बरसों से हमारे समाज का यह दस्तूर-सा रहा है कि यहां सज़ा पीड़ित को मिलती है पीड़क को नहीं। क्या हो अगर ये तस्वीर अपना रुख पलट दें तो?
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ऐ गंगा तुम बहती हो क्यूं? – गृहलक्ष्मी कहानियां
चर्चित कथाकार विवेक मिश्र की यह कहानी इस सच को कुरेदती है कि इक्कीसवीं सदी में जमे एक पैर के साथ हम आज भी सोलहवीं सदी में एक पांव से लड़खड़ा रहे हैं। जाति-धर्म से ऊपर उठने की बातें किताबी हैं, असल जि़ंदगी का सच कुछ और है।
चूहा स्टोव गिरा गया
बात उस समय की है, जब मेरी उम्र पांच साल रही होगी। मेरे पिताजी टूर पर बाहर गए हुए थे। गॢमयों का समय था, मेरी मम्मी स्टोव पर दूध रखकर पड़ोसिन आंटी से बात करने के लिए बाहर खड़ी हो गई। वह स्टोव को धीमा करके चली गईं और मुझे हिदायत देकर गई थीं कि […]
बहुत शर्म आई
जब मैं 5-6 साल की बच्ची थी तो अपनी कोई चीज संभाल कर नहीं रखती थी। अपना बैग, कपड़े, जूते सब इधर-उधर फेंक देती थी। चॉकलेट का रैपर हो या आइसक्रीम का कप, खाकर घर में जहां-तहां छोड़ देती। मम्मी समझाती पर मेरी आदत नहीं सुधरी। एक बार मैं छुट्टियों में अपने मामा के घर […]
मैं भी तेरी तरह थी– गृहलक्ष्मी की कहानियां
बचपन में यूं तो सभी बच्चे शरारतें करते ही हैं। बड़े होने पर उन शरारतों को याद करने पर खट्टी-मीठी यादें मन को गुदगुदा जाती हैं। बात तब की है जब मेरी उम्र 4 या 5 साल होगी। मुझे बड़ों की देखादेखी चश्मा पहनने का बड़ा शौक था। पापा, मम्मी, बुआ किसी का भी चश्मा […]
अलजाइमर – गृहलक्ष्मी कहानियां
काकी एक सौम्य, सशक्त और अनुशासित महिला थीं। जीवन का प्रत्येक चरण उनके अनुशासन से बंधा था, लेकिन समय ने अब उनके पांवों को बेड़ियों में बांध दिया था। फूल चुनती काकी का जीवन समय-चक्र ने कांटो से घिरा हुआ बना था। पढ़िए, यह सहज-सरल, लेकिन मर्मस्पर्शी कहानी-
सबूत – गृहलक्ष्मी कहानियां
प्रिया और नवल की शादी को पूरे पांच बरस हो गये थे। वे अपने पारिवारिक जीवन से बहुत खुश थे। काम की अधिकता और जीवन का आनंद उठाने के लिये शादी के शुरुआती दो बरस तक तो उन्होंने परिवार बढ़ाने के बारे में सोचा तक नहीं। अपनी सास माया के दबाव के आगे प्रिया इस बारे में सोचने के लिये मजबूर हो गयी।
ठहरिए, आगे हेलमेट चेकिंग चालू आहे! – गृहलक्ष्मी कहानियां
दोपहिया वाहन चलाने वालों को अगर यह समाचार मिल जाए कि आगे हेलमेट चेकिंग चल रही है तो चालक रास्ता बदल देता। कुछ अपनी डिक्की में रखे हेलमेट को पहन लेते हैं। यह सब चालक केवल चालान से बचने के लिए करते हैं। इन दोपहिया वाहन चालकों को एक्सीडेंट से मौत का डर नहीं लगता, इसलिए हेलमेट नहीं लगाते।
तेज़ाब – गृहलक्ष्मी कहानियां
तेज़ाब से किसी चेहरे को बिगाड़ देने जैसी हरकत वे लोग करते हैं, जो कभी भी अपनी शख्सियत को संवार नहीं पाते। क्या वाकई तेज़ाब का असर किसी के बुलंद हौसलों से ज़्यादा होता है, जानिए इस सशक्त कहानी द्वारा-
आजकल की लड़कियों की पहली पसंद – गृहलक्ष्मी कहानियां
हमें आज दर्द का एहसास तभी क्यों होता है, जब वह खुद हमें ही या हमारे अपनों को ही होता है? जब एक अपराधी सज़ा से बचता है, उसी पल सौ अपराधों की पृष्ठभूमि तैयार हो जाती है। प्रस्तुत है ऐसी ही एक सटीक-सशक्त और प्रासंगिक कहानी-
