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मां तो बस मां ही होती है – गृहलक्ष्मी कहानियां

निहाल के आंसू थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे। उसकी दो साल की बेटी नेहा उसकी गोद में बैठी टुकुर टुकुर उसकी और देख रही थी। पास ही कुसुम निर्जीव सी फर्श पर जड़ पड़ी थी, न कुछ बोल रही थी और न ही उठ रही थी। थोड़ी देर पहले तक सब ठीक था।

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मेरे सामने वाली खिड़की में – गृहलक्ष्मी कहानियां

मिसेज गुप्ता नारी जाति पर अब तक हुए तमाम अत्याचारों का बदला अकेले गुप्ता जी से ले रही हैं। मेरी उनके साथ पूरी सिमपैथी है, परन्तु मैं विवश हूं उनकी हैल्प करना, मिसेज गुप्ता का कोपभाजन बनना है।

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गृहलक्ष्मी की कहानियां : गुमराह बच्चे

सुबह के नौ बजे थे। स्कूल के गेट के पास चार-पांच लड़कियां सजी धजी सी खड़ी थी और बार बार सड़क की तरफ देख रही थी मानो किसी की राह देख रही हों। आज स्कूल में बच्चों की छुट्टी थी और बच्चों को स्कूल नहीं आना था। इतने में उन्होंने मैडम की गाड़ी आती देखी तो इधर उधर छुपने लगी। मैडम ने उन्हें देख लिया था।

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गृहलक्ष्मी की कहानियां : एक चालाकी ऐसी भी

पापा के दोस्त पाण्डेय जी के दो बेटे और एक बेटी हैं। पांडेय अंकल सरकारी नौकरी में थे। अपनी जिंदगी में उन्होंने अपने तीनों बच्चों को पढ़ाया लिखाया, पहले बेटी की शादी की और फिर बड़े बेटे की। बड़ा बेटा उसी शहर में प्राइवेट कंपनी में नौकरी करता था।

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इज्ज़त या आत्मसम्मान – गृहलक्ष्मी कहानियां

डाइनिंग हॉल में बैठकर परिवार के सभी लोग नाश्ता कर रहे थे । मेहता जी एवं उनके बेटों के बीच बड़ी-बड़ी बातें हो रहीं थीं, कभी कॉरपोरेट ऑफिस तो कभी सुप्रीम कोर्ट तो कभी विधान सभा के मसलों पर और सुझाव दिए जा रहे थे।

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गृहलक्ष्मी की कहानियां : मां तो मां ही होती है

मेरे पड़ोस के घर आज 4-6 दिन हुये पोता हुआ। सब बड़े ही खुश हैं, मैं भी अपने काम जल्दी निपटा कर जाना चाह रही हूं शिखा, चार-पांच दिन तो हो गये अभी इन लोगों के यहां वो नाचने गाने वाले नहीं आये, कब आयेगें। आ जायेगे मां जी, आप क्यों परेशान हैं।

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नयी सहर – गृहलक्ष्मी कहानियां

निधि गई, उसके पीछे पीछे मोहित भी अपने कमरे में चला आया । वह मुंह दूसरी ओर किये लेटी थी। मोहित समझ रहा था वह रो रही है मगर उसके आंसुओं का सामना करने की हिम्मत अभी मोहित में नहीं थी। लाइट बुझा कर वह भी लेट गया।

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मां का प्यार – गृहलक्ष्मी कहानियां

ट्रेन जैसे ही प्लेटफार्म पर रुकी, मैंने इधर उधर नज़रे दौड़ाई। तभी सामने चाय की दुकान पर छह- सात बरस के बच्चे पर निगाह पहुंच गयी। नए पैंट-शर्ट, धूल-धूसरित बाल, फटे गाल, वो लड़का वहां पड़े कुल्हड़ों में बची चाय पीने की कोशिश कर रहा था।

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हाय हाय ये महंगाई – गृहलक्ष्मी कहानियां

धन्य है हमारी श्रीमती जी, जिन्होंने महंगाई से जंग लडऩे का संकल्प लिया। लाख समझाया कि तुम्हारे वश की बात नहीं, तो कहने लगी अपनी असफलताओं से ही सबक लेना चाहिए

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गृहलक्ष्मी की कहानियां : टेलीफोन

कॉलेज टाइम से वो एक दूसरे को प्यार करते थे। घरवालों ने खुशी-खुशी रिश्ता मंजूर कर लिया, धूमधाम से शादी हुई और कब दो साल गुजर गये, पता ही नहीं चला। पर कल उस फोन की घंटी से जैसे सब कुछ थम सा गया…

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