राधा को नौकरी पर रखे अभी कुछ ही दिन बीते थे। वह साधारण व्यक्तित्व की सांवली सी महिला यों तो जवान थी, काम में कुशल भी बहुत थी, लेकिन बिना बताए छुट्टी कर लेने की उसकी आदत से वह बहुत परेशान थी। सुनयना बेड पर लेटी थी, टीवी देख रही थी। अचानक राधा आ गई। राधा को इस वक्त देखकर वह गुस्से से उसे डांटने लगी। राधा चुपचाप नीचे फर्श पर बैठी, उसकी डांट सुनती रही। उसकी अश्रुधारा देख, सुनयना का दिल पसीजने लगा।

अब वह शांत होकर बोली, ‘क्या बात है राधा? तुम बिना बताए इस तरह गायब क्यों हो जाती हो?’ राधा गंभीर होकर बताने लगी, ‘मेम साहब क्या करूं? चार दिन हो गए हैं बेटे को, बुखार से तड़प रहा है। कुछ पैसे दे देती तो…’ उसने अपना वाक्य अधूरा छोड़ दिया। सुनयना ने पूछा, ‘तुम्हारे पति भी तो होंगे?’ राधा रूआंसी हो बोली, ‘मैम साहब! मरद तो है लेकिन जैसे नहीं। शादी के बाद बच्चों को गोद में डालकर ना जाने कहां गायब हो गया। दूसरी कर ली उसने। पहले साथ थी, तब भी क्या सहारा था? रोज पीटता था मुझे। शराब के लिए पैसे मांगता रहता था।’ राधा ने अपनी सारी राम कहानी सुनयना को सुना दी। उसने तुरंत पर्स में से पांच सौ रुपये दे दिए। राधा चली गई।

अब उसे बहुत सहानुभूति हो रही थी राधा से। काफी देर तक वह राधा की जिंदगी के बारे में सोचती रही। उसकी भी पारिवारिक मजबूरियां थी। चार बच्चों की मां होकर वह अपनी गृहस्थी कैसे चला रही थी। एक औरत होकर कितना कठिन काम था, राधा के लिए। सुनयना अक्सर अब राधा की सहायता कर देती थी। उसके बच्चों को अपनी तरफ से कभी-कभार चॉकलेट, टॉफी, आइसक्रीम और मिठाई के पैसे भी दे देती थी। एक औरत होने के नाते वह उसकी हालत को अच्छी तरह समझती थी।

नारी जीवन पर कितना अध्ययन किया था उसने। समाजशास्त्र में पीएच.डी. की उपाधि मिली थी उसे। उसकी अपनी जिंदगी भी तो एक अनसुलझी पहेली ही थी। उसे महसूस होता कि जैसे वह भी राधा के समान ही तो है। व्यवहार में अक्सर, उच्च या निम्न वर्ग से एक औरत की जिंदगी में कोई मौलिक अंतर नहीं आता।

उसके पति अशोक एक सफल बिजनेसमेन थे। अति व्यस्त जीवन था उनका। दस कमरों की कोठी में उनके सेपरेट बेडरूम थे। पति देर रात लौटते। क्लब जाना उनकी रूटीन लाइफ थी, लेकिन जाते हमेशा अकेले ही थे। अपनी जिंदगी का खालीपन उसे हमेशा अखरता था। वैसा ही खालीपन जैसा राधा के जीवन में था। शादी के बाद से उसने एकाकीपन ही तो बिताया था। आर्थिक तंगी चाहे ना रही हो, किन्तु पति-पत्नियों दोनों के दिलों के बीच की दूरी कभी कम नहीं हो पाई। उसकी जिंदगी में न अपनत्व था और ना ही प्रेम, रोमांस। फर्ज, जिम्मेदारी के भाव उसने कभी समाप्त नहीं होने दिए थे। वह जब भी एक सामान्य महिला की तरह सोचती तो उसे लगता कि शायद वह दुनिया की सबसे गरीब औरत है।

