रात के करीब डेढ़ बज रहे थे कस्बे में गहन सन्नाटा छाया हुआ था लेकिन सावित्री के घर से बच्चे के रोने की आवाजें लगातार आ रही थीं। बिजली चली गई थी सावित्री ने मिट्टी के तेल की लालटेन जला दी, मगर उसके तीन महीने के मुन्ने का रोना बंद नहीं हो रहा था सावित्री ने बच्चे को चुप कराने का हर संभव प्रयास किया मगर सब बेकार ही रहा।
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पत्नीजी का ‘ऑड-ईवन’ फार्मूला – गृहलक्ष्मी कहानियां
हम पतिधर्म निभाते हुए सुनते रहे। लाचारी में कोई विकल्प होता भी नहीं। नए सिस्टम के अनुसार सोम, बुधवार, शुक्रवार को किचन की जिम्मेदारी पत्नीजी पर और मंगल, बृहस्पति, शनिवार को हमारी। नहीं पता, मेरे हिस्से सम आया या विषम, लेकिन सुनते ही कंपकंपी छूट गई।
वसीयत और वारिस – गृहलक्ष्मी कहानियां
रमन के इनकार ने काव्या को चिंतित कर दिया था। वह यही सोच कर परेशान थी कि अब वह वसीयत उसके वारिस तक कैसे पहुंचा पाएगी। आखिर क्या थी वसीयत की पहेली और काव्या का बदला…
सवालों के दायरे में जिंदगी – गृहलक्ष्मी कहानियां
सुनयना कॉलेज से आई ही थी कि घर की हालत देखकर परेशान हो गई। अस्त-व्यस्त पड़ा सामान, नौकरानी के ना आने की चुगली कर रहा था। थकी मांदी सुनयना को गुस्सा तो बहुत आया। किचन में गई तो वॉश बेसिन में पड़े झूठे बर्तन जैसे उसे चिढ़ा रहे थे। इसका मतलब राधा आज भी नहीं आई थी। सुनयना के कॉलेज में सुबह जल्दी क्लासेज होती थी। दोपहर में घर आकर खाना बनाने का मूड ही नहीं होता था। गुस्से को शांत कर अब वह काम में जुट गई। फ्रीज से ब्रेड निकालकर नाश्ते से ही काम चला लिया। कॉलेज की सर्विस आसान थोड़े ही थी। लेक्चर तैयार करने के लिए स्टडी करने में ही वह थक जाती थी।
खुशियों की दस्तक – गृहलक्ष्मी कहानियां
वृद्ध दंपत्ति का एकमात्र सहारा उनका पुत्र जब परदेस के जीवन में खो गया और अकेलापन वृद्ध दंपत्ति को तिल-तिल कर मारने लगा तब पराये लोगों में उन्होंने अपने जीवन का यथार्थ ढूंढ़ लिया।
सजा से मुक्ति – गृहलक्ष्मी कहानियां
शॉपिंग मॉल में अचानक पलाश और पलक दिखाई दे गए। पलक अपने चिर-परिचित अंदाज में चहकते हुए बोली, ‘हैलो, भीनी कैसी हो?’ मेरे अंदर क्रोध का लावा जमा था, वह लावा बाहर तो निकलना चाह रहा था लेकिन समय व स्थान को देखते हुए खुद पर काबू रखना पड़ा। बड़े रूखे स्वर में कहा, ‘अच्छी […]
मेरी बेटी मेघा – गृहलक्ष्मी कहानियां
सारे विकल्प समाप्त हो चुके थे। अब तो मात्र निर्णय लेना था। किसी की सुनी-सुनाई बात नहीं थी। सुनी-सुनाई पर विश्वास भी नहीं किया कभी। आंखों देखी घटना थी। सब ठीक चल रहा था। कम से कम मेरे हिसाब से। दस वर्ष विवाह को हो चुके थे। एक प्यारी सी 8 वर्ष की बेटी थी। अच्छी नौकरी थी। घर में ऐसी कोई कमी न थी कि किसी मजबूरी के तहत कोई अनुचित कदम उठाना पड़े। कमी होती तो शायद ऐसा न होता।
गृहलक्ष्मी की कहानियां : पौत्र जन्म की खुशियां
पत्नी मुक्त मन से पैसा लुटाने में लगी थी। मैंने उसे समझाया था कि वह पौत्री को ही बेटा मान लें, बावजूद उसके भीतर तमन्नाएं उछालें मार रही थीं कि इस बार तो पौत्र ही हो।
गृहलक्ष्मी की कहानियां : नई राह
गृहलक्ष्मी की कहानियां : एक दिन दोपहर के समय फोन की घन्टी बजी, हेलो- रोहित का गम्भीर एक्सीडेन्ट हो गया है। रोहित के पिता ने बड़ी गम्भीर आवाज़ में कहा। हाथ तो उम्र के कारण कांपते ही थे दादा जी के हाथ से रिसीवर गिर कर झूलने लगा। और दादा जी वही घम्म से गिर […]
मां की सीख – गृहलक्ष्मी कहानियां
एक कबूतर ने बालकनी में रखे शू रैक में दो अंडे दिए थे। मां की लाख हिदायतों के बावजूद रिशू और पम्मी वहां बार-बार जाकर देखते कि अंडों से चूजे निकले हैं या नहीं। अचानक एक दिन रिशु की नजर काले बिलौटे पर पड़ी, उसने उसे तुरंत भगा दिया और पम्मी को बताया। यह सुनकर पम्मी भी चिंतित हो गई।
