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गृहलक्ष्मी की कहानियां : दंगे वाली दुल्हन

मेरे दर्द से आपा का दर्द कुछ कम नहीं था, मगर मैं क्या करूं…? जिस दर्द को मैं भूलना चाहती थी, उसे कोई मुझे भूलने ही नहीं देता।

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घर की लक्ष्मी – गृहलक्ष्मी कहानियां

माया को उसके सास-ससुर बात-बात पर ताने मारते। उसका पति तो उसे अधिक दहेज न लाने के कारण रोज तानों के साथ-साथ थप्पड़-मुक्के भी मारने लगा। माया की सुबह गलियों से शुरू होती और शाम लात-घूसे लेकर आती। ये सब सहना तो माया की अब नियति बन गया था। रोज-रोज की दरिंदगी को सहते-सहते माया के आंसू सूख चुके थे…

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मृगतृष्णा का दंश – गृहलक्ष्मी कहानियां

वो पेट की भूख, जल्दी और ज्यादा कमाई का लालच ही था जो देवू और बीरू ने चोरी के भुट्टे बेचने का धंधा करने की सोची। उन्हें ये नहीं पता था कि यह लालच आने वाले समय में उन्हें कैसा समय दिखाने वाला है।

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सपनों की उड़ान – गृहलक्ष्मी कहानियां

बचपन से एक सपना था, आईआईटी में एडमिशन लेने का, एक विश्वास कि- हां! कुछ करना है। इस विश्वास ने कब जुनून का रूप ले लिया, इसका मुझे खुद भी पता नहीं चला।

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नम्मो की शादी – गृहलक्ष्मी कहानियां

जब भी मैं नम्रता की कहानी सुनाना चाहता हूं, कलेजा मुंह को आ जाता है यह भी समझ नहीं आता कि कहां से शुरू करूं पता नहीं वह ऊपर वाला ऐसी निष्ठुर कहानियां रचता कैसे है। क्या पत्थर का दिल है उसका ! आज मैंने मन कड़ा करके यह निश्चय कर लिया है कि आपको नम्मो की कथा सुनाकर ही रहूंगा।

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पतझड़ – एक मां ऐसी भी – गृहलक्ष्मी कहानियां

पेड़ का आखिरी पत्ता भी गिर गया था कल। ठूंठ रह गया था आज ,जिसका सूखना तय है। सूखने के बाद लड़की का इस्तेमाल लोग चाहे जिस रूप मे कर सकते हैं। जब तक हरा – भरा था अनगिनत पक्षियों का बसेरा बना, उनके तथा मोहल्ले के बच्चों का क्रीड़ास्थल बना। सावन मे स्त्रियों का झूला लगता था, शाम मे पुरुषों का चर्चा स्थल बनता था।

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आशाओं का सूरज – गृहलक्ष्मी कहानियां

महेश एक बहुत ही होनहार और बुद्धिमान बालक था। उसमें सीखने और जानने की अद्भुत ललक थी। उसके हाथों में तो मानो जादू था। वह अपने चित्रों में प्राण डाल देता था। उसके अध्यापक उसकी प्रतिभा से बहुत प्रभावित थे। वह सुबह स्कूल आने से पहले मंदिर अवश्य जाता था ।

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जै हो गैया मैया की – गृहलक्ष्मी कहानियां

शहर की स्वच्छता को चार-चांद लगाते उस सिविल अस्पताल के पिछवाड़े में खाने लायक कुछ ढूंढने वह वह रोज वहां आती थी। वह आती और बड़ी दिलेरी से रोगियों की जूठन या फिर फलों के सड़े गले छिलके तक खाने में वह गुरेज न करती और उस ढेर पर चढ़ती चली जाती, एक ही झटके में, देश के स्वास्थ्य नियमों को ठेंगा दिखाने की नीयत से शायद। इंजेक्शन की सुईयां तो रोगी तक को नहीं चूकती तो फिर उसके नंगे नखों को छलनी करने से क्योंकर कतराती?

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गृहलक्ष्मी की कहानियां : अंतर्द्वंद

आज सुबह से ही विभा का दिल बहुत बेचैन था। रह रह कर उसे कुछ अनजाना सा भय सता रहा था। जैसे तैसे करके उसने अपना सारा काम निपटाया और छुट्टी का समय होते ही घर के लिए निकलने की तैयारी करने लगी।

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