अशोक के व्यवहार को वह कभी नहीं समझ पाई। उसके अंतरमन में उठने वाले विभिन्न सवालों ने उसके सुख चैन को छीन लिया था। उसकी जिंदगी में ऐसे बहुत से सवाल थे, जो रह रहकर उसे परेशान करते थे। लाख प्रयत्नों के बाद भी वह उनका कोई जवाब तलाश नहीं पाई थी। वो सारे सवाल जैसे अनुत्तरित ही थे। उसके मन में विचार आता कि अशोक का उपेक्षित व्यवहार, क्या उसके लिए अत्याचार नहीं है? उसने कभी भी एक जिम्मेदार पत्नी के विपरीत आचरण नहीं किया था। फिर भी वह, इतनी उपेक्षित क्यों? क्या पत्नी भी बाजार में उपलब्ध उपभोक्ता सामान की तरह है कि जब मन भर गया तो उसे उपेक्षित जीवन जीने के लिए छोड़ दिया।

यदि ऐसा ही था और अशोक को एकाकी जिंदगी ही पसंद थी तो उसने उसके साथ विवाह ही क्यों किया? माना कि उनमें उसके प्रति प्रेम नहीं है, किन्तु वह तो एक औरत है, जिसमें इंसानी भावनाएं हैं जो अपने पति से जायज अपेक्षाएं रखती है। उसके दिल में बार-बार यह ख्याल आता कि क्या अशोक को यह बात समझ में नहीं आती? उनका ऐसा उपेक्षित व्यवहार अनजाने में था या जानबूझकर? उसका तिरस्कार करके वह अपने पुरुषत्व के अहं को तुष्ट कर लेना चाहता था? ऐसे कठोर व्यक्तित्व को क्या संज्ञा दी जाए? क्या उनमें मानवीय भावनाएं थी ही नहीं या उन्हें कभी सुनयना की जरूरत ही महसूस नहीं होती थी?

 इन प्रश्नों ने उसकी जिंदगी को इतनी ठेस पहुंचाई थी कि वह टूट कर रह गई थी। उसकी जिंदगी इन सवालों की गिरफ्त में फंस कर बेजान हो चुकी थी। उसने तिरस्कार और अछूत व्यवहार के साथ भी समझौता कर लिया था क्योंकि वह अपनी जिंदगी को दुनिया की नजरों में तमाशा नहीं बनाना चाहती थी। उसकी सोच थी कि अंदर की बात अंदर ही रहे, एक औरत के लिए यही शालीनता की बात है। राधा के साथ सुनयना को समानताएं दिखतीं। जैसे दोनों का जीवन एक समान है। सुनयना अशोक के व्यक्तित्व को कभी नहीं समझ पाई थी। पैसा ही तो सब कुछ नहीं होता? पैसों से अलग भी जिंदगी होती है। शायद उसमें सुकून भी ज्यादा हो। कुछ रिश्ते और भावनाओं के आगे पैसे की चमक कोई मायने नहीं रखती।

एक दिन सुनयना कॉलेज से जल्दी घर आ गई। पोर्च में अशोक की कार खड़ी थी। शायद वो अभी तक अपने ऑफिस नहीं गए थे। उनके पास कोठी की अलग-अलग चाबियां होती थीं। उसने मेनडोर खोलकर लॉबी में प्रवेश किया, घर में न तो अशोक और न ही राधा दिखाई दे रहे थे। उसने किचन में देखा, राधा वहां भी नहीं थी। अशोक के बेडरूम ने उसका ध्यान आकर्षित किया। उसके बेडरूम से कुछ अजीब सी आवाजें सुनाई पड़ रही थी। उसने बेडरूम का डोर नॉक किया तो दरवाजा नहीं खुला। थोड़ी देर प्रतीक्षा करने के बाद उसने एक बार फिर से डोर नॉक किया। अब दो-तीन मिनट बाद डोर खुला तो वह भौंचक्की रह गई। अशोक अपने बेड पर लेटा हुआ था। राधा, डरी सहमी सी कोने में खड़ी अपनी साड़ी ठीक कर रही थी। उसकी नजरें नीचे झुकी हुई थी। उसकी हिम्मत नहीं हो पा रही थी कि वह मेम साहब से नजरें मिला सके।

