। पार्क से लौटते ही मिनी स्वयं ही होमवर्क करने में लग गई।

मिनी के मम्मी-पापा यह सब देखकर आश्चर्यचकित थे। मिनी को तो वे समस्याग्रस्त बच्ची समझते थे। कितने डॉक्टरों को दिखाया था। उनसे रहा नहीं गया तो एकांत में पूछ ही लिया, ‘आपने कौन सा जादू कर दिया।’ 

बुआ ने बहुत ही संयत स्वर में उन्हें कहा, ‘खेलने खाने की उम्र में उसके दिमाग और शरीर पर इतना अधिक बोझ लाद दिया गया कि उसके भीतर दहशत समा गई। शिक्षक तथा आप सभी उसे शत्रु लगने लगे थे। अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है, उसके सुंदर भविष्य की जिम्मेदारी आप लोगों पर है…, हताशा की स्थिति से उसे निकालें अथवा वह अवसादग्रस्त हो जाएगी।’

सप्ताह भर में बुआ ने मिनी का कायाकल्प कर डाला। हमेशा उदास रहने वाली मिनी अब बात-बात पर खिलखिला उठती। कभी बुआ से कहानी सुनती तो कभी उन्हें कविता सुनाती। उसके पापा चुटकुले सुनाते तो मम्मी सबको अंत्याक्षरी खेलने को तैयार कर लेतीं। पढ़ाई के समय पढ़ाई भी हो जाती। जिस विषय में मिनी को कठिनाई महसूस होती उसमें वह बुआ से मदद ले लेती। पारिवारिक माहौल बेहद खुशनुमा हो उठा।’

बुआ के जाने का समय आते ही सभी उदास हो गए। मिनी के मम्मी-पापा बुआ के प्रति बेहद कृतज्ञ थे। जो मिनी बुआ के न आने की प्रार्थना ईश्वर से कभी कर रही थी उसी ने बुआ के सीने से लग कर कहा, ‘बुआ फिर आना।’

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