पता नहीं वो कौन सी मनहूस घड़ी थी जब ‘ऑड-ईवन’ का फॉर्मूला हमारी पत्नीजी के उपजाऊ दिमाग में प्रविष्ठ हुआ। उस दिन के बाद हमारी सभी गतिविधियां इसी सूत्र से संचालित होने लगी। ‘ऑड-ईवन’ का आइडिया नूतन है अथवा पुरातन, असरदार है अथवा बेअसर हम उस झमेले में फंसना नहीं चाहते, लेकिन इसने हमारी जिंदगी को किस तरह अपनी गिरफ्त में ले लिया है, बस ये दुखड़ा शेयर करना चाहते हैं। वैसे भी घर में सार्वजनिक रूप से ऐसी घर बिगाडू बातें करना सद्गृहस्थ के लिए वर्जित है। इससे घर की शांति भंग होना सुनिश्चित है। पत्नीजी रुष्ट हो सकती हैं, दो-चार साल में एक बार मायके जाने पर प्रतिबंध लग सकता है, इसलिए अपनी आजादी के ऐसे दिव्य पलों को खो देने का रिस्क हम अफोर्ड नहीं कर सकते।
प्रदूषण का मुद्दा वैसे भी सुर्खियों में है। हर चीज के साइड इफैक्ट होते हैं इसलिए हम राजधानी से दूर होते हुए भी इस प्रदूषण की चपेट में आ गए। दिल्ली की सडक़ों पर ऑड-ईवन नंबर के वाहनों के फार्मूले ने पत्नीजी के दिमाग की बत्ती अचानक जला दी और वो तब से घर को प्रयोगशाला बनाने पर तुली हैं।
उस दिन जैसे ही हम घर पहुंचे तो श्रीमतीजी ने हमें ऑड-ईवन पर घेर लिया। हमें हंसी आई तो हमने उन्हें समझाया, ‘पगली अमरीका, चीन सब जगह ये फार्मूला फेल रहा।’ लेकिन उन्हें तो ‘मफलरबाजी’ के दिव्य ज्ञान पर बड़ा नाज था, इसलिए अपनी घोषणा सुना डाली।
‘आप कुछ भी कहें लेकिन बंदे में दम है तभी ऐसे आइडिया लॉन्च करता है, अब अपने घर में भी इसी फॉर्मूले से काम होंगे…’ हम पति का धर्म निभाते हुए गंभीरतापूर्वक सुनते रहे। लाचारी में कोई दूसरा विकल्प होता भी नहीं। एक नजर नए सिस्टम पर डाल लीजिए-
सोम, बुधवार, शुक्रवार को किचन की जिम्मेदारी पत्नीजी पर और शेष दिवस अर्थात मंगल, बृहस्पति, शनिवार को हमारी। नहीं पता, मेरे हिस्से सम आया या विषम, लेकिन उनकी बात सुनते ही कंपकंपी छूट गई।
दूसरी व्यवस्था यह स्थापित हुई कि सम संख्यांक के दिनों में हम अपना स्कूटर ले जा सकते हैं लेकिन विषम दिनों वाहन अलाऊ नहीं, उन दिनों के पेट्रोल की ‘सरप्लस मनी’ को पत्नीजी के ब्यूटीपार्लर मद में जमा कराना होगा।
सप्ताह के विषम दिवसों पर साफ सफाई की जिम्मेदारी भी हमें सहनी होगी। घर में टीवी चैनल किस समय, कौन से देखे जाएंगे ये भी ऑड-ईवन’ फॉर्मूले से तय हो गए। बच्चों को ट्यूशन देने वाले सर ने भी ओड-ईवन डेज फिक्स कर अपने कार्य दिवस आधे कर लिए। दबी जबान से हमने भी एक मांग रख दी है। घर में पत्नीजी सिर्फ सोम, बुध, शुक्रवार को ही बोलेंगी, डांट लगा सकेंगी, शेष दिवसों पर हमारा हुकुम चलेगा। संडे फ्री रहेगा, कारण सब अपनी आजादी से जी सकेंगे। लेकिन हमारी चिर प्रतीक्षित अभिलाषा अभी मंजूर नहीं हुई है। इस पर पत्नीजी ने वीटो कर रखा है लेकिन विचाराधीन होने के बावजूद हम बहुत खुश हैं, दो तीन दिवस ही सही, हमें बोलने का मौका तो मिलेगा। विवाहित पुरुष भी स्वतंत्रता, समान नागरिक संहिता को महसूस कर सकेंगे।
यदि ये मांग पूरी हो जाए तो लगेगा, हमारे यहां भी ध्वनि प्रदूषण कुछ कंट्रोल हो गया है लेकिन ये डिमांड कभी पूरी नहीं होनी न नौ मन तेल होगा और न राधा नाचेगी। सबको पता है, होना जाना कुछ नहीं। हम प्रदूषित हुए या प्रदूषण मुक्त ये तो अभी नहीं कह सकते लेकिन ये सच है कि ऐसे सिस्टम ने हमारा जीना जरूर मुहाल कर दिया है।
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