अशोक आराम से बेड पर लेटा रहा। सुनयना को देखकर उसने बस इतना ही पूछा, ‘आज इतनी जल्दी कैसे आ गई?’ सुनयना ने जवाब नहीं दिया। वह वहां का नजारा देखकर सब समझ गई। वह समझ नहीं पा रही थी कि आखिर ऐसा क्यों? ऐसी हरकत क्यों की अशोक ने? अशोक की धृष्टता से उसे आक्रोश हो रहा था। उसे तो अपने किए पर पछतावा भी नहीं था।

अशोक बिना कुछ कहे अपना सूटकेस उठाकर ऑफिस जा चुका था। राधा उसके कमरे में आकर फूट-फूट कर रो रही थी। सुनयना ने उससे कुछ नहीं कहा। वह फजीहत पसंद नहीं करती थी। राधा ने स्वयं ही बताना शुरू किया, ‘मेम साहब! मेरी कोई गलती नहीं है। आप चाहो तो मुझे नौकरी से निकाल दो। मैंने तो हमेशा साहब से दूर रहने की कोशिश की है। मेरी बदकिस्मती थी कि आज मैं जब यहां आई तो साहब की कार कोठी से निकल रही थी। मैं किचन में जाकर अपने काम में लगी ही थी कि वो वापस आ गए और…, मैं क्या करती?’ राधा फूट-फूटकर रोने लगी। उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे। सुनयना उसकी लाचारी और बेबसी को समझ रही थी। गलती राधा की नहीं उसके पति की ही थी। उसने समझाबुझा कर राधा को विदा किया लेकिन वह इस सदमे से उबर नहीं पा रही थी।

सुनयना को बार-बार ख्याल आ रहा था कि आखिर ऐसा कैसे हो सकता है? अशोक को राधा में ऐसा क्या लगा जो उसमें नहीं था। यदि अशोक को यह सब अच्छा लगता है तो फिर वह उपेक्षित क्यों। सौंदर्य में तो सुनयना की तुलना में राधा कहीं नहीं टिकती थी। राधा साधारण सी महिला थी। फिर भी उसमें इतना आकर्षण कि… वह सोच सोचकर परेशान हो रही थी। उसे लग रहा था कि उसमें और राधा में कोई बेसिक फर्क नहीं है। दोनों औरत ही तो हैं। मजबूर और आसान शिकार। दोनों एक समान ही तो थीं, शिकार बनी औरत। लेकिन आज जो कुछ उसने देखा, उस घटना की तो कोई व्याख्या ही नहीं थी। अशोक भी एक आम आदमी से अलग नहीं था। अब उसका दिल बुरी तरह टूट चुका था। जिंदगी के यथार्थ ने जैसे उसकी जिंदगी को ही व्यर्थ साबित कर दिया था।

अब तक उसने सब कुछ सहन किया था लेकिन अपनी आंखों के सामने वह ये सब कैसे सहन करती? वह पुरुष सोच के पशुत्व को समझ नहीं पा रही थी। उसे अफसोस हो रहा था कि राधा जिसके प्रति वह इतनी दया और सहानुभूति रखती थी, अपनी उतरन उसे दे कर सोचती थी कि वह उसको संबल दे रही है। लेकिन अब उसे लग रहा था शायद वह तो राधा से भी गरीब और बेबस है। उसे लगने लगा कि जैसे वह स्वयं ही राधा की उतरन है। छी-छी, नफरत होने लगी उसे अपने आप से। वह ऐसी अछूत जिसे छूना भी…। उसने अपना सूटकेस तैयार किया।

जाने से पहले वह एक बार अशोक से बात कर लेना चाहती थी ताकि अनसुलझे सवाल जिन्होंने उसकी जिंदगी के सारे रंग छीनकर उसे रंगहीन बना दिया था, के जवाब हासिल कर सके। सवालों के दायरों में सिमटी अपनी जिंदगी से वह मुक्त हो जाना चाहती थी ताकि उसका स्वतंत्र अस्तित्व भी दुनिया में बचा रह सके। 